वो हमसफ़र था मगर उससे हमनवाई न थी

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इधर मैंने कुछ कहानियां ऐसी लिखी हैं जो किसी गीत-ग़ज़ल से जुडती हैं, उन कहानियों में बैकग्राउंड म्यूजिक की तरह से ग़ज़ल चलती रहती है. उस श्रृंखला की एक कहानी आपकी राय के लिए- प्रभात रंजन 
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वो हमसफ़र था मगर उससे हमनवाई न थी
कि धूप छाँव का आलम रहा जुदाई न थी…
संयोग हो सकता था! महज…
सोचा पूछ ले.
क्या?
सवाल-जवाब, जवाबसवाल…
हूँह…
बिलावजह देर हो जाती. उसने फोन का स्क्रीन ऑन किया.  टाइम देखा- 9. 05!
आज तो पक्का देर हो जाएगी. एक से ज्यादा बत्ती पर रुकना पड़ गया तो…
रोज रात यही सोचते हुए सोती है कि कल सुबह ऑफिस के लिए पांच मिनट पहले निकलेगी.
रोज पांच मिनट देर हो जाती है…
‘बाय’, उसने सीढियां उतरते हुए कहा.
‘बाय’ शायद पीछे से आवाज आई थी.
शायद नहीं.
लगता है आवाज का ही रिश्ता बाकी रह गया है…
शादी-प्यार सब भागमभाग में कहीं छूटता जा रहा है…
‘बिछड़ने वाले में सब कुछ था बेवफाई न थी…’ सीढ़ियों पर उतरते उतरते उसके कानों में यही आखिरी आवाज आई थी.
उफ़ ये गीत…
टाइम नहीं था रुकने का. रूककर सुनने का, सुनकर सोचने का…
वह भागी जा रही थी… मन सोचता जा रहा था…
ऑफिस जाकर इसके बारे सोचेगी- इति ने गाड़ी में बैठते हुए सोचा.
काश मन भी कमांड से चलता. एक कमांड दिया- ऑल स्टॉप!
मोहित पहली बार कोई ग़ज़ल सुन रहा हो- ऐसी भी बात नहीं है. उसका शौक है. जब भी उसके पास समय होता है वह यूट्यूब पर ऐसे गीत-गज़लों को खोज खोज कर सुनता था जो कुछ अलग-सा हो. जिसे पहले सुना न हो.
वह अपने दोस्तों को सुनने के लिए भेजता था. उनको अच्छा लगता तो उसको भी अच्छा लगता था.
जो समय कभी उसका था, सिर्फ उसका…  धीरे धीरे वह गीतों-गज़लों, किताबों से भरता जा रहा था.
कहता था जो किताबें कहीं नहीं मिलती वह भी किसी ने किसी साईट से मिल जाती हैं. न जाने वे कौन लोग थे जो दुर्लभ को स्कैन करके इंटरनेट पर डाल देते थे… वह सब कुछ डाउनलोड करता था.
‘मेरे पास करीब 3 हजार दुर्लभ किताबें हैं…’ उसने एक दिन बताया था. वह सिर्फ किताबों और संगीत के लिए 500 जीबी का एक्सटर्नल हार्ड डिस्क ड्राइव खरीदने जा रहा था.
मोहित उससे दूर होता जा रहा था!
शादी के सात साल हो चुके थे!
शनिवार-इतवार के दिन वह तो अपने बेटे हनु को लेकर या तो मॉल चली जाती या सहेलियों के साथ आउटिंग पर चली जाती थी… घर में रहने का कोई कारण नहीं समझ में आता था!
घर…
घर उसका था वह घर से दूर होती जा रही थी!
न जाने क्या है… क्या होता है… कभी कभी क्या होता है… एक ही गाना सुनता चला जाता है… सुनता चला जाता है…
अभी कुछ दिन ही हुए…. ‘नाम अदा लिखना…’ गाना सुने जा रहा था…
डेस्कटॉप पर बैठकर… लगातार… बार-बार…
वह तो इति को पता था फिल्म ‘यहाँ’ का गाना है. लेकिन बार-बार, बार-बार…
‘गुलजार साहब ने कितना अच्छा लिखा है’ वेरी सेंसुअस…’
पूछने पर जवाब देते हुए उसने ख़त्म होते गाने के लिए प्ले के साइन पर फिर से क्लिक कर दिया था.
बात इतनी ही थी. बात इतनी ही थी क्या?
एक दिन अपने ऑफिस पहुँचकर पहली बार उसका ईमेल हैक किया था. बड़ा सिंपल सा पासवर्ड था…पिंकू22062005. बेटे का नाम और उसकी जन्मतिथि वर्ष के साथ.
कुछ ख़ास नहीं था. बस एक ईमेल था उसका माथा घुमाने के लिए- ‘हाय!’
मेल में सिर्फ यही संबोधन था. और कुछ नहीं….
बस एक मुश्किल थी. वह ईमेल जिस आईडी पारुलपाण्डे79@जीमेल.कॉम से आया था. मुश्किल उससे थी.
एक नाम नहीं बस एक ईमेल आईडी था और वह सात साल पीछे चली गई…
पारुल मोहित की एक्स थी.
शादी से पहले भाई ने उसके बारे में पता करके बता दिया था- ‘पारुल से लम्बा इश्क था उसका मगर अब पारुल यहाँ नहीं है. वह पहले पढने के लिए अहमदाबाद और बाद में शायद मुम्बई चली गई. सुना है डिजाइनर है…’
‘वैसे ठीक है. काम को लेकर बहुत कमिटेड! सब यही कहते हैं!’ आगे उसने जोड़ा था.
शादी के बाद उसने कई बार जानने की कोशिश की थी. इस कहानी का कोई सिरा पकड़कर वह मोहित के अतीत के किसी छूटे हुए सिरे से जोड़ना चाहती थी.
पहले अपनी किसी स्कूल की दोस्त पारुल का नाम ले लेकर उसका रिएक्शन जानने की कोशिश करते हुए.
कभी अचानक चलते हुए किसी मॉल में, किसी शहर में कोई पारुल नाम की लड़की टकरा जाती तो वह उसका रिएक्शन देखने लगती थी.
उसके लिए जैसे यह एक खेल बन गया था.
कभी उसकी ऑफिस जाने के बाद जब वह घर में रह जाती थी तो उसकी पुरानी किताबों, लैपटॉप की पुरानी फाइलों में सुराग ढूंढने लग जाती थी. कुछ भी नहीं मिला था. उसके फोन के नामों, नम्बरों में भी कुछ ऐसा सुराग नहीं मिला था.
हाँ, एक बार उसने फोन में एक नम्बर डिजाइनर के नाम से सेव था. खटका हुआ था. तब उसके मन में जब सबके नाम से नम्बर सेव है तो डिजाइनर….  कौन है… उसने पूछा था.
‘अरे बाबा, हमारे ऑफिस का इंटीरियर जिसने किया था उसका नंबर है…’ पूछने पर मोहित का जवाब.
‘जब सबके नाम से नंबर सेव है तो फिर इसका नाम से क्यों नहीं?’ इति की शंका अभी कम नहीं हुई थी.
‘अब जिससे कभी कभी काम पड़े उसका नाम भी याद रह जाए कोई जरूरी है क्या? वैसे ये डिजाइनर से तुमको इतनी परेशानी क्यों? मैं समझा नहीं?’
इस सवाल से ऐसा लगा जैसे उसका सवाल बैकफायर कर गया हो.
‘ऐसी कोई बात नहीं… बस यूँ ही…’ कहकर वह संभल गई थी.
जिस तरह से उसने जवाब दिया था उससे ऐसा लगा कि ये जो पारुल है न उसके अपने मन का वहम है. क्या पता उसके जीवन में कोई रही ही न हो. उसके भाई को कुछ ग़लतफ़हमी हो गई हो. उसने सोचा निशांत से फोन करके एक बार पूछ लूं-
‘तुमने जो बताया था पारुल के बारे में बात सही थी.’
लेकिन अगले ही पल उसे अपना यह ख़याल बदलना पड़ा. अब शादी के 5 साल बाद यह सवाल पूछने का कारण भी तो बताना पड़ता. कारण तो कोई था भी नहीं…
कारण…
क्या पता वह डिजाइनर न हो. निशांत को इसके बारे में गलत पता चला हो.
वह इस बात को भूलती जा रही थी कि जब वह नैनीताल गया था उसके साथ तो माल रोड पर एक रात टहलते-टहलते कंपकंपाती हवाओं के बीच कहा था-
‘पहली बार यहाँ पारुल के साथ आया था. 7 साल हो गए…’
‘मतलब तुम और पारुल यहाँ आये थे…अकेले…?’ उसने शब्दों को सवाल के रूप में जोड़ते हुए पूछ लिया था.
‘नहीं कॉलेज के ट्रिप पर आया था. हमारे एम. ए. का आखिरी साल था. उसके बाद वह अहमदाबाद चली गई थी और मैं जामिया मॉस कम्युनिकेशन पढने…’
‘फिर उसने मेल भेजा था तो तुमने जवाब क्यों नहीं दिया था?’ इति के मुँह से अचानक यह सवाल निकला गया था.
‘तुम मेरे मेले चेक करती रहती हो?’ उसने घूरते हुए देखा.
‘नहीं तब तुम ‘नाम अदा लिखना’ वाला गाना कितना सुन रहे थे’, फिर मैंने कुछ रुकते हुए कहा, ‘शक हो गया था.’
‘वह मेरा ऐसा अतीत है जिसे मैं भूलने लगा था. आज न जाने कैसे याद आ गया. बीती चीजों को भूलने से ही तो आगे बढ़ने की राह मिलती है. तुम मिल गई अब और क्या…’ कहते हुए उसने मेरे गालों पर चूम लिया था. आँखों के ठीक नीचे.
यह उसके प्यार जताने का तरीका था. नैनी झील पर गिरती शहर की रंगबिरंगी रोशनियों के रंग उसके चश्मे पर आ जा रहे थे. साँवले पहाड़ के धुंधले पड़ते साए तले वह उसके गले लग गई थी.
वे बर्फ देखने गए थे और उनके रिश्तों की गर्मी जैसे वापस आ गई थी!
न जाने कब से उधेड़बुन चल रहा था. शांत हो गया था.
दो साल हो गए.
कहते हैं सात साल के बाद रिश्तों में एक नई ऊष्मा की जरुरत होती है. नहीं तो दूरी बढ़ने लगती है- उसने पढ़ा था कहीं!
हर रिश्ते में एक समय ऐसा आता है जब एक दूसरे को देने के लिए कुछ नहीं होता. उस समय रिश्तों की सच्ची पहचान होती है- उसे याद आया मनोरमा दी ने कहा था.
उसका ब्रेक अप हुआ था.
जब सब ठीक चल रहा था. वह सोचने लगी थी कि अपने स्कूल के दिनों के दोस्त नितिन से शादी करने की बात अपने माता-पिता से कहे कि वह बैंगलोर इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने चला गया था. अचानक से बरसों की आदत ख़त्म हो गई थी. मनोरमा दी के पते पर दो-एक चिट्ठी आई और फिर अलविदा…
प्यार आदत ही तो होती है! नजदीकी से बढता है दूरियों से टूटने लगता है!
या दूरियों से बढ़ जाता है…
कुछ नहीं कह पाई, कुछ नहीं कर पाई… मनोरमा दी के गोद में सर गड़ाए सुबकती रही.
मनोरमा दी ने सर सहलाते हुए कहा था.
बात बीत चुकी थी. सब कुछ बीत जाता है क्या! समय की बर्फ के नीचे दबा रह जाता है, जरा सी उष्मा मिलते ही उभरने लगता है…  
बात बीती चुकी थी.
कभी कभी याद तो आती थी लेकिन इधर अचानक उसे लगने लगा था वह अकेली होती जा रही थी. ऑफिस, बेटी, खाना, घर का साज-सामान- उसका जैसे कोई जीवन ही नहीं रह गया था.
मोहित अपने आप में सिमटता जा रहा था. कभी उसे लगता था आजाद हो गई है. अपना कमाती है, गाड़ी उठाती है जहाँ मन होता है चली जाती है, जो पहनना होता है पहनती है, दोस्तों के साथ घूमती है, खाती है, पीती है…
कभी लगता था सब बेकार… वह कितनी अकेली पड़ती आ रही थी. सब कुछ था बस प्यार…
प्यार ही तो है- मिलता है तो सब से अकेला कर देता है, न हो तो भी अकेला बना देता है!
अचानक उसे लगने लगा था प्यार नहीं था…
कि अचानक एक दिन नितिन ने फेसबुक पर उसे फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दिया था. इति ने उसे फेसबुक पर उसे खोज लिया था लेकिन पहल उसने नहीं की थी.
क्या संयोग था जिस दिन उसका फ्रेंड रिक्वेस्ट आया था उस दिन मोहित का जन्मदिन था. वह उसके साथ नोएडा स्पाइस मॉल गई थी. रात में लौटी तो उसने अचानक देखा.
संयोग जीवन में कितनी सहजता से घटित होते हैं! एक संयोग हुआ और ऐसा लगा जैसे वह पुराने दिनों में लौट गई थी. ल

9 COMMENTS

  1. हमारी रोज-मर्रा की जिंदगी में प्रवेश करती हुई रचना। बहुत ही सुन्दर लिखा है।

  2. बेहतरीन ..बाँध लिया कहानी ने … उहापोह का सुन्दर चित्रण

  3. यह एक रोचक प्रयोग है, उम्मीद है कि इसका स्वागत होगा. होगा ही, हालाँकि इस बात से बचने की जरूरत है कि ग़ज़ल का शिल्प ही उभरे, कथ्य और भंगिमा नहीं.

  4. ग़ज़ल-कहानी या ज़िंदगी की ग़ज़ल-कहानी मन भा गयी …बधाई आपको ..

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