अविस्मरणीय पुस्तक है ‘गिरिजा’

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सन 2000 के आसपास एक किताब आई थी ‘गिरिजा‘. युवा लेखक, संगीत मर्मज्ञ यतीन्द्र मिश्र की किताब ‘गिरिजा’ कई अर्थों में युगांतकारी है. इससे पहले संगीत पर जो किताबें आती थी वे ऐसी भाषा, ऐसी शब्दावली में होती थीं कि आपको अगर संगीत की जानकारी न हो तो उनको पढने की कोशिश करते हुए हीन भावना से ग्रस्त हो जाते, मैं हो जाता था. ‘लेकिन ‘गिरिजा’ आम पाठकों को संगीत से जोड़ने वाली किताब है, उनमें संगीत के प्रति अनुराग जगाने वाली किताब है. कभी इसके जैसी किताब लिखना चाहता था. हालाँकि संगीत के ज्ञान न होने की वजह से ऐसी किताब तो नहीं लिख पाया, लेकिन गायिकाओं, उनकी संस्कृति, उनके प्रभाव, उनके जादू को मैंने जरूर ‘कोठागोई’ में पकड़ने की कोशिश की है. मेरी पहली प्रेरणा ‘गिरिजा’ ही है. प्रस्तुत है इसका एक छोटा सा अश- प्रभात रंजन
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गिरिजा देवी अपनी पूर्ववर्ती जिन गायिकाओं एवं गायकों से प्रेरित हैं, उनमें डी.वी. पलुस्कर, केसरबाई केरकर, रसूलनबाई, हीराबाई बड़ोदेकर प्रमुख रूप से आते हैं। बड़ी मोतीबाई की आवाज़ पसन्द होने के बाद भी प्रेरणाप्रद नहीं उनके लिए। हाँ! जिनका नाम पूरी श्रद्धा के साथ उनकी ज़ुबान पर बार-बार आता है, वे अकेली सिद्धेश्वरी देवी ही हैं। सिद्धेश्वरी जी की गायिकी का बाना उनको आस्था से भर देता है। अप्पा बताती हैं सुबह उठने के साथ सबसे पहले सरस्वती का ध्यान करते हुए मानसिक भाव से बहुत सारे रागों के आलाप, बन्दिशें, आरोह-अवरोह उनको अर्पित करती जाती हैं। सच्चे सुर का नैवेद्य। बाद में दिनारम्भ। कभी पूछा नहीं उनसे क्या सिद्धेश्वरी जी भी ऐसा ही किया करती थीं। क्या सारे सुर साधक ऐसा ही करते हैं।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस काली उपासना करते-करते कमल का फूल अपने ही सिर पर चढ़ाने लगते थे। पूरी तन्मयता के साथ। काली की सिद्धि थी उन्हें, ऐसा परमहंस स्वयं स्वीकारते हैं। अब मुद्दा यह कि वह कौन सा तत्त्व है, जो स्वयं अपरिमित आनन्द की स्थिति (ब्रह्मानन्द सहोदर) में पहुँचा देता है।

यह स्थिति बिना एकान्त निष्ठा और अनन्यता के सम्भव नहीं। आस्था और समर्पण का द्वैत बाहर से भले ही अलग-अलग दिखाई पड़े, परन्तु आन्तरिक विन्यास में उसका स्वरूप एक हो जाता है। यदि भक्त परमहंस की मानसिक स्थिति में आ सके। उस क्षण फूल का अर्पण गौण हो जाता है और एकान्त निष्ठा प्रखरता से उभर आता है। सिद्धेश्वरी हों या गिरिजा, चैतन्य महाप्रभु रहे हों या बैजू बावरा। सभी अपने संगीत के प्रति एकनिष्ठता रखते हुए गायिकी अथवा भक्त का ऐसा स्थापत्य निर्मित करते हैं, जिसमें श्रद्धा और समर्पण का द्वैत मिट जाता है।

क्रोचे अभिव्यंजना को सर्वोपरि मानते हैं। उनके यहाँ अन्तःप्रज्ञात्मक ज्ञान या अनुभूति कला के शाश्वत में प्रवेश को स्वीकारती है। वे इस तर्क से पूर्णतया सहमत हैं कि बिना अन्तःप्रज्ञा स्फुरण के कला की सृष्टि नहीं होती। यह स्फुरण, झलक या प्रतिभास कलाकार के अन्तर में बिजली की कौंध की तरह सहसा होता है, इसके लिए कोई पूर्व चिन्तन अपेक्षित नहीं।

सांगीतिक अभिव्यक्तियों में भी यही तर्क स्पष्टतः देखा जा सकता है। भाव की अभिव्यंजना के फलस्वरूप सुर के धरातल पर यही स्फुरण प्रकट होता है। जिसके कारण अनन्य आनन्द की प्रतीति होने लगती है।

गिरिजा देवी की सुर साधना ऐसे ही स्फुरण की फलश्रुति है।

जिस तरह प्रत्येक अन्तःप्रज्ञा कला है, उसी तरह हर कलाकार की अपनी-अपनी अन्तःप्रज्ञाएँ वे पवित्र तीर्थ हैं, जहाँ कलाएँ जन्मती हैं।

इस तरह काशी में दो तीर्थ हैं।

इस तरह काशी में बहुतेरे तीर्थ हैं।
  
2
साँवरिया प्यारा रे मोरी गुइयाँ
वह ते ठाढ़े कदम की छइयाँ
धूप का मारा रे मोरी गुइयाँ

अप्पा के साथ सारी शिष्याएँ कोरस में रियाज़ कर रही हैं। हल्के शब्दों में दादरा की मीठी बन्दिश अच्छी लग ही रही थी कि अप्पा एक-दो शिष्याओं को डाँटने लगीं।
अरे बिटिया जरा दुलार से साँवरिया प्यारा दुहराओ। हियाँ गाते बखत ई लागेक चाही कि अपने प्रियतम के बेहद प्रेम मा पड़ी हौ। तू तो अइसा गाय रही हौ जइसे चण्डी मैदान मा उतर आइ हों।

बाकी सब खिलखिलाने लगे। फिर डपटकर बोली अरे मालिनी! तोहार साहेब तौ अफसर हैं। का तू उनका अइसे ही पुकारत हौ।
मालिनी अवस्थी ना में सर हिलाकर मुस्करा देती हैं। अप्पा फिर सबको रियाज़ के मैदान में खदेड़कर रेफरी की तरह ताकीद करती हैं चलो फिर से शुरू करो। मगर इ बार सब जनी ठीक से गाओ, हियाँ मन मा ई भाव रखौ कि नाजुक-नाजुक औरत हो, चण्डी नाहीं।

दादरा, टप्पा ऐसे टप्प से थोड़ी आय जात है
क्या टप्प से ऐसे कुछ भी आ सकता है?
जैसे दादरा
जैसे टप्पा
जैसे तराना
जैसे सबकुछ
सभी लोग फिर से शुरू-
साँवरिया प्यारा रे….

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वे बोलीं- मुझे कई राग बेहद प्रिय है। मगर भैरव को मैं सबसे ज़्यादा गाती हूँ। भैरव में गायी जाने वाली बन्दिशें मुझे बहुत अच्छी लगती हैं। मैं इस राग को इसलिए भी ज़्यादा मन से गाती हूँक्योंकि यह शिव का राग है। इसको गाते वक्त शिव आराधना का सा अनुभव होता है। सुर इसमें मंद्र पर इतनी गम्भीरता से उठता है कि बेहद शान्ति महसूस होती है।

अप्पा को काशी प्रिय है। वे शिव उपासिका हैं, अतः शिव का प्रिय भैरव राग भी उन्हें अपना लगता है। और यह अलग से आश्चर्य का कारण है कि जब काशी में सुबह उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ अपना रियाज़ आरम्भ करते हैं, तो वह विश्वनाथ मन्दिर एवं बालाजी मन्दिर की दिशा की ओर मुँह करके बैठते हैं। वे कहते भी हैं कि मैं यहीं से शिव को रोज़ अपनी शहनाई सुनाता हूँ और अपना सलाम भेजता हूँ।

काशी जो भी आता है, वह अपनी कला को विश्वनाथ के सामने प्रदर्शित करके जाता है। जो काशी में रहता आया है, उसके लिए अपने घर में बैठे-बैठे ही सही सलाम, बैना, आभार और निमंत्रण भेजने का रिवाज़ है। काशी का एक पर्याय शिव हैं। शिव का एक पर्याय सुन्दर की सृष्टि करना है। यह और भी प्रासंगिक तब हो जाता है, तब उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ अपनी शहनाई शिव को सुनाकर प्रफुल्लित होते हैं और गिरिजा देवी भैरव गाकर अपनी अनन्य श्रद्धा का भाव बनाए रखती हैं।

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