क्या हिंदी प्रकाशन जगत में नए दौर की शुरुआत हो गई है?

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कल की दोपहर बड़ी ख़ास थी. वसंत की दोपहरें आम तौर पर उदास करने वाली होती हैं. धूप की गर्मी, हवाओं की चोट, गिरते पत्तों का शोर. लेकिन इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर की वह दोपहर ख़ास थी. 28 फरवरी का दिन हिंदी के सबसे बड़े प्रकाशन समूह राजकमल प्रकाशन समूह का स्थापना दिवस होता है. कल 66वां था. आम तौर पर यह समारोह रात के अँधेरे में होता था कल दिन में हुआ. लेकिन सबसे बदलावों भरा हुआ.

दिन के उजाले में राजकमल प्रकशन समूह ने जब नई नई घोषणाओं की झड़ी लगाई, नए इम्प्रिन्ट्स की बाबत जानकारी साझा की तो मैंने अपने बगल में बैठे मित्र से कहा- देखना अब समय आने वाला है कि हम भी नई कहानी के दौर के लेखकों की तरह अपने लेखन से आजीविका कमा सकेंगे. उसने कहा, तुम हिंदी को लेकर हमेशा उम्मीद से भरे रहते हो. मैंने कहा, हिंदी मेरे लिए उम्मीद का दूसरा नाम है. असल में, इस उम्मीद का कारण था. राजकमल के सम्पादकीय निदेशक सत्यानंद निरुपम ने जब लेखक और प्रकाशक के बीच पारदर्शिता की बात की, यह बताया कि हम ऐसी व्यवस्था की शुरुआत करने जा रहे हैं जिससे लेखकों को यह आसानी से पता चल सकेगा कि उसकी किताबों की बिक्री की क्या स्थिति है. एक हिंदी लेखक के लिए इससे अधिक आश्वस्ति की बात क्या हो सकती है. साफ़ लग रहा था कि राजकमल अपने 66वें साल में एक नए दौर में कदम रख चुका है.

नए बदलावों की शुरुआत इस बार पुरस्कारों में भी दिखाई दी. इससे पहले राजकमल कृति सम्मान के नाम पर अपने प्रमुख लेखकों को पुरस्कृत किया करती थी. इस बार कृति सम्मान नहीं दिया गया. इस बार राजकमल ने  सृजनात्मक गद्य सम्मान जिन दो कृतियों को दिया वे सच में सृजनात्मक गद्य के मील स्तम्भ की तरह हैं- मालचंद तिवाड़ी की किताब ‘बोरुन्दा डायरी’ और रवीश कुमार की ‘इश्क में शहर होना’. यह नए दौर की शुरुआत भर नहीं है उसका स्वीकार भी है.

राजकमल की एक नई टीम बन गई है- सम्पादकीय निदेशक, मैनेजिंग एडिटर, ब्रांड मैनेजर जैसे शब्द इससे पहले मैंने हिंदी प्रकाशन जगत में नहीं सुने थे. साथ में युवा निदेशक मंडल जिनकी जनतांत्रिकता कल के कार्यक्रम में साफ़ झलक रही थी. अपनी स्थापना के 66वें साल में ही सही राजकमल ने पेशेवर रुख अख्तियार करके यह बता दिया है कि प्रकाशन जगत में वह मार्किट लीडर रहा है और नए बदलावों को जगह देकर उसने अपने आपको फिर से मार्किट लीडर के रूप में स्थापित किया है.

मैं राजकमल का मूल रूप से लेखक नहीं हूँ. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि एक लेखक के रूप में इन बदलावों का स्वागत न करूँ. हिंदी के प्रकाशक पेशेवर हों, पारदर्शी हों राजकमल ने उसका रास्ता दिखा दिया है. यह बता दिया है कि बिना पेशेवर हुए, बिना लोकप्रिय को स्वीकार किये आगे का रास्ता मुश्किल है.

भालचंद नेमाडे, नामवर सिंह को देखना, सुनना तो जैसे बोनस था.

राजकमल का यह स्थापना दिवस हिंदी में अलग से रेखांकित किये जाने लायक है. किया जायेगा. 

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