बापू! देश का अंतिम जन अपने अंत की ओर बढ़ रहा है!

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महात्मा गाँधी की वतन वापसी के सौवें साल में उनके नाम यह मार्मिक पाती लिखी है दिल्ली विश्वविद्यालय के विद्यार्थी नंदलाल सुमित ने- मॉडरेटर 
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प्यारे बापू
आपके वतन वापसी का सौवां साल है यह. देश भर में उत्सव मनाया जा रहा है. आपकी खूब पूजा हुई है. लाखों टन फूल मालाएँ चढ़ी आप पर. लेख लिखे गए, फ़िल्में बनीं, प्रार्थना सभाओं का आयोजन हुआ. अनेक भजन गाये और सुने गए. आपके नाम से पुरस्कार बांटे गए. फीते काटे गए, मिठाइयां बंटी. जयंती पर छुट्टी हुई और शहीदी पर शोक सभाएं भी.
महात्मा जी, सिर्फ यह सब सुनकर आप खुश नहीं हो सकते. क्योंकि देश का अंतिम जन खुशहाल नहीं है. मजदूर पिस रहे हैं. किसान आत्महत्या को बाध्य हैं. और आपके प्रिय जन हरिजन अल्लाह को प्यारे हो रहे हैं. ठहर-ठहर कर दंगा भड़क रहा है. भड़काने वाला बेधड़क-बेदाग़ छूट रहा है.
निजी तौर पर भी आपके लिए एक अप्रिय सूचना है. आम जनता से अधिक समझ रखने वाले एक भद्र किन्तु विद्वत पुरुष ने आपको अंग्रेजों का एजेंट कहा. एजेंट माने दलाल… एक कदम और आगे आपको चालक पाखंडी कहा गया. वैसे आप टेंशन मत लो, हमने इसकी कड़ी शब्दों में आलोचना कर दी है.
हाँ, यह सुन आपकी कई प्रतिरूपी मूर्तियाँ बिलख पड़ी, कुछ टूटगई, कुछ ने मौन प्रतिक्रिया दी. आपसे अधिक आहत हम हो सकते थे, हर संभव हुए भी. आपको लेकर कुछ सिरफिरे विवादों में घिरते रहते हैं. उनका शगल है यह. यकीन जानिये इस वक्त भी आपको लेकर कोई नया विवाद अपने गर्भ में पल रहा होगा. शीघ्र ही प्रकट भी हो सकता है.
हिंदुस्तान को छोड़िये. अफ्रीका में भी आपको निशाना बनाया जा रहा है. जोहानिसबर्ग में एक मनचले ने आपकी प्रतिमा पर सफ़ेद पेंट उड़ेल दिया. संभवतःउसकी आत्मा ने आपके धवल व्यक्तित्व पर काली स्याही फेंकने की अनुमति नहीं दी होगी.यह आपकी जवानी की बुत है. अकेली प्रतिमा- जिसमें आप वकील हैं. कोट पतलून में हैं. हाथ में लाठी नहीं दस्तावेज है. उस तथाकथित मनचले ने अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस की टोपी पहन रखी थी.
बताइये, इसी अफ्रीका के लिए आपने क्या क्या न किया? जेल गए, लाठी खाई, वंचितों को सम्मान दिलाया… बदले में मिला क्या- सफ़ेद स्याही और नस्लभेदी होने की तोहमद. अच्छा ही हुआ, नाथूराम ने आपको बचा लिया. वरना आज यह सब एकसाथ कैसे सह पाते आप?  बेचारा गोडसे फिर चर्चा में है. वह खलनायक से नायकत्व की प्राप्ति हेतु संघर्षरत है.
लेकिन बापू, आप उदास मत होना. समूचा विश्व आपको समान भाव से स्वीकार रहा है. आदर-सत्कार दे रहा है. देश दुनिया में आपकी अनेक प्रतिमाएं स्थापित हो रही हैं. मसलन, इसी साल आप ब्रिसबेन, आस्ट्रेलिया में प्रतिष्ठापित हुए. ब्रिटिश पार्लियामेंट परिसर में आपको स्थान मिला. तब आपसे मिलने से मना किया गया था. आज दूर-दूर से बड़े-छोटे, ऊँचे-नाटे, काले-गोरे, अच्छे-खोटे… सब बिना बुलाये आपसे मिलने आते हैं. और हाल ही में आप हनोवर, जर्मनी में भी अवतरित हुए है. हम जगह-जगह आपका अनावरण करवा रहे हैं. आपका आशीर्वाद मिलता रहा तो अगले दो चार साल में विश्व के तमाम इलाकों में आपको प्रतिष्ठापित करवाने का सपना पूरा हो जाएगा. वैचारिक रूप से न सही लाटों में ही.
किन्तु आपके इस सेवक को एक चिंता खाए जा रही है. आपका यह विश्वव्यापी विस्तार है न, भारत से पलायन तो नहीं? आर्यावर्त का ‘योग’ पहले विदेश गया. फिर हिंदुस्तान लौटा- ‘योगा’ बन कर. और तब योग दिवस की शुरुआत हुई. कहीं आपके भी गाँधीजी से एमके गांधी बन कर लौटने और कोई और वापसी सदी मनाने की नौबत तो नहीं आयेगी न? प्यारे बापू हम आपको लाख भगाएं, आप हमें छोड़ कर मत जाना.
केवल मूर्ति ही क्यों, आपके नाम पर अनेक पथ, कई मार्ग, कुछ पुल, कुछ और चौराहे बन गए हैं. या कहिये बना दिए गए हैं. कुछ निर्माणाधीन हैं. कुछ का शिलान्यास हो रहा है. कुछ की योजना है. नोट पर आप तब भी थे आज भी हैं. आपकी छवि वाली मुद्राओं का अवैध मुद्रण काफ़ी बढ़ गया है लेकिन आपकी छवि जैसी थी वैसी है. आपने पीके देख ल? वह कहा रहा है- “गांधीजी की कीमत सिर्फ इन कागजी नोटों पर ही शेष है.”
महात्मा जी, आपके नामधारी पथों से प्रतिदिन लाखों पथिक गुज़र रहे हैं. वे आपके मार्ग चल रहे हैं. बहुत निरंतर चल रहे हैं. कुछ तो अब स्वयं पथप्रदर्शक हो गए हैं. कुछ कुपथ हुए किन्तु पुनः सुपथ भये. कुछ ने आपकी राह चलते हुए ही हिटलर को भी अपना लिया है. कुछ तो बिलकुल पथ-भ्रष्ट ही हो गए हैं. मैं नाम लूँ तो चिट्ठी भर जायेगी. सिर्फ नाम से आप पहचान भी नहीं पाएंगे. एक हैं अन्ना हजारे. विशेष आप गूगल सर्च कर लेना. अच्छा, जब आप फेसबुक पर हैं तो ट्विटर पर भी क्यों नहीं आ जाते?
बापू, आपकी जयंती से राष्ट्रीय स्वच्छ भारत अभियान शुरू हुआ है. आपको चश्मे से दिख रहा होगा. यहाँ सभी योजनाओं में आप ही हैं. हर अभियान में भी आप ही हैं. आपके बिना कोई सरकार नहीं चल सकती. बिना आपके हिंदुस्तान नहीं चल सकता.
वर्षों पहले हरिशंकर परसाई ने आपको एक ख़त लिखा था. तब मोरारजी भाई की सरकार थी. आज मोदी जी की है. दोनों आपके प्रशंसक हुए. आपने भी दोनोंका साथ दिया. क्यों? क्योंकि, दोनों गुजराती हैं… और आप भी. खैर, उस पत्र का उत्तर नहीं दिया आपने. भेजा भी होगा तो ख़ुद की तस्वीर वाली टिकट चिपकाकर. नतीजतन जवाबफाइलों में दब गया होगा. या सरकार ने दबा लिया होगा. वैसे मंडेला धरती की स्थितियों से अवगत करा ही चुके होंगे. उनसे भेंट हुई या नहीं. वह तो बीते साल ही यहाँ से चल लिए थे.
चिट्ठी की बात चली तो आपको लगे हाथ यह भी बता ही दूँ. बीबीसी में एक खबर छपी. आपका ख़त हिटलर तक पहुंचा ही नहीं था. इसलिए मैं आपको डाक से न भेजकर सीधे मेल कर रहा हूँ. मिले तो बताइयेगा… डाक से नहीं मेल से ही.
नंदलाल

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