शैलजा पाठक की कविताएं

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आज शैलजा पाठक की कविताएं. शैलजा पाठक  की कविताओं में विस्थापन की अन्तर्निहित पीड़ा है. छूटे हुए गाँव, सिवान, अपने-पराये, बोली-ठोली. एक ख़ास तरह की करुणा. आप भी पढ़िए- मॉडरेटर 
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1.   इतनी सी ख़ुशी 

 हमने कब कहा बो देना मुझे अपने मन की जमीन पर
 हमने कहा बिखेर देना जैसे खेतों में छीट दिए जाते हैं बीज
 नहीं कहा की नाम देना मुझे मेरे रिश्ते को
इतना कहा की नाम लेना मेरा प्यासे तालू से चटकने लगे जो प्यास
मैं बरस जाउंगी
कभी नही कहा ना की मिल लेना मुझसे
हमेशा मिलना चाहा कि जैसे कोयल की आवाज को चाहतें हरे पेड़ की मिलती है
आवाज की मिसरी हवा में मीठे हो जाते हैं खलिहान
नही कहा कि पास ही रहना हमेशा, साथ रहना की जैसे सूखे पत्ते के साथ रहती है
हवा
कि जैसे पत्तों पर चमकता हैं बरसों का टीका सिंदूर
कि टूट गए पत्तों को छुपा लेती माटी दो मुस्कराते पत्तों को सौंपती सी
मुस्कराती है
कि आग रहती है सीने में
कि मुलाकात के दुपट्टे पे चिपके रह जाते है कुछ घास फूस
रहना साथ हमेशा
हमारी दूरियों में हवा बनाती है एक पुल
दहकती आग से जलता है गाँव का सिवान
बादलों पर सवार संदेसे बिखरे तो रहते है आसमान की छाती पर
मेरे घर के रेडियो में तुम्हारे शहर की बात होती है
तुम्हारी खिड़कियों से उतरते रंग का समन्दर इधर है
आम प्रेमिकाओं की तरह कहना तो चाहती हूँ कि मेरे रहना सिर्फ और सिर्फ
पर तुम रहना जरूर यही कहती हूँ
तुम कहना जरूर अपने मन की
घोसले में खुले चोंच की चिड़ियाँ
इतनी बड़ी दुनिया से एक तिनका चाहती है बस
२. जीना जानते हैं हम
हम शुरू से शुरू नही कर सकते
हम अंत से शुरू होते हैं
हमारे हाथ में पिछली गिरी दीवारों की रेत है
हमारे हाथ में चिपके आकाश का रंग सफ़ेद है
हम चूल्हे में जान फूंकते हैं
हम मसालों से सने देह वाली औरतें
स्वाद भर याद रहते हैं तुम्हें
हम पिछली तारीखों के कैलेण्डर से बिछे हैं
तुम्हारी फाइलो के नीचे
हम सांवली आँख से घिरे समन्दर में
अपनी कश्तियाँ डुबोते हैं
कोर पर बच जाते हैं
हम जागते हुए सारी रात
तुम्हारे कन्धों पर तेज साँसों से टपक जाते हैं
हम गया हुआ कल है
पुरानी बातों पर मुस्कराते हैं
हम अपने भूले प्रेमी के नाम के पहले अक्षर को याद कर एक पूरी कहानी जी आते हैं
हम भविष्य सूंघते हैं
हम वर्तमान बनाते हैं
हम अतीत के पुराने घिरे बवण्डर में
बेतहाशा भाग रही औरतें
तुम्हारी खोखली दीवारों पर कितने इतिहास लिख जाते हैं
तुम्हारी तेज सांस मेरी खुली आँख पर नही ख़तम हो जाती हमारी कहानी
३. अम्मा रोई थी
अम्मा रोई थी
दीदी की सगाई में
बेटियों की विदाई में
भाई के उदासी में
पिता की दुरूह खांसी में
पूजा घर में भी न जाने क्या क्या याद कर
दूसरों की दुःख में पीड़ा में
एक बार तो भाई को नौकरी मिलने पर भी रोई
कई त्योहारों पर रोई थी
अपनी बेटियों को याद कर
उनके भरे खुशहाल परिवार की फोटो पर भी
हाथ फेरती भिगोती रही आँखें
एक बार मुझे खिलखिलाते देख भी सुबक पड़ी कि
सुबह चली जाने वाली हूँ मैं
ससुराल
एक दिन एकदम से चुप लगा गई
कितने ही कन्धे कांपे पर अम्मा न हिली
सब रहे रोते
अम्मा न रोईं
ये पहली दफा था
बिना आँचल बिना गोद हमने अपने आप को अकेले रोते देखा….
४ .फैसला
तितलियों ने त्याग दिए रंगीन पंख
गोरैया ने बेहिचक सौप दी अपनी उड़ान
नन्ही सी गुड़िया ने एकदम से छोड़ दी रंगीन पेन्सिल
आहत समय के घाव को सहला रही मक्खियाँ
हम एक घोषणा पत्र लिख रहे
एक आवाज हो रहे हम
बेरहम समय के भरोसे
टिका प्यार रेत की दिवार हो रहा
पंचायतें पेड़ों के नीचे चिता जलाये बैठी है
छुरियों पर रेते गए गर्दनों की आखिरी हिचकी है
इतने काले समय में
हम मरने से बदतर जी रहे
प्रेम अलविदा कहता हुआ दो टूक धरती की छाती में समा जाना चाहता है
मोमबत्तियों में जलाये जायेंगे धरे हुए प्रेम पत्र
आखिरी बार रौशनी देखेगी धरती
फिर राख हो जायेगी
हम सबने कर दिए हस्ताक्षर
तुम फैसले सुनाना
५. बताना जरा
तुम याद आते हो
जबकि चाहती हूँ भूल जाना
कितनी दरवाजे खिड़कियां बन्द कर लूँ
ये मन के रास्ते तो पूरा गाँव ही भागता सा चला आये
याद भी न जिद्दी घास होती है
जहाँ उम्मीद न हो वहां उग जाये
तुम्हें भूलूँ तो याद भी क्या करूँ
तुमसे ही जुड़े हैं झरने गीत गाते से
नदिया मचलती सी
ठहरी सी शाम का काँपता पत्ता
उलझे बालों की मुस्काती फ़िक्रें
और तुम्हारी कविता में रूप बदल कर मिलने वाला पहाड़
पता है आदतन जारी है साँसों का आना जाना
भींगे कपड़े को सुखाना
आग को कम ज्यादा करना
हथेली पर चखना नमक का स्वाद
बिस्तर पर लेटते ही पहली मुंदी आँख में उभरा चेहरा
ये झल्लाकर दीवारों पर नए रंग क्यों चढाते हो
पिछले रंग की मायूस पपड़ियाँ उभर आएँगी न
पहले उन्हें सहेजते
बेखुदी में खेलती हूँ बचपने सा खेल
भूल गए याद हो भूल गए याद हो
भूल गए वाले पंखुरी पर याद आ जाते हो
मुस्कराती आँख की झील में डूब कर भी नही डूबती किश्तियाँ
ये पारे सी फैलती याद ये दूरियों की किरचें
जादुई रास्तों पर याद साथ मिलने की बातें
कलेंडर में मिलने की तारीख किस रंग से लिखी होती है बताना जरा …

9 COMMENTS

  1. ज़रा सा जानता हूँ इस लड़की को! ये सतत लड़की ही रहने वाली है. भावुकता इसके डीएनए का मूल आधार है. ये कवितायें स्मृतियों में ठहरे मगर जीते-जागते पलों को उनकी पूरी अनिश्चितता समेत ज्यों का त्यों धर देने की कोशिश हैं. हम सोचते रह जाते हैं वो लिख देती है. ….बेखुदी में खेलती हूँ बचपने सा खेल…भूल गए याद हो भूल गए याद हो..ऐसी बेखुदी में चुने गए ये शब्द तरतीब लेकर उसकी कविता बन जाते हैं..

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