राबर्ट ब्रेसां का मर्मस्पर्शी सिनेमा

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उर्दू के उस्ताद लेखक कृशन चंदर ने एक उपन्यास लिखा था ‘एक गधे की आत्मकथा’. मशहूर फ्रेंच फिल्मकार रॉबर्ट ब्रेसां ने गधे को लेकर एक मर्मस्पर्शी फिल्म बनाई थी ‘Au Hasard Balthazar’. इसी फिल्म पर सैयद एस. तौहीद का यह पठनीय लेख- मॉडरेटर 
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फिल्मकार रॉबर्ट ब्रेसां को सिनेमा का संत कहा जाना चाहिये जिनकी कविताई अभिव्यक्ति ‘Au Hasard Balthazar’ को मर्मस्पर्शी सिनेमा का ताज़ जाएगा. आपकी यह फिल्म गधे अथवा गर्दभ समान निरीह प्राणी के जीवन का भावपूर्ण डॉक्युमेंटेसन करने में सफल रही थी. उस पशु के जन्म से लेकर अन्तोगत्वा मर जाने तक की यात्रा को इसमें समाहित करने का महान काम किया गया. बल्टजर सारे समय स्वयं की सीमित गरिमा अर्थात मौन रहने के बंधन में जीता रहा, उसे मालूम था कि जिस जीवन को वो जी रहा, उसको लेकर कुछ भी नहीं कर सकता. जीवन को लेकर यह स्वीकारोक्ति दरअसल उसकी योग्यता का परिचय दे रही, जिसका उसे संज्ञान था. बल्टजर को हास्यास्पद प्राणियों की जमात का नहीं कहा जाना चाहिए क्योंकि ना बोलना जानता था, ना ही गाना. वो चार पांवों वाला इंसान नहीं था. सपाट शब्दों में कहूं कि बल्टजरएक तुच्छ व निरीह गधा था. उसकी जीवन यात्रा को देखें.. सबसे पहले उसे हम नवजात शिशु के रुप में देखते हैं.जोकि लडखड़ाते कदमों के साथ अभी-अभी खड़ा होना सीख रहा. हर्ष के पलों में बच्चों ने पशु के माथे पर पानी की बूंदे छिड़ककर उसका बपतिस्मा सा कर दिया.दृश्य में महत्वपूर्ण संकेत यह था कि हालांकि चर्च के मतानुसार सिर्फ़ इंसान ही जन्नत में दाखिल किए जाएंगे, फ़िर भी खुदा ने बाकी प्राणियों के लिए भी ज़रूर जगह बनाई होगी. एक दिन बल्टजर भी  ईश्वर की उस दुनिया का हिस्सा होगा. बल्टजर का बचपना फ्रांस के दूरगामी ग्रामीण प्रांत में कट रहा. कहानी का बड़ा अंश यही घटित होगा. गांव के लोग बल्टजर को पाल-पोष कर बड़ा कर रहे,कई एक दफा वो एक ही जगह लौट-लौट कर आया. जिनके सम्पर्क में उस निरीह पशु का जीवन कट रहा, ठीक लोग  नहीं.कुछेक ही परोपकारी हृदय वाले थे. मसलन वो शराबी जो अपनी तमाम खराबी के बीच बल्टजर के प्रति करुणा भाव भी रखता था.
मेरी (एना वाईजेम्सकी )कहानी के प्रोटगोनिस्ट (बल्टजर )की सबसे पहली मालिक थी. इस मासूम पशु का नामकरण उसी ने किया था. मेरी के पिता वहीं किसी स्थानीय विद्यालय में शिक्षक थे. जेक्स (वाल्टर ग्रीन )व मेरी दोनों बचपन में साथ खेलते थे, गुजरते वक्त के साथ बचपन का साथ जवानी के प्यार में तब्दील हुआ. जेक्स ने मेरी से वादा किया कि एक दिन दोनों शादी कर लेंगे. लेकिन घटनाएं तो कुछ अलग विचार लेकर चल रही थी. जेक्स की मां चल बसी,ग़मज़दा पिता ने अपनी खेती-बाडी अपने भरोसेमंद मेरी के पिता (फिलिप एजलीन) को जिम्मे कर गांव-घर त्याग दिया. मेरी के दिल में पशु के लिए प्रेम भाव था.बल्टजर के लगाम को बड़ी शौक में फूलों से सजाती, लेकिन उस मासूम पशु को बेवजह सताने वाले शैतान बच्चों को रोकने के लिए कुछ नहीं किया. जेराड बच्चों की इस उददंड टीम का लीडर था. मेरी के पिता घमंड से पीडित व्यक्ति थे, हालांकि खेती-बाडी की जिम्मेवारी को बड़ी ईमानदारी से लेकर चल रहे. दुश्मनों की अफवाह कि आप अमानत में खयानत कर मालिक से दगा कर रहे,पर ध्यान नहीं दिया. ईमानदारी साबित करने लिए कोई भी दस्तावेज़ पेश करना उन्हे पसंद नहीं था.
मेरी की मां असहाय सी थी कि पति की जिद ने घर को तंगी की ओर धकेल दिया. इन हालात में बल्टजर को भी अपना घर गंवाना पड़ा, स्थानीय बेकर उसका मालिक हो गया. बदकिस्मती देखिए कि उददंड जेराड उसी घर का बेटा था. बल्टजर को अक्सर उसी निर्मम संगत में रहना पड़ा. नान को ग्राहकों के घर पहुंचाने के लिए  जेराड उसे साथ ले जाता था. निर्दयी जेराड पशु के साथ निर्मम बर्ताव करता, हर समय उसे अपमानित करता. इतना सारा दुख झेलने बाद जाहिर था कि बल्टजर की हिम्मत टूट जाती, आखिर में वो अपनी जगह से एकदम नहीं घसकता था. सनकी जेराड को इस पर भी शकुन नहीं मिला. पशु को चलाने के लिए उसकी पूंछ को अखबार के टुकडे से जोड़ आग जलाने का उपाय खोज निकाला.
जेराड से मिले निरंतर अपमान व निर्दयता ने पशु को अधमरा कर दिया.मतलबी बेकर बेकार से हो चुके बल्टजर को फेंक देने की बातें करने लगा. जीवन-मरण की इस घड़ी में शराबी अरनॉल्ड (जीन गिल्बर्ट )उसकी रक्षा को आया. असहाय पशु को उस आततयी जगह से मुक्त कर नयी जिंदगी दी. बल्टजर के जीवन के स्वर्णिम दिन आए, उसे सर्कस में काम मिला. गणितज्ञ गर्दभ के रुप में उसका वक्त कट रहा था.  वरदान में मिले ये दिन लेकिन जल्द ही काफूर हो लिए.  एक संयासी के हांथ से  गुजरते हुए उम्मीद की तालाश में भटकते हुए फिर से अपने पुरानी जगह पहुंचा. इसी जगह से अपनी जीवन-यात्रा के आरम्भ को पाया था.  मेरी के पिता अभी भी वहीं पे काम कर रहे थे,इत्तेफ़ाक से मेरी भी वहीं थी.लेकिन अफसोस यह सब भावनात्मक अंत को नही प्राप्त हुआ. मेरी का व्यक्तित्व कमजोर किस्म का था, ईमानदार जेक्स मेरी को संगिनी बनाने का पुराना वायदा लेकर आया. लेकिन मेरी ने प्रेम भरे प्रस्ताव को अस्वीकार कर उड़दंड जेराड का हांथ पकड़ा. जेराड उसके साथ खराब बर्ताव कर रहा, लेकिन फिर भी वो उसके एटीट्यूड पर जान दे रही.बल्टजर की आंखो से हम ऐसी दुनिया को देख सके जहां मिठास की उम्मीद बेमानी थी. लोगो में चरित्र का अपार अभाव था. हमने यही देखा.
किंतु बल्टजर ने क्या देखा ? ब्रेसां की सृजन दक्षता देखिए वो एक पल नही रचते जोकि सही मायने में पशु का प्रतिक्रया शॉट्स कहा जाता. दूसरा कोई फिल्मकार होता तो पशु की मूवमेंट पर फोकस करता, खुर का घसीटना एवं आंखो को गोल गोल घुमाना नोटिस होता. लेकिन बल्टजर सिर्फ़ चलता या एक जगह खड़ा रहना जानता था. उसमें स्वयं के अस्तित्व की बड़ी पहचान नज़र आई, गर्दभ होने के आजीवन बोझ का उसे संज्ञान था. स्वयं के बोझ रूपी जीवन को उठाना या नहीं उठाना ही उसका विकल्प रहा, ग़मज़दा होना या नही होना या फिर खुश होना या नहीं होना भी.. सब उसके दायरे से बाहर की चीजें रही जिन पर उसका कोई नियंत्रण नहीं था. अभिव्यक्ति के नाम पर उसे बस रेंकना मिला, यह कोई मोहक आवाज़ नहीं हुआ करती.
लेकिन गधे समान निरीह पशु को केवल इतना आता है. बल्टजर के रेंकने में बदसूरती भरी पड़ी थी, लेकिन दुनिया के समक्ष खुद को अभिव्यक्त करने का दूसरा ज़रिया भी कहां था ! उस मासूम फरिश्ते को बोलने की कुछ तो संतुष्टि ज़रूर हासिल हो सकती थी. हम दर्शकों में  बल्टजरके हरेक अनुभव के प्रति गहरी सम्वेदना उत्पन्न होना लाजिम था. ब्रेसां ने फिल्मों के माध्यम से सभ्य मूल्यों का प्रसार किया, इन फिल्मों का एक रुहानी मकसद यह हुआ करता कि पात्रों को जानने के लिए दर्शकों को पहल लेनी होगी. उनकी ओर चल कर जाना होगा, इससे पहले कि वो आधे-अधूरे  इस ओर आए. अधिकांश फिल्मों में सभी बात  दर्शकों को लुभाने के लिए गढ़ी जाती हैं. मनोरंजन के लिए परिस्थतियों का निर्माण किया जाता है. प्रसिद्ध फिल्मकार हिट्चकॉक ने फिल्मों को दर्शकों में भावनाएं जगाने वाला यंत्र कहा.रॉबर्ट ब्रेसां की सोच इस जमात से एकदम अलग रही .
आपके किरदार सम्मान कर रहे,अपने संग दर्शकों को भी वही प्रेरित कर रहे. ताकि वो किरदारों के सम्बंध में निष्कर्ष पे आएं, जोकि दरअसल उनकी ही उपज थे. ब्रेसां का सिनेमा सहानुभूति के सिनेमा था.ब्रेसां
  ने दर्शकों की भावनाओ को ट्रेन करना नही सीखा था. लेकिन सीमा रही कि वो अभिनेताओं को अभिनय का कोई अवसर नही देते. परफेकशन के लिए एक ही सीन को बार-बार शूट करते, अभिनय का एक अंश ना रहे इसके लिए बीस से पचास मर्तबा भी शूट करना गंवारा किया. ब्रेसां के अभिनेता केवल बोल व शरीर से अभिव्यक्त कर सके. परफॉरमेंस को इस हद तक सीमित रख  ब्रेसां ने हालांकि एक किस्म की मौलिकता को पा लिया जोकि उनके सिनेमा को महानतम श्रेणी में रखता है.
इस फिलॉसोफी ने एक गर्दभ को ब्रेसां का चिरकालिक किरदार बना दिया. अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए बल्टजर ने कोई भी कोशिश नहीं की. शरीर से व्यक्त करने के लिए सनातन भावों का इस्तेमाल हुआ. बर्फ से ढका हुआ पशु  शीतकाल का संकेत दे रहा, पूंछ में आग लग जाने पर भयभीत हुआ. भर पेट भोजन कर संतुष्ट था.घर वापसी पर इत्मिनान का भाव रहा कि परिचित ठिकाना था. हालांकि सभी लोगों ने उस असहाय का आदर नहीं किया. कुछ लोग उदार रहे तो कुछ निर्मम. आदमी किस मंशा से सब कर रहा? बल्टजर की समझ से परे था.
ब्रेसां संकेत दे रहे कि हम सब इंसान बल्टजर ही हैं. तमाम ख्वाब व आशा तथा योजना होने पर भी दुनिया हमारे साथ वही कर रही जो उसे अंजाम देना भा रहा. क्योंकि हम सोचने समझने में सक्षम हैं. हम विश्वास के साथ जी रहे कि उलझन का उपाय कर लेंगे.सवालों का जवाब तलाश लेंगे. लेकिन बुद्धि हमें तकदीर संवारने की शक्ति देकर भी अनजाने खतरे से नही बचा सकती.सब कुछ तय कर भी बहुत कुछ नही तय किया जा सकता. जीवन से फ़िर भी निराश नही होना चाहिए. आदमी को  सहानूभूति व सम्वेदना का मार्ग अपना लेना चाहिए.दूसरों के दुख में शरीक होकर हमें सुख की प्राप्ति होगी.कुशल-क्षेम बांटने का अनुभव मिलेगा.  उदास व एकांत रहना दुखों का विकल्प नही होता.
बहरहाल अंतिम सीन.. वृद्ध एवम बीमार बल्टजर मौत के करीब है. वो भेडों की झुंड में बेपरवाह विचरण कर रहा. ठीक इसी तरह के एक झुंड में उसने जीवन भी शुरू किया था.भेडे उसके पास पास आकर अपना शरीर रगड़ कर परेशान कर रही थी. लेकिन ना बराबर परवाह कर साथी से सूरज की किरणों का बंटवारा कर चल रहा. थकान की वजह से झुक कर गिर पड़ा, ईश्वर की दूसरी दुनिया उसका इंतज़ार कर रही थी..भेडे अपने काम पे लगी रहीं. आखिर में ही सही निरीह बल्टजर को ऐसा जहान मयस्सर हो सका जहां बाकी प्राणी भी उसके समान सोच रखते थे.
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