जयश्री रॉय के उपन्यास ‘दर्दजा’ का अंश

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कल से शुरू हो रहे विश्व पुस्तक मेले में जानी-मानी लेखिका जयश्री रॉय का उपन्यास ‘दर्दजा’ जारी हो रहा है. वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हो रहे इस उपन्यास का एक अंश- मॉडरेटर 
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वह एक सांवला सा दिन था.

बारिश के आखिरी दिन जब बादल खुद को समेटने लगे थे और उसके झीने कोनों से आकाश के नीले टुकड़े छोटे-छोटे रुमाल की तरह लहराने लगे थे. खाला मेरे लिये सुबह का नाश्ता लेकर आई थी- शाह यानी चाय के साथ कानजीरो- रोटी और माराक-सब्जी और मांस का शोरबा! मुझे कानजीरो घी और चीनी से खाना पसंद था. मगर गर्भवती होने के बाद से मुझसे यह भी ठीक से खाया नहीं जाता था. मुझे खिलाने के लिये खाला चाय और तिल के तेल के साथ भी इसे भिगोकर लाती थीं जैसे अक़्सर बच्चों को पसंद आता है. आज भी वह मुझे तरह-तरह से फुसला कर खिलाने की क़ोशिश में लगी थी जब पड़ोस के रमजान चाचा का बेटा ख़बर दे गया था कि मक्का में नमाज़ के बाद संग-ए-अस्वत को चूमने की क़ोशिश करते हुये लोगों में अचानक भगदड़ मच जाने की वजह से सैकड़ों लोग पैरों के नीचे कुचल कर मारे गये हैं. ज़हीर के साथ गये लोगों ने सूचना दी थी कि ज़हीर का कुछ पता नहीं चल पा रहा है. वे उसे ढूंढ़ रहे थे. किसी ने कहा था, ज़हीर की लाश उसने देखी है. जाने सच या झूठ! गांव का एक और आदमी सुलेमान इस भगदड़ में कुचलकर मारा गया था. सुनकर घर में लोगों की भीड़ जुड़ गई थी. चारों तरफ कोहराम मच गया था. सब फातिमा बी के कमरे में इकटठा हुये थे. तमाम औरतें छाती पिट-पिटकर रो रही थीं. खाला मुझे भी वही खींच ले गई थी. कमरे में घुसते ही वे भी दहाड़े मारने लगी थीं.
मेरी तो जैसे सोचने-समझने की शक्ति ही चली गई थी. सब एकदम से गडमड हो गया था. तमारोने-धोने के बीच एक ही ख़्याल मुझे बार-बार आ रहा था कि ज़हीर अब कभी वापस नहीं आयेगा… कभी नहीं! क्या वाकई? मुझे यकीन नहीं हो रहा था. मैं अपने उस समय की मन:स्थिति को शब्दों में बयान नहीं कर सकती. एक अजीब-सी सिहरन मेरे पूरे शरीर में दौड़ रही थी, रोआं-रोआं जाग गया था. दिल धड़क रहा था वेग से. भीतर तूफान समेटे मैं बस सूखी आंखों से सबको रोते-चीखते हुये देखे जा रही थी. फातिमा बी भी बिस्तर में पड़ी-पड़ी अपने एक हाथ से सर पीटते हुये मुंह से अजीबो-गरीब आवाज़ निकाल रही थीं. एक समय के बाद खाला ने मुझे घूर कर देखते हुये चिकोटी काटी थी और फिर खुद ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी थी. चिकोटी से मुझे होश आया था और फिर मैं भी आंखों पर हाथ धरकर सिसकने लगी थी. हालांकि मेरी आंखें सूखी थीं और जल रही थीं. जब भी मेरा रोना थमने लगता खाला मुझे फिर से चिकोटी काटतीं और मैं दुबारा रोने लगती. मुझे खुद समझ में नहीं आ रहा था कि मैं वाकई रो रही हूं कि क्या कर रही हूं. अभी भी मेरे दिमाग में वही बात चक्कर काट रही थी- ज़हीर अब कभी नहीं लौटेगा!
जाने कितनी देर बाद ज़हीर की बेटी रज़िया अपने बाप की ख़बर सुनकर ससुराल से भागी-भागी आई थी. उसके आने की ख़बर सुन खाला सहित सभी औरतें रोते-चीखते कमरे से बाहर निकल गई थी- शायद उससे मातमपुर्सी करने. उनके जाते ही कमरे में एकाएक सन्नाटा छा गया था. अब सिर्फ़ मैं और फातिमा बी ही कमरे में रह गये थे. यह अहसास होते ही हम दोनों जाने क्यों एकदम से चुप हो गये थे! फातिमा बी की आंखें रो-रोकर लाल हो रही थीं. मेरी भी आंखें रगड़ने से लाल हो गई थीं. अपनी सुजी हुई लाल आंखों से हम चुपचाप एक-दूसरे को देखते रहे थे और इस बीच कमरे में भी गहरा सन्नाटा पसरा रहा था. क्या था हम दोनों की आंखों में उस समय! एक सच जो अपने होने पर शर्मिंदा है… या शायद शर्मिंदा से भी ज़्यादा डरा हुआ! हम दोनों का चेहरा पारदर्शी हो आया है, इतना कि जैसे कांच! हम आईना बने एक-दूसरे के सामने थे और आंखें चुरा रह थे. गूंगे आईने की तरह हम भी झूठ नहीं बोल पा रहे थे. जुबान झूठ बोल लेती है, ख़ामोशी नहीं. वह बस उजागर हो जाती है! मुझे घबराहट हो रही है. फातिमा बी भी सकते में है जैसे- ऐसा नहीं होता, होना नहीं चाहिये. रवायत नहीं! अभी-अभी हम दोनों की दुनिया लुटी है, अभी-अभी हम बेवा हुई हैं. हमें ग़म में होना है, आंसुओं में होना है… मगर हम दोनों अपने-अपने हिस्से के भयानक सच के साथ स्तब्ध खड़े हैं. रंगे हाथों पकड़े गये हों जैसे! बिना कोई गुनाह किये गुनाहगारों की तरह. संस्कार शायद इसी को कहते हैं, अपने युगों के अनुकूलन से सहज बाहर नहीं आया जाता.
थोड़ी देर बाद सभी औरतें रज़िया को लेकर रोती-पीटती कमरे में लौट आई थीं और उनके आते ही हम एक बार फिर भरभरा कर रो पड़े थे. खाला मुझे इस तरह रोते देख काफी संतुष्ट नज़र आ रही थीं मगर रज़िया की गीली आंखों में मेरे लिये आज भी घृणा की नीली लपटें थीं.
उस दिन रोते-रोते मैं थक गई थी. जब खाला को तसल्ली हो गई थी कि मैं काफी रो चुकी हूं, मेरे गर्भवती होने की दुहाई देकर वह मुझे मेरे कमरे में ले आई थीं. फिर दरवाज़ा बंदकर खाना भी दिया था. खाना देखते ही मैं किसी भुक्खड़ की तरह खाने पर टूट पड़ी थी और देखते ही देखते पूरी थाली साफ कर दी थी. मुझे तो याद ही नहीं था बाररिस-भात में इतना स्वाद होता है! जीरा-कामून, ईलायची- हेयल, लौंग-क़ारानफूल और साहजीरा का स्वाद… अर्से बाद मसाले की गंध से उल्टी नहीं आई थी. मेरे और खाना मांगने पर खाला ने मुझे डपट दिया था और चुपचाप लेट जाने को कहा था. मैं हाथ-पैर फैलाकर लेट गई थी और पलक झपकते ही सो गई थी. बहुत गहरी नींद! ऐसी नींद जिसमें सपने नहीं होते, दरारें नहीं होतीं. होता है तो बस एक सपाट, मुलायम अंधेरा! जाने कितने समय के बाद मैं इस तरह से सोई थी. मृत्यु की तरह सुखद थायह.
देर शाम को खाला ने मुझे उठाया था. ढेर सारे रिश्तेदार आये थे मातमपुर्शी के लिये. औरतों के बीच जाकर खाला ने सबको बताया था मैं सारी दोपहर अपने कमरे में अचेत रही. मुझे बहुत अच्छा लगा था. खाला झूठ उतनी ही सहजता से बोलती थीं जितनी सहजता से सच. एकबार फिर रोना-धोना शुरु हुआ था जो देर रात तक चला था. दूसरे दिन ख़बर मिलने पर मां आई थीं, मगर खाला के लाख आंख गरम करने या चिकोटी काटने के बावजूद आज मेरी आंखों से एक बूंद आंसू नहीं गिरा था. अपने भीतर एक जलती हुई अंगीठी लिये मैं बुत बनी बैठी रही थी. मुझे उनका रोना भी सह नहीं रहा था. जी चाह रहा था या तो सब कुछ तहस-नहस कर दूं या उठकर जंगल में भाग जाऊं! मैं बहुत विवश थी. कुछ भी नहीं कर सकती थी. मेरी आवाज़ नहीं, हाथ-पैर नहीं, औकात नहीं, मगर मैं इतना तो आज कर ही सकती हूं कि ना रोऊं. उनके सामने ना रोना ही मेरा विरोध था. ऐसा करके मुझे बहुत अच्छा लग रहा था. कहीं से खुद को हल्का महसूस कर रही थी. सोचती थी, कहीं कुछ बचा नहीं है. राख हो गई हूं, मगर कोई जीवित चिंगारी है जो हवा पाते ही भड़क उठती है. अपना यूं कहीं से बची रहना, गेहुंवन की तरह ठनक उठना सुखद लगा था. अपमान, प्रताड़ना में निर्विरोध जीते रहना कहीं से बहुत दंश देता था, कसकता रहता था. कुचला हुआ स्वाभिमान किसी केंचुये की देह से कटकर अलग होने के बावजूद देरतक जीवित रह गये हिस्से की तरह छटपटाता रहता था. मेरा रवैया देख मां का चेहरा उतर गया था. खाला ने ही बढ़कर एक बार फिर बात सम्हाली थी – “क्या करें! बच्ची जब से ख़बर सुनी है सदमे में है!” सुनकर मां ने तत्परता से सर हिलाया था. इसके सिवा उनके पास कोई चारा भी क्या था. यह झूठ उन के सांझे का था. इसी में उनकी ख़ैर थी.
दो-तीन दिन इसी तरह बीते थे. घर में ग़मी चल रही थी. इन दिनों मुझे अकेली रहने की दुर्लभ आज़ादी मिल गई थी. खाला की वजह से ही कुछ और ज़्यादा. मुझे अंधेरे कमरे में चुपचाप पड़े रहना अच्छा लगता था. आंखों के आगे नाचती स्याह तितलियां, खिड़की के बाहर दूर तक पसरा धूसर आकाश, हर तरफ बिखरी रेत की अनगढ़ ढूंहें, ताड़ के पेड़ पर चीखते-झगड़ते गिद्ध… इन सबके माने भी अचानक से बदल गये हैं! अब ये इतने बुरे नहीं लगते. डराते भी नहीं पहले की तरह. एक नींद आती है बेहोशी की तरह… मुझे पल में खुद में डूबो लेती है, मै एक काली झील में देर तक डूबती-उतराती रहती, तैरती दूर-दूरतक, लहरों के साथ बहती… बहुत सुखद था सब कुछ! एक श्राप वरदान बन कर फला था- मैं सो सकती थी अंधेरे की गर्म रजाई ओढ़कर सदियों तक… मुझे पता नहीं था, मृत्यु ऐसी आह्लादकारी भी हो सकती है. मैं कुछ सोच नहीं रही थी मगर महसूस कर रही थी. मेरी शिराओं में बसंत उतरा था, मिट्टी महकी थी ठीक जैसे पहली बारिश के बाद! मैंने गहरी सांस ली थी और एक भी सपना नहीं देखा था- देखने की ज़रुरत नहीं पड़ी थी! बीच रात अपने घुप्प अंधेरे कमरे में उठ बैठती और इस डर से खिड़की की तरफ देखती कि कहीं सुबह तो नहीं हो गई! सूरज तो नहीं उग गया! इस अंधकर के साम्राज्य में मैं सुरक्षित थी, निश्चिंत थी. मैं नहीं चाहती थी कभी भोर आये, रोशनी फैले, दुनिया का चेहरा फिर से मुझे दिखे! सबकुछ सिरे से भूल जाना चाहती थी, खारिज कर देना चाहती थी हमेशा के लिये. मैं अपने अंधकार भरे महाद्वीप के इस अथाह अंधकार से मिल कर एकाकार हो गई थी! सोमालिया-अफ्रिका हो गई थी. सही अर्थ में!
मगर समय थमता नहीं. ना हमेशा के लिये अंधकार ही रहता है. उस दिन सुबह की नर्म धूप में कुछ गौरैया घर के दालान पर चहचहाती हुई दाने चुग रही थीं और मुझे बूराश- दलिया चीनी और मक्खन के साथ नाश्ते में परोसकर खाला अनाज के दाने फर्श पर फैला रही थीं जब यकायक दरवाज़े पर ज़हीर आ खड़ा हुआ था. मैंने और खाला ने उसे एक साथ देखा था. मुझे अपनी आंखों पर यकीन नहीं आया था. जैसे भूत देख लिया हो. ज़हीर का एक हाथ टूटा हुआ था और पट्टे के सहारे कंधे से लटका हुआ था. वह बहुत ख़ुश नज़र आ रहा था. उसके सारे हरे, लाल दांत मसूड़े समेत बाहर निकले हुये थे. उसे देखकर मेरा जी यकायक ज़ोर से मिचलाया था और मैं बूराश की थाली ज़मीन पर फेंककर भीतर की ओर भागी थी.
भीतर आकर मैं सीधे फातिमा बी के कमरे में पहुंची थी और उन पर गिरकर फूट-फूटकर रोने लगी थी. मेरे इस तरह अचानक आ कर रोने से फातिमा बी घबरा गई थी और गोंगिया-गोंगियाकर मुझसे कारण पूछने लगी थी. मगर मुझसे कुछ भी कहा नहीं जा रहा था. बस रोये जा रही थी. थोड़ी देर बाद ज़हीर सारे घर के साथ आकर वहां हाज़िर हुआ था. उसे देखकर फातिमा बी एकदम से चुप हो गई थीं. उनका गोंगियाना बंद हो गया था. इधर मैं बेतरह रोये जा रही थी. ज़हीर हम दोनों को गहरे कौतूहल से देख रहा था. आखिर खाला ने ही आगे बढ़कर फिर से बात सम्हाली थी – “ख़ुशी के आंसू हैं! बेचारी अपनी ख़ुशी सम्हाल नहीं पा रही है! सौहर सलामत घर लौट आया…” मैं वाकई खुद को सम्हाल नहीं पा रही थी. अल्ला ताला ने सब कुछ देकर इस तरह से क्यों वापस ले लिया! मुझे रह-रहकर ज़ोर की उल्टी आने लगी थी.
उस रात एक बार फिर मुझ पर कहर टूटा था. अब चूंकि आम तरीके से जिस्मानी ताल्लुकात मुमकिन नहीं थे और मैं हामीला थी इसलिये ज़हीर ने दूसरी तरह से मेरे साथ होने की क़ोशिश की थी. यह मेरे लिये बेहद कष्टकर था. आते ही कोई बात करने की जहमत उठाये बिना ही उसने मुझे दीवार के सहारे खड़ी कर दिया था. पहले-पहल मैं समझ नहीं पाई थी, मगर जैसे ही मैंने उसका इरादा समझा था, बहुत डर गई थी. मगर हमेशा की तरह उसने मेरे रोने-चिल्लाने की कोई परवाह नहीं की थी. मेरे छटपटाने पर यकायक उसने कई तमाचे ताबड़तोड़ जड़ दिये थे, शायद मेरा प्रतिरोध कम करने के लिये. एक हाथ के बंधे होने की वजह से वह मुझ से हाथापाई करने की हालत में नहीं था. इसके बाद मैं चुपचाप दीवार से लगी सिसकती रह गई थी और वह बलात मुझ में प्रविष्ट कर गया था. मुझे लगा था किसी ने मुझे आरी से चीर दिया है. अन्दर दर्द आग़ की तरह फैला था. मैं एकबार फिर चीखते-चीखते अचेत हो गई थी. सुबह मैंने उठकर खुद को खून से सने बिस्तर पर पाया था. खाला एक कोने में बैठी मुझे चुपचाप देख रही थी- जाने कैसी नज़र से. मैंने सरक कर उनकी गोद में सर छिपाया था और फफक पड़ी थी – “बहुत दुखता है खाला! और बर्दास्त नहीं होता!” खाला ने मुझे रोने दिया था, बिना कुछ कहे और जाने कितनी देर बाद अचानक झल्लाकर कहा था – “सहता नहीं तो मर क्यों नहीं जाती! जान तो छूटे! औरत होकर दुखता है’, ’दुखता हैकी रट!” उनकी बात ने कुछ देर के लिये मुझे सकते में डाल दिया था. खाला ये कैसी बातें कर रही थीं! मेरे चेहरे पर हैरत देखकर ही शायद खाला ने फिर कहा था – “और नहीं तो क्या! औरत होकर जन्म लिया है और दर्द से बचना चाहती है! कैसे सम्भव है? अगर बचना ही चाहती है तो इसका एक ही रास्ता है, मर जा!” सुनकर मैं बिलखी थी – “ऐसा मत कहो खाला! तुम भी ऐसा कहोगी तो मैं कहां जाऊंगी!” इसके बाद हम दोनों देर तक बैठकर बिलखते रहे थे.
दोपहर को हम दोनों की सुजी आंखें देखकर फातिमा बी ने कहा था – “तुम दोनों आज बहुत रोये ना? मुझे साथ नहीं ले सकते थे? साथ रोये तो दुख तो नहीं घटता, मगर सह ज़रुर जाता है. रोने के दुख में एक सुख होता है. मुझे इससे महरुम मत किया करो! बांटने को और है भी क्या हमारे पास!”
इसके बाद ज़हीर का अत्याचार लगातार ज़ारी रहा था. वह जब-तब आकर मुझे भंभोर कर रख देता था. इसी तरह कई महीने बीते थे. इसी बीच मेरा पूरा परिवार मवेशियों के लिये चारागाह की तलाश में डोरा-डंडा उठाकर फिर सबील्ले नदी की ओर चला गया था. जाने से पहले मां भैया को लेकर मिलने आई थी मगर उनसे ज़्यादा बात करने की मुझमें कोई स्पॄहा नहीं जागी थी. उन्हें जाते हुये भी मैं रीती आंखों से देखती रही थी.
चढ़ते हुये महीने के साथ ही मेरी तकलीफें भी लगातार बढ़ती जा रही थीं. मुझे पेशाब का इनफेक्शन लगातार बना रहता. नहीं खा-खाकर मैं काफी कमज़ोर हो गई थी.
एक बार खाला के बहुत कहने-सुनने और मिन्नतों के बाद ज़हीर मुझे पास के कस्बे के एक हेल्थ सेंटर में ले गया था. महिला डॉक्टर ने जांच-पड़ताल के बाद निराशा में सर हिलाया था – “इसके योनि का भीतरी हिस्सा लगभग बंद है. शारीरिक मुआयना संभव नहीं. फिर पेशाब के नमूने से भी कुछ पता नहीं चल सकता. सुन्ना की वजह से हुये भीतरी जख़्मों के कारण इसके पेशाब में मल रिस आता है जिससे ये प्रदूषित हो जाता है. खून की कमी तो इसे है ही, पेट का बच्चा भी लगता है सही ढंग से बढ़ नहीं रहा है. मां और बच्चे- दोनों की हालत अच्छी नहीं!” सुनकर खाला सिर हिलाती रही थी, ज़ाहिर है उनके पल्ले कुछ नहीं पड़ा था. मैंने सुन कर भी कुछ समझने की क़ोशिश नहीं की थी. अब क्या फर्क पड़ता है! डॉक्टर ने कुछ दवाइयां दी थी. बाहर आकर देखा था, ज़हीर खड़ा-खड़ा जाने क्या चबाते हुये किसी ऊंट की तरह मुंह चला रहा था. मेरा जी एक बार फिर मिचलाया था…
बारिश के बाद फिर रेगिस्तान में धूप का डेरा पड़ा था, रेत का रंग एकदम पीला! आकाश गर्म लोहे-सा दिखता, जैसे कोई धुंआती हुई कड़ाही औंधी पड़ी हो! नीचे बालू की चिलमिलाती आंच और क्षितिज पर पानी की कांपती दीवार-सा हवा का रेला… पेड़ों के पत्ते गिनती के हो चले थे, हरियाली के पैबंद ज़र्द, विरल. सबकी जुबान में प्यास, गले में अनगिन दरार. जिस्म पर पसीना नहीं, बस नमक. हर नमी आकाश से बरसती आग़ की लपलपाती जीभ सोख ले गई थी. पशु-पक्षी रात-दिन धौंक रहे थे. हर पानी का सोता, धारा कीचड़ में तब्दील हो गयी थी. पत्थरों की तरह टुकड़ों में बंटी पड़ी थी. हमारे इलाके के अधिकतर बंजारे अपने मवेशियों के लिये चारा और पानी की तलाश में बड़ी नदियों की तरफ निकल गये थे. वही उनकी आख़िरी उम्मीद थीं!
मौसम की तरह ही मेरी मन:स्थिति हो रही थी- सीझ रही थी आपाद-मस्तक. ऊमस और उसांसों से भरी हुई थी. महसूस होता अन्दर खौल और उबाल के सिवा कुछ नहीं. अपनी देह से ही वितृष्णा हो गई थी. लगता यही सारे दुखों की जड़ में है. यह नहीं होती तो इसे घेर कर रात-दिन चलने वाला नरभक्षियों का महाभोज भी नहीं होता. मैं अपने जिस्म से, इसके नरक से छुट जाना चाहती थी. मेरे लिये इसका एक ही अर्थ रह गया था और वह था दर्द- हर पोर में, रेशे-रेशे में टीसता हुआ, धड़कता हुआ- किसी विषैले फोड़े की तरह जो पक कर नासूर बन गया हो, एकदम लाईलाज! मेरा उठना-बैठना मुहाल हो गया था. कैल्शियम ना क्या की कमी से हड्डियां, जोड़ दुखते रहते, खून में लोहे की भी अत्यधिक कमी थी, इससे कमज़ोरी ऐसी बढ़ गई थी कि बैठ-बैठ कर भी चक्कर आने लगते, उठकर खड़ी होती तो आंखों के आगे अंधेरा छा जाता. उस पर पेशाब का इनफेक्शन- तल पेट में आग़-सी लगी रहती. यही हाल सीने का था, खाना हजम नहीं होता, खटटी और तेजाबी डकारे आती रहतीं. लगता, छाती में मिर्च की धूनी लगी हुई है!
हर पल आतंक में जी रही थी मैं! दिन का आतंक, रात का आतंक… सारा दिन आकाश शीशे-सा पिघलता रहता, गहरी ऊमस और घुटन में मैं पकती रहती, जिस्म का हर जोड़ घाव की तरह दुखता-टीसता और सूरज के डूबते ही रात का काला लबादा ओढ़े किसी प्रेतात्मा की तरह ज़हीर मेरे सीने पर उतर आता! चुंकि अब मैं बच्चे की वजह से पेट के बल बिल्कुल लेट नहीं पाती थी, वह मुझे हमेशा दीवार के सहारे खड़ी करके अत्याचार करता. उसके निर्मम प्रहार से अपने पेट को दीवार से टकराने से बचाने के लिये मुझे अपने हाथों को दीवार से टेक कर रखना पड़ता, कभी-कभी देर तक. अंत में मेरे हाथ शून्य पड़ने लगते, जांघों का भीतरी हिस्सा खून से गीला हो जाता.
एक समय के बाद मैंने समझा था, मेरी चीखें, सिसकियां ज़हीर को एक पाशविक आनन्द से भर देता है. यह उसके लिये उद्दीपन का काम करते हैं. वह और और उत्तेजित हो उठता है. उसके इस स्वभाव को समझते ही मुझ में भी एक ज़िद्द भर गई थी- अपनी तकलीफ से तो मुझे निज़ात नहीं मिल सकती, मगर उसे भी मैं कम से कम अपनी तरफ से ख़ुश होने का मौका देना नहीं चाहती थी. इसलिये लाख दर्द में होने के बावजूद मैं अब रोती नहीं थी. दांत भींचकर चुप पड़ी रहती थी. कमरे के अंधकार में आंसुओं से मेरा चेहरा तर हो जाता, दांत भींच-भींच कर मुंह दुख जाता मगर मैं उफ तक नहीं करती. ज़हीर मुझे पीड़ा पहुंचाने के लिये और निर्मम हो उठता. मैं फिर भी ख़ामोश रहती. मेरे इस व्यवहार से ज़हीर का उत्साह ठंडा पड़ जाता. वह चिढ़ कर कहता- चीखो! चीखती क्यों नहीं? तुम्हें दर्द हो रहा है ना? और अंतत: झल्लाते हुये चला जाता. यही मेरी जीत थी- उसे खुश न होने देना! दर्द से सारी देह लथपथ होती मगर भीतत सुकून का एक नन्हा सोता नि:शब्द बह निकलता… मैं विवश थी मगर अपने तई एकदम से हारी नहीं थी. एक लड़ाई, एक प्रतिरोध, चाहे वह कितना भी कमज़ोर, नगण्य क्यों न हो, मेरी तरफ से ज़ारी था और इसी में मेरा तिल मात्र सुख निहित था. मैंने पीड़ा की अथाह, अंधकार रात से अपनी तसल्ली और सुकून के दो-चार जुगनू चुनना सीख लिया था. वो रास्ता जिसका कोई अगला सिरा नहीं था, बस मोड़ ही मोड़ दिखते थे, उस पर चल

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