‘रॉय’ ने मेरे भीतर के ज्ञान-चक्षु खोल दिए हैं!

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फिल्म ‘रॉय’ की आपने कई समीक्षाएं पढ़ी होंगी. यह समीक्षा लिखी है हिंदी की जानी-मानी लेखिका अनु सिंह चौधरी ने. जरूर पढ़िए. इस फिल्म को देखने के लिए नहीं, क्यों नहीं देखना चाहिए यह जानने के लिए- मॉडरेटर.
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इस रॉयने मेरे भीतर के ज्ञान-चक्षु खोल दिए हैं। फिल्म ने मेरे तन-मन-दिल-दिमाग पर ऐसी गहरी छाप छोड़ी है कि इसके असर को मिटाने के लिए टॉरेन्ट पर टैरेन्टिनो की कम से कम पांच फ़िल्में डाउनलोड करके देखनी होंगी। बहरहाल, महानुभाव रॉय और उनसे भी बड़े महापुरुष फिल्मकार-लेखक विक्रमजीत सिंह की बदौलत मैंने ढाई सौ रुपए गंवाकर सिनेमा हॉल में जो ज्ञान अर्जित किया, वो आपसे बांटना चाहूंगी। (वैसे भी ज्ञान बांटने से जितना बढ़ता है, सदमा बांटने से उतना ही कम होता है।) 
ज्ञान नंबर १ – अगर आप कबीर ग्रेवाल (अर्जुन रामपाल) की तरह सेलीब्रेटेड फ़िल्म राईटर-डायरेक्टर बनना चाहते हैं, तो आप सिर्फ़ और सिर्फ़ टाईपराईटर पर अपनी स्क्रिप्ट लिखें। फ़िल्म लिखने के लिए प्रेरणाका होना जितना ज़रूरी है, उतना ही ज़रूरी आपके सिर पर फेडोरा स्टाईल टोपी का होना। प्रेरणामलेशिया जैसे किसी देश में मिलती है। मलेशिया जाकर शूट किया जाए तो आधे-अधूरे स्क्रीनप्ले से भी काम निकल जाता है। 
ज्ञान नंबर २ – एक सफल फिल्मकार और लेखक होने के लिए आपका चेन स्मोकर और एल्कोहॉलिक होना अत्यंत आवश्यक है। हां, ध्यान रहे कि आप बार में ड्रिंक मांगे तो द मैकेलैन, वो भी तीन आईस क्यूब्स हों। सिर्फ़ तीन। उसके बाद ही आप गर्लफ्रेंड नंबर २३ को पटाने की ज़ुर्रत करें। (‘What were you smoking when you wrote this’ जुमले का मतलब आज जाकर समझ में आया है!
ज्ञान नंबर ३ – आपकी फ़िल्म बन सके, इसलिए लिए ईरानी नाम का कोई पपलू फाइनैंसर ढूंढ लें। मीरा नाम की एक असिस्टेंट हो तो और भी अच्छा। बाकी प्रेरणाएंतो आती-जाती रहती हैं।
ज्ञान नंबर ४ – एक फ़िल्म लिख पाने के लिए अपने भीतर के ऑल्टर ईगो को तलाशना ज़रूरी होता है। आप अपने ऑल्टर ईगो के जितने करीब होंगे, फ़िल्म उतनी ही ऐब्स्ट्रैक्ट और कमाल की बनेगी। दर्शक ख़ुद को फ़िल्म और फ़िल्म के किरदारों के करीब महसूस करें, इसकी बिल्कुल ज़रूरत नहीं है।
ज्ञान नंबर ५ – संगीत के लिए तीन किस्म के रिहैश का इस्तेमाल किया जा सकता है – अंकित तिवारी स्टाईल रिहैश, बेबी डॉल स्टाईल रिहैश और ईडीएम यानी इलेक्ट्रॉनिक डांस म्यूज़िक स्टाईल रिहैश।
ज्ञान नंबर ६ – फ़िल्मों तीन किस्म की होती हैं – एक वो जो दर्शकों के लिए बनाई जाती है – मसाला फ़िल्में टाईप की। दूसरी वो, जो आलोचकों और फेस्टिवल सर्किट के लिए बनाई जाती है। तीसरी किस्म का पता मुझे रॉयफ़िल्म देखकर चला है – वो जो ख़ुद को समझने के लिए बनाई जाती है।
ज्ञान नंबर ७ – डायलॉग लिखने के लिए रॉन्डा बायर्न और पॉलो कोएल्हो को पढ़ना और आत्मसात करना ज़रूरी है। बाद में आपके डायलॉग इनकी बहुत ख़राब कॉपी लगें भी तो कोई बात नहीं।
ज्ञान नंबर ८ – – आप किस तरह के इंसान हैं, ये बात आपकी राईटिंग से पता चलती है। ये ज्ञान मैंने नहीं बघारा, फ़िल्म में जैक़लीन फर्नान्डीज़ कहती हैं।
 ज्ञान नंबर ९ – रणबीर कपूर के मासूम चेहरे पर बिल्कुल नहीं जाना चाहिए। लड़का जितना भोला दिखता है, उतना है नहीं। उसको पता था कि ये फ़िल्म देखकर लोग उसे गालियां देंगे। लेकिन हॉट बेब जैकलीन की कंपनी का लालच गालियों से बढ़कर होता है।

ज्ञान नंबर १० – ब्रेकअप की कोई वजह और बहाना न सूझ रहा हो तो इस वैलेंटाईन अपने बॉयफ्रेंड को रॉय का टिकट तोहफ़े में दें। वो आपको इस धोखे के लिए कभी माफ़ नहीं कर पाएगा, और बैठे बिठाए आपका काम निकल आएगा। (आपको साथ जाने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं। जो ढाई सौ रुपए बच जाएं उसकी मुझे कॉफ़ी पिला दीजिएगा।)

1 COMMENT

  1. फिल्म समीक्षा के इस नए-नवेले ढंग ने आकर्षित किया। मौका लगे, तो आप एक फिल्म समीक्षा यह भी पढ़िएगा।(…दिल से मत लें, मैं तो अपनी बड़वर्गी में कह गया। आप न भी पढ़े, तो कोई बात नहीं। लेकिन, छोटों के भी कहे पर कान देना चाहिए; है न!)
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    मेडल हासिल करना महज हार-जीत के निर्णय में तमगा पा लेना नहीं है। इस उपाधि का अर्थ है-ऐसी विशेषता या असाधारण धर्म जो एक वस्तु को दूसरी वस्तु से अलग करता है।…खेल-जगत में खिलाड़ी मेडल पाते हैं, तो सम्बन्धित देश स्थान और वरीयता। खेलप्रेमी अपने खिलाड़ियों के उम्दा प्रदर्शन और उनके अथक परिश्रम के आगे सर नवाता है, तो मेजबान देश मेहमान खिलाड़ियों को शुक्रिया कहना नहीं भूलते।….लेकिन, सच का कैनवास बस इतना ही है। क्या हमें किसी खिलाड़ी की निजी जिन्दगी से कोई वास्ता-रिश्ता नहीं होता है? क्या हम कभी उनके मन की बेचैनियों को शिद्दत से महसूस करते हैं? क्या कभी उनकी ‘परफार्मेंस’ और ‘पर्जेंटेशन’ से इतर कुछ और अधिक जानने की चेष्टा-प्रयत्न करते हैं? जवाब है, रुपहले पर्दे पर अवतरित-‘मेरी काॅम’।

    परिकथा के अगले अंक में राजीव रंजन प्रसाद लिखित….‘मेरा नाम 'मेरी काॅम’

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