हरेप्रकाश उपाध्याय की टटकी कविताएं

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हिंदी कविता के कई स्वर हैं. समकालीन कविता की कई आवाजें हैं. एक आवाज हरेप्रकाश उपाध्याय की भी है. उनकी कविताओं में वंचित समाज का नजरिया दिखाई देता है, भारत के उस समाज का विकास का इंजन जहाँ कभी पहुँच ही नहीं पाता है, जहाँ तक जाते जाते कई नदियाँ सूख जाती हैं. कुछ बेहद मार्मिक और जरूरी कविताएं- मॉडरेटर 
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हाशिया
लिखने से पहले
निकाल देता हूँ हाशिये की ज़गह
हाशिये से बाहर
लिखता चला जाता हूँ
पूरे पृष्ठ में कोरा
अलग से दिखता है हाशिया
मगर हाशिये को कोई नहीं देखता
कोई नहीं पढ़ता हाशिये का मौन
हाशिये के बाहर
फैले तमाम महान विचार
लोगों को खींच लेते हैं
खींच नहीं पाती हाशिये की रिक्ति
किसी को…
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एक कवि जब हाशिये के बाहर
व्यक्त कर लेता है अपना विचार
हाशिये के बारे में भी
लिख लेता है अपनी कविता
और नहीं मिलती उसे कोई जगह
तो आकर
हाशिये में लिखता है अपना नाम
एक बार फिर…
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विमर्श
लोग सरकारी दफ्त़रों में भकुआए हुए घूमते हैं
इस मेज़ से उस मेज़ पर दुरदुराये जाते हुए
लोग कोर्ट-कचहरियों में लूट लिये जाते हैं
धक्के खाते हैं
लोग भूखे रह जाते हैं
भविष्य के लिए थोड़ा सा अन्न बचाते हैं
लोग साधारण सुविधाओं के लिए तरस कर रह जाते हैं
एक तिहाई से भी अधिक बच्चे कुपोषण के शिकार हैं
बेरोजगारों की फौज़ रेलों में लटककर
देश भर में काम खोज़ती घूम रही है
लोग चंद हज़ार के कर्ज़े चुकाने में अपनी धरती से हाथ धो बैठते हैं
लोग खेत से लौटते हैं और फांसी लगा लेते हैं
ज़हर खा लेते हैं
लोग राजनीति पर थूकते हैं
तो विश्वविद्यालय में मलाई मार रहा एक अध्यापक कहता है
जनता अराजनीतिक हो गयी है
यह जनता के भविष्य के ़िखलाफ है
एक वामपंथी सरकारी अधिकारी कहता है
जनता में लुम्पेनगीरी बढ़ रही है
तरह-तरह के रंगों वाली सरकारों से अनुदान पाकर नाटक करने वाला
एक नटकिया कहता है कि ़खतरनाक है जनता की राजनीति से चिढ़
वह राजनीतिक पक्षधरता के विलुप्त हो जाने का राग अलापता है
अपनी बीवी को सड़क पर घसीटकर बाहर कर देने वाले एक क्रांतिकारी
अध्यापक को याद आती है रघुवीर सहाय की संदर्भ से भटकायी गयी पंक्तियाँ
‘‘एक मेरी मुश्किल है जनता
जिससे मुझे ऩफरत है
गहरी और निस्संग…’’
एक भगवाधारी कहता है- सब प्रभु की माया है
समाजवादी कहता है कि बगैर सोशल इंजीनियरिंग के नहीं टिक सकती राजनीति…
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नागरिक
उसके घर जब आकर रहने लगे
दु:ख अभाव और उनकी सगी कलह
तो वह भागकर कमाने मुंबई चला गया
वहाँ से भगाया गया
धरती पुत्रों ने भगाया उसे
उसके बाद वह सूरत गया बंगाल गया
नेपाल गया
कई-कई शहरों में कई-कई बार गया
कहीं दोस्तों ने ही ठग लिया
कहीं उसके मालिकों ने मार लिया मेहनताना
और भगा दिया
कहीं बीमारी और मौत से लड़ते-लड़ते वह भागा
मारा-मारा फिरता रहा
एक अदद काम की तलाश में
पूरी जवानी की यही रही कहानी
एक दिन कबूतरबाजों के हत्थे चढ़ा
तो अपने हिस्से में मिली एक कोठरी भर की ज़मीन बेचकर
चला गया दूर अरब के देश में
वहाँ भी उसका मालिक
उठाता है उसकी मज़बूरी का ़फायदा
जब न तब बिना बात के काट लेता है पैसे
बोनस में अपमान का करता है भुगतान
अब वह जाये तो कहाँ जाये
अब वह लौटे तो किसके पास लौटे
किस ठिकाने पर लौटे
निगोड़ा घर भी बिक गया
जो होता तो लौटने का एक बहाना तो होता
अब वह उस देश में कैसे लौटे
जहाँ बिक गयी उसकी धरती
बिक गया आसमान…
कहने को मगर
वह अब भी एक देश का नागरिक है…
……….
भारत माता के बेटे
यह भाई जो दिन-दिन भर
रोज़ रिक्शा चलाता है
दो-चार रुपये के लिए झिक-झिक झेलता है
बेवजह अपमान झेलता है मार खाता है
जिसके पेट में भूख हरदम अंतड़ियाँ चबाती रहती हैं
भारत इस भाई का भी तो है
यह भाई जो दिन भर ठेले खींचता है
और जिसके बच्चे मिठाई के लिए तरसते हैं
जिसके बच्चों के लिए नयी कमीज़ें दिवास्वप्न की तरह हैं
भारत इस भाई का भी तो है
यह भाई जो खेतों में
अपनी हड्डियाँ गलाता है
पसीने से सींचता है अन्न के दानों को
जिसके बच्चे दूध के लिए तरस कर रह जाते हैं
जिसकी बिन ब्याही बेटी पिता की दु:ख की पोटली लिए कुएं में कूद जाती है
भारत इस भाई का भी तो है
यह भाई जो फूटपाथ पर
जूते सिलता है
और जिसके पाँव बिवाइयों से पटे हैं
भारत इस भाई का भी तो है
यह भाई जिसका भाई
इलाज़ के अभाव में मर गया
और जो चंद रुपयों की दवाई खरीद न सका
जो अस्पतालों स्कूलों और कचहरियों में घुसते हुए डरता है
भारत इस भाई का भी तो है
यह भाई जिसके पिता
साहूकार से लिए चंद हज़ार रुपये की कर्ज़ न चुका पाये
और अपमान व ज़िंदगी की दिक्कतों से भागकर
गरदन में गमछा बाँधकर पेड़ से लटक गये
भारत इस भाई का भी तो है
यह भाई जिसके बेटे को
पुलिस ले गयी
आतंकवादी कहकर
जो दरअसल बेरोज़गारी-अभाव के आतंक से बौखलाया
मारा-मारा घूम रहा था
जिसके चेहरे पर हल्की दाढ़ी थी
भारत इस भाई का भी तो है
क्या आप इन भाइयों को बता सकते हैं
संविधान में दर्ज़ समता बंधुत्व न्याय स्वतंत्रता के अर्थ
क्या आप बता सकते हैं इन्हें विकास का अर्थ
क्या आप बता सकते हैं इन्हें नयी शताब्दी का अर्थ
क्या आप बता सकते हैं डिज़िटल इंडिया के मायने
ये किससे करें मन की बात
क्या आप बता सकते हैं…
………….
इंतज़ार
क्या वह दिन कभी आएगा
जब हरचरना भी पेट भर पाएगा
सबकी आवाज़ में आवाज़ मिला अमन का गाना गाएगा
वह दिन कब आएगा

13 COMMENTS

  1. Sach mein Ek svar yah bhi hai!! Achchhi Kavitain…Hare Prakash Bhai ko Haardik Shubhkaamna…Jankipul ka aabhaar!
    – Kamal Jeet Choudhary

  2. सहज और प्रभावी कविताएं। हरेप्रकाश जी को शुभकामनाएं।

  3. हाशिया कविता बहुत सुन्दर लगी .नागरिक भी बेहतर है .

  4. उपाध्‍याय जी की कविताएं पहली बार पढ़ रहा हूँ। यहॉं दी गई सभी कविताएं एक से बढ़कर एक हैं। व्‍यक्तिगत रूप से मुझे 'हाशिया' कविता सबसे अच्‍छी लगी।

  5. ये किससे करें 'मन की बात'
    क्या आप बता सकते हैं……
    बिल्कुल जायज प्रश्न ।

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