पाकिस्तान की शायरा अम्बरीन हसीब ‘अम्बर’ की चुनिन्दा ग़ज़लें और शेर

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इंदौर में पाकिस्तान की शायरा अम्बरीन हसीब ‘अम्बर’ को सुनने-जानने का मौका मिला. तरक्कीपसंद उर्दू शायरी पर पीएच.डी. करने वाली अम्बरीन परवीन शाकिर के शहर कराची की रहने वाली हैं. उनकी शायरी में भी परवीन शाकिर की तरह गजब की सेंसुअलिटी है. कहने का लहजा एकदम नया है. वरना आजकल तो ऐसे-ऐसे शायरों को शोहरत मिल जाती है जो जिंदगी भर शायरी को एक रदीफ़ तक नहीं दे पाते. बहरहाल, हमारे ख़ास इसरार पर उन्होंने जल्दी-जल्दी में कुछ ग़ज़लें, कुछ शेर हिंदी में करवाकर जानकी पुल के पाठकों के लिए दिए. नई नस्ल के शायरों में वह पाकिस्तान की सबसे मकबूल शायरा मानी जाती हैं. जहाँ तक मेरी मालूमात है हिंदी में कहीं भी पहली बार उनकी ग़ज़लें प्रकाशित हो रही हैं- प्रभात रंजन 
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1.
ध्यान में आकर बैठ गए हो तुम भी ना
मुझे मुसलसल देख रहे हो तुम भी ना
दे जाते हो मुझको कितने रंग नए
जैसे पहली बार मिले हो तुम भी ना
हर मंज़र में अब हम दोनों होते हैं
मुझमें ऐसे आन बसे हो तुम भी ना
इश्क ने यूँ दोनों को हम आमेज़ किया
अब तो तुम भी कह देते हो तुम भी ना
खुद ही कहो अब कैसे संवर सकती हूँ मैं
आईने में तुम होते हो तुम भी ना
बन के हँसी इन होंठों पर भी रहते हो
अश्कों में भी तुम बहते हो तुम भी ना
मांग रहे हो रुखसत मुझसे और तुम भी

हाथ में हाथ लिए बैठे हो तुम भी ना 


2.
ज़िन्दगी भर एक ही कारे-हुनर करते रहे
इक घरौंदा रेत का था जिसको घर करते रहे
हमको भी मालूम था अंजाम क्या होगा मगर
शहरे-कूफा की तरफ हम भी सफ़र करते रहे
एक नहीं का खौफ था सो हमने पूछा ही नहीं
याद क्या हमको भी वो दीवारो-दर करते रहे
आँख रह तकती रही दिल उसको समझाता रहा
अपना अपना काम दोनों उम्र भर करते रहे
यूँ तो हम भी कौन सा जिन्दा रहे इस शहर में
जिंदा होने की अदाकारी मगर करते रहे
3. 
ये क्या मता-ए-जीस्त गंवाने में लग गए
अहले कलम भी नाम कमाने में लग गए
देखा नहीं कि घर की टपकने लगी है छत
बरसा जो अब्र झूमने गाने में लग गए
ये ज़र्फ़ ही नहीं था कि सुनते किसी की बात
सब लोग मिलके शोर मचाने में लग गए
बेऐतबारियों की चली हैं वो आंधियां
हम लोग अपना आप छुपाने में लग गए
इस दौर-ए-इब्तिला में भला हमने क्या किया
इक आह भर के ग़म को भुलाने में लग गए
सजदा किया किसी ने कहाँ फिर लब-ए-फुरात
सब अपनी अपनी प्यास बुझाने में लग गए


4. 
कदम जो भी उठाना चाहिए था
नया रस्ता बनाना चाहिए था
तमन्ना थी नई बातों की तुमको
मुझे लहजा पुराना चाहिए था
चलो मैं तो भुला बैठी हूँ लेकिन
तुम्हें तो याद आना चाहिए था
बिछड़ सकते थे ख़ामोशी से लेकिन
ज़माने को फ़साना चाहिए था
जला के इक दिया चौखट पे ‘अम्बर’
हवा को आजमाना चाहिए था  


5. 
तुम छाये थे बादल से
हो गए मंज़र ओझल से
बात बदल दी है तुमने
डर गए बहते काजल से

6. 
ये शोले आजमाना जानते हैं
सो हम दामन बचाना चाहते हैं
तआल्लुक जो भी रखो सोच लेना
कि हम रिश्ता निभाना जानते हैं

7.

कहाँ वुसअत किसी इमकान में
जो अपने घर के दालान में है
बदल सकता है सब कुछ वक्त लेकिन
वो एक चेहरा जो मेरे ध्यान में है
उठाऊं बोझ क्यों मंजिल तक इसका
ये दुनिया कब मेरे सामान में है

8.

खिजां रंग गुलशन नहीं चाहिए
कि फूलों का मतफन नहीं चाहिए
महकता नहीं बारिशों से कभी
मुझे पक्का आँगन नहीं चाहिए
हम अहले कलम दोस्ती के अमीं
हमें कोई दुश्मन नहीं चाहिए


9. 
तुम्हारा जो सहारा हो गया है
भंवर भी अब किनारा हो गया है
मोहब्बत में भला क्या और होता
ये मेरा दिल तुम्हारा हो गया है

10. 

बस बहुत हो चुका संभल ऐ दिल
अब न खुद को जला संभल ऐ दिल
अब लहू रो रहा है सीने में
मैंने कितना कहा संभल ऐ दिल 

6 COMMENTS

  1. ज़िन्दगी भर एक ही कारे-हुनर करते रहे
    इक घरौंदा रेत का था जिसको घर करते रहे
    ——————————————————
    ये शोले आजमाना जानते हैं
    सो हम दामन बचाना चाहते हैं

    तआल्लुक जो भी रखो सोच लेना
    कि हम रिश्ता निभाना जानते हैं
    sabhi behtreen …..:)

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