रवीश कुमार की कहानी ‘स्मार्ट सिटी विद 32GB’

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रवीश कुमार की यह संभवतः पहली कहानी है. उनकी सम्मोहक भाषा के हम सब कायल रहे हैं. जो है उससे अलग करने की जबरदस्त प्रतिबद्धता उनके काम में दिखाई देती है, इसलिए वे जो भी करते हैं अलग दिखाई देता है. इस कहानी को भी उनकी छवि, उनके ग्लैमर से हटकर पढ़े जाने की जरुरत है. अपने आइडिया, अपनी भाषा, अपने मेटाफर से सम्मोहित करने वाली कहानी. वह गहरा व्यंग्य तो मौजूद है ही जो उनकी शैली की ख़ास पहचान है. संपादक सत्यानंद निरुपम की भूमिका के साथ आप पढ़िए और अपनी राय खुलकर दीजिए- मॉडरेटर 
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रवीश कुमार पेशे से टीवी पत्रकार, शौक से ब्लॉगिये और मिजाज से एक अच्छे बतकहीप्रेमी हैं. गली-मोहल्ले, नुक्कड़ की चाय दूकान से लेकर किसी भी तरह की भीड़ के बीच पैठ कर चार गाल गप्प मार आने  की खूबी कहिये या शौक, कहने को बातें इनके पास इतनी होती हैं कि पत्रकारिता की नौकरी के फ्रेम में सब कुछ अंट नहीं पाता. और ऐसे में अतिरिक्त कच्चे माल की सप्लाई हम इनके ब्लॉग के पोस्ट से लेकर फेसबुक अपडेट्स और ट्वीट्स तक की शक्ल में देखते-पढ़ते ही रहते हैं. इन सबको मद्देनज़र रखते हुए इनके बारे में मेरी जो समझ बनी है, वह यह कि ये थ्योरियाये हुए हिंदी-दौर में नैरेशन की परम्परा के एक नैसर्गिक और मंझे लेखक-पत्रकार हैं.

बहरहाल, रवीश अपने ब्लॉग ‘कस्बा’ (www.naisadak.org) पर संस्मरणपरक किस्सा ‘वन रूम सेट का रोमांस: दिल्ली मेरी जान’ और लम्बी फैंटेसी कथा ‘आश्रम जाम’ किश्तवार पहले लिख चुके हैं. उसके बाद फेसबुक के दौर में छुटकी कहानियां (micro fiction)  लप्रेक (लघु प्रेम कथा) नाम से अक्सरहां लिखने लगे. जो रेखाचित्रों के साथ पुस्तकाकार रूप में शीघ्र प्रकाश्य हैं. अभी लप्रेक लिखने का सिलसिला हालांकि थमा नहीं है. इसी दौरान हाल में ट्वीटर पर भी ट्रैफिक जाम के दौरान की कुछ बेहतरीन कहानियां लेकर आये. और अब पहली बार एक फुल लेंथ फैंटेसी कथा ‘स्मार्ट सिटी विद 32GB’ लेकर हमारे बीच आये हैं.
रवीश की जो बुनियादी विशेषता है, एक अलग कोण से, एक अलग नजरिये से अपने समय और समाज को देखने और दिखाने की- यह कहानी उससे लैस है. एक समय में कई यथार्थ हम सभी जी रहे हैं.  रवीश वर्चुअल फैंटेसी और रियल कंसर्न के जरिये वर्तमान और भविष्य की कई उलझनकारी परतों को बहुत मजे-मजे में इस कहानी में खोल दे रहे हैं. वे इस कहानी में जितना भविष्य के आतंक को बेपर्दा करते दिखाई देते हैं, उससे ज्यादा वर्तमान को उद्घाटित करते दीखते हैं. पूरी कहानी त्रिकोणात्मक संवाद में गुम्फित है. एक स्तर पर वह वर्चुअल स्पेस में रियल भी है, दूसरे स्तर पर वह वहीँ से उपजी फंतासी है. लेकिन उसका तीसरा सिरा रामप्रवेश का आत्म-संवाद है. एक अद्भुत तनाव और बनाव की इस कहानी को पढ़ते हुए किसी कॉमिक्स कथा को पढने का-सा सुख मिला. आइये, इनका इस उम्मीद से स्वागत करें कि हिंदी कहानी के परिदृश्य में रवीश की यह आमद आगे कोई अलग रंग भरेगी.
सत्यानन्द निरुपम

(डिस्क्लेमर: मैं ‘हिंदी कहानी के परिदृश्य’ का जिक्र कर रहा हूँ, साहित्यिक या गैर साहित्यिक परिदृश्य का जिक्र नहीं कर रहा.)
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स्मार्ट सिटी विद 32GB
रवीश कुमार
रात दो बजे फ्लिपकार्ट पर दुनिया की तीन सौ ‘स्मार्ट सिटी’ के बारे में सर्च कर रहा था। उसके कमरे से बाहर रखे इन्वर्टर की एलईडी लाइट भुकभुका रही थी; ब्लिंक कर रही थी। हां, इन्हीं पलक-झपक लम्हों में चमत्कारी ख़्वाब अवतरित होते हैं। माउस का कर्सर कब उसके 3डी एनिमेशन पर दब गया, पता ही नहीं चला।
और यह क्या!
स्मार्ट सिटी का दरवाज़ा खुलता है.. और सारे रास्ते भागते हुए गेट पर ही आ जाते हैं।
…कहां चलना है?
आटो वालों की तरह सड़कों को चिल्लाते देख रामप्रवेश उर्फ रैमी सहम गया, पर डरा नहीं। कूल’ पीढ़ी के लोग सहमते हैं, डरते नहीं हैं। उनके कंधे थोड़ी देर के लिए संकुचित होते हैं, फिर थोड़े ऊंचे होकर नीचे झड़ जाते हैं। उफ्फ, व्हाट अ सिटी मैन! रास्ते ही पूछ रहे हैं, कहां जाना है? तभी गार्ड कहता है-
…नए हो!
हां, नया हूं।  
…इस शहर में आने से पहले हर रास्ते का एक ‘एप’ डाउनलोड करना पड़ता है। …‘जीपीएस मोड’ में उन रास्तों पर बने मकानों के नंबर डालने पड़ते हैं। …एंड्रायड फोन का आईपी नंबर ही स्मार्ट सिटी का आधार नंबर है। …अगर आपने रास्तों के ‘एप’ डाउनलोड नहीं किये तो यही होगा।
क्या?
…सारे रास्ते यहां आकर चिल्लाने लगते हैं।
… … …
तभी कंप्यूटर के दाहिने किनारे पर नीचे मधुवंती का मैसेज ब्लिंक करने लगा। छह महीने से प्राग की बर्फ में जम रही मधुवंती के पास चैट बाक्स ही अलाव है। इसी के सहारे वो ख़ुद को तपाती रहती है।
“रैमी, क्या कर रहे हो।“
“मैव्स, स्मार्ट सिटी सर्च कर रहा हूं।“
रैमी की अजीब आदत है। मधुवंती को पूरे नाम से बुलाना पसंद करता है; लेकिन जैसे ही किसी एकांत में होता है, उसे मैव्स कहने लगता है। मैव्स रामप्रवेश को हमेशा ही रैमी बुलाती है। 
“प्रह्लादपुर कैसा है, रैमी?”
“और कैसा होगा, मैव्स! प्राग जैसा तो नहीं होगा न। घंटाघर पर दीवाली के रोज़ छब्बीस जनवरी तक की बधाई वाले पोस्टर लग गए हैं। बीसबीस लोगों के चेहरे हैं पोस्टर में। ऐसा लगता है कि गणतंत्र तो इन्हीं से पूरा होता है। घंटाघर के नीचे का कूड़ा साफ हो गया है। कूड़ा कहीं बचा है तो वह है प्रह्लादपुर के कोने-कोने में लगा सफाई अभियान का पोस्टर। बस, इनके साफ होते ही शहर एकदम चकाचक हो जाएगा।“
“वाउ, तो प्रह्लादपुर स्मार्ट सिटी हो जाएगा!”
मैव्स की यह बात रैमी को चुभ गई।
“प्रह्लादपुर कभी स्मार्ट सिटी नहीं होगा। जिन लोगों ने सरकारी ज़मीन पर अतिक्रमण कर अपनी दुकानें आगे बढ़ा ली हैं, उन्होंने झाड़ू के साथ अपनी सेल्फी खींचकर प्रधानमंत्री को भेज दिया है।“
“तो अतिक्रमण कूड़ा नहीं है?
“नहीं। अतिक्रमण कूड़ा नहीं है।“
“रैमी, व्हाट नानसेंस!”
“हां, मैव्स। अतिक्रमण तो बिजनेस है। इससे दुकान बड़ी हो जाती है। पटरी पर और रेहड़ियां लग जाती हैं। इससे तो जीडीपी बढ़ता है। इसीलिए अतिक्रमण को पीएम ने सफाई अभियान का हिस्सा नहीं बनाया है। क्योंकि सारे पोस्टर इन्हीं अतिक्रमण वालों के सौजन्य से लगे हैं। जिनकी भी दुकान है उनके चेहरे किसी न किसी गोले में हैं और वे एक साथ बीस-बीस त्योहारों की बधाई दे रहे हैं। किफ़ायत से ही तो कूड़ा कम होगा।“
“रैमी, फैंटास्टिक। प्रह्लादपुर का जवाब नहीं! यही तो स्मार्ट सिटी के गुण हैं।“
“शट अप, मैव्स! प्रह्लादपुर और स्मार्ट सिटी? एक ‘एप’ तो बना नहीं इस शहर का!”
“घंटाघर है न प्रह्लादपुर का ‘एप“- मैव्स के इस कमेंट से रैमी के भीतर का रामप्रवेश जाग गया। इन्हीं पलों में प्रेमी प्रेमिका के स्वामी बन जाया करते हैं- “तुम स्मार्ट सिटी-विरोधी हो। तुम सुधरोगी नहीं। विरोध की भी हद होती है। साठ साल में घंटाघर ही तो मिला है शहरों को! और तुम कहती हो, घंटाघर ही ‘एप’ है। जनमत का अपमान मत करो। पहले भी कहा है कि रिसर्च का काम करो। पोलिटिक्स तुम्हारे बस की बात नहीं।“
“अरे तुम तो चिढ़ गए, रैमी। हमारे बीच के स्पेस का सम्मान तो करो पहले, बाद में नए शहर का स्पेस तलाश लेना। क्या स्मार्ट सिटी पर मैं मज़ाक भी नहीं कर सकती!”
“मैं मज़ाक ख़ूब समझता हूं, मैव्स। तुम लोग पिटी हुई विचारधारा के बिके हुए माल हो।“
“रैमी, तुम ज्यादा ही तूल दे रहो हो। क्या असहमति की इतनी भी जगह नहीं?” “नहीं है। बहुत बातें हो गईं इस देश में। अब स्मार्ट सिटी बनेगा। स्मार्ट सिटी का विरोध हमारे नेता से वादाख़िलाफ़ी
मैव्स ने फिर कोई जवाब नहीं दिया। रैमी ने कोशिश भी नहीं की।
दोनों का एकांत अब फेसबुक का पेज बन गया था। जहां एक कमेंट पर ऐसी ही लड़ाइयां होने लग जाती हैं। लड़ते-लड़ते एक-दूसरे की बाल की खाल निकालतेनिकालते खाल खींचने लगते हैं दोनों।
… … …
अब सुबह के चार बज रहे थे। रैमी की आंखें झपकने लगीं। एक 3डी ख़्वाब एनिमेशन की तरह चलने लगा.
…आइये रैमी सर, स्मार्ट सिटी में आपका स्वागत है।
…आप 32GB का मकान ले सकते हैं, 64GB और का 125GB के भी।
जीबी’ मतलब
…जैसे आप टू बेडरूम, थ्री बेडरूम और फोर बेडरूम का मकान खरीदते थे वैसा ही समझ लीजिए। …यहां मकान नहीं होते, स्टोरेज कैपेसिटी होती है। …पूरा शहर ‘क्लाउड सिस्टम’ पर है।
…आपका जीमेल अकाउंट होना ज़रूरी है। …एंड्रायड फोन पर हर चीज़ के एप बने हैं। …कंडोम से लेकर पावडर तक सब क्लिक करते ही दस सेकेंड के अंदर डिलिवर हो जाते हैं। …इस्तेमाल के तुरंत बाद सभी सामान ‘क्लाउड स्टोर’ में चले जाते हैं। …आप चाहें तो किश्त बढ़वाकर स्टोरेज कैपेसिटी बड़ा कर सकते हैं। …स्टेट बैंक आफ इंडिया से लोन लेना होगा।
वो तो कब का बंद हो चुका है!
…ब्रिसबेन के ग्लोबल स्मार्ट सिटी बैंक से लोन लेना होगा। …आपके पास आधार नंबर तो होगा न?
है।
…तो फिर अप्लाई कर दीजिए। …आपको यहां कोई दीवार दिख रही है, रैमी साहब
नहीं! बिना दीवार के कोई शहर भी हो सकता है? 
…यही तो स्मार्ट सिटी है। छत भी नहीं है। सिर्फ दो ही फ्लोर हैं।
दो
…हां। …एक ग्राउंड फ्लोर और दूसरा स्काई फ्लोर। …दो गज़ ज़मीन। …बस आप जहां खड़े हैं, वही घर है, वही ज़मीन है। …ईंट न सीमेंट। …आप कमीज़ उतारिये, क्लाउड में स्टोर हो जाएगा। आपको नींद आएगी, क्लाउड से बिस्तर आ जाएगा। …आपके उठते ही बिस्तर क्लाउड में चला जाएगा। …यहां कोई हेल्पर नहीं होता है। …बस आपको क्लिक करना होता है। …कहीं जाना नहीं होता है। …रास्ते ही आपके पास चल कर आ जाते हैं। …आपको बस फोन पर ड्रैग करना होता है। ड्रैग करते ही आपके पास रास्ते से लेकर दुकान तक चल कर आ जायेंगे।
क्याएंड्रायड फोन पर ड्रैग करने से घंटाघर भी मेरे पास चलकर आ जाएगा!
…ये ‘घंटा’ ‘घर’ क्या होता है, रैमी? यहां न घर है, न घंटा। …क्लाउड स्टोर को आप बहुत से बहुत ‘घर’ कह सकते हैं, लेकिन स्मार्ट सिटी में आप घर ही कहेंगे तो… बेटर यू लिव इन प्रह्लादपुर…
… … …
रैमी ने करवट बदल ली। उसे यकीन नहीं हो रहा था। स्मार्ट सिटी का ख्वाब सुनहरा है या ख़ौफनाक, समझ नहीं सका। कई पीढ़ियों से मनुष्य दीवारों से घिरे घर में रहता है, सारे सामान साक्षात होते हैं। वह उन्हें छूकर महसूस करता रहा है। लेकिन यहां तो बीवी से लेकर गर्लफ्रैंड तक के ‘एप’ बने हैं! ‘एप’ डाउनलोड कीजिए और फिर उसमें से प्रेमिका भी डाउनलोड हो जाएगी। एक सौ तीस चेहरों की बनावट वाली प्रेमिकाएं। एक चेहरे से ऊबने से बच जाएंगे।
…. … ….
…रामप्रवेश जी!
तुम्हें कैसे पता चला, मेरा नाम रामप्रवेश है!!
आप जब गेट पर आए थे तभी हमने आपको डाउनलोड कर लिया था।
तो मैं कहाँ-s रहूंगा
…हा-हा-हाआआआ  
क्यों हंस रहे हो, गार्ड?
…इसलिए हंस रहा हूं कि एक बार डाउनलोड होने के बाद आपकी यहां ज़रूरत नहीं रहेगी। …आप वापस प्रह्लादपुर भेज दिये जायेंगे। …घंटाघर के नीचे, भिंडी खरीदने।
व्हाट! लेकिन यहां बुकिंग तो मैं करा रहा हूं!! लोन मैं ले रहा हूं। सबकुछ मेरे नाम से हो रहा है।
…लेकिन रैमी जी, ये स्मार्ट सिटी है। …सबकुछ आपके नाम से होगा, लेकिन आपका नाम यहां नहीं होगा। …यह कोई प्रह्लादपुर नहीं है कि रामप्रवेश को देखते ही उनके पिता जगप्रवेश, उनके पिता सजगप्रवेश, उनके पिता प्रियप्रवेश को याद करने लग जाएं। …एक पीढ़ी के बाद क्लाउड स्टोर से उसकी सारी मेमोरी डिलिट कर दी जाएगी। …जो नया जीबी स्पेस होगा, उसे फिर किसी को बेच दिया जाएगा। 
… … …
रैमी की नींद टूटी तो वह बहुत देर तक खुद को छूता रहा। यकीन नहीं हो रहा था कि वह कहीं और डाउनलोड होकर प्रह्लादपुर में बचा रह सकता है। मेरा दो-दो सेल्फ? एक प्रह्लादपुर में और दूसरा क्यूआरटी स्मार्ट सिटी में! कहीं मैव्स भी तो डाउनलोड नहीं हो गई? हाय राम, मैंने कैसा ख्वाब देखा है! हम नहीं होंगे, लेकिन हम वहां होंगे। कोई मुझे क्रेडिट कार्ड की तरह स्वाइप करेगा और मेरे सेल्फ से कुछ और सेल्फ डाउनलोड हो जाएंगे! एक इंसान की तस्वीर में कितने फ्रेम होते हैं? हर फ्रेम को अलग अलग डाउनलोड किया जा सकता है! हमारे भीतर कितने सेल्फ हैं? अनगिनत। इनमें से कुछ प्रह्लादपुर में रहेंगे और कुछ स्मार्ट सिटी में! एक ही रैमी के कई रैमी, मैव्स के कई मैव्स से इश्क करेंगे? वो भी बिना किसी मेमोरी के! प्रेम ख़त्म तो मेमोरी खत्म या मेमोरी ख़त्म तो प्रेम ख़त्म? क्लाउड स्टोर से हम दोनों फेंक दिये जायेंगे! 
वह झट से उठा और मैव्स को चैट पर मैसेज भेजने लगा-
“आर यू देयर?”
“आर यू देयर?”
… … …
… …
“हां, मैं हूं।“
“कौन-सी वाली मैव्स बोल रही हो?”
“रामप्रवेश, तुम्हारा दिमाग ख़राब हो गया है? मैं सिर्फ मैव्स हूं।”
“हां, लेकिन तुम तो मेरे साथ क्यूआरटी स्मार्ट सिटी में डाउनलोड हो चुकी हो!”

21 COMMENTS

  1. रवीश जी 2008 से ब्लॉगिंग कर रही हूँ कम्प्युटर का कम ज्ञान हने की वजह से बहुत कुछ समझ न्हहिं पाई शायद क़स्बा ब्लॉग पर भी कभी नहीं गयी आपको टी वी पर देखना सुनना बहुत अच्छा लगता था ख़ास कर किसी डिबेट पर मेरे पतिदेव आपके फैन हैं और मई इतनी पागल की आपको पहचान न पाई फेसबुक का धन्यवाद जिसने आपसे परिचय करवाया। देखी सुनी समझी महसूस की कहानी को कोई भी लिख सकता है लेकिन किसी अघटित को कल्पना आधार पर कहानी लिखना किसी ख़ास प्रतिभा के हाथ से ही होता है । कमाल की कल्पना है। बहुत बहुत बधाई शुभकामनाएं।

  2. आने वाले समय की पड़ताल करती दिलचस्प फैन्टसीयुक्त कहानी! रवीश जी को हार्दिक बधाई, और इस अभिनव प्रस्तुति के लिए प्रभात भाई, आपको भी बहुत – बहुत बधाई!

  3. रवीश जी को पहली बार पढ़ा ..और सच में बहुत रोचक लेखन है ..बधाई

  4. टटके समय की खिच्चे लहजे-मुहावरे में कहानी। बेजोड़। नामवर आकाओ के पल्ले शायद न पड़े. लेकिन नई पौध तो हरिया गयी है पढ़ कर. प्रभात भाई! आपका बेहद शुक्रिया। रवीश जी से नयी रविश पर लिखने का आग्रह खूब!

  5. कहानी अच्छी थी, मगर प्राइम टाइम की तरह बीच-बहस में ही खत्म हो गयी… 😉

  6. बहुत ही तीखा कटाक्ष है। रवीश आपको बधाई। काश स्मार्ट सिटी के सपने बेचने वाले क्योटो और बनारस का फ़र्क़ समझ पाते।

  7. सिर्फ कहानी नहीं साइंस फिक्शन का भी अहसास छुपा है इसमें जो आने वाले कल का सच भी हो सकता है…

  8. बहुत सुन्दर –सार गर्भित –उत्तेजक –और कथा तत्व और अपनी कहनात और बनक में एक सचमुच की कहानी –जो इस अकाल में अब देखने –सुनने या पढ़ने नहीं मिलती –रवीश को बधाई

  9. कहानी दिलचस्प है लेकिन एक साथ सैकड़ों अंग्रेज़ी साइ-फाई फिल्में याद आ गईं. क्या फिल्मों की तरह कहानियों का भी रीमेक होने लगा है?

  10. Ravish ji ki kahani padhkar aisa mahsus hua jaise aaj ke aise samay me rah rahi manvata – insaaniyat ke aankho me pal rahe dar ko maine dekh liya ho.. jaise shahar me pahle se hi ab gadiyaan (cars) rah rahi hai aur insaan unki sewa ke liye un gadiyon ke sath rahte ho .. aisa ho gaya sa lagta hai… kal sirf app rahenge aur hum unko chalane wali machine ban ke rah jayenge kya.. bahut hi sateek chitran prastut kiya hai Ravish ji ne.. jitni pranshansha karun kam hai !!

  11. शुरू शुरू में लग रहा था कि कहानी के बजाय कोई राजनी तिक ब्लॉग जैसा ही लप्रेक की तर्ज पर दीप्रेक, बीच में सच में डिजिटल भयावहता से दो चार करवा दिया । 10-50 रुपये के लिए दुकानदार से मोलभाव करना कब से बंद सा हो गया है । ऑनलाइन बेस्ट डील सर्च करो और आर्डर कर दो ।
    01010101010111000
    010010011001001011
    101011110001110001
    सब कुछ ऐसा ही दीखेगा महसूस करिये , यही डिजिटल है ।

  12. रवीश की कहा.नी फैंटैसी की तरह है.स्मार्ट सिटी.स्मार्ट फोन जैसी संज्ञा.विशेषण..हमारे रोजमर्रा के जीवन के उपकरण बन गये है..रवीश ने उस लय और धुन को पकडने की कोशिश की है.कथा के लिये इस मायावी लोक का उपयोग करना चाहिये..फिलहाल रवीश जी को बधाई.

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