हास्य रस और विश्व सिनेमा

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प्रचण्ड प्रवीर बहुत दिनों से रस सिद्धांत के आधार पर विश्व सिनेमा का अध्ययन कर रहे हैं. इस बार हास्य रस के आधार पर उन्होंने विश्व सिनेमा पर एक दिलचस्प लेख लिखा है- मॉडरेटर 
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इस लेखमाला में अब तक आपने पढ़ा:
1. हिन्दी फिल्मों का सौंदर्यशास्त्र http://www.jankipul.com/2014/06/blog-post_7.html
2. भारतीय दृष्टिकोण से विश्व सिनेमा का सौंदर्यशास्त्र http://www.jankipul.com/2014/07/blog-post_89.html
3. भयावह फिल्मों का अनूठा संसार http://www.jankipul.com/2014/08/blog-post_8.html
4. वीभत्स रस और विश्व सिनेमा http://www.jankipul.com/2014/08/blog-post_20.html
5. विस्मय और चमत्कार: विश्व सिनेमा में अद्भुत रस की फिल्में http://www.jankipul.com/2014/08/blog-post_29.html
6. विश्व सिनेमा में वीर रस की फिल्में – (भाग) http://www.jankipul.com/2014/09/blog-post_24.html
7. विश्व सिनेमा में वीर रस की फिल्में -(भाग २) : http://www.jankipul.com/2014/10/blog-post_20.html
8. शोक, पीड़ा, और कर्त्तव्य: विश्व सिनेमा में करूण रस की फिल्में (भाग) :http://www.jankipul.com/2014/11/blog-post_12.html
9. शोक, पीड़ा, और कर्त्तव्य: विश्व सिनेमा में करूण रस की फिल्में (भाग) – http://www.jankipul.com/2014/11/blog-post_28.html
10. क्रोध भाव और रौद्र रस: विश्व की महान कृतियाँ http://www.jankipul.com/2014/12/blog-post_18.html
भारतीय शास्त्रीय सौंदर्यशास्त्र के दृष्टिकोण से विश्व सिनेमा का परिचय कराती इस लेखमाला की दसवीं कड़ी में हास भाव और हास्य रस की विश्व की महान कृतियों का अवलोकन

हँसी, ठिठोली, और व्यंग विश्व सिनेमा में हास्य रस की फिल्में

सबसे पहले यह बात साफ कर लेनी चाहिये कि हँसने और रोने का शाब्दिक साहचर्य किसी सैद्धांतिक साहचर्य की तरफ इंगित नहीं करता है। जो भी सिद्धांत या प्रमेय हँसने के लिये प्रयोग किये जायें, उसका विलोम प्रलाप पर नहीं लग सकता। यह किस्सा सबने सुना होगा कि किसी सम्मेलन में किसी वक्ता ने एक मजेदार चुटकुला सुनाया। सुन कर लोग बहुत हँसें। पेट पकड़पकड़ हँसें। वक्ता ने वही चुटकुला दोबारा सुनाया। इस बार कम लोग हँसें। एकदो बार और दोहराने से कोई भी श्रोता नहीं हँसा। वक्ता ने सवाल किया कि जब एक चुटकुला को बारबार दोहराने से हँसी नहीं आती तो एक ही ग़म को बारबार दोहरा कर लोग ग़मजदा क्यों हो जाते हैं। तथाकथित वक्ता को जो भी उद्देश्य रहा हो, यहाँ पर यह साफ कर देना उचित होगा, कि हँसना सुख की अनुभूति का प्रतीक विशेष तो है, पर एकमात्र प्रतीक नहीं। इसी तरह रोना दुःख का एकमात्र प्रतीक नहीं है। इसलिये हँसने और रोने को एक दूसरे का विलोम समझने की गलती साधारण मनुष्य करते हैं, लेकिन इससे बचना चाहिये वरना चिंतन संपूर्ण शुद्ध नहीं रहेगा। तदुपरांत अशुद्ध चिंतन से विचारों में दोष आ जायेगा।
भरतमुनि के अनुसार हास्य रस का उद्भव हास स्थायीभाव से होता है। इसके विभाव अनुचित वस्त्र या आभूषण, धृष्टता, लालच, झगड़ा, विकृत अथवा दोषपूर्ण शारीरिक अंग, अप्रासंगिक शब्दों का प्रयोग, विभिन्न प्रकार के दोषों का उल्लेख आदि उद्धृत हैं। इसके संचारी भाव अथवा व्यभिचारी भाव आलस्य, नींद, स्वप्न, अवहित्थ (चतुरता पूर्वक मन की भावनाओं या विचारों का छिपाव), अनिद्रा आदि हैं। इस के अनुभावहोठों का हिलना, नाक और गालों का हिलना, आँखों का विस्तार या संकुचन, स्वेद, चेहरा का रंग बदलना आदि हैं।
हास भाव दो प्रकार के होते हैं :- ) आत्मस्थ हास,  और २) परस्थ हास।
भरतमुनि के अनुसार आत्मस्थ हास उसे कहते हैं जब आदमी खुद पर हँस रहा होता है, और परस्थ हास उसे कहते हैं जब आदमी दूसरों पर हँस रहा होता है। इसमें संशोधन करते हुये अभिनवगुप्त का मत है कि आत्मस्थ हास वैसे हास को कहते हैं जिसमें उपरोक्त विभाव के कारण से हँसी आये। परस्थ हास उस तरह के हास को कहते हैं जहाँ हँसते हुये लोगों को देख कर हँसी आ जाये, और हँसी का कारण बाद में पता चले। हास संक्रमण स्वाभाव का है, जब कि रति, शोक, क्रोध आदि संक्रमित नहीं करते। किसी भी हँसते हुये आदमी को देख कर हम खुद ही हँसने लगते हैं।

नाट्यशास्त्र में छः तरह के हास इस प्रकार वर्णित हैंस्मित, हासित, विहसित, उपहासित, अपहासित, अतिहासित। (हिंदी में केशवदास ने केवल मंदहास, कलहास, अतिहास तथा परिहास नामक चार ही भेद बताये हैं।) नाट्यशास्त्र के अनुसार नाटक में श्रेष्ठ पुरुषों के लिए स्मित और हासित जैसे ध्वनि रहित हलके हास्य के रूप नियत किये गये हैं। इन दोनों में चेहरे के खिलने के अलावा, दांत दिखने और न दिखने का अंतर भर है। मध्यम प्रकार के पुरुष के लिए विहसित (जिस हँसी में आवाज़ सुनाई दे), और दूसरों को मजाक उड़ाने के लिये उपहास नियत किये गए हैं। निम्न प्रकार के पुरुषों के लिए अपहासित (जिसमें हँसतेहँसते आँखों से आँसू निकल जाए) और अतिहसित (जिसमें पूरा शरीर हँसी से काँप रहा हो, आँखों से आँसू निकल रहे हो, और हँसने के आवाज़ बहुत ही तेज हो) नियत किये गए हैं। 

नाट्यशास्त्र की तरह ग्रीक नाटकों में भी ट्रेजेडी श्रेष्ठ पुरुषों के लिएऔर कॉमेडी तथाकथित निम्न पुरुषों के अभिनय के लिए रखी गयी थी। यूनानी दार्शनिक अरस्तू अपनी पुस्तक Poetics  पोएटिक्समें हास्य भाव को सार्वभौमिकता के उदहारण के लिए चुनते हैं। इसी पुस्तक का दूसरा भाग आज अनुपलब्ध है, इसमें उन्होंने हास्य भाव की चर्चा की थी। यह अब खोयी मानी जा चुकी है। पश्चिमी विद्वान, नोबल पुरस्कार विजेता हेनरी बर्गसन Henri Bergson (1859- 1941) का हास्य और हास्यप्रद पर लिखा वृहद् निबंध आज भी हास्य परिचर्चा के लिए मानक है बर्गसन ट्रेजडी और कॉमेडी में अंतर रेखांकित करते हुये कहते हैं ट्रेजडी एक व्यक्ति विशेष से जुड़ी होती है, और कॉमेडी एक वर्ग विशेष से, हालाँकि ये दोनों बड़े ही विशिष्ट ढंग से निरूपित होती है
पुर्तगाली दार्शनिक स्पिनोज़ा ने हँसने को शरीर के उपान्तर से जोड़ कर देखा और वे भाव में उसकी गिनती नहीं करते। स्पिनोज़ा के द्वारा परिभाषित भाव बहुत हद तक निष्क्रिय मनोभाव जैसे हैं, और नाट्यशास्त्र के भाव के व्यापक अर्थ (उदहारण के तौर पर कई भाव जैसेमरण, आलस्य, अनिद्रा, स्तम्भन, वैवर्ण्य, स्वरभंग आदि) से बिलकुल ही अलग हैं। यहाँ पर रस भाव के लिये महत्वपूर्ण चर्चा बिंदु है। स्थायीभाव तब तक भाव हैं जब तक वे मानसिक हैं, रस प्राप्ति के समय उनकी अर्थक्रियाहोना आवश्यक है। मतलब अगर शोक है तो करूण रस के लिये रोनाधोना, विलाप करना, या आँखों में आँसू आ जाना अर्थक्रिया हैं। इसके बिना रस सिद्धि नहीं होती।
हास्य रस कई मायनों में अनोखा रस है। पाश्चात्य विद्वानों के पास भी हँसी, ठिठोली, व्यंग, मज़ाक, चुटकुला इन सबों के लिये कोई एक सिद्धांत नहीं है। हास्य रस अपने स्थायीभावहास भाव से बहुत मिलता जुलता है, ठीक वैसे जैसे भयानक रस भय भाव से जुड़ा हुआ है। अब बात आती है स्थायीभाव और रस के बीच अंतर की। रस की निष्पत्ति के संदर्भ में हम जानते हैं कि सहृदय (कवि के सदृश हृदय रखने वाला) प्रेक्षक में किसी विभाव के हृदयसंवाद (सहभागिता) से उत्पन्न व्यभिचारी (या संचारी) भाव प्रेक्षक के चित्त को किसी स्थायीभाव की ओर ले जाते हैं। यह स्थायीभाव किसी आलंबन (विषय और आश्रय (काव्य का पात्र)) के द्वारा प्रेक्षक की तन्मयीभावना (खुद को उसमें लीन कर लेने) की सहायता से अपने संबंधित रस में रूपांतरित हो जाती है।

हास्य रस और हास भाव के बीच समस्या आश्रय की है। भयानक रस के लिये आश्रय हेतु दानव या भूतप्रेत, वीर रस के लिये उत्साह का आश्रय किसी वीर पुरूष में, करूण रस के लिये शोक का आश्रय किसी पीड़ित में, शृंगार रस का आश्रय किसी प्रेमीप्रेमिका में रति भाव के हेतु हो जाता है। किंतु जुगुप्सा भाव और हास भाव दो ऐसे भाव हैं जिसमें आश्रय की आवश्यक नहीं होता है। आश्रय का काम तन्मयीभावना के लिये कारण/ जरिया बनना होता है, जहाँ पर व

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