हम खड़ी बोली वाले हर बात के विरोध में खड़े रहते हैं!

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हिंदी के एक वरिष्ठ लेखक, एक ज़माने में मैं जिनका दूत होता था, भूत होता था, ने एक बड़ी मार्के की बात कही थी. उन्होंने कहा था कि जानते हो हिंदी भाषा खड़ी बोली से बनी है, और इसलिए हर बात पर विरोध में खड़े हो जाना इसके मूल स्वभाव में है. विरोध हम हिंदी वालों का मूल स्वभाव है, मूल प्रवृत्ति है.

80 के दशक में हम टीवी के खिलाफ खड़े हुए. मनोहर श्याम जोशी जब ‘हमलोग’, बुनियाद’ जैसे सीरियल लिखकर हिंदी के परिसर में एक नई शुरुआत कर रहे थे हम हिंदी वाले उनके ऊपर ढेले फेंक-फेंक कर अपनी प्रगतिशीलता का सबूत देने में लगे हुए थे. भारत के सबसे दूरदर्शी प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने जब कंप्यूटर क्रांति, संचार क्रांति की बुनियाद रखी हम हिंदी वाले ऐसे विरोध में लगे रहे जैसे कंप्यूटर आ गया तो हम जैसे निपट ही जायेंगे. सुधीश पचौरी ने जब उत्तर-आधुनिकता की बात की हम उनके खिलाफ खड़े हो गए. 
जब इंटरनेट आया हम सोशल मीडिया के विरोध में खड़े हो गए, खुद को हिंदी के विधाता मानने वाले बूढ़े कहने लगे इससे तो मर्यादाएं टूटने लगी हैं, जो बात गुपचुप में होनी चाहिए वह खुले आम हो रही है.

एक बड़ा अच्छा किस्सा सुनाता हूँ. मेरे एक आदरणीय प्रोफ़ेसर साहब हैं. मिलने पर बड़े प्यार से जानकी पुल ब्लॉग का हालचाल पूछा, फिर ये कहा कि वे फेसबुक ब्लॉग को पढने से क्यों बचते हैं क्योंकि यह समय नष्ट करने का माध्यम है. इस बात पर बड़ा अफ़सोस भी जताया कि अच्छी अच्छी प्रतिभाएं इसके प्रभाव में आकर नष्ट हो रही हैं. जब मैं चलने लगा तो यह कहा- सुनो, तुम जानकीवल्लभ शास्त्री के भक्त रहे हो, उनकी सारी किताबें दिल्ली के एक बड़े प्रकाशक से मैंने छपवा दी हैं, जरा इसके बारे में जानकी पुल पर लिख देना. 
प्रगतिशीलता का यही दुचित्तापन है.

बाद हम बाजार के विरोध में खड़े हो गए. जिस दौर में तथाकथित लघु पत्रिकाओं में शिवराज सिंह, रमन सिंह का चेहरा विज्ञापनों के रूप में अगले-पिछले पन्नों पर छप रहा था, छप रहा है उस दौर में हम भाजपा के विरोध में खड़े हो गए. मैं पूछना चाहता हूँ कि प्रगतिशीलता की वह नैतिक जमीन कहाँ बची है जहाँ खड़े होकर हम दक्षिणपंथी राजनीति का विरोध करें, उनको फासीवादी बताएँ और खुद को प्रगतिशील? जिन राज्यों में दक्षिणपंथी सरकारें हैं, वहां हमारी किताबों की थोक खरीद होती है हम उसका विरोध नहीं करते, हम वहां से मिलने वाले नियमित विज्ञापनों का विरोध नहीं करते हम बस रायपुर साहित्योत्सव का विरोध करते हैं! हमारे इसी दुचित्तेपन ने हमारे विद्रोह को हास्यास्पद बना दिया है. विद्रोह त्याग की मांग करता है. उसके बिना सारा विद्रोह छद्म लगने लगता है. यह कहने लगता है हिंदी पर खतरा है.

मैं विरोध में खड़ा नहीं हूँ. मैं इस आयोजन में गया भी, बिक भी गया और आप चाहे इसके लिए मेरे ऊपर थूकाथुकी भी कर लें लेकिन मैं साफ़ साफ़ कहूँगा कि बड़े सकारात्मक भाव से लौटा. कारण है, इससे पहले बहुत सारे लिटरेचर फेस्टिवल्स में भाग लेने का मौका मिला है. मान-सम्मान, स्वागत-बात में कहीं कोई कमी नहीं रहती है. लेकिन एक कमी हर जगह दिखाई देती है कि दिव्यता-भव्यता तो उनमें खूब रहती है लेकिन हिंदी के लेखकों के असली पाठक उनको नहीं मिलते. रायपुर साहित्योत्सव अकेला ऐसा उत्सव लगा जहाँ माहौल में वह अंग्रेजियत नहीं थी, हिंदी के असली पाठक अपने लेखकों से मिल कर गौरवान्वित हो रहे थे. वहां सारे स्टाल हिंदी के प्रकाशकों के थे और मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि वहां स्टाल लगाने वाला कोई प्रकाशक यह नहीं कहेगा कि उसकी बिक्री कम हुई. अच्छी हुई. यह बात मैं हवा हवाई नहीं कह रहा हूँ. वहां स्टाल पर मौजूद प्रतिनिधियों से बातचीत के आधार पर कह रहा हूँ.

एक और बात, मैं बड़े बूढों की बात नहीं करना चाहता. वे बेचारे तो नए पुराने दो पाटों के बीच फँस गए हैं. लेकिन नए लेखकों ने जहाँ भी बोला जमकर बोला और उनको लेकर सुनने वालों में उत्साह भी खूब रहा. वहां आयोजित सत्रों में जिन दो सत्रों में जबरदस्त भागीदारी देखने में आई, उनमें एक सत्र लोकप्रिय लेखन को लेकर था, जिसमें अदिति महेश्वरी, पंकज दुबे, प्रभात कुमार(प्रभात प्रकाशन वाले) आदि वक्ता थे, और जिन्होंने भविष्य की किताबों को लेकर, समकालीन लेखन को लेकर जमीनी बातें की, क्रांति-व्रांति जैसी हवा-हवाई बातें नहीं! दूसरा सत्र आभासी दुनिया के लेखन को लेकर था जिसमें विनीत कुमार, मनीषा पाण्डे, वरुण ग्रोवर और युवा उत्साह से सराबोर बुजुर्ग जगदीश्वर चतुर्वेदी वक्ता थे और आपका यह जानकी पुल का रखवाला उस सत्र का संचालन कर रहा था. सच बताऊँ तो अभूतपूर्व उपस्थिति थी उस सत्र में और विनीत कुमार को तो जैसे सुनने वालों ने सर पर बिठा लिया.

हिंदी के लेखक को पाठक मिल रहे हैं, बड़े बूढों के सर्टिफिकेट के बिना दमदार युवा लेखकों को पहचान मिल रही है. हम जिस जन-जन का हल्ला मचाते हैं वह हम लेखकों तक पहुँच रहा है. इसमें विरोध की क्या बात है. यह सकरात्मक पहलू है जो आश्वस्त करता है कि आने वाले समय में लेखकों द्वारा लेखकों के लिए किया जाने वाला लेखन समाप्त हो जायेगा, पुरस्कारों के लिए लिए लिखी जाने वाली कवितायेँ कूड़ेदान में चली जाएँगी. हिंदी में पाठकों लेखकों के बीच जीवंत रिश्ता बनेगा. कम से कम रायपुर साहित्योत्सव ने मुझे उत्साह से भर दिया है.

अंत में, जहाँ तक मानदेय लेकर बिकने की बात है तो मुझे इसमें कहीं कोई संदेह नहीं है मैं एक बिका हुआ लेखक नहीं हूँ. मैं पत्र-पत्रिकाओं में लिखता हूँ मानदेय लेता हूँ, लड़-झगड़ कर लेता हूँ, प्रकाशकों से रॉयल्टी लेता हूँ. सभा-समारोहों में पत्रं-पुष्पं लेता हूँ. मैं तो न जाने से कब से बिका हुआ हूँ. यह कोई पहली बार थोड़े न है. साहित्योत्सवों में मानदेय मिलना चाहिए. यह अच्छी शुरुआत है. लेखक बंधुआ मजदूर नहीं होता है, जिस तरह मजदूरों को उचित मजदूरी मिलनी चाहिए उसी तरह लेखकों को उसके लेखन की उचित मजदूरी मिलनी चाहिए. उसके श्रम का मूल्य मिलना चाहिए. तभी उसके लेखन की सार्थकता है. यह मेरा अपना मत है. आप चाहें लाख विरोध करें मैं अपने इस मत से टलने वाला नहीं हूँ.

मेरे आदरणीयों, हिंदी को नकारात्मक मोड(mode) से निकलने दीजिए, सकारात्मक होकर सोचिये. हिंदी के विस्तार में ही हमारा विस्तार है. हमारी भाषा को खड़े खड़े सौ साल से ऊपर हो चुके हैं. अब प्लीज उसे बैठ जाने दीजिए न मंगलेश जी, विष्णु जी!

– प्रभात रंजन 

14 COMMENTS

  1. (3) ‘जिन रायपुर हिन्दी साहित्य महोत्सव नईं वेख्या.. ते जन्म्या नईं' का भाव अपने चेहरे पर लिए एक पंडाल से दूसरे पंडाल तक की यात्रा करते पेनललिस्ट साहित्यकार, ‘मीना बाजार देखने आये हैं’ वाला भाव लेकर थोड़ी देर इस पंडाल में और थोड़ी देर उस पंडाल में घूमते दर्शक, कोटा देकर जिलों से बुलाये गए लोग, स्कूल और कालेजों के कला संकाय के लाये गए छात्र, लेखक, कवि बने राज्य शासन के वर्तमान और पूर्व अधिकारी, नृत्य के लिए आईं आदिवासियों की टोलियाँ और पूरे आयोजन की व्यवस्थित व्यवस्था अहसास करा रही थी कि ईवेंट मेनेजमेंट अब राज्य के सुशासन का स्थायी अंग बनने की ओर अग्रसर है| अभिव्यक्ति की मिली इस स्वतंत्रता से सभी खुश हैं| वे भी खुश हैं, जो व्यवस्था और सत्ता दोनों से शिकायत रखते हैं कि उनको उनकी आवाज उठाने के लिए मंच मिला, और वे भी खुश हैं, जो अभिव्यक्ति की मिली इस सीमित स्वतंत्रता को भी कुचलने/समाप्त करने में लगे हुए हैं| पहले वाले इसलिए खुश हैं कि उन्हें अपना असंतोष जाहिर करने मिल रहा है, चाहे इसके लिए उन्हें अपनी धार को बोथा ही क्यों न करना पड़ रहा हो तो दूसरे वाले इसलिए खुश हैं कि जिन प्रतिगामी नीतियों और बातों को लोगों के सामने रखते ही उन्हें विरोध का सामना करना पड़ता था, अब वे ही विरोध करने वाले उनकी बातों को मौन होकर सुन रहे हैं| पहले वाले को इसका ध्यान ही नहीं कि आज शासन ने दोनों को बुलाया है, कल शासन ऐसा ही करेगा, जरुरी नहीं| दूसरा वाला खुश है क्योंकि वह जानता है कि उसका पांसा सही पड़ रहा है|

    मुख्यमंत्री ने कुछ अर्सा पहले खैरागढ़ में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा था कि अब प्रदेश में सांस्कृतिक पुनर्जागरण का कार्य शुरू हो रहा है, मुख्यमंत्री उसी पुनर्जागरण को इस महोत्सव के जरिये आगे बढ़ा रहे हैं। सुभाष घई जब महोत्सव में बच्चों की शिक्षा में भारतीयता को लाने की बात करते हैं तो वह कैसी भारतीयता चाहते हैं, नहीं बताते, पर इसका एक अच्छा उदाहरण योग गुरु रामदेव देते हैं| रामदेव के अनुसार 'बदलाव से हम सोशल साइंसेज में क्या असर डाल सकते हैं, इसको मैं एक उदाहरण से समझाता हूं। सोशल साइंस में हमें सिखाया जाता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी (जानवर) है, लेकिन अगर हम कहें कि मनुष्य भगवान की देन है तो कहीं ज्यादा बेहतर होगा। मनुष्य भगवान की सबसे अच्छी कृति है। ऐसे में एक स्कूल मनुष्य को एक जानवर बताता है, जबकि दूसरा उसे दैवीय रचना की तरह देखता है।' यही वह पुनर्जागरण है, जिसे वे लाना चाहते हैं| आने वाले समय में सभी देखेंगे कि भाजपा शासित अन्य राज्यों में भी ये महोत्सव प्रारंभ हो जायेंगे, आखिर ये आरएसएस के हिन्दुत्ववादी धुर्वीकरण के लिए किये जाने वाले कार्यों का एक हिस्सा हैं|

    जिन्हें आज ऐसा लग रहा है कि वैचारिक मतभेदों को भूलकर और बहुमत के अल्पमत पर दबाव के बिना अभिव्यक्तियां इस कार्यक्रम के जरिये प्रारंभ हुई हैं और यह एक अच्छी बात है, उन्हें ऐसा अच्छा कितना भी क्यों न लगे, पर उन्हें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि सत्ताएं सिर्फ दमन और शक्ति का ही प्रयोग नहीं करती , वे बौद्धिक चालाकी और काईयांपन को भी एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करती हैं, जिससे उनका खेल चलता रहे…यह भी उसी तरह की चालाकी है|

  2. (2) प्रेमचन्द ने कहा था कि ‘साहित्य देश भक्ति और राजनीति के पीछे चलने सच्चाई नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है’| पर, यह भी सच है कि राजनीति हो या सत्ता, किसी को भी साहित्य की यह भूमिका कभी भी रास नहीं आई| और यदि साहित्य शोषण से मुक्ति और समानता की मांग करने वाला हो तो चाहे लोकतांत्रिक ताकतें सत्ता में हों या प्रतिगामी, दोनों की आंखों में हमेशा खटकने वाला होता है| आज तो कम से कम साहित्य समाज और राजनीति को मशाल दिखाने की भूमिका में नहीं है, बल्कि यह एक भाषा बनकर ही रह गया है, अभिव्यक्ति की भाषा, जैसा कि साहित्य महोत्सव के उद्घाटन पर स्वयं मुख्यमंत्री ने कहा कि साहित्य मनुष्य के विचारों की अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम है। विचारों में भिन्नता हो सकती है, लेकिन वैचारिक विभिन्नताओं में ही नये विचारों के अंकुर खिलते हैं। हमें नये विचारों का हमेशा स्वागत करना चाहिए, सबके विचारों को और असहमति अथवा विरोध को भी सुनना चाहिए।

    इन सबके विचारों को सुनने और सहने का नतीजा यह निकलता है कि एक समय प्रेमचन्द साहित्य के आधिकारिक विद्वान एवं प्रामाणिक शोधकर्ता माने जाने वाले कमल किशोर गोयनका के लिए प्रेमचन्द की प्रसिद्ध कहानी शूद्रा की नायिका की आत्महत्या केवल एक गोरे से अपनी शुचिता को बचाने के लिए की गई आत्महत्या है| कहानी में व्यक्त शूद्रों की स्थिति, धोखे और चोरी से लगभग बंधक गुलाम बनाकर देश से गरीबों को ले जाने की व्यथा, गोरों का अत्याचार, नायक और नायिका का एक दूसरे के लिए प्रेम और पुरुष का स्त्री की उस तथाकथित शुचिता को ही सब कुछ मान लेने की गलत धारणा, गोयनका के लिए कुछ नहीं है| वे इस तरह कहानी को वर्णित करते हैं मानो प्रेमचन्द ने कहानी स्त्री की शुचिता को महिमा मंडित करने ही लिखी हो| यह कोशिश वैसी ही है, जैसा आज सरदार पटेल, गांधी और नेहरू के साथ हो रही है, अपने मंतव्य के लिए अवमूल्यन करके देश के पुराने नायकों को पुनर्स्थापित करना| कमल किशोर गोयनका के लिए ‘साहित्य में शुचिता’ स्त्री तक सीमित है, पुरुष उस शुचिता को बनाए रखने के बंधन और दायरे से बाहर है और ये सब होता है क्योंकि शुचिता और भारतीयता को समान पलड़े पर रखना है| और इसलिए भी होता है कि जिस समाज के पुनर्जागरण के वे हिमायती हैं, उसमें देवी के रूप में तो स्त्रियाँ पूजनीय हैं, पर स्त्रियों के रूप में वे केवल भोग्या हैं और उनकी शुचिता ही उनकी संपत्ति है| अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए उन्हें प्रेमचन्द को सिकोड़ने में भी कोई संकोच नहीं होता है| प्रेमचन्द जो समाज में व्याप्त कुरीतियों, विडंबनाओं, शोषण और विदेशी शासन के अत्याचारों के खिलाफ संघर्ष किये, जिन्होंने गंभीर बीमारी के बावजूद प्रगतिशील लेखक संघ के दायित्व को संभालने में हिचकिचाहट नहीं दिखाई, साहित्य में शुचिता की रक्षा करने वाले साहित्यकार के रूप में सिकुड़ जाते हैं| यह काम मनमाने अतार्किक ढंग से सत्ता आयोजित उत्सव में ही किया जा सकता है|

  3. रोम जलता रहा और नीरो बंसी बजाता रहा, यदि आपको विश्वास नहीं होता होगा तो आप छत्तीसगढ़ आकर देख सकते हैं कि ऐसा होता भी है, जहां हम अभी अभी एक साहित्यिक उत्सव से बाहर आये हैं| जब मुझे पता चला कि राज्य सरकार त्रिदिवसीय साहित्यिक महोत्सव मनाने जा रही है और उसमें स्थानीय ही नहीं, देश भर के जाने-माने साहित्यकारों को आमंत्रित किया जाएगा, तो मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ| धर्म में, फिर वह चाहे कैसा भी धर्म क्यों न हो, उत्सव के लिए गुंजाईश निकालने की परंपरा तो पुरानी हैं| अभी हाल ही में मेरे एक मित्र की मृत्यु हुई| उनके बड़े भाई ने बताया कायदे से तो पहले तेरहीं, फिर छैमासी और फिर बरसी होनी थी, पर आज तेरहवीं में ही हमने सभी कार्यक्रम निपटा दिए हैं, क्योंकि खानदान में एक बच्चे की शादी होनी है| अब किसी एक की मृत्यु हो जाने से पूरे खानदान के उत्सव तो रोके नहीं जा सकते! इसीलिये हमारे प्रदेश में पिचके पेट वाले मरते रहते हैं और भरे पेट वाले उत्सव मनाते रहते हैं| प्रदेश सरकार भी दोनों पेट वालों की मानसिकता समझती है और उसी अनुसार उन्हें उत्सव मनाने के अवसर देती रहती है| ग्राम-सुराज, नगर-सुराज, राज्योत्सव, राजिम-कुंभ और इसमें अब जुड़ गया है, रायपुर साहित्य महोत्सव|

    और फिर इस प्रदेश के पास क्या नहीं है? बिजली कटौती से मुक्त है| प्रदेश के 65 लाख परिवारों को एक रुपये किलो चावल मिल रहा है, मुख्यमंत्री चिकित्सा योजना है, प्रदेश सरकार सभी किसानों का 10-15 क्विंटल धान समर्थन मूल्य पर खरीद रही है| निःशुल्क नमक, सस्ता चना और सस्ती दाल का वितरण किया जा रहा है| छत्तीसगढ़ भूख और पलायन की पीड़ा से मुक्त हो गया है। यही तो वो दुःख हैं, जिन्हें समाज का इलीट स्टेट्स सिम्बल बनाकर दिखावे के लिए जेकेट के समान पहनकर दुखी होते रहता है| यही तो वे पीड़ाएं हैं, जो साहित्यकारों को तड़पाती हैं और उनकी कहानियों, कविताओं और लेखों में व्यक्त होते रहती हैं| जब ये नहीं रहीं तो राजधर्म क्या कहता है? ईलिट को भी बौद्धिक होने का दिखावा करने की भूख होती है| साहित्यकार को भी समाज में प्रशंसित, पुरस्कृत और सम्मानित होने की चाह रहती है, दोनों की चाह पूरी होनी चाहिए| और फिर इतना बड़ा मध्यम वर्ग, उसकी भी तो चाह होती है कि कभी कभी उसे यू नो गाय, फोर आवर्स इन मॉल, वेरी टायरसम, कहने की जगह, टुडे यू नो, आय डिवोटेड होल डे फॉर हिंदी लिट् फेस्ट यार, कहने का मौक़ा मिले| सुभाष घई से चबा चबा कर हिन्दी बोलती मनीषा लाखे को देखकर तो ऐसा ही लग रहा था कि मनीषा और सुभाष दोनों का आईटम उन्हीं दर्शकों को संतुष्ट करने के लिए है|

  4. कभी प्रेमचंद ने कहा था कि “साहित्य देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलनेवाली सचाई नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सचाई है।”
    अब यदि यह बात सत्य है तो….. बेकार में ही देश की जनता को आपस मे ईर्ष्या द्वेष रखने, वाद-विचार के नाम पर मुड़फुटौवल करने दोषी माना जाता है। वे तो वही कर रहे हैं जो साहित्यकारों की मशाल उन्हें दिखा रही है…..!
    (मसला- रायपुर साहित्य महोत्सव )

  5. प्रभात जी,
    हमें ऐसे ही आत्‍मविश्‍लेषण की जरूरत है । साठ-सत्‍तर सालों में जो भले ही कुछ न हुआ हो, हिंदी की ऐसी तैसी सत्‍ता, संस्‍कृति के मठों और लेखकों के गिरोहों ने जरूर कर दी । आईये सब कुछ भुलाकर फिर खड़े हों खड़ी बोली के साथ ।
    नमस्‍कार,
    प्रेमपाल शर्मा
    15.12.14

  6. चलिए ,कम से कम आपमें दुचित्तापन नहीं है !आपमें स्वीकार का साहस है !आपमें समर्थन का माद्दा है !

  7. बधाई।सही सही लिखा है आपने।सत्तर फीसदी लोग भाजपा विरोधी थे।इक्कीस हजार की सम्मान राशि पाकर हम हब धन्य हो गए।यह अब तक का सबसे ज्यादा पारिश्रमिक है।
    वाम से राम की ओर का रास्ता साफ है।

  8. कुछ लोगों का काम सिर्फ़ विरोध करना ही है। सुर सिर्फ़ दांए-बांए होते हैं। रायपुर साहित्य महोत्सव ने सभी को स्थान दिया और विरोध के स्वरों का स्वागत किया। कल जो विरोध कर रहे थे, आज महोत्सव की सफ़लता को देख कर पछता रहे होगे क्योंकि श्रोताओं की भरपूर उपस्थिति ने कार्यक्रम को जीवंत बनाए रखा। नकारात्मकता हमेशा ही दुखदाई होती है और दुखदाई रहेगी। हाँ! आभासी शब्द सर्जना के सत्र के दौरान छत्तीसगढ़ के ब्लॉगर्स का भी जिक्र होना चाहिए था। बाकी तो सब चकाचक हैइए है। 🙂

  9. हर बार की तरह मेरी आवाज आपके तर्क के पक्ष में। सामने विरोध करना और फिर ढके छुपे तरीकों से अपने लिए मलाई भी निकालने की जुगत बिठाना यह हमारी नियति है। क्‍या करें मजबूर हैं। आपने सही कहा कि दक्षिणपंथी सरकारों से अपनी पत्रिका के लिए विज्ञापन जुटाने में कोई गुरेज नहीं लेकिन उनके न्‍यौते पर उनके घर किसी अच्‍छे मकसद से जाना तो भई बहुत बड़ा अपराध है।

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