यह शिक्षा के नए पंथ में ढलने का दौर है!

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दक्षिणपंथ की सरकार जब भी केंद्र में आती है तब वह शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन करने में लग जाती है. एक बार फिर ऐसी आशंका लग रही है. युवा शिक्षाशास्त्री कौशलेन्द्र प्रपन्न का एक सुचिंतित लेख- मॉडरेटर 
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शिक्षा समितिओं और आयोगों की सिफारिशों और नीतियों को समय समय पर पुनरीक्षा से गुजारा गया है। वह 1964-66 का कोठारी आयोग हो, 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा आयोग हो या 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति। सन् 1990-92 में आचार्य राममूर्ति पुनरीक्षा समिति बनाई गई थी जिसका मकसद था 1986 की नीतियों को आज के संदर्भ में पुनर्मूल्यांकन किया जाए और आवश्यकतानुसार सुझाव दिए जाएं। एक बार फिर राष्ट्रीय शिक्षा नीति को पुनरीक्षा और पुनर्गठन के दौर से गुजरने का मौका आया है। मानव संसाधन विकास मंत्री ने पिछले साल ही घोषणा की थी कि 2015 में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति देश भर में लागू की जाएगी। इस बाबत राज्य के शिक्षा मंत्रियों और शिक्षाविदों, समाज के विभिन्न धड़ों से बातचीत की जाएगी। गौरतलब है कि जब जब सत्ता में हिन्दूत्वहावी सरकार आई है उसने अपने तरीके से शिक्षा को बदलने का प्रयास किया है। न केवल एक दल बल्कि अन्य वैचारिक दलों की सरकारों ने भी शिक्षा को अपने वैचारिक प्रसार-प्रचार के लिए इस्तेमाल किया है। 2000 में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2000 तैयार हो कर देश भर में लागू हुआ तो जिस तरह से पाठ्यचर्या को बुना गया था उसी तर्ज पर पाठ्यपुस्तकें बनाई गईं। प्रेमचंद के साहित्य को मृदुला सिन्हा के साहित्य से पुनर्स्थापित किया गया। इतना नहीं बल्कि भाषा,  इतिहास, विज्ञान की धार को तेज करने की बजाए कुंद ही किया गया। शिक्षा नई सोच और सृजनात्मकता को बढ़ावा देने का काम करती है। शिक्षा दरअसल इतिहास को पढ़ने और अतीत की गलतियों को सुधारने की समझ भी पैदा करती है। लेकिन दुर्भाग्यवश आज जिस नई राष्ट्रीय  शिक्षा नीति निर्माण की बात की जा रही है। उसके उद्देश्यों से हमें असहमति का अधिकार है। क्योंकि इस नई नीति के जड़ में आरएसएस की विचारधारा और पूर्वग्रह स्पष्ट दिखाई देते हैं। जहां माना जा रहा है कि भारतीयों को भारतीयता से हटा कर पश्चिमवादी विचारधारा पढ़ाई जा रही है, जिससे उनमें पाश्चात्य जीवन मूल्य का प्रसार हो रहा है। इसलिए आवश्यक है कि नई पीढ़ी को भारतीय शिक्षा दी जाए, उंची कक्षाओं में भी उन्हें अंग्रेजी के बाजए हिन्दी माध्यम से पढ़ाया जाए और संस्कृत को अनिवार्य बना दिया जाए।

योग गुरु रामदेव नई सरकार के सलाहकार भी हैं उन्होंने शिक्षा पाठ्यक्रम का एक दस्तावेज सरकार को सौंपा है। इसमें प्रमुखता से संघ और हिन्दुत्व विचारधारा को पोषित किया गया है। वहीं दीनानाथ बत्रा की लिखी किताब ‘तेजोमय भारत गुजरात के तकरीबन 42 हजार सरकारी स्कूलों में पढ़ाए जा रहे हैं। उस किताब के कुछ अंशों से ही अनुमान लगाया जा सकता है कि वे किस तरह की शिक्षा देने पर उतारू हैं-
“अमेरिका स्टेम सेल अनुसंधान के आविष्कार का श्रेय लेना चाहता है, पर सच यह है कि भारत के डॉ. बालकृष्ण गणपत मातापुरकर को पहले ही शरीर के अंगों का फिर से निर्माण करने के पेटेंट मिल चुका है…तुम्हें यह जानकर आश्चर्य होगा कि यह अनुसंधान नया नहीं है और डॉ. मातापुरकर को इसकी प्रेरणा महाभारत से मिली थी। कुंती का सूर्य के समान तेजस्वी एक पुत्र था।अजेय कुमार,12122014 जनसत्ता

पाठ्यपुस्तकों में इस्तेमाल किए गए शब्दों को निकाल बाहर करने के बाबत दीनानाथ बत्रा ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को ज्ञापन सौंपा है जिसमें उर्दू, फारसी, अंगे्रजी के शब्दों को पाठ्यपुस्तकों से बाहर निकालने की वकालत की गई है। इन शब्दों में दोस्त, शरारत, खबरदार, गायब,गुस्सा, मौका आदि शामिल हैं। इन शब्दों को बाहर करने के पीछे तर्क दिया गया कि इन शब्दों से हिन्दी खराब होती है। जरा शैक्षिक दर्शन और शिक्षा शास्त्र की दृष्टि से इन तर्कों पर विचार करें तो यह हास्यास्पद से ज्यादा नहीं लगता। जबकि भाषाविदों और शिक्षा शास्त्रियों की मानें तो हिन्दी व अन्य भाषाओं को उर्दू, फारसी, बोलियां खराब करने की बजाए समृद्ध ही करती है। यदि हिन्दी से उक्त शब्दों व बोली भाषाओं को निकाल बाहर किया जाए तो वह हिंदी कैसी होगी इसके अनुमान मात्र से ही डर लगता है।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति किन किन बिंदुओं पर प्रहार करने वाली है इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं है। शिक्षा की बुनियाद मानी जाने वाली भाषा नीतियों, इतिहास, विज्ञान और समाज शास्त्र आदि पर इन बदलावों के तलवार चलने वाले हैं। संभव है आगामी शिक्षा नीति में हिन्दी उर्दू विहीन, अंग्रेजी के कटी, बोलियों से बेदखल होगी जहां हिन्दी के संस्कृतनिष्ठ शब्दावलियां होंगी। और उस हिन्दी में प्रेमचंद का कोई स्थान नहीं होगा। क्योंकि प्रेमचंद को काफी समय तक हिन्दी में नहीं लिख रहे थे। वे तो उर्दू में लिखा करते थे। सो प्रेमचंद हिन्दी के लेखक न रहें। साथ ही गंगा-जमुनी संस्कृति यानी हिन्दी उर्दू की साझा जबान को घातक साबित कर उर्दू को हाशिए पर धकेल दिया जाए।

संस्कृत शिक्षण को लेकर पिछले साल विवाद का जन्म हो चुका है। जर्मन की जगह केंद्रीय विद्यालयों में आगामी शैक्षिक सत्र में संस्कृत को पढ़ाने का निर्णय लिया जा चुका है। इसके साथ ही हिन्दी की शुद्धता के तर्क तले भाषा दर्शन का गला दबा दिया जाए इसकी भी पूरी संभावना नजर आती है। नई शिक्षा नीतियों में जिन मूल्यों, नैतिकता और जीवन मूल्यों को शामिल किया जाएगा उसमें नहीं लगता है वैज्ञानिक सोच के लिए कोई स्थान होगा। ऐसा भी नहीं लगता है कि तैयार होने वाली नई शिक्षा नीति त्रिभाषा सूत्र की आत्मा को बचा पाए।

इसकी एक बानगी देख सकते हैं- जिन लोगों ने खास विचार धारा के प्रसार में अपना हाथ खींच लिया उन्हें उनके पद से ही हटा दिया गया। मसलन एनसीइआरटी ने निदेशक प्रवीण सिनक्लेयर को इसलिए हटा दिया गया क्योंकि वे 2005 के राष्ट्रीय पाठ्यचर्या को जारी रखना चाहते थे। वहीं राजस्थान विश्वविद्यालय के उपकुलपति को भी पद से हाथ धोना पड़ा। इतना ही नहीं अपने एजेंडे को लागू कराने के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में ऐसा कुलपति नियुक्त किया गया जो हिन्दुआइजेशन ऑफ़ एजुकेशन में भाग ले सके।

कौशलेंद्र प्रपन्न
भाषा विशेषज्ञ एवं शिक्षा सलाहकार,
अंतः सेवाकालीन शिक्षक शिक्षा संस्थान
टेक महिन्द्रा फाउंडेशन, दिल्ली

4 COMMENTS

  1. सुन्दर सटीक और सार्थक रचना के लिए बधाई स्वीकारें।
    कभी इधर भी पधारें

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