अखिलेश का लेख ऐतिहासिक है

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कल स्कूल में पढ़ाई जाने वाली हिंदी पाठ्यपुस्तकों को लेकर वरिष्ठ चित्रकार अखिलेश का एक शोधपरक लेख पोस्ट किया था. उसके ऊपर टिप्पणी के बहाने वरिष्ठ कवि, विद्वान विष्णु खरे का यह लेख है. विष्णु जी ने कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना शैली में यह लेख लिखा है. लेकिन उनका यह कहना बिलकुल सच है कि वर्षों में हिंदी में ऐसी कोई कृति प्रकाशित नहीं हुई है जिसे यादगार कहा जा सके, जिसे पढ़ते हुए यह लगा हो कि कुछ पढ़ा. बहरहाल, विष्णु जी की यह टिप्पणी पढने लायक है. इसमें सभी के लिए कुछ न कुछ है- मॉडरेटर 
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हिंदी में वर्षों में ऐसी कोई साहित्यिक कृति या गैर-साहित्यिक लेख-टिप्पणी आदि प्रकाशित होते हैं जो इतने बेहतरीन होते हैं कि उन्हें बहुत धीरे-धीरे,बीच-बीच में बंद करते हुए,जाँचते हुए पढ़ना पड़ता है कि कहीं ख़त्म न हो जाएँ – कुछ-कुछ पुराने शहद,गुड़,अचार,वाइन,सिंगल मॉल्ट या कोन्याक के आस्वादन की तरह.अखिलेश का यह लेख मुझ पर यही कैफ़ियत तारी करता है.सच तो यह है कि यदि यह किसी अल्पज्ञात जगह प्रकाशित होता तो मैं इसके बारे में लिखता ही नहीं – हिंदी के सूअरों को क्यों बताया जाए कि मोती और मधुपर्क कहाँ मुफ़्त बाँटे जा रहे हैं.हैरत और रोमांच की बात है कि इसे बेपनाह मेहनत और वक्तख़र्ची के साथ किसी शिक्षक या शिक्षा-शोध-शास्त्री ने नहीं,बल्कि एक सक्रिय और प्रसिद्ध चित्रकार ने इतने अरसे में लिखा होगा जिसमें वह लाखों रुपयों की अपनी पेन्टिंग बना लेता.इसे लेख या टिप्पणी कहना भी इसका महत्व कम करना होगा – यह किसी भी शोध-निबंध से लेश-मात्र भी कम नहीं.और विषय भी कितना विरल है – हिंदी की लगभग सौ वर्ष पुरानी स्कूली पाठ्य-पुस्तकों से शुरू कर आज तक की उनकी अभागी बहनों तक आता हुआ.

मैं ख़ुद वर्षों से अपने ( 1946-56 ) और अपने शिक्षक-पिता के शाला-युग ( 1923-34 ) की पाठ्य-पुस्तकें खोजता-सहेजता रहा हूँ.काफ़ी भटका हूँ,अजीबोग़रीब घरों-भंडरियों आदि में तिलचट्टों,कसरों,छिपकलियों से संघर्ष किए हैं,उनमें रहने वाले लोगों का कोप-एवं-उपहासभाजन बना हूँ.स्कूलों में डपटा-दुरदुराया गया हूँ.लेकिन उन ज़मानों की एक भी अनिवार्य या सहायक पाठ्य-पुस्तक मिल जाए तो वह आर्केमेडीज़ का यूरेका क्षण हो जाता है.तेजी ग्रोवर भी इस लम्हे को पहचानती हैं.लेकिन जो यह लेख अखिलेश ने लिखा है,और तेजी बरसों से जो काम कर रही हैं,  उसके आगे Mein Kampf ( मेरी – ग़ैर-हिटलरी – जद्दोजहद ) कुछ भी नहीं है.वाल्टर बेन्यामीन के ऐसे ही एक लेख की याद आती है.

मैं अखिलेश द्वारा परावर्तित धूप नहीं तापना चाहता.लेकिन यही स्मरण करना चाहता हूँ कि 1953 की हमारी एक पाठ्य-पुस्तक में जॉर्ज कीट के चित्र थे,जो आज अश्लील माने जाएँगे.कौन George Keyt ? ‘लेक आइल ऑफ़ इनेसफ्री’ शीर्षक कविता थी.किसकी है यह कविता ? सी.ई.एम.जोड का लेख था.उन दिनों की हिंदी स्कूली टैक्स्ट-बुक्स में ‘चहचहाता चिड़ियाघर’ जैसे साहित्यिक व्यंग छपते थे,जैनेन्द्र की ‘अपना अपना भाग्य’ जैसी कहानियाँ छपती थीं,और जबलपुर में प्राप्त डायनोसॉर के फॉसिलों पर लेख शामिल होते थे.कितना लिखा-कहा जाए ? अखिलेश की सराहना में एक बड़ा लेख लिखा जा सकता है.इसके महत्व को सिर्फ़ कृष्ण कुमार जैसे व्यक्ति समझ सकते हैं.

स्कूल,कॉलेज,विश्वविद्यालय,यूनिवर्सिटी,केंद्रीय हिंदी निदेशालय,केंद्रीय हिंदी संस्थान,विश्व हिंदी सम्मेलन,आकाशवाणी,दूरदर्शन,अख़बारों,हर तरह के मीडिया,विज्ञापनों,होर्डिंगों,मार्ग-चिन्हों,रेल्वे और बस स्टेशनों,वाहनों पर,हर तरह के साइन-बोर्डों और निजी निवासों आदि के नाम-पट्टों पर हिंदी के साथ वर्षों से बलात्कार हो रहा है.’’नवभारत टाइम्स’’ दिल्ली के मेरे पितृतुल्य सहकर्मी वासुदेव झा हिंदी की तुलना वेश्या के गुप्तांगों से करते थे जिनके साथ जो चाहे कुछ भी कर सकता है.मुंबई में ठाकरे परिवार एक बार दहाड़ता है,सही मराठी अगले दिन लागू हो जाती है.हमारे यहाँ रसरंजकों के अश्लील जन्मदिनों पर अप्सराएँ नचाई जा रही हैं,गंधर्व गवाए जा रहे हैं.

अखिलेश का यह लेख ऐतिहासिक है.यह भी एक विडंबना है कि जब ब्लॉगों में भ्रष्ट हिंदी निर्लज्जता से प्रकाशित हो रही है,स्वयं ब्लॉगों के यही नियामक हिंदी को लुग्दी-नगरवधू बनाने के षड्यंत्र में शामिल हों,सही हिंदी न सिर्फ नहीं जानते हों बल्कि उसमें धृष्ट गर्व करते हों,हिंदी-शत्रुओं की दलाली कर रहे हों,अखिलेश का लेख ऐसी-ही ब्लॉग-दुनिया में आने के लिए अभिशप्त है.लेकिन यह युधिष्ठिर और दान्ते की नरक-यात्रा की तरह है.

अखिलेश की यह टिप्पणी प्रत्येक आत्म-सम्मानी हिंदी पत्र-पत्रिका-माध्यम में अनिवार्यतः प्रकाशित होने योग्य है.इसकी लाखों प्रतियाँ हिंदी विश्व में बँटवाई जानी चाहिए.हिंदी जगत अखिलेश के ऋण से उऋण नहीं हो सकता.

4 COMMENTS

  1. 'वेश्या के गुप्तांग', 'छिनाल' , 'त्रिया चरित्र' जैसे शब्द अब समाज में नहीं चलते। किसी भी संदर्भ में इनका प्रयोग ही दर्शाता है कि हिंदी की जरूरत अब नहीं है। हिंदी के पैरोकारों ने उसे मध्ययुगीन मानसिकता में दबा रखा है। हिंदी साहित्य एक कपोल कल्पित समाज की वकालत करता रहा है जो अभी के समाज से तारतम्य नहीं बैठा सकता। फेसबुक पर हिंदी क्रांति के दौर में निरंतर 'अपने तईं', 'सनद रहे', 'ऐलानिया' जैसे शब्दों का प्रयोग देखकर हँसी आती है। अंग्रेजी में कोई breaketh, maketh, thou का प्रयोग करता है क्या? हिंदी के वकीलों को हिंदी की वकालत बंद कर देनी चाहिये। हिंदी अब वो हिंदी नहीं रही जो बड़े लोग सोचते हैं। ये भाषा है, सोच नहीं।

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