वंदना राग की कहानी ‘स्टेला नौरिस और अपूर्व चौधुरी अभिनीत क्रिसमस कैरोल’

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समकालीन स्त्री कथाकारों में वंदना राग सबसे अंडररेटेड लेखिका हैं. जबकि उनकी उनकी कहानियों की भाषा, कथ्य, इंटेंसिटी, शैली सब न सिर्फ अपने समकालीन कथाकारों से भिन्न है बल्कि उन्होंने हिंदी में स्त्री-लेखन को सर्वथा नई जमीन दी है. उनमें वह ‘तथाकथित’ बोल्डनेस नहीं है दुर्भाग्य से जिसे हिंदी में स्त्री लेखन के मूल्य की तरह स्थापित करने की कोशिश की गई. जो लेखिकाएं उस सांचे में फिट नहीं हुईं उनको परे कर दिया गया. लेकिन वंदना जी ने उस चालू मुहावरे से हमेशा अपनी कहानियों को बचाया है. फिर भी उनकी कहानियों में जीवन की उष्मा है, परिवेश और कहन की जीवन्तता है. उदहारण के लिए उनकी प्रस्तुत कहानी, जो मुझे बहुत पसंद भी है. संभवतः समकालीन हिंदी कहानी की कुछ बेजोड़ कहानियों में एक. मेरी पीढ़ी के लेखकों के पास ऐसी कहानियां बहुत कम हैं. यह लिखते हुए मैं यह नहीं भूल रहा हूँ कि मैं भी उसी पीढ़ी का लेखक हूँ- प्रभात रंजन  
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आजकल क्या लिख रही हो?’ स्टेला ने मुझसे पूछा था।
एक कोशिश कर रही हूँ… देखोऽऽ कब सफल हो पाती हूँ।
जरूर, मेरा फ्रस्ट्रेशन फोन के पार उस तक पहुँचा होगा, तभी वह एकदम से आश्वस्त करती हुई अपनी खुशनुमा हँसी के साथ बोली थी, ‘शुरू कर दिया है, तो पूरा भी कर लोगी… वैसे है क्या?’ स्टेला दूसरों को उन्मुक्त करने की काबिलियत रखती है। मैं भी उस जादुई असर में आ, अपनी हिचक छोड़, उसे अपने महामहत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के बारे में बताने लगती हूँ।
एक नाटक पर काम रही हूँ, जिसमें क्राइम और मोरालिटी की नई परिभाषाएँ प्रस्तुत करना चाहती हूँ।
अच्छाऽऽवह खासी उत्तेजना से कहती है।
लगता है, इस बार मॉर्डन क्लासिक जैसा कुछ रच दोगी तुम।
न-न, मॉर्डन से कुछ आगे के समय की बात करना चाहती हूँ। क्लासिक होगा कि नहीं वह तो समय ही बताएगा, लेकिन इस बार मेरा इरादा बहुत सारी अकल्पनीय डिबेट्स को जायज ठहराने का है।
अरेऽऽ, क्या यह संभव है?’ वह गहरे आश्चर्य में डूब गई थी।
हाँ।
वेलकम टू द वर्ल्ड ऑफ पोस्ट मॉडर्निज्म बेबी…।
यह मैं जोर से नहीं कहती। मन ही मन में मथती हूँ। जानती हूँ उसे, इस तरह की बातें कम ही समझ में आती हैं, फिर उसे उलझाने से क्या फायदा?
दरअसल स्टेला नौरिस बरसों-बरस से एक-सी रही है। हद दर्जे की शौकीन, खूब हँसनेवाली, मीठा बोलनेवाली और तुनकमिजाज। लेकिन एक घटना समान उसमें पहला बदलाव मुझे तब महसूस होता है, जब वह अपने चालीसवें जन्मदिन के सेलिब्रेशन के वक्त घर में जुटे फूलवालों, रंगीन बल्लियोंवालों और अन्य साज-सज्जावालों से कहती है, ‘यह सब मत करो, प्लीज कीप इट सिंपल।
मैं देखती हूँ, उसी दिन के बाद से वह यह जुमला लगातार दुहराती है। बताती नहीं, कहाँ से उठाया है, लेकिन मेरा अनुमान है, दीपक चोपड़ा या रौंडा बर्न जैसे किसी लेखक की प्रेरणादायी किताब ही इसका स्रोत है। आजकल वह अलग-अलग किस्म की किताबें खरीदती रहती है। पढ़ती कितनों को है, यह ठीक-ठीक पता नहीं, लेकिन तरह-तरह की चर्चाएँ खूब करने लगी है। कभी उपभोक्तावादी कल्चर से अलग जाने की बात करती है, कभी दुनियादारी की चालाकियाँ उसे नागवार लगने लगती हैं कभी कुछ तो कभी कुछ। और तो और चर्चाओं तक ही उसका सिलसिला ठहरता नहीं, वह अलग, मौकों पर अक्सर रूप भी अलग दिखलाती रहती है। जब अपने पति स्टीव नौरिस के अगल-बगल होती है तो उसकी पतली नाक ग्रेशियन आभिजात्य का ढिंढोरा पीटने लगती है। और जब अपने घर में काम करनेवाली औरतों को सिस्टर कह कर पुकारती है, तो उसके चेहरे पर सिस्टरहुड की ऐसी सर्वहारा चमक फैल जाती है कि मैं उससे पूछने पर मजबूर हो जाती हूँ, ‘तुम हर मौके पर इतली अलग-सी क्यों हो जाती हो?’
मेरी मर्जी।वह छोटा-सा जवाब दे, कुछ भी नामाकूल-सा करने लगती है। मुझे अटपटा-सा लगता है। लगता है कछ भ्रमित-सी तो नहीं हो रही ये, कितनी आसानी से मेरी मर्जीकह कर आगामी सवालों के घेरे से निकल जाना चाह रही है। मेरी मध्यमवर्गीय चेतना में मेरी मर्जीकुछ ज्यादा ही किस्म के स्वतंत्रता बोध को जगाता है, और यह डरावनी बात लगने लगती है। मैं यह भी जानती हूँ कि इस तरह का डरपॉलिटिकली इनकरेक्ट भाव है और स्टेला का मेरी वर्गीय चेतना से कोई वास्ता नहीं, फिर भी मित्र होने के नाते मैं उसे टोक देती हूँ
स्टेला, क्या तुम खुदगर्ज किस्म की नहीं होती जा रही हो?’
हाँऽऽ।वह प्यार से कहती है और अपने भरे-भरे लेकिन रूखे हो चुके होठों को गीला करने के उद्देश्य से उनपे जीभ फिराती है। मैं देख कर सन्न रह जाती हूँ कि ऐसा करते वक्त वह सेक्सी कम जरूरतमंद ज्यादा लगती है।
अब जैसे मैं स्टेला को बरसों से देख रही हूँ, ठीक वैसे ही उसके पति स्टीव नौरिस को भी उससे ज्यादा बरसों से देख रही हूँ। वह दिल्ली शहर का नामी-गिरामी आदमी है। पक्का, सफल बिजनेसमेन। कनाट प्लेस में गाड़ियों का बड़ा शो-रूम है उसका। चर्च में लोग अक्सर बातें करते हैं कि नौरिस प्रधानमंत्री का करीबी है। यह दीगर बात है कि प्रधानमंत्री हर पाँच-दस साल में बदल जाता है, लेकिन नौरिस का रिश्ता प्रधानमंत्री से बदस्तूर रहता है। जाहिर है प्रधानमंत्री टाइप के लोगों को हमेशा से नौरिस जैसे लोगों की जरूरत बनी रहती है। लोग तो यहाँ तक कयास लगा चुके हैं कि नौरिस को जल्द राज्यसभा के लिए मनोनीत किया जाएगा। वैसे भी नौरिस लोग खानदानी अमीर-उमरा रहे हैं। पीढ़ियों से सत्ता से उनका रिश्ता कायम रहा है। दे डिजर्व इट!
सच तो यह है कि स्टीव मेरे पसंदीदा लोगों में से हैं। हमेशा मस्त रहता है। अपने खानदान के पुरखों की बड़ी शानदार कहानियाँ हैं उसके पास। खालिस अंग्रेजों का वंशज है वह। उन्नीस सौ सैंतालीस के बाद जो कुछ अंग्रेज रह गए भारत में, उन्हीं में से एक उसके खानदान के लोग थे। उसके कई रिश्तेदार उसके बाद आस्ट्रेलिया चले गए। उनमें कोई मिक्सिंग नहीं हुई। वे कभी-कभी इंडिया आते हैं तो आस्ट्रेलियन ही कहलाते हैं। यहाँ जो उसके खानदान की शाखा रह गई, पता नहीं उसमें स्थानीय लोगों की आमद हुई या नहीं, इस बाबत ठोस जानकारी नहीं है हमारे पास लेकिन सुखद तरीके से स्टीव का डीएनए तो पूरा विदेशी ही जान पड़ता है। उसका लंबा कद, उसका गठीला शरीर, उसकी गोराई, उसके बालों का भूरा रंग और उसकी भूरे कंचे जैसी आँखें जो बेहद खूबसूरत हैं। कई बार महफिलों में बैठे-बैठे स्टीव हमें सुदूर अतीत की सैर करवाता है। और स्टीव और मैं वहाँ की शानो-शौकत से रूबरू हो बेहद तरोताजा और आत्मविश्वासी महसूस करते हैं। मैं, क्योंकि नौस्टैल्जिया मेरी कमजोरी है, (वही चिरपरिचित मध्यमवर्गीय लोलुपता का बोध) और वह, क्योंकि शासक वर्ग से ताल्लुक रखना अपने आप में बड़ी अनुभूति है। अलबत्ता स्टेला को अतीत में जाना बिल्कुल नहीं पसंद और तो और मुझे लगता है, उसे भविष्य के बारे में सोचना भी पसंद नहीं। थोड़ी अजीब ही है वह और-और अजीब बनती जा रही है। स्टीव इन विषयों पर उसकी विरक्ति पर उसका चिबुक उठा कर कहता है।
भोंदू।
स्टेला इस पर आँखें बंद कर लेती है। मैंने गौर किया है कि यह सिर्फ एक बार की बात नहीं। स्टेला स्टीव के किसी भी प्रकार के उकसाने का जवाब यों ही देती है। पूरी तरह भोंदूपने को जीते हुए, मानो कोई बहुत छोटा बच्चा छुप्पम-छुपाई का खेल खेल रहा हो और छुपने के बजाए अपनी आँखें बंद कर लेता हो, यह सोचते हुए कि अब जो वह नहीं देख पा रहा है, तो शर्तिया खुद ही छुप गया होगा। एक दम चिढ़ानेवाली हरकत है यह। पता नहीं स्टीव उसकी इस हरकत पर चिढ़ता क्यों नहीं। उल्टे उसे और दुलराने लगता है।
स्टेला अपने आप से ही छिपती हो क्या?’ मैं कुरेदती हूँ।
क्या बकवास करती हो, लेखक हो तो क्या हर बात में पेंच ढूँढ़ोगी? समटाइम्स कीप इट सिंपल।
फिर उसका वही तकिया कलाम। वह चिड़चिड़ा कर भी यही बोलती है, और यह बोल वो न सिर्फ सबको लाजवाब कर देती है बल्कि अब तो लगने लगा है कि हमारी जुबान को भी इस जुमले की लत लग ही जाएगी। खैर! यह सब भविष्य की बातें हैं और भविष्य के बारे में कौन-कब ठीक-ठीक जान पाया है।
सोचते-सोचते यकायक स्टीव की मस्ती की बात याद आती है। सुबह की संडे सर्विस के बाद हम चर्च से निकले तो स्टीव ने अपनी लेटेस्ट चकाचक सफेद ऑडी में हमें बिठाया और फर्राटे से गाड़ी दौड़ा दी, लुटियन्स की दिल्ली और आभिजात्यों की दिल्ली से अलग दिशा में, ‘कहाँ जा रहे हो?’ स्टेला अस्थिर होने लगी।
सदर… चलो आज तुम्हें वह जगह दिखा ही दूँ जहाँ मेरे पुरखे रहा करते थे। कितनी बार सोचा…।
इसके बाद उसने गाड़ी एक गली के मुहाने पर पार्क कर दी। और हम गली में पैदल चल पड़े। बारिशों के दिन थे। चारों ओर गंदगी, गड्ढों और बदबू का साम्राज्य फैला था। इसके बावजूद स्टीव का उछाह देखने लायक था। झक सफेद टाई सूट पहने वह चल नहीं – दौड़ रहा था। ऐसा लगता था मानो सदर की इस गली में दफन पुरखों की हड्डियों की मिट्टी से उसे साँसें मिल रही हों। और वह अपने अतीत के गौरव की गंध से उन्मत्त हो रहा हो। उसके वजूद से ऐसी अथाह मस्ती टपक रही थी।
स्टेला उससे ठीक उलट नाक और मुँह बिचकाती अपनी साड़ी दो इंच पिंडलियों से ऊपर उठाए, धीरे-धीरे चल रही थी।
ये देखो,’ स्टीव एक भद्दी कंक्रीट की दो-मंजिला दुकान के निचले-पीछे के हिस्से को दिखाते हुए बोला, ‘यही वह कोठी थी, जिसमें मेरे परदादा और दादा रहते थे।
स्टेला ने अवमानना से नाक सिकोड़ी। मैंने अपनी निराशा पर काबू पाते हुए, ‘अभी भी उत्साहित हूँवाला चेहरा ओढ़ लिया।
मेरे परदादा, अलबर्ट नौरिस फर्ग्यूसन। पूरी दिल्ली में बड़ा नाम था उनका। जिधर निकल जाते थे, लोग सर झुका लेते थे। इतना रुतबा था उनका हुँह।
स्टीव की बातों और सामने खड़ी इमारत में कोई मेल नहीं दिख रहा था, फिर भी मैं लगातार उसकी बातें सुने जा रही थे, लेकिन स्टेला अवज्ञा की हद तक निस्संग बनी हुई थी और स्टीव उस पर ध्यान दिए बिना उजबक-सी रौ में बोले जा रहा था।
ये जो खिड़की है न, उससे अंदर झाँको, फायर प्लेस दिखेगा देखो… देखो वह पत्थर का है, और बरामदे के ये पिलर्स कितने मजबूत और गोल है, और देखो वहीं फायर प्लेस के ऊपर एक नक्काशीदार लोहे का कुंदा है, वह भी सन 1900 के आसपास का है।
क्या टँगता था उसमें?’

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  1. अपने समीक्षा-कर्म के दौरान वंदना राग की कहानियों (हालिया दो संग्रहों 'हिजरत से पहले' और 'ख़यालनामा' की कहानियों के बहाने विशेष) को पढ़ने का सुख मिला और उनपर कुछ लिखना हो सका। इन दोनों संग्रहों पर एक लंबा आलेख लिखा गया है। Prabhat Ranjan जी अगर अनुमति दें तो जानकीपुल के लिए उसे भेजना चाहूंगा। फ़िलहाल प्रसंगवश, जो इस कहानी पर या कहें इसके बहाने Vandana Rag के कहानीकार पर  लिखना हो सका था, वह यहाँ अविकल रूप से प्रस्तुत कर रहा हूँ। …
    वंदना राग का कहानीकार बहुत ठहरकर चलता है। अगर पाठक भी उतना ही ठहरकर उन्हें पढ़े, तो वह उन विवरणों में डूबता चला जाता है।वंदना का कहानीकार अपने पाठकों से यह अपेक्षा भी रखता है। मसलन 'क्रिसमस कैरोल' कहानी को ही लिया जाए।
    दो सहेलियों के परस्पर भिन्न मताग्रहों के बीच गुँथी इस कहानी में वंदना राग ने अपने लेखकीय मिज़ाज के अनुरूप अपने पात्रों के बेहतर स्केच खींचकर उन्हें जीवंत बनाया है।कहानी की नायिका, अपनी सहेली स्टेला द्वारा अपने होठों को गीला करने के उसके प्रयास पर सोचती है और उसकी वर्तमान स्थिति को मन ही मन दर्ज़ करती चलती है, " मैं देखकर सन्न रह जाती हूँ कि ऐसा करते वक़्त वह सेक्सी कम ज़रूरतमंद ज़्यादा लगती है"।ऐसी एक और बानगी। इसी स्टेला का पति स्टीव, जब अपने पुरखों के मुहल्ले सदर बाज़ार में अपनी पत्नी को घुमाने ले जाता है, तो बारिश से जहाँ तहाँ भरे पानी के गड्ढों और गन्दगी के बावजूद उसके उत्साह पर ग़ौर करती, कहानी की कथावाचिका लेखिका क्या खूब चित्र खींचती है,"ऐसा लगता था मानों सदर की इस गली में दफ़न पुरखों की हड्डियों की मिट्टी से उसे सांसें मिल रही हों। और वह अपने अतीत के गौरव की गंध से उन्मत्त हो रहा हो। उसके वजूद से ऐसी अथाह मस्ती टपक रही थी"(पृष्ठ 31)।
    आगे घटनेवाली घटना का संकेत किस तरह किया जाता है, "बच्चे और बड़े की बारीक अन्तःरेखा को कभी पकड़ ही नहीं पाया स्टीव, लिहाजा जो बच्चे थे वे बड़े हो गए और बड़े बच्चे।"
    यह स्टीव द्वारा ही प्रथमतः घर में बुलाए गए अपूर्व चौधरी और स्टेला के बीच की संभावित आग को पकड़ने की एक कोशिश थी। उनके बीच की अंतरंगता का आगे आना अभी बाकी है और कहानी उस ओर आगे बढ़ रही है। क्रिसमस से पहले की एक पार्टी में उन दोनों के भीतर की चिनगारियों को पकड़ती कहानी की नाटककार वाचिका आगे लिखती है, "उस बहके और बेहोश पल में भी दोनों की आँखों में उठनेवाली चिनगारी पूरी तरह बाहोश थी। अपूर्व चौधुरी और स्टेला नौरिस सच के पाश में एक हो चुके थे"।
    एक सधी हुई भाषा में घटनाक्रम को बहुत लाउड किए बग़ैर दोनों के बीच के विवाहेतर संबंध को या कहें उनके आत्मिक रिश्ते को अभिव्यक्त किया गया है। ऐसे रिश्तों का कोई मुकाम नहीं होता, हो भी नहीं सकता। मगर ऐसे रिश्तों में स्वयं की पहचान मिलती है, स्वयं से व्यक्ति टकराता है और नैतिकता और अनैतिकता के कई सवाल खड़े होते हैं। सदियों से होते आए हैं और आगे भी होते रहेंगे। मगर स्त्री-पुरुष के स्थापित (जिसे अमूमन वैवाहिक रिश्ता ही समझा जाता है) रिश्तों के बरक्स ये अस्थायी और क्षणभंगुर रिश्ते बहुत दूर तक चले जाते हैं। चूँकि ये क्षणभंगुर होते हैं, शायद इसलिए इनमें आवेग बहुत अधिक होता है। इसमें अगर सिर्फ स्त्री की यौनिकता और उसकी देह स्वतंत्रता को देखा जाए तो यह कहानी के मूल उद्देश्य के साथ अन्याय होगा।अपने पुत्र की उम्र से थोड़े बड़े अनूप चौधुरी से स्टेला की निकटता कहीं इससे आगे जाती है। प्रकट और घोषित तथ्यों के बीच दबे हुए सच को जब तब जोर शोर से उजागर करनेवाली स्टेला के आत्म निरीक्षण की यह कहानी है। पारंपरिक तरीके से और मध्यवर्गीय कसौटियों पर कसे और सिद्ध हुए मूल्यों के साथ चलनेवाली कथावाचिका और स्टेला की आपसी वैचारिक टकराहट के बहाने वंदना ने इस विषय पर बिना आग्रही हुए एक संवेदनशील कहानी को सिरजा है।यह आश्चर्य की बात नहीं कि बाद में वही कथावाचिका अपनी सहेली के बिखराव के पलों में उसे समेटती है और अपूर्व चौधुरी की सद्यःप्रकाशित किताब उसे भेंट करती है, जिसे परोक्षतः उसे ही समर्पित किया गया है।कहानी का अंत इन पंक्तियों से होता है, "…स्टेला धीरे-धीरे बड़ी मुलायमियत से 'अपूर्व चौधुरी' के नाम पर उंगलियाँ फिराने लगती है, बार बार, मानो किसी कोमल निष्पाप मेमने की देह सहला रही हो"। जो कथावाचिका, इस बढ़ते जाते संबंध पर एक पैनी, तीक्ष्ण और कुछ संशकित निगाहें जमाई हुई थी, जिस अपूर्व चौधुरी से उसे दूर रहने की हिदायत दे चुकी थी,बाद में वही कथावाचिका इस पूरे प्रसंग में कोमलता और अकलुषता को लाकर मानों अपनी मध्यवर्गीय कसौटी से कहीं आगे जाकर स्वयं को कसने का प्रयास करती है।

  2. शानदार कहानी… पहले भी पढ़ी थी… फिर से पढ़ना भी उतना ही ताजा अनुभव रहा। उन्हें और आपको बहुत बहुत बधाई।

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