क्या ‘वासकसज्जा’ हिंदी का सबसे अश्लील उपन्यास है?

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इमरजेंसी के बाद कोठे का मतलब बदलने लगा था. इस बात के ऊपर लोगों का ध्यान नहीं गया है कि इमरजेंसी में बैन होने के बाद से नाच-गान के पारंपरिक पेशों की जगह कोठे रेडलाईट एरिया में तब्दील हो गए. उन्हीं दिनों मुंबई के कमाटीपुरा की यौनकर्मियों के जीवन को आधार बनाकर आबिद सुरती ने एक उपन्यास लिखा था- वासकसज्जा. तब उस उपन्यास का धारावाहिक प्रकाशन कोलकाता से निकलने वाली पत्रिका ‘रविवार’ में होता था.

बाद में एस. हुसैन जैदी ने भी मुम्बई की माफिया हसीनाएं किताब में कमाटीपुरा के जीवन की कुछ झलकियाँ दिखाई थी लेकिन वह बहुत बाद की बात है. मेरे खयाल से यौनकर्मियों के किसी एक इलाके के ऊपर इतना विस्तार से पहले किसी ने नहीं लिखा था, जिस तरह से आबिद सुरती ने लिखा था. हालाँकि इस उपन्यास का ऐतिहासिक महत्व ही अधिक है.

मुझे अच्छी तरह याद है, तब मैं स्कूल में पढता था और रविवार के अंकों का बेसब्री से इन्तजार किया करता था. क्योंकि एक गंभीर समझे जाने वाली पत्रिका में उस तरह एक वर्णन मैंने कभी नहीं पढ़े थे जिनको अन्यथा अश्लील कहा जाता था. तब भी और आज भी. कहते हैं कि रविवार के उन आखिरी दिनों में उसकी राजनीतिक पत्रकारिता ने नहीं बल्कि आबिद सुरती के इस उपन्यास ने थामे रखा था. जहाँ तक मेरी अपनी जानकारी है आबिद सुरती का सबसे अधिक पढ़ा गया उपन्यास भी यही है.

हालाँकि तब भी यह कहना चाहता हूँ कि कमाटीपुरा के रेड लाईट एरिया में रहने वाली औरतों के जीवन की दुश्वारियों का, वहां एक माहौल का उतनी गहराई से वासकसज्जा में विश्लेषण नहीं किया गया है. बल्कि धारावाहिक प्रकाशित होने के कारण शायद लेखक के ऊपर इस बात का दबाव रहा हो कि हर अंक में मस्तराम टाइप कुछ वर्णनात्मकता होनी चाहिए. दुर्भाग्य, से यह इससे आगे नहीं बढ़ पाया. एक थ्रिल पैदा करके रह गया.

वासकसज्जा को आज मैं एक अश्लील उपन्यास के रूप में ही याद करता हूँ जिसके केंद्र में जीवन नहीं सेक्स है! कभी मिले तो पढियेगा जरुर. कभी किसी पत्रिका ने इतना बोल्ड उपन्यास नहीं छापा था.  

5 COMMENTS

  1. I also remember reading this novel…. not as ASHLIL as has been described…. if you read the contents without context or background, even a description of month feeding an infant would sound obscene.

  2. My dear Prabhat, please note – It was a published novel chosen by "Ravivar" editor for serialisation in the weekly. So there was no pressure to add or change anything. It was published as it was. For your information, this novel has been translated in practically all the major Indian languages. In English it was chosen by IMPRINT, the only literary magazine of India in those days & published the full book in two parts. Well, i am glad that you have still remembered the novel..

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