आलोक श्रीवास्तव के चुनिन्दा शेर

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समकालीन हिंदी ग़ज़ल की पहचान बन चुके आलोक श्रीवास्तव को कथा यु.के. का ग़ज़ल सम्मान दिए जाने की घोषणा हुई है. यह सम्मान उनको ब्रिटेन के संसद में प्रदान किया जायेगा. जानकी पुल की ओर से उनको बधाई और इस मौके पर उनके कुछ चुनिन्दा शेर पढ़ते हैं- मॉडरेटर 
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धडकते, साँस लेते, रुकते-चलते मैंने देखा है,
कोई तो है जिसे अपने में पलते मैंने देखा है
मुझे मालूम है उसकी दुआएं साथ चलती हैं
सफ़र की मुश्किलों को हाथ मलते मैंने देखा है
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घर में झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उघडते देखे,
चुपके चुपके कर देती है जाने कब तुरपाई अम्मा
बाबूजी गुजरे आपस में सब चीजें तकसीम हुई, तब
मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से आई अम्मा
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बहती नदी के नाम पर कुछ भी नहीं रहा,
मुझमें नमी के नाम पर कुछ भी नहीं रहा
घर के बुजुर्ग लोगों की आँखें क्या बुझ गई
अब रौशनी के नाम पर कुछ भी नहीं रहा
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हम उसे आँखों की देहरी नहीं चढ़ने देते
नींद आती न अगर ख्वाब तुम्हारे लेकर
एक दिन उसने मुझे पाक नजर से चूमा
उम्र भर चलना पड़ा मुझको सहारे लेकर
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हामान हैं इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या,
गुजारी होशियारी से, जवानी फिर गुजारी क्या,
धुएँ की उम्र है कितनी, घुमड़ना और खो जाना
यही सचाई है प्यारे, हमारी क्या तुम्हारी क्या!
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ले गया दिल में दबाकर राज कोई,
पत्तियों पर लिख गया आवाज कोई
जिसका तारा था वो आँखों में सो गई हैं,

अब कहाँ करता है मुझपे नाज़ कोई 

4 COMMENTS

  1. चौथा शेर पढ़कर बरबस यह ख्याल आया कि मुन्नवर राणा ने इस ख्याल का शेर पहले लिखा कि अलोक भाई ने? राणा का शेर इस तरह है: ""घर के बंटवारे में किसी के हिस्से मकाँ किसी के दुकां आई/ मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में मां आई.""

  2. अच्छा कलेक्शन। मगर पाँचवे शेर के दूसरे पंक्ति मे "नामी" के जगह नमी होगा शायद

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