श्रीकांत दुबे की कविताएं

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श्रीकांत दुबे कई विधाओं में लिखते हैं. उनको मैं अच्छे कथाकार के रूप में जानता रहा हूँ. इन कविताओं को पढ़कर चौंक गया. कुछ टटके बिम्बों वाली कविताएं. आप भी पढ़िए- प्रभात रंजन 

1.
अन्यों का समुच्चय मैं
मेरी बनावट बुनावट संघटन
रक्त-कणिकाएं डीएनए और क्रोमोजोम्स तक
मिले जुले नतीजे माँ-पिता के
उनके, उनकी पुरखा पीढ़ियों के
मेरे भौतिक विचार
कदम-दर-कदम इस दुनिया ने गढ़े
मसलन लेखाकार बनने की सोच आई मेरे कामयाब(?) चाचा से
कलाजीवी होने की प्रेरणा
एक महान कलाकार की ओर से उपजी
और अभी जबकि साध रहा हूँ
तमाम विकल्पों में से कुछ भी न कर पाने वाला
देश की तरह का मध्यममार्ग
समूचा जीवन मार्ग भी
थोड़ा चाचा थोड़ा उस कलाकार
और बहुत सारा अन्य अन्यों का हुआ
और तो और
खुद के मौलिक होने का दंभ भरती मेरी इच्छाएं तक
आधी अलाँ पाव फलाँ तो छटाँक-छटाँक भर
न जाने किन-किन की हैं
मेरी ही तरह हर कोई अनेक अन्यों का समुच्चय है
यूँ मुझसे किसी का कुछ कहना
बहुतों से बहुतों का कुछ कहना हुआ
और इस तरह व्यक्ति के व्यक्त से लेकर अव्यक्त तक
सब कुछ हुआ सामाजिक


2.

दिन के विरुद्ध 
सुबह एक दाग की तरह सट गई मुझ पर
धूप की कीचड़ में सनता रहा पूरा वजूद
मैंने भाग-भागकर खोजा अंधेरे कोने
रात आने के इंतजार में मरता रहा साँस दर साँस
सांझ हुई, रात की धोबन
बुहारने लगी अपने पाट
मेरी आँखों में उतर आए थकान के रंग
मैं पछीटा गया नींद की पोखर में लगातार
फिर सूखने के लिए मुझे
चाँद की अलगनी पर टांग
सपनों के हवाले कर दिया गया
मैं दिन के भय से दूर
सुस्ताया थोड़ी बेर
कि फिर से आ गयी मुई सुबह

3.

मुक्ति के लिए 
मेरे द्वारा अब तक
जीवन के किसी भी हिस्से में किए
किसी भी वायदे को आज
ठीक इसी क्षण से
खारिज मान लिया जाय
मेरे इस फैसले को अगले हरेक क्षण में
मेरे द्वारा दुहराया जाता हुआ माना जाय
मैं सबसे अपनी
और खुद से सभी कि मुक्ति के लिए
सिर्फ इतना ही करना चाहता हूँ

4.

ठहरना मेरा जाना है 
मेरा जाना चलना नहीं, ठहरना है
चलना मेरे लिए चलने से दूर भागने जैसा कुछ है
  
चलते हुए जहाँ-जहाँ से गुज़र जाता हूँ, यूँ
वहाँ-वहां मेरा जाना खारिज़
लेकिन ठहरकर जहाँ
सोख लेता हूँ चार साँस
पीता हूँ दो घूँट पानी
माटी और देह को एक दूसरे को चीन्ह लेने देता हूँ
दो-एक को अपना अपना बना आता हूँ
दो-एक के साथ रह जाता हूँ थोडा सा
चिरई चुरुंग आम जाउर और मैं, सब
मिलजुल कर अघा जाते हैं एक दूसरे से जब
तब कह पाता हूँ कि कहीं गया 
इस तरह की शैली में जाते हुए
पता है कि जीवन कहीं नहीं पहुंचेगा
लेकिन अब मैं क्या करूँ
किसी और तरीके से कहीं पहुँचने वाले जीवन को
जीवन भी नहीं कह पाता मैं!

5.
लिखता हूँ जिन्हें 
जब जिन्हें लिखता हूँ
वे चले आते हैं उस वक़्त
अपने हरवे-हथियार कुएं-तालाब पहाड़-पठार
और रस्ते-पगडंडियों समेत
मेरी कलम की नोक तक
फिर पसर जाते हैं वहां तक
जहाँ तक पहुँचता है मेरा लिखा
यूँ मेरे इतना करीब आकर पुनः दूर हो जाते हुए
वे सब अंततः मुझसे दूर ही रह जाते हैं
इस तरह हरेक कवि एक यायावर कैदी है
जो आमंत्रित कर सकता है कहीं से किसी को भी अपनी ओर
लेकिन कलम की नोक और उँगलियों के बीच की दूरी
इतनी अधिक होती है
कि उन्हें छू नहीं सकता

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