आलोचकों की लीला आलोचक जानें- मृणाल पाण्डे

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वरिष्ठ लेखिका, लब्धप्रतिष्ठ पत्रकार मृणाल पाण्डे से बड़े दिनों बाद एक लम्बी बातचीत पढ़ी. अंजुम शर्मा के साथ इस बातचीत में मृणाल जी ने बड़े बेबाक तरीके से जवाब दिए हैं. ‘नया ज्ञानोदय’ में प्रकाशित यह बातचीत आपके लिए- मॉडरेटर 
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मृणाल जी जिस दौर में आपने लिखना शुरू किया उस दौर में उषा प्रियंवदा, मन्नू भंडारी, ख़ुद आपकी माँ शिवानी जैसी लेखिकाएं लिख रही थी. और भी कई नाम आगे जुड़ते गए लेकिन आपने हमेशा ख़ुद को अन्य स्त्री लेखिकाओं से अलग बताया. विशेषकर जब ‘स्त्री विमर्श’ की बात आती है. मैं जानना चाहता हूँ कि जब सब्जेक्ट के स्तर पर जब आप सब एक हैं तो फिर आप ख़ुद को अलग कैसे कहती हैं?

मैंने कभी घोषित रूप से नहीं कहा कि मैं स्त्री विमर्श की पैरोकार हूँ, या अन्य लेखिकाओं से अलग हूँ. मैंने वह किया जो मुझे सही लगा. जैसे हिंदी की लेखिकाओं में यह है कि हम नौकरी नहीं करेंगे पूर्ण कालिक लेखन करेंगे. मुझे लगता यह संभव तो है लेकिन इससे अनुभव का दायरा उतना विस्तीर्ण नहीं हो पता. इसलिए अनुभव का दायरा जितना बड़ा होगा उतनी गहराइ लेखन में आएगी. जैसे मैंने पत्रकार बनकर कामगार महिलाओं पर शोध किया. तीन साल घूम घूम कर कामगार महिला, मजदूर, बुनकर महिलाओं आदि के जीवन अनुभव जाने. फिर महिला स्वास्थ्य पर काम किया. तो इन सबसे मन खुलता है. आप विषय भले ही वही उठाएं लेकिन उसकी अनुगूंज दूसरी हो जाती है. आप एक तार का एकतारा भी बजा सकते है और चार तार का तानपुरा भी. मुख्य चीज़ है- अनुभव का दायरा. मैं मुख्य रूप से अपने आप को कथा लेखिका भी अकेली नहीं मानती मैं ख़ुद को लेखिका मानती हूँ. लेखिका पारंपरिक गद्य भी लिख सकती है और ग़ैर पारंपरिक भी. कविता भी लिख सकती है, यात्रा वृत्त भी लिख सकती है और पत्रकारिता का गद्य भी लिख सकती है. इसलिए मैंने यह चीन की दीवारें नहीं बनाई. मुझे लगता है हमरे समय में साहित्य और गद्य की परिभाषा बदली है. इसलिए जिन्दगी की लय जो पकड पाए, लोगों को पढने में आनन्द आए और जिस बारे में नहीं सोचते उसे लोग सोचने लगे, यही लेखक का काम है. मैंने जब वामा निकाली तब यही किया. उस वक़्त मुझे साथ वाली लड़कियां कहती थी कि मृणाल जी आप क्या लिखती हैं समझ नहीं आता. मैंने कहा आएगा दस साल बाद आयेगा. जो चीज़ें आज मुझे महसूस हो रही है, बाद में औरों को भी होंगी. और ऐसा हुआ. हमने रेप पर एक स्टोरी की थी. जिस पर मार्केटिंग वाले नाराज़ हुए कि यह क्या लिख रही हैं आप कि मध्यवर्गीय परिवारों में रेप होते हैं. यह सब झुग्गी वाले करते हैं. अच्छे घरों में नहीं होता. हमने कहा जो सच्चाई है हम वही बता रहे हैं. पर हिंदी में यह खुलापन कम है. क्योंकि हिंदी में संपादकों का ज़्यादा ध्यान विज्ञापन जुटाने में रहता है ताकि आर्थिक रूप से अपनी क्षमता का परिचय दे सके.

लेकिन आप ख़ुद भी ‘हिंदुस्तान’ समाचार पत्र की संपादक रही हैं. आपने ख़ुद ऐसे सम्पादकीय  लिखे हैं कि नारी का वस्तुकरण हो रहा है, बाज़ार नारी की देह से होकर जा रहा है और उसके अगले ही पृष्ठ पर अर्धनग्न अवस्था में एड करती नारी के विज्ञापन भी छापे हैं.

देखिये बाज़ार हमरे कब्ज़े में नहीं है. आपका एक अख़बार छपता 20 रूपए में है और आपको मिलता है 5 रूपए में. उस वक़्त तो आप नहीं पूछते हैं कि उसमें एड क्यों छप रहे हैं. अब देखिये फेयर एंड लवली के एड में लोग कहते हैं महिला का चित्रण ग़लत है, मैं मानती हूँ और लिखती भी हूँ कि ग़लत है लेकिन फेयर एंड लवली की रेकोर्ड तोड़ सफलता का राज़ क्या है? कौन ख़रीद रहा है उसे, यह भी हमें सोचना चाहिए. मैं तो साफ़ जवाब देती हूँ कि अगर एड नहीं होंगे तो हम अच्छा अख़बार नहीं निकल सकते. जब मैंने ‘हिंदुस्तान’ हाथ में लिया था तब उसमें 10-12 पन्ने होते हैं. तब उसमें अर्धनग्न औरते नहीं छपती थी लेकिन कुछ भी नहीं छपता था. न स्टाफ को अच्छी तनख्वाह थी न अच्छे लोग लिख रहे थे. जब आपने उसे मार्किट सेवी बनाया, सोलह से बीस, बीस से चालीस पन्ने तक पहुँचाया फिर एक अख़बार के अपने सत्रह संस्करण किये तो इन सबका ख़र्चा बहुत होता है. कहाँ से आयेगा? किससे कहेंगे? हिंदी अकादमी नहीं देगी, डी.ए.वी नहीं देगा, वह तो इंडिपेंडेंट मार्किट ही देता है. आप कहते हैं आप टाइम्स ऑफ़ इण्डिया जैसा अख़बार क्यों नहीं निकालते? तो टाइम्स ऑफ़ इण्डिया ने बहुत सारी चीज़ों में समझौते कर रखा है. यह हमारे समय कि सच्चाई है कि आपको बाज़ार के साथ हाथ मिलाकर ही चलना होगा. और इसमें हिंदी वालों का दुचित्तापन बहुत आड़े आता है कि हम बड़े रूपवादी कलावादी है. मैं अपनी माँ की तरह व्यावहारिक हूँ. मुझे पता है कि मैं नौकरी के स्तर पर, सम्पादकीय स्तर पर कोई समझौता नहीं करुँगी. लेकिन मार्केटिंग के स्तर पर कोई फ्रंट पेज का एड आ रहा है जिसके आधार पर मैं 4 पेज का पुल आउट हर डिस्ट्रिक्ट में दे सकती हूँ तो क्यों न करू? लेकिन हाँ सम्पादकीय स्तर पर मेरे हिस्से में वे लोग हस्तक्षेप नहीं करेंगे और मैं उनके हिस्से में. तो यह सीधा साधा समीकरण बना हुआ है.

इस पर तो अलग से लम्बी बात हो सकती है इसे पकडूँगा तो बाक़ी सब छूट जायेगा. आगे बढ़ता हूँ, आपकी पहली कहानी ‘धर्मयुग’ में छपी थी कोहरा और मछलियाँ और तब आप 21 वर्ष की थी.

अच्छा, इस कहानी के पीछे बड़ी मज़ेदार कहानी है. मैंने कहानी लिखी और धर्मयुग को पोस्ट कर दी. चूंकि अपनी माँ की कहानी मैं ही पोस्ट करती थी इसलिए मैंने अपनी भी कर दी लेकिन मैंने कहीं भी यह नहीं लिखा कि मैं शिवानी जी की बेटी हूँ. शिवानी जी से भारती जी का परिचय था लेकिन शिवानी जी के बच्चों के नाम वे नहीं जानते थे. मैंने लिखा यह मेरी पहली कहानी है, अच्छी लगे तो स्थान दीजिएगा. उनके यहाँ से उनके हाथ का लिखा इतना सुन्दर पत्र मेरे पास आया, जिसमें लिखा था – प्रिय मृणाल जी मैं आपको जानता नहीं हूँ. आपने लिखा आपकी पहली कहानी है, बहुत सुखद विस्मय हुआ आपमें बहुत सम्भावना है आगे कुछ भी लिखें ज़रूर भेजिएगा. अब आप सोच सकते मेरे लिए कैसा क्षण होगा.

आपने वह कहानी शिवानी जी को पढ़वाई थी?

नहीं. उस वक़्त मैं नीमच में थी और वे नैनीताल में. इसमें हम दोनों ने कभी कोई रूचि भी नहीं ली. लेखक के स्वाभिमान को वे अच्छी तरह से समझती थी. हम बिना कहे एक दूसरे को समझते थे. लेकिन जब उन्होंने पढ़ा तो वे बेहद ख़ुश हुई. हाँ शिवानी जी के बगैर शायद मैं लिख नहीं सकती थी लेकिन मेरे भीतर कभी यह ख़याल नहीं आया कि उन्हें मैं दिखाऊँ या उनसे जज करवाऊं. मुझे ऐसा लगता है कि बहुत कुछ है मेरे लेखन में जो शिवानी जी से मेरे भीतर आया है लेकिन वह संवेदना के स्तर पर है, अभिव्यक्ति के लिए हर आदमी अलग तरीक़ा ख़ुद ढूंढता है.

शिवानी जी के बारे में कहा जाता है कि वे कहीं भी कभी भी शोर शराबे में भी लिख लिया करती थी, उन्हें किसी एकांत की ज़रूरत हो ऐसा नहीं था. क्या यह सच है?

हाँ, यह बात सही है. एक बार एक महिला घर पर आई थी उन्होंने पूछा शिवानी जी आप कैसे लिखती हैं किस कलम से लिखती है, मुझे दिखाइए मैं उसे चूमना चाहती हूँ, वगैरह वगैरह. तो दिद्दी ने कहा कि देखिये, लिखने की इच्छा होती है तो आदमी मरती हुई पलंग से भी उठकर चला आता है. मैं तो खाने की मेज़ पर बैठकर लिखती रही हूँ, बच्चों में से जिसका पेन ख़ाली मिला उससे लिख लेती हूँ, जिसकी कॉपी मिल जाती है उसी पर पहला ड्राफ्ट तैयार कर लेती हूँ.
यह सहजता मैंने शिवानी जी के भीतर देखी. घर में नगाड़े बज रहे हैं मेहमान आए हैं और आप आराम से बैठ कर फेयर कर रही हैं. हम लोगों ने कभी यह नहीं सोचा कि वे लिखती कैसे थी. उन्हें कब समय मिलता था. हाँ, मैं उसकी हरकारा थी तो स्कूल जाते वक़्त रास्ते में पोस्ट कर दिया करती थी. लेकिन इर्ष्या द्वेष हर घर परिवार में होता ही है. जब हमारे बड़े मामू की तबियत ख़राब थी तो माँ उन्हें देखकर जब वहां से वापिस आने लगी तो किसी ने कहा कि अभी जा रही हो, अब तो कुछ ही दिन का यह मेहमान लगता है. माँ ने कहा कि नहीं, मुझे जाना है तो किसी ने कहा कि अरे! धर्मवीर भारती के लिए कुछ लिखकर भेजना होगा. मेरी माँ को इस बात का बड़ा क्लेश था कि ऐसे मौके पर भी लोग छोड़ते नहीं हैं. लेकिन हम लोग अपनी माँ से खुलकर बातें किया करते थे और मुझे लगता है कि इससे उन्हें काफी बल मिलता था. ज़ाहिर है, मध्यवर्गीय परिवार था तो आय सीमित थी. माँ लिखकर जो कमाती थी उससे हमारी स्कूल ड्रेस वगेरह आया करती थी. मज़ेदार बात है, कि जब हमें नई यूनिफार्म की ज़रूरत होती थी तो हम माँ से कहा करते थे कि अब नया उपन्यास लिखना शुरू कर दो और धर्मवीर भर्ती से एडवांस मंगा लो हमें यूनिफार्म बनवानी है. और वे कर दिया करती. बहुत से अद्भुत उपन्यास उन्होंने ऐसे ही लिखे. कमलेश्वर को भेज दिया, मनोहर श्याम को भेज दिया गया. यह सब लोग हमारे परिवार की तरह थे.

मृणाल जी, आपके समूचे साहित्य में पात्र परिवेश की एक समानता दिखलाई पड़ती है. आप मध्य वर्ग पर ज़्यादा लिखती हैं. लेकिन गाँव की महिलाओं या बस्तर की महिलाओं तक आपका विमर्श कैसे पहुँचता है?

मैंने कोई ठेका नहीं लिया है कि वह बस्तर तक पहुंचे. स्त्री शिक्षा होगी तो औरतें खोज खोज कर पढ़ेंगी. जब वे खोजना चाहेंगी तो मेरी कहानी पढ़ी जाएगी. मैंने कभी यह सोच कर नहीं लिखा कि बस्तर या नक्सल प्रभावित इलाके में महिलाएं मुझे कैसे पढ़ा जायेगा. मैंने बस लिखा और लिख दिया है. जिसकी जरुरत होगी वह पढ़ेगा जो नहीं पढ़ेगा वह उसका दुर्भाग्य और मेरा दुर्भाग्य. मैं यह बहुत ग़लत मानती हूँ कि लेखक अपने को समाज सुधारक मान कर लिखे कि मैं लोगों की आँखें खोल सकता हूँ या सकती हूँ. यह बेहद जटिल चीज़ है कि कोई लेखक क्यों लिखता है. जैसे शिव संकल्प सूत्र में एक जगह लिखा है यद्पूर्वयक्षमअंतर्प्रजानाम, अर्थात मन एक यक्ष की तरह है जो हर व्यक्ति में छिपा है. हम ख़ुद नहीं जानते कि हम क्या सोचते हैं और कभी यक्ष आपको अचानक आके घसीट ले जाता है. इसीलिए मुझे लगता है कि अचानक कोई गुलियक कभी उस दिशा में ले जाए जहां मेरी कहानियाँ है तो वे खोज लेंगे वरना कोई क्या कर सकता है.

‘रास्ते पर भटकते हुए’ की मंजरी हो, ‘विरुद्ध’ की रजनी हो, ‘पटरंगपुर पुराण’ की कई पीढ़ियां हो या उपन्यास कहानी के अन्य पात्र हों, इन पात्रों को गढ़ते वक़्त, इनके परिवेश को बुनने के लिए आप मानसिक स्तर पर वर्गांतरण कैसे करती हैं?

देखिये जब आदमी लिखने पर आता है तो मेरा वर्ग तेरा वर्ग सब ग़ायब हो जाता है. यह सब समीक्षकों की भाषा है, लेखकों की नहीं. लेखक तो लिखता है केवल. अब प्रेमचंद तो पुरुष थे, कोई कह सकता है कि कफ़न में प्रसव वेदना का ऐसा वर्णन वे कैसे कर सके. ऐसा थोड़े था कि प्रेमचंद ने कोई बच्चा पैदा किया था उस कहानी को लिखने के लिए. तो यह एक चीज़ है कि यक्ष अपना रूप बदलने में माहिर होता है. वह कुछ भी बन सकता है. लेखक का मन भी ऐसा ही होता है. वह उपद्रवी होता है, वह कुछ भी लिख सकता है. यही रचनात्मकता का मर्म है. अभी मैं एक उपन्यास पर काम कर रही हूँ जो उन्नीसवीं-बीसवीं सदी की महिला गायिकाओं के बारे में हैं. तब मेरा जन्म नहीं हुआ था लेकिन उनके बारे में पढ़ना शुरू किया, मालूमात किया. तो यह बड़ी अजीब और रोचक प्रक्रिया होती है जिसके बारे में तयशुदा तरीक़े से कह पाना मुश्किल है.

आपकी कहानी, उपन्यासों को जब पढ़ते हैं तो पहाड़ की उपस्थिति कहीं न कहीं उसमें रहती है. साहित्य में पहाड़ आज भी ‘कल्ट’ है. आप उसे कैसे देखती है?

कल्ट बन गया है. था नहीं. मेरा तो बचपन ही पहाड़ में बीता है. मैंने पहली भाषा भी पहाड़ी सीखी. आज भी अपने भाई बहनों से मैं हिंदी नहीं बोल पाती हूँ. हिंदी तो मैंने बहुत बाद में स्कूल जाकर सीखी. इसलिए पहाड़ स्वतः ही आ जाता है. बचपन को टटोलते वक़्त कई दर्लभ और पुरानी चीज़ें हाथ लगती है जिसमें हर लेखक को चाव होता है. सोलह साल पहाड़ पर गुज़ारने के बाद जब मैं मैदान में, युनिवर्सिटी आई तो मेरे लिए यह बड़ा विस्मयकारी अनुभव था.

बहुत कम महिला लेखिकाएं हैं जो राजनीति पर कुछ बोलती लिखती हैं. आपने संभवतः इसलिए लिखा क्योंकि आप पत्रकार रही, लेकिन अधिकांश महिला लेखिकाएं राजनीतिक विषयों पर चुप रहती हैं. इसका क्या कारण है?

मैंने आपसे कहा न कि मध्यवर्गीय पूर्णकालिक लेखन अगर आप करेंगे तो आपके सोच और अनुभव का दायरा सीमित रहेगा और फिर आप वृहत्तर सरोकारों से बिदेकेंगी. अब जैसे मन्नू जी ने ‘महाभोज’ लिखा जो कि एक अच्छा उपन्यास है लेकिन उसमें राजनीती कि वो अंदरूनी चमक नहीं दिखती है. ‘आपका बंटी’ को उन्होंने आर पार देखा जिया है लेकिन महाभोज को उनके अपने लेखन के पैमाने पर थोड़ा मैं कम करके आंकती हूँ. मुझे लगता है वो उनका स्टाइल नहीं है. राजनीति पर महिलाएं शायद इसलिए भी नहीं लिखती क्योंकि उन्होंने वह समझ बटोरने की चेष्टा भी नहीं की. राजनीति पर लिखने के लिए आपको लेखन से इतर जाने की ज़रूरत है. या तो आप सीधा राजनीति में उतरें. हालांकि कई महिलाएं ऐसी हैं जिनका मैं नाम नहीं लेना चाहूंगी जो राजनीति में हैं और बेहद ख़राब कवितायेँ लिखी हैं.

आपने भी तो कुछ कवितायेँ लिखी हैं.

हाँ, कवितायेँ लिखी हैं लेकिन नियमित नहीं. बीच बीच में कभी कभी लहर बनती है तो लिख जाती हैं. अभी मैंने अपना कहानी संग्रह अशोक महेश्वरी जी को दिया है, उसमें मैंने अपनी चौदह कवितायेँ भी दी हैं और कहा है कि अगर आपको लगे तो इन्हें भी संग्रह में लगा दीजिएगा. कविता मेरा मूल स्वर नहीं है. कभी कभार लिख जाती है.

आप लेखन के लिए प्रतिभा और प्रतिबद्धता में से किसे ज़रूरी मानती हैं?

निश्चित रूप से प्रतिभा. बहुत प्रतिबद्ध होकर भी आपमें प्रतिभा नहीं है तो आप बेकार लिखेंगे. जैसे अज्ञेय कविता अच्छी लिखते थे लेकिन कहानियां मुझे बिल्कुल पसंद नहीं हैं. रमेशचंद्र शाह का गद्य बिल्कुल पसंद नहीं है जबकि उनमें मेधा बहुत है. वहीँ बच्चन जी अद्भुत गद्य लिखते हैं. कई मायनों में मुझे उनका गद्य उनके पद्य से बेहतर लगता है.

लेकिन केवल प्रतिभा लेकर भी आप क्या करेंगे ? बगैर प्रतिबद्धता के भी तो नहीं लिखा जा सकता.

नहीं नहीं. प्रतिभा होगी तो प्रतिबद्धता स्वयमेव आ जाती है अगर आप लिखना शुरू करें तो वो इतनी कठोर होती है कि आप न भी चाहें तो आपसे गला दबवाकर काम करवा लेती है. श्रीकांत वर्मा को ले लीजिये. उनमें इतनी प्रतिभा थी, राजनीतिक रूप से उनकी पक्षधरता को आप भले सही न मानें लेकिन उन्होंने जो कवितायेँ राजनीति के बारे में लिखी हैं, मगध और कोसल के बारे में लिखी हैं उसमें कहीं उनकी लेखकीय प्रतिबद्धता उनके निजी जीवन के विपरीत जाकर उनसे वो लिखवा ले गई है जो उन्होंने कभी अपने गद्य में नहीं कहा होगा. तो लेखक में प्रतिबद्धता प्रतिभा के बूते आ जाती है. लेकिन बिना प्रतिभा के जो प्रतिबद्धता होती है उसमें आप सीरियस हो सकते हैं, मर्यादावान हो सकते हैं लेकिन अच्छे लेखक नहीं हो सकते.

आपने ‘यह तो नारीवाद नहीं’ लेख में बड़े बड़े पदों पर बैठी महिलाओं द्वारा अन्य महिलाओं के लिए कुछ न किये जाने की भर्त्सना की थी. लेकिन आप भी तो बड़े बड़े पदों पर रही….

तो आप यह जानना चाहते हैं कि मैंने क्या कद्दू के तीर मारे…अब मैं अपने तीर गिनाऊं.(हँसी के साथ) देखिये ऐसा है कि आप तीस साल अलग अलग पत्र पत्रिकाओं का संपादन करके यह साबित कर सकती हैं कि एक महिला सफल रूप से यह काम कर सकती हैं. बाज़ार कभी जेंडर नहीं देखता वह यह देखता है कि इसका काम लहता है नहीं लहता है. चूंकि मेरा काम लहा और पाठकों ने स्वीकार किया इसलिए यही अपने आप में इस बात का खंडन करता है कि एक महिला ‘सपादक’ का पद नहीं पा सकती है. दूसरी चीज़, मैंने यह देखा कि महिलाओं की क्षमता में कमी नहीं है आत्मविश्वास की घोर कमी है जो कि परवरिश के कारण है. इसलिए मैंने अपने लिखने में सफलता पर उतना ज़ोर नहीं दिया जितना परवरिश के उन बिन्दुओं पर बल दिया जिनके चलते महिला कमज़ोर बनती है. अंगेजी में कहा जाता है कि महिला के प्रोडक्टिव और रिप्रोडक्टिव साल एक ही होते हैं. तो इसलिए जिस वक़्त आप सबसे अधिक काम करती हैं उस वक़्त आप पर सबसे अधिक पारिवारिक उत्तरदायित्व भी होते हैं. तो इनके चलते यदि महिला सफल होती है तो यह बहुत बड़ी चीज़ है. मैंने पहले पहल जब ‘अबोर्शन’ के बारे में लिखा तो बड़ा बवेला मचा. उस वक़्त यह अल्ट्रासाउंड वाले अबोर्शन नहीं थे. मैंने तब यह भविष्यवाणी की थी कि यदि हमारे यहाँ भविष्य में ऐसा कोई तरीक़ा निकल आया कि आप अजन्मे भ्रूण का लिंग जान सकते हैं तो जितनी चिढ़ लोगों को कन्याओं से अभी है शायद फिर कन्या शिशु नाम का जीव ही ग़ायब हो जायेगा. और अब देख लीजिये. तीसरी बात, महिला अपने स्वास्थ्य के बारे में नहीं सोचती हैं. जब मैंने महिला प्रजनन स्वास्थ्य और यौन जीवन पर किताब लिखी तो मैंने यह जाना कि जीवन का इतना बड़ा सत्य, जिसके बारे में पुरुष हर वक़्त बात करते रहते हैं उसके बारे में महिला बड़ी ही मुश्किल से केवल अपने निकटतम मित्र से ही बात करती है. प्रजननागों के बारे में हमरे यहाँ सभ्य भाषा में कोई शब्द भी नहीं है. इसलिए यदि हम उसे कुछ समझाना चाहते हैं तो वो पहले ही बिदक जाती है. मैंने ऐसी ऐसी औरतें गाँव में देखी हैं जिनका यूट्रस तक बाहर आ गया था क्योंकि प्रजनन के तुरंत बाद उन्हें भारी बोझ उठाना पड़ा. और उनके पास इतना समय-साधन नहीं था कि इलाज़ करा सके. तब मुझे लगा कि नारी मुक्ति की लम्बी चौड़ी बातों से बुनियादों बातों जैसे- वे बची रहें, उन्हें व्यवस्थित स्वास्थ्य जानकारी हो, पोषाहार हो, शादी सही समय पर हो और परिवार में उन्हें वह बराबरी की जगह मिले जो उन्हें लोकतान्त्रिक मनुष्य बनाता है. तो इन सबको स्टडी कर मैंने इन बातों को उजागर किया.

आपने पत्रकरिता का लम्बा सफ़र तय किया है, उसे रोज़ बदलते हुए देखा है. आपको क्या लगाता है कि पत्रकरिता ने बीते वर्षों में क्या खोया और क्या हासिल किया है?

मुझे लगता है पत्रकरिता बहुत समर्थ माध्यम बनकर उभरा है. बल्कि हमारे समय का सर्वाधिक लोकप्रिय और सशक्तम माध्यम भी यही है चाहे फिर वह सोशल मीडिया हो या परम्परागत मीडिया. साहित्य अब बहुत कम लोग पढ़ते हैं. हिंदी पत्रकारिता में छपाई के स्तर पर वितरण के स्तर पर काफी तरक्क़ी हुई है. लेकिन उस स्तर तक नहीं हुई जहां तक हो सकती थी. हो यह रहा है कि अच्छे अच्छे हिंदी लेखकों के बच्चे और पब्लिशर्स के बच्चे भी अंग्रेज़ी माध्यम स्कूल में भेजे जाते हैं. तो हिंदी जानने वाले और रचनात्मक काम कर सकने वाले लोग घट रहे हैं. अब लोगों की रूचि टीवी पत्रकरिता की ओर बढ़ रही है क्योंकि अटपटी हिंदी सब लोग बोल लेते हैं. हालांकि टीवी की हिंदी से भी मुझे कई बार निराशा हाथ लगती है लेकिन वह एक नया रास्ता खुल गया है.

लेकिन आपने ‘हिंदुस्तान’ में नए मीडिया पर एक लेख लिखा था जिसमें कहा था कि नया मीडिया ग़ैर ज़िम्मेदार है.

हाँ, नया मीडिया ग़ैर ज़िम्मेदार है क्योंकि यह एक भ्रान्ति लोगों को दे देता है कि बिना प्रशिक्षण पाए आप रातों रात पत्रकार बनकर चमक सकते हैं. लोग ऐसा ऐसा लिख रहे हैं, ऐसे लोगों का अपमान कर रहे हैं है जिनकी परछाई छूने लायक भी वे नहीं हैं. विष्णु खरे ने एक बहुत अच्छी बात कही थी कि यह हिंदी की चीखती टिटीहरियाँ हैं जिन्हें यह मुगालता है कि आसमान उन्हीं के पैरों पैरों पर टिका हुआ है. मुझे लगता है यह बहुत अच्छा बिम्ब उन्होंने इस्तमाल किया था.

अंजुम शर्मा 
कभी कभी जब आप एक साथ कई दायित्वों का निर्वाह करते हैं तो न चाहते हुए भी कोई एक सिरा छूट जाता है. आप लेखक भी हैं, पत्रकार भी, प्रसार भारती की अध्यक्ष भी रहीं और उससे पहले एडवाइजर भी. क्या कभी ऐसा लगा कि कहीं सब कुछ पकड़ने के चक्कर में कोई दायित्व छूट गया?

छूटा करे, मुझे क्या(हँसी के साथ). नहीं! वैसे मुझे ऐसा कोई अवसाद नहीं रहा. मैं भाग्यवान रही कि इतनी सारी विधाओं में काम करने का सुअवसर मुझे मिला. हालाकि कुछ खोने या न होने का अवसाद तो हर मनुष्य के मन में किसी न किसी चीज़ को लेकर होता है.

यह सवाल मैंने इसलिए पूछा क्योंकि कुछ आलोचक आपको मूलतः पत्रकार ही मानते हैं और साहित्यकार के रूप में तवज्जो कम देते हैं.

आलोचकों की लीला आलोचक ही जाने. उन्हें अगर अच्छा लगता है तो ठीक है. मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है. मेरी माँ कहा करती थी कि अंतिम मानक पाठक बनाते हैं न कि समालोचक. माँ का भी यही कहना था कि मैंने जो लिखा है सबके सामने है, अब लोग पसंद करेंगे तो ठीक, नहीं करेंगे तो ठीक. मैं भी यही मानती हूँ.

एक अंतिम सवाल, प्रसार भारती के चार वर्षों में बतौर अध्यक्ष आपने क्या खोया और क्या पाया?

सबसे अधिक तो यह पाया कि मुझे जानकारी मिली कि सरकार ने इतना बड़ा जो पशु बना दिया है वह ज़िन्दा कैसे है. फिर इससे मेरी उपर वाले पर आस्था दृढ हुई कि यह सब ‘राम रचि राखा’ है. क्योंकि सब भाई लोग खा गए हैं. न वहां लोग बचे हैं, न नियमित नियुक्तियां हैं, बाबूशाही पूरी तरह से हावी है. इतनी बड़ी बड़ी मशीनरी आयातित की हैं, इतने बड़े बड़े स्टेशन बने हैं लेकिन उसके रख रख रखाव में किसी की रूचि नहीं है.

आपने कभी मुखालफ़त नहीं की, कि ऐसा क्यों है?

मैंने मुखालफ़त की लेकिन बोर्ड स्तर पर क्योंकि जब आप ऐसे ओहदे पर होते हैं तो मीडिया में जाकर कीचड़ उछालना मुझे सही नहीं लगता. इसलिए मैंने चिंता व्यक्त की जिसके परिणामस्वरूप सैम पित्रोदा कमिटी का गठन भी हुआ लेकिन जब तक उसकी रिपोर्ट आई तब तक इलेक्शन का समय हो चुका था इसलिए न तो उस पर कोई विचार हुआ न सुनवाई. इसकी स्वायत्ता पर भी कुछ बोलना वैसा ही जैसे महिलाओं की सशक्तिकरण की बात करना. मुझे लगता है कि जो स्थिति प्रसार भर्ती की इस समय है, सरकार को अविलंब उसका कुछ करना होगा क्योंकि हर सरकार को ज़रूरत होती है कि उसके पास एक ऐसा व्यवस्थित और भरोसेमंद माध्यम हो जिसके मार्फ़त लोगों को लोकतान्त्रिक खबरें मिल सकें. लेकिन उसके लिए बेहद ज़िम्मेदार और विश्वास भरा सफ़र चाहिए जो कि उनके लिए अभी संभव नहीं है.

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अंजुम शर्मा
9810796305


  

 

3 COMMENTS

  1. बढ़िया इंटरव्यू। अपनी परछाईं को भी लोग किन्हीं लोगों के छूने लायक न समझें…क्या मुगालता है।

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