उत्तराखंड की घाटियाँ और पहाड़!

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युवा पत्रकार स्वतंत्र मिश्र यायावर मिजाज रखते हैं. यायावरी के वृत्तान्त लिखते हैं. पहले हम उनके हिमाचल यात्रा की दास्तान पढ़ चुके हैं. इस बार उत्तराखंड- मॉडरेटर 
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2012  के अगस्त में तहलकाकी नौकरी छोड़ दी थी और शुक्रवारमें एक सितंबर से नई पारी शुरू करनी थी। लगभग एक सप्ताह का समय था तब भी मैं देहरादून, शिमला, नालदेहरा और तत्तापानी घूमने गया था। पता नहीं क्यों पहाड़ मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित करते हैं? शायद इसके पीछे एक वजह यह रही हो कि हमारे देश की हर पावन और पुण्यसलिला कही जाने वाली नदियों में पानी कम होता चला गया और उसमें प्रदूषण ज्यादा बढ़ता चला गया। नदियां एक-एक करके दूषित होती चली गईं। मंदिर-मस्जिद की कलाकृतियों को छोड़ दें तो उसमें अपनी कोई विशेष दिलचस्पी कभी जगी नहीं। हां, गुरूद्वारे मुझे जरूर आकर्षित करते हैं। खैर जो भी हो आठ महीने लगातार नौकरी करते-करते मन ऊब सा गया था। अक्सर हम तीन-चार महीने में दिल्ली की चैहद्दी से बाहर दो-तीन के लिए जरूर निकल जाते हैं। इस बार नई नौकरी में मजा आने की वजह से थोड़ा लंबा समय निकल गया था। पत्नी और बेटे भी महानगर की थका देने वाली जिंदगी से बाहर निकल कर अपने फेफड़ों में ताजी हवा भर लेना चाहते थे। फेसबुक में तहलका के दिनों में एक दोस्त गौरव नौरियाल मिले जो मुझे साल भर से भी ज्यादा समय से पौड़ी आने का निमंत्रण दे रहे थे। गौरव भी सरोकारी पत्रकार हैं। मैं था कि कभी बारिश तो कभी ठंढ तो कभी छुट्टी नहीं मिलने का बहाना- इन तीनों वजहों के अलावा एक और वजह यह भी थी कि मेरी गौरव से अबतक फोन पर ही बात होती रही थी। अभी तक उससे मिलना नहीं हुआ था। पिछले दो दशक के दौरान ट्रेन में किसी अनजान व्यक्ति के हाथों कुछ खाने के बाद उसके दुष्परिणाम के सैकड़ों वारदातों को पढ़ और सुन चुका था। और तो और अत्याधुनिक दिल्ली मेट्रो में अनजान व्यक्ति से दोस्ती न करने की सलाह उसकी सवारी करते-करते हजारों बार सुन-सुन कर पक चुका था। इससे इतर बाघा बोर्डर पर दो मुल्कों की सेनाओं को रोटी साझा करते हुए देख चुका था और धीरे-धीरे कई अनजान लोगों को अपने नजदीक आते भी समय-समय पर महसूस करता रहा। समय कम था और दूसरे विकल्प तीन दिन में पूरे नहीं होने वाले थे। सो, बेटे के उकसाने पर अपनी गाड़ी से ही जाने का निर्णय ले लिया।
नजीबाबाद से कोटद्वार: यहां हिरण, हाथी और नीलगाय दिखते हैं
रीना  (पत्नी) और शब्द (बेटा) अपने-अपने स्कूल से- रीना पढ़ा कर और शब्द पढ़ कर मेरे दफ्तर नोएडा आ गए। अब मेरी क्लासलगने वाली थी क्योंकि रोज-रोज की ड्राइविंग से तंग आ गया था और अब तीन दिन लंबी ड्राइविंग करनी थी। शुक्रवारके सहयोगी मित्र हरिशंकर शर्मा भी हमारा साथ मोदीनगर तक देने के लिए हमारे साथ चले पड़े थे। मोदीनगर उनके घर पहुंचते-पहुंचते अंधेरा घिरने लगा था और वे बार-बार किसी आशंका या पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अपने इलाके के स्वभाव से परिचित होने की वजह से अपने घर रात को रूक जाने की बार-बार जिद कर रहे थे। गौरव ने कोटद्वार में अपने एक बचपन के दोस्त नवीन नेगी को कहकर पीडब्ल्यूडी का अतिथि-गृह में हमारे ठहरने की व्यवस्था करा दी थी। नवीन भी पत्रकार हैं। हम पहले एनएच 24 पर चलते हुए मेरठ और मेरठ के बाद एनएच 58 पर चलते हुए मवाना, बिजनौर और नजीबाबाद के बाद और कोटद्वार से लगभग 40 किलोमीटर पहले एक ढाबे पर खाना खाया और अब जंगल के बीच से बनाए गए रास्तों पर चलते हुए कोटद्वारा पहुंचना था। गौरव ने समझाया कि गाड़ी की गति कम रखना क्योंकि कभी-कभी नीलगाय, कभी हाथी और कई बार हिरण भी सड़क पर निकल आते हैं। उसकी बात सही निकली और हमें दूर से ही नीलगाय चमकती आंखें दिखाई दे रही थी। हमने गाड़ी धीमी कर ली। शब्द और रीना बहुत रोमांचित हो रहे थे तब मुझे लगा कि कार से आने का मेरा फैसला ठीक रहा। हम लगभग साढ़े ग्यारह बजे कोटद्वार स्थित झंडा चैक पहुंच गए और स्थानीय निकाय के चुनावों की वजह से थोड़े जगे हुए शहर में हमें पता बताने के लिए लोग मिल जा रहे थे। मैंने कार का शीशा उतारा और किसी व्यक्ति से पूछा कि पीडब्ल्यूडी का गेस्ट हाउस कहां है? मेरी दाहिनी ओर एक बाइक सवार आ रूका और दूसरी ओर मुंह करके सवाली सी शक्ल बनाकर आवाज लगाई – मिश्र जी। मैं समझ गया और मैंने भी जवाब में कहा – नवीन। फिर हम उसके बाइक के पीछे हो लिए। गेस्ट हाउस का दरबान सो चुका था। बहुत आवाजें देने के बाद भारी-भरकम दरवाजा खुला। हमारे ठहरने के लिए जो सुइट था, उसे देखकर लगा कि यह उनके लिए बनाए गए होंगे जो बहुत सारे खिदमतगारों से घिरे रहते हैं। शब्द ने अपनी बालसुलभ चपलता के साथ मेरी भावनाओं को नवीन से कह डाला – अंकल, ये तो हमारे हाऊस से भी बड़ा है। अबतक हम पस्त हो चुके थे। नवीन को सुबह नौ बजे आने और दरबान को सात बजे चाय दे जाने को कहकर हम सोने चले गए। कभी-कभी बहुत ज्यादा थकान भी नींद को दूर कर देती है। उस रोज भी यही हुआ। मुझे अच्छी नींद नहीं आई। सुबह-सुबह ट्रैक्टर की ट्राॅलियों की शोर से नींद अब फाख्ता हो चुकी थी। अब मैं और रीना बालकोनी में चारों और पहाड़ के अलग-अलग रंग, उगते सूरज और बंदरों की शरारत भरी हरकतों का आनंद लेने लगे। सामने ही रेल लाइनें बिछी थी, जिसे देख कर लग रहा था कि यहां अब कई वर्षों से कोई ट्रेन नहीं आई हो। सूअर के बच्चे भी आसपास के मकानों से अव्यवस्थित तरीके से बहाए गए पानी से बन चुके नाले के किनारे अपनी मां के स्तन में थूंथने मार दूध पीने के लिए संघर्ष कर रहे थे।
कोटद्वार: चुल्लू भर पानी में जीवन का लुत्फ ढूंढ़ते दो मतवाले
गौरव का फोन आया और उसने निर्देश दिया कि तुम सिद्धबली मंदिर देख कर पुलिंदा वाली सड़क पर चार-पांच किलोमीटर ऊपर चले जाना, शायद हिरन और हाथी दिख जाए। पर उसने यह भी कहा कि हाथी अगर अकेला हो तो खतरनाक होता है। पहाड़ और नदी के बैकग्राउंड वाले सिद्धबली मंदिर पहुंचा तो तबियत खुश हो गई। पूरा कोटद्वार शहर वहां से दिखाई दे रहा था। एक बहुत पुराना चर्च भी दिख रहा था। अंदाजा लगा कि यहां इसाई धर्म को मानने वाले लोग भी हैं। नवीन ने बताया कि यह एशिया के पुराने चर्चों में से एक है। मंदिर के पीछे बह रही नदी में पानी बहुत कम था लेकिन धूप की चमक से उसका रंग सोने सा दमक रहा था। दो छोटे-छोटे बच्चे अपना कच्छा माथे पर बांधे हुए उसी चुल्लू भर पानी में छप-छपाकर जीवन की सारी खुशियां तलाश लेना चाह रहे थे। यहां से निकल हम पुलिंडा वाले रास्ते को मुड़ गए। यह रास्ता कहीं पक्का तो कहीं मलवे से भरा तो कहीं बीच-बीच में रास्ता बचपन में झूले पर घिस चुके हाफ पैंट पर दादी की मोटी सुई और धागे से लगाए गए पैबंद की तरह मालूम हो रहे थे। हमें न हाथी मिला और न ही हिरन। हां, रास्ते में कहीं-कहीं हाथी के लीद जरूर दिखाई दिए जो आगे बढ़े जाने के लिए आकर्षण भी पैदा कर रहे थे और एक किस्म का डर भी। हमें रास्ते में जगह-जगह लकड़ी और चारा इकट्ठा करने वाली औरतें और लड़कियां दिखाई देती जो पहाड़ों के कठिन जीवन को अपने दम पर हरा करती हुई प्रतीत हो रही थीं। वर्ना पुरूष तो यहां टांगों पर टांगे चढ़ाए मुक्तिबोध के अंदाज में बीड़ी पीते हुए दार्शनिक से ही नजर आते हैं। यहां का लिंगानुपात बहुत बढि़या है। 1000 पुरुषों पर 1103 महिलाएं हैं, जिससे पता चलता है कि महिलाएं यहां आदर पाने वाले पात्रों में से है। हम पुलिंडा पहुंच गए थे। यहां के लोग 1970 से ही विस्थापित होने की मांग करते आ रहे हैं। बरसात में हर साल यहां के मकान जमीन में कुछ फीट धंस जाते हैं। कुछ साल पहले तो यहां पंद्रह परिवार के कुल 60-65 लोग जमींदोज हो गए। विकास की दुदंुभि बजाने वाली अब तक की किसी भी सरकार ने इन्हें अपेक्षाकृत सुरक्षित जगह पर बसाया नहीं इसलिए वे अक्सर कोटद्वार और देहरादून में अपनी मांग के लिए पहुंचते रहते हैं। हम टूटे-फूटे रास्तों से होते हुए दोगड्डा आए जहां से अच्छी सड़क लैंसडोन को जाती है।
लैंसडोन: भुल्ला लेक में बोटिंग का आनंद
दोगड्डा में एक बहुत साधारण नाश्ते-खाने की दूकान पर नाश्ता करते हुए हमने अपनी टेबुल की बगल में एक छोटी सी जगह से एक सीढ़ी तहखाने में जाती हुई देखी। दूकान वाले से पूछा- यह क्या है?’ उसने बताया कि 40 रुपये में एक चारपाई रातभर टिकने के लिए। दूकान के अंदर वाले हिस्से में जहां दूकानदार का परिवार भी रहता था, कोई निर्माण कार्य चल रहा था। रस्सी में दो-तीन ईंट फंसाकर एक मजदूर हमारे सामने से बार-बार गुजरता हुआ निर्माण-प्रकिया में मग्न नजर आ रहा था। दोगड्डा में ही डबराल स्वीट्स देखकर मधुरता से भरे अपने कवि मंगलेश दा की याद हो आई और पता चला कि ऊर्जा पैदा करने वाले राज्य में रोशनी पाने के लिए अभी भी बहुत सारे गांवों के लिए लालटेन ही एकमात्र सहारा है। यहां से लैंसडोन 30 किलोमीटर की दूरी पर था। हम एक बजे से पहले वहां पहुंच गए थे। वहां पार्किंग में किसी स्कूल के बच्चे फुटबाॅल खेल रहे थे। लैंसडोन गोरखा रेजीमेंट की वजह से पिकनिक की एक खूबसूरत जगह में तब्दील हो चुका है। यहां 30 फीट गहरे भुल्लातालाब में लाइफ जैकेट पहना कर सेना वाले वोटिंग भी करवाते हैं। इस ताल में छोटी और मंझोली मंझोले किस्म की मछलियां और बत्तखें भी तैरती हुई आपको आनंदित करती हैं।  यहां एक बड़े पिंजड़े में जंगलों से पकड़े गए खरगोश और बिलायती चूहा भी रखे गए हैं जो बच्चों के साथ किसी भी उम्र के लोगों को आनंदिन कर सकते हैं। यहां से अब हमें 35-36 किलोमीटर की दूरी पर महादेव के मंदिर ताड़केश्वर भी जाना था। हम घंटे भर की ड्राइविंग के बाद खूबसूरत वादियों और घाटियों के दर्शन करते हुए वहां पहुंच गए। यहां चारों ओर निरापद शांति पसरी हुई थी, जो आपको शांति और सुकून पहुंचाती है। 2092 मीटर की ऊंचाई पर बनाया गया यह मंदिर देवदार के लंबे-लंबे पेड़ों से घिरा है। यहां सात देवदार के पेड़ ऐसे हैं जो शिव के त्रिशूल की तरह दिखते हैं। मेरी पत्नी ने थोड़ी मगजमारी की तो उसे चार ही दिखे। यहां दो-तीन छोटे-छोटे आश्रम हैं, जहां रूकने वाले को अपने साथ खाने की सामग्री लाने की सलाह देता हुआ एक बोर्ड भी दिखता है। पर इसके बिना भी आपको खाना खिलाने के लिए आश्रम वाले तत्पर रहते हैं। हमने भी यहीं खाया। यहां योग और आध्यात्म के केंद्र भी बनाए गए है। यहां कुछ घंटे बिताने के बाद हम पौड़ी के लिए चल पड़े। हमने यहां के स्थानीय लोगों के कहने पर पौड़ी पहुंचने के लिए 15-20 किलोमीटर छोटा रास्ता लेने का मन बनाया। यह रास्ता बहुत डरावना और बहुत ही खराब था। लैंसडोन वाला रास्ता लंबा जरूर था पर वहां 40-50 की गति में गाड़ी दौड़ाई जा सकती थी और रास्ता चैड़ा होने की वजह से दुघर्टना की आशंका भी न्यूनतम थी। रास्ते भर ऐहतियात बरतने और मठु-मठु चलने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। परिणाम यह हुआ कि हमें खिरसू पहुंचने में बहुत देर हो गई। इस रास्ते पर जरा सी चूक के बाद हमें सुधार का कोई मौका नहीं मिलने वाला था। मेरी गर्दन और पीठ अब तक ऐंठ चुकी थी। अंततः दो-ढाई घंटे लगातार चलने के बाद सतपुली पर आकर हमें हाइवे के दर्शन हुए। वहां गर्दन की अकड़ को ठीक करने के लिए दर्द निवारक एस्प्रे खरीदना पड़ा। एक ओर बस्ती थी तो दूसरी ओर बहुत नीचे बहने वाली नायर नदी। रात में खिरसू पहुंचने पर गौरव ने बताया कि नायर नदी में छोटी मछलियां हैं और सतपुली में मछली के मजेदार पकौड़े मिलते हैं। मैंने और शब्द ने यह मौका गंवा दिया था। रीना तो वैसे भी शाकाहारी प्राणी है।
खिरसू की निरापद शांति प्रेम के लिए उकसाती है
पहाड़ों में जल्दी रात होती है इसलिए गौरव को यह डर था कि खिरसू पहुंचने पर हमें खाने को न मिले। हुआ भी यही। लेकिन शुक्र यह था कि हमारे लिए गौरव और पंकज वहां मुस्तैद थे जिन्होंने हमारे लिए खाना कहीं से जुटा लिया। खाना न मिलने की स्थिति में भूख की तीव्रता भी बढ़ जाती है। खाना अच्छा था। हमने जमकर खाया। वन विभाग के अतिथि गृह में हमें ठहराया गया। वे भी बगल वाले कमरे में ही टिके थे। मेरे कमरे का नाम बुरांश कक्ष था। बुरांश एक लाल रंग का फूल होता है जिसके रस के सेवन से हृदयरोगियों को लाभ पहुंचता है। यहां के मकानों के छत त्रिभुजाकार वाले होते हैं। खिरसू, पौड़ी से 19 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक बहुत ही शांत और किसी किस्म के प्रदूषण से रहित गांव है। इस नीरवता को छोटी-छोटी रंग-बिरंगी चिडि़या ही अपनी चहचहाट से भंग करती रहती है। इन चिडि़यों के माथे चीड़ के नुकीले ऊपर उठे हुए पत्तों की तरह होते हैं, जो बर्फबारी से इनकी रक्षा करते हैं। यहां चीड़, देवदार, अखरोट, बुरांश और काफल के पेड़ों से भरे जंगल हैं। वन विभाग के गेस्ट हाउस में अखरोट की बड़े पैमाने पर खेती होती है। यहां अखरोट की पैदावार के लिए प्रशिक्षण भी दी जाती है। रूकने के लिए यहां गढ़वाल मंडल का बहुत ही खूबसूरत गेस्ट हाउस भी है जहां 900-1800 रूपये में कमरा मिल जाता है। गढ़वाल मंडल गेस्ट हाउस में पचासों किस्म के फूल उगाए जाते हैं। यहां बहुत सारे हनीमून के लिए जोड़े भी टिके हुए दिखाई दिए। प्रेमियों के लिहाज से निरापद शांति यहां भरपूर है। इन दोनों गेस्ट हाउस के बीच में एक बड़ा सा पार्क है, जिसमें कपड़े के तंबू तने हुए दिखाई दिए, जहां 2000 रुपये देकर रात गुजारी जा सकती है। जंगली इलाका होने की वजह से यह विकल्प खतरनाक भी साबित हो सकता है। सर्दियों में यहां बहुत बर्फबारी होती है। मौसम खुला हो तो हिमालय की बर्फीली चोटी देखी जा सकती है। यहां एक घनडियाल देवता का भी एक मंदिर है, जिसे जरूर देखना चाहिए। गौरव ने बताया कि पौड़ी में चार अलग-अलग घनडियाल देवता का मंदिर है। यह भूमि देवता हैं। सुबह गौरव और पंकज अपनी नौकरी पर चले गए। हम प्राकृतिक नजारों का मजा लेते रहे। गढ़वाल मंडल के गेस्ट हाउस में भंडारी जी के हाथों बनी दाल, चावल, रोटी और जीरा आलू की सब्जी खाई और पौड़ी के लिए निकलते वक्त गेस्ट हाउस में पहुंचे लोगों की खातिरदारी करने वाली महिला को हम कमरा छोड़ने की बात बताने गए तो उसके आंखें मोटे-मोटे आंसूओं से लबालब थे जो बस सहानुभूति पाते ही सब्र का बांध तोड़कर बाहर आ जाने को बेताब थे। उससे पूछा तो रोते हुए उसने बताया कि उसके पति को पेट में दर्द है और उसे पौड़ी डाॅक्टर के पास ले गए हैं। मैंने पूछा कि पेट में दर्द क्यों है तब उसने बताया कि रोज पीते हंै। गौरव ने उत्ताखंड में नशाखोरी की वजह बताई कि यहां मनोरंजन के लिए आदमी के पास कुछ नहीं है। बेचारा क्या करे, इतना कठिन जीवन है। विचित्र बात है कि यहां पर्यटक मनोरंजन के लिए आते हैं और यहां के लोगों के पास अपनी एकरसता तोड़ने के लिए शराब या नशाखोरी के अलावा कोई साधन नहीं है। खैर, हम ढांढ़स बंधा कर पौड़ी की ओर चल पड़े।
नायर के मछली के पकौड़े गुलदार, बर्फीले हिमालय के लिए हम दोबारा आएंगे
रास्ते में कहीं घुघुती तो कहीं तोते और मोर भी दिख जाते। कई ऐसी चिडि़या देखी जो आकार में इतनी छोटी कि माचिस की डिबिया में भी आसानी से बंद हो जाए। कइयों के पंख के रंग हरा कचोट ऐसा कि  मानों कुएं के आसपास वर्षों से जमी काई को उठाकर पेड़ की फुनगी पर टिका दिया गया हो। सीढ़ीनुमा खेतों, घाटियों और वादियों को निहारते, कैमरे में उतारते हुए हम दोपहर तक पौड़ी पहुंच गए। यहां हमें गौरव मिल गया -मेरा राजू गाइड। उसके साथ हम भारत के सर्वाधिक ऊंचाई पर बनाए गए स्टेडियम देखने को गए। इस स्टेडियम को लेकर कई तरह की योजनाएं बनाई गई हैं लेकिन फिलहाल यहां लोग कार-मोटर और मोटरबाइक ही सीखने को इसमें आते हैं। इसके बाद हम एकेश्वर मंदिर गए, जिसका पुजारी रास्ते में मोबाइल पर बतिया हुआ मिल गया। उसकी नई आल्टो किनारे खड़ी थी। गौरव को वह जानते थे इसलिए गाड़ी रोक कर हमसे परिचय कराया गया। मैंने उनकी ओर हाथ बढ़ाया तो संत के चेहरे का रंग पहाड़ों में मौसम बदलने की तरह पलक झपकते ही बदल गया। उनसे विदा लेने के बाद गौरव ने कहा कि भाई तुमने तो उसका मजाक उड़ा दिया। साला कितने इसके चरणों में लोटते होंगे। इस मंदिर के घपले की कहानी भी गौरव ने सुनाई। शाम को हम पर्यटक हाउस पहुंचे। हमें रात यहीं बितानी थी। शाम होते ही बारिश शुरू हो गई। ठंढ बढ़ चुकी थी। हम बहुत देर रजाई में दुबके रहे और पकौड़े खते रहे। गौरव खबर लिखकर नौ बजे के आसपास पहुंचा और दवाई लेने के बहाने से मुझे बाहर चलने को कहा। उसकी योजना तो मुझे गुलदार (तेंदुआ) दिखाने की थी। मैं ताड़ गया था। मेरा मन भी गुलदार को सामने से देखने को था। गौरव के पास गुलदार के शिकार करने, चलने, पेड़ पर चढ़ने आदि को लेकर बहुत सारे किस्से हैं। एक बार तो एक गुलदार उसके बाइक के पीछे भी बहुत दूर तक भागा था। रीना को हमने इस बात की भनक नहीं लगने दी लेकिन जब हमें देर हुई तब उसे भी इसका अंदाजा लग गया था। लौटने के बाद उसने मुझसे पहला सवाल गुलदार देखने जाने के बारे में ही पूछा था। हमने कार के शीशे पूरी तरह चढ़ा लिए और शहर से दूर जंगल की ओर करीब 7-8 किलोमीटर निकल आए। गौरव की फोन पर कई बार कही हुई बात याद आने लगी थी कि गुलदार और हिमालय की बफीर्ली चोटी किस्मत वालों को ही दिखती है। हमें गुलदार भी नहीं दिखा। सुबह हम जल्दी जग गए पर सामने बर्फीली चोटी पर घने बादल और कोहरे की कनात तने होने की वजह से हमें हिमालय भी नहीं दिखा। किस्मत के भरोसे जिंदगी जी नहीं इसलिए नायर नदी के मछली के पकौड़े, गुलदार की पीली पनीली आंखें और रौबदार चाल और बर्फ से ढंके हिमालय को देखने कई-कई बार आ सकता हूं। अगले दिन हम सुबह गौरव और पंकज से विदा लेने के बाद दिल्ली के लिए रुद्रप्रयाग, ब्यासी, ऋषिकेश, हरिद्वारा बरास्ते चल पड़े थे। गौरव अपनी नई एनफील्ड बुलेट पर पंकज के साथ शहर की सीमा तक हमें राह दिखाने भी आए थे।
गंगा, गोमुख से निकलती है तब देवप्रयाग से पहले कहां चली जाती है?

दिल्ली लौटने के लिए हमने दूसरा रास्ता चुना था और इस बार दिन का समय भी था इसलिए प्राकृतिक नजारों का लुत्फ हम उठा पाने में सक्षम थे। एक ओर पहाड़ खड़े थे तो दूसरी ओर पेड़ों की छाया से गंगा का पानी भी हरा-हरा नजर आता है। पानी रे पानी तेरा रंग कैसा, जिसमें मिला दो उस जैसा…। गंगा तो हमारे यहां भी बहती है लेकिन इतनी साफ कहां! हम तीनों ने जगह-जगह अलग-अलग कोणों से गंगा को देखा। एक सवाल भी मन में उठा, अगर जवाब किसी के समझ में आए तो मुझे भी बताइएगा। कहते हैं गंगा गोमुख से निकलती है लेकिन देवप्रयाग में दो अलग-अलग रंगों वाली अलकनंदा और भागीरथी का संगम होता है और तीसरे रंग वाली गंगा वहां से शुरू होती है, फिर गंगा का उद्गम गोमुख कैसे? खैर, हम आगे बढ़ते रहे। ब्यासी से लेकर ऋषिकेश तक रिवर राफटिंगके बहुत सारे कैंप बने हुए दिखे। कनाडा में रहने वाले सिक्खों की कई टोलियां,

3 COMMENTS

  1. मिश्र जी,
    यात्रा वृतांत चल चित्र की तरह बाँध देता ह
    गंगा की लोकाचार में मान्यता है कि भगीरथ के प्रयास का महत्व प्रतिपादित करने केलिये पाँचवे प्रयाग के बाद ही गंगा गंगा बन पाती हहै!

  2. जो हमारे पहाड़ एक बार जाता है वह उसे फिर कभी जीवन में भूल नहीं सकता…
    बहुत अच्छा लगा स्वतंत्र मिश्र जी के साथ साथ पहाड़ की सैर करना …
    प्रस्तुति हेतु आभार!
    श्री गणेश जन्मोत्सव की हार्दिक मंगलकामनाएं

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