इस्लाम की पश्चिमी छवि और ‘दफ्न होती जिंदगी’

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जिस अखबार, जिस मैगजीन को उठाइए उसमें कुछ चुनिन्दा प्रकाशकों की किताबों के बारे में ही चर्चा होती है। एक तो मीडिया में साहित्य का स्पेस सिमटता जा रहा है, दूसरे उस सिमटते स्पेस में भी चर्चा कुछ ‘ख़ास’ ठप्पों वाली किताबों तक सिमटती जा रही है। नतीजा यह होता है कि हमें बहुत सारी अच्छी या जरूरी किताबों के प्रकाशन का पता ही नहीं चलता। कुछ का पता फेसबुक आदि से चल जाता है, कईयों का वहां भी नहीं। मिसाल के लिए, तुर्की की नायाब किताबों के बारे में मुझे भी पता नहीं चला होता अगर चार किताबों का नायाब तोहफा मुझे यात्रा बुक्स से न मिला होता। ये चारों किताबें तुर्की के लेखकों की हैं, उन लेखकों की जो वहां के लोकप्रिय, चर्चित लेखक हैं।

मैं इन किताबों के ऊपर बारी-बारी से लिखने की कोशिश करूँगा। सबसे पहले आज जिस उपन्यास की चर्चा करने जा रहा हूँ वह है 2011 में तुर्की के सर्वश्रेष्ठ उपन्यास के रूप में पुरस्कृत उपन्यास ‘दफ्न होती जिंदगी’, लेखक हैं हाकान गुंडे। अंग्रेजी के माध्यम से उसे सहज, सरल भाषा में हम तक पहुंचाने का काम किया है स्पैनिश भाषा की विदुषी, मार्केज़ के उपन्यास ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सौलिट्युड’ के ऊपर शोध करने वाली, शोध के अंतर्गत उसका अनुवाद करने वाली विदुषी मनीषा तनेजा ने। तुर्की में दो तरह के उपन्यास खूब लिखे और पढ़े जाते हैं- एक तो वहां अपराध कथाएं खूब लिखी जाती हैं और पढ़ी भी जाती हैं, वैसे उपन्यास जिनको अंग्रेजी में थ्रिलर कहते हैं। दूसरे, वैसे उपन्यास जिनके एक आदर्श मॉडल के रूप में मैं ओरहान पामुक के उपन्यास ‘स्नो’ को देखता हूँ। यानी एक ‘उदार’ समाज में कट्टरतावादी इस्लामिक संगठनों के संघर्ष की खूंरेज कहानी। ऐसे कथानक ‘वेस्ट’ के पाठकों को खूब पसंद आते हैं, जो उनके सामने इस्लाम की एक बर्बर छवि पेश करता है। ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ के दौर में इस्लाम को कट्टर बताकर, बर्बर बताकर, मध्युगीन सोच का बताकर पश्चिमी समाज अपनी श्रेष्ठता को पेश कर पाता है। ऐसे कथानक को आधार बनाकर लिखे गए उपन्यासों को एक बड़ा पाठक वर्ग मिलता है, ईनाम इकराम मिलने की सम्भावना बढ़ जाती है।

हाकान गुंडे का यह उपन्यास इसी दूसरे वर्ग का उपन्यास है। एक देरदा है जिसका विवाह 11 साल की उम्र में एक शेख के बेटे से करा दिया जाता है। उपन्यास में जब वह प्रसंग आता है कि गाँव में शेख की गाड़ियों का काफिला जब लड़की पसंद करने के लिए गाँव में आता है तो गाँव का माहौल जिस तरह का दिखाया गया है उससे मुझे बरबस सागर सरहदी की फिल्म ‘बाजार’ की याद आ गई, जिसमें खाड़ी देश का एक पैसे वाला अधेड़ हैदराबाद आता है लड़की पसंद करने ताकि उससे शादी रचाई जा सके। होड़ मच जाती है कि वह मेरी लड़की खरीद ले, वह मेरी लड़की खरीद ले। बहरहाल, देरदा को ब्याह कर लन्दन ले जाया जाता है, वहां पांच साल एक अपार्टमेंट में वह कैदी की तरह पांच साल तक रहती है, जहाँ अपने मर्द की हवस शांत करने एक अलावा उसके पास कोई काम नहीं होता है। एक दिनव अह वहां से भाग निकलती है, हेरोइन की आदी हो जाती है। उसे ऐनी नाम की एक औरत दूसरी जिंदगी देती है। वह पेशे से नर्स होती है, लेकिन देरदा को वह अपनी बेटी की तरह से रखती है। उसकी जिंदगी बदल जाती है। एक दर्द है, कब्रिस्तान में खेलने वाला, ओज्ञुस अतय है। सबके जीवन का अँधेरा पक्ष है, सबके जीवन में उजाला है।

ऐसी कई जिंदगियां हैं, तुर्की के लिए प्यार है, उसके समाज की पेचीदगियां हैं, जीवन के उतार-चढ़ाव हैं, धर्म की बनती-टूटती दीवारों के बीच इंसानियत का उजाला है जो सबको जोड़े रखता है। इसमें कोई शक नहीं है कि इस्लाम के नाम पर होने वाले अत्याचार को केंद्र बनाकर लिखे गए इस उपन्यास का यूएसपी यही है कि इस्लाम कट्टरता बढाता है, दूरियां पैदा करता है, धर्म के नाम पर इंसानी जिंदगियों को दफ्न कर देता है। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि हाकान गुंडे ने अपराध कथाओं की गुत्थियों में, पेचीदगियों में, इंसानी रिश्तों के जज्बात का ऐसा रसायन मिलाया है कि आप उपन्यास की रहस्मयी दुनिया में धंसते चले जाते हैं. 

शुक्रिया यात्रा बुक्स, सबसे बढ़कर शुक्रिया मनीषा तनेजा हमारी भाषा में सहज अनुवाद के जरिये यह उपन्यास पहुंचाने के लिए!

पढियेगा तो हो सकता है, बहुत सारे बने बनाए पूर्वग्रह पुख्ता होंगे, लेकिन यकीन मानिए बहुत सारे टूट भी जायेंगे।

– प्रभात रंजन 

उपन्यास- दफ्न होती जिंदगी, लेखक- हाकान गुंडे, प्रकाशक- यात्रा बुक्स, भारतीय अनुवाद परिषद्, मूल्य- 295 रुपये.   
http://www.uread.com/book/dafn-hoti-zindagi-hakan-gunday/9789383125067                 

5 COMMENTS

  1. Aapki is rai se sahmat nahi hoon ki Orhan Pamuk ki 'Snow' Islam ki kattarta ke vishay mein racha hua upanyaas hai. Mere khayal se 'Snow' ya fir Orhan Pamuk ke dusre upanyaas, kisi ek pahlu ko na dikhakar, do pahloon ke beech peeste hue Turki samaaz ka varnan karte hain. 'Snow' mein ye sangharsh, secularist, jo Ataturk ko apna aadarsh maante hain, aur Islamists, jinka chehra BLUE hai, ke beech hai. Pamuk na yahan Islamists ko bura dikhate hain na Secularists ko aur na hi woh samaaz ke in dono vargo mein se kisi ek ko accha batate hain. Snow secularism aur Islam ki dahleez par khade ek samaaz, ek desh ke sangharsh kahani hai, jiska sunhara samay Islami culture ke sunhere samay se coincide karta par jiski modern neev Ataturk ke secular aur development ki kalpana par aadharit hai. Snow ka marm shayad is prashan mein hai, ki modernity ki raah par badhne ke liye kya apna sunhara ateet bhool jaaye kyonki wah mazhab se zuda hai aur modern, secular Turkey ka swapan jin siddhanto par bana hai unke virodhabhaas hai.

    Is sangharsh mein Pamuk na Islamists ka saath dete pratit hote hai na Secularists. Woh to bas is samaaz aur samay ka aaina dikha rahe hain koi judgment pass nahi kar rahe. Aur shayad yahi Pamuk ke saahitya ki utkrishtta hai.

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