अनुवादक का कोई चेहरा नहीं

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हिंदी में अनुवाद और अनुवादक की स्थिति पर यह एक छोटा-सा लेख आज ‘प्रभात खबर’ में आया है- प्रभात रंजन 
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अनुवाद तो बिकता है अनुवादक का कोई चेहरा नहीं होता- एक पुराने अनुवादक के इस दर्द को समझना आसान नहीं है. यह सच्चाई है कि हिंदी में चाहे साहित्य हो या ज्ञान-विज्ञान की पुस्तकें हों अनुवाद का उनमें बड़ा योगदान रहता है. यह सचाई है कि हिंदी में हाल के दिनों में सबसे अधिक बिकने वाली पुस्तकों में अनुवाद की पुस्तकें अधिक रही हैं. चेतन भगत केवल अंग्रेजी ही नहीं हिंदी में भी खूब बिकने वाले लेखक हैं. इसी तरह तसलीमा नसरीन का साहित्य हिंदी में अगर बांगला से अधिक नहीं तो उससे कम भी नहीं बिकता होगा. मुनव्वर राना जैसे शायर सबसे अधिक हिंदी में पढ़े जाते हैं. शम्सुर्ररहमान फारुकी के उपन्यास ‘कई चाँद थे सरे आसमां’ मूल रूप से उर्दू का उपन्यास है लेकिन हिंदी में प्रकाशित होने एक बाद उसको एक अलग मुकाम मिला.

बड़े दुःख और आश्चर्य की बात है कि हिंदी देश की अकेली ऐसी भाषा है जिसमें बड़े पैमाने पर देश और दुनिया की तमाम भाषाओं से अनुवाद प्रकाशित होते हैं, पढ़े जाते हैं. अनुवादों के माध्यम से ही हमें यूरोपीय, लैटिन अमेरिकी लेखक नितांत परिचित लगने लगते हैं. लेकिन जो अनुवादक इन पुस्तकों को हिंदी पाठकों के लिए उपलब्ध करवाते हैं वे गुमनाम रह जाते हैं. अज्ञेय की काव्य-पंक्ति याद आती है- ‘जो पुल बनायेंगे/वे अनिवार्यतः पीछे रह जाएँगे/सेनाएं हो जाएंगी पार/मारे जायेंगे रावण/जयी होंगे राम/जो निर्माता रहे, इतिहास में बंदर कहलाएँगे’ सच में हिंदी में अनुवादकों की यही स्थिति है.  

हिंदी में भाषा के आरम्भ से ही अनुवाद की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण रही है. लेकिन हिंदी साहित्य का इतिहास पढ़ाते समय अनुवाद का इतिहास नहीं पढ़ाया जाता है. यह अजीब विरोधाभास है कि हिंदी में प्रमुखता रचनात्मक विधाओं में लेखन और उनके ऊपर लेखन को दी जाती रही है. जबकि अनुवाद सबसे अधिक रचनात्मक विधा है, जिसके माध्यम से दो भाषाओं का ही नहीं बल्कि दो संस्कृतियों का भी संगम करवाया जाता है. फिर भी अनुवादकों को हिंदी में न लेखकों में गिना जाता है न अलेखकों में.

यह विचारणीय बात है कि महत्व न मिलने के बावजूद अनुवाद विधा का हिंदी में सबसे अधिक रचनात्मक विस्तार हुआ है. लेकिन गंभीरता से न लिए जाने के कारण जो सबसे बड़ा नुक्सान हुआ है वह शब्दों, वर्तनी, मानक प्रयोगों को लेकर मानक नहीं बन पाए हैं. हिंदी में अनुवाद तो बहुत होते हैं लेकिन उनमें एकरूपता नहीं पाई जाती है. यह कहा जाता है अनुवादों में अराजकता पाई जाती है. लेकिन हम इस गंभीर सवाल से बच नहीं सकते हैं कि हमने कभी अनुवाद को अनुशासन के रूप में देखने का प्रयास ही नहीं किया, उसे एक विधा का तौर पर मान्यता ही नहीं दी. हिंदी में इतने हलके ढंग से शायद ही किसी विधा को लिया जाता होगा. अनुवादक के रूप में अपना परिचय देना कोई भी सम्मानजनक नहीं समझता. बड़े-बड़े अनुवादक भी अनुवाद की चर्चा चलने पर यही कहते हैं कि रोजी-रोटी के लिए अनुवाद करता रहा.

जरूरत है आज अनुवाद की विधा को लेकर पेशेवर दृष्टिकोण अपनाने की. उस विधा को लेकर जिसमें हाल के वर्षों में सबसे उल्लेखनीय पुस्तकें आई हैं. तभी अनुवाद की पहचान बनेगी और अनुवादक का चेहरा. 

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