‘रिमझिम’ की समीक्षा की समीक्षा

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कुछ दिनों पहले जाने-माने चित्रकार और लेखक अखिलेश ने स्कूलों में पढ़ाई जा रही हिंदी को लेकर एक सुदीर्घ और सुचिंतित लेख लिखा था. उसका जवाब शिक्षाविद रविकांत ने दिया है. यह बहस जारी रहेगी- मॉडरेटर 
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अखिलेश जी ने बहुत लंबा लेख लिखा है –हम अपने बच्‍चों को कैसी हिंदी पढ़ा रहे हैं ?”  जिसमें उन्‍होंने 1927 में अंग्रेजों के जमाने में छपी भाषा की किताबों मध्‍यप्रदेश की सरकारी पाठ्यपुस्‍तकों – भाषा भारतीतथा राष्‍ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान व प्रशिक्षण परिषद द्वारा बनाई गई भाषा की पाठ्यपुस्‍तकों – रिमझिमका तुलनात्‍मक अध्‍ययन किया है।
इस बात में कोई शक नहीं कि शिक्षा के विद्यार्थी न होने के बावजूद अखिलेश ने इन किताबों पर काफी लंबा लेख लिखा है। यह भी खुशी की बात है कि शिक्षा से जुड़े व्‍यक्‍तियों के अलावा दूसरे भी शिक्षा से जुड़ी एक अहम इकाई पाठ्यपुस्‍तकों से न सिर्फ चिंतित हों बल्कि उस चिंता की वजह से जुड़े अपने सवालों को भी दूसरों के सामने रखें।
अखिलेश जी के लेख का अधिकांश हिस्‍सा भाषा-भारती व अंग्रेजों के जमाने की पाठ्यपुस्‍तकों की समीक्षा पर केन्द्रित है। उन्‍होंने लेख के बहुत ही थोड़े हिस्‍से में रिमझिम की समीक्षा की है। अखिलेश जी ने कक्षा 2 की रिमझिम पर दो अनुच्‍छेद तथा कक्षा4 की रिमझिम पर एक अनुच्‍छेद लिखा है। मैं भाषा-भारती  व अंग्रेजों के जमाने की पाठ्यपुस्‍तकों पर फिलहाल कोई टिप्‍पणी नहीं करते हुए इस आलेख को सिर्फ कक्षा 2 की रिमझिम की उनकी समीक्षा पर ही केन्‍द्रि‍त रखूंगा।( अगर मुमकिन हुआ तो इस लेख में पाठ्यपुस्‍तकों से जुड़े लेखक के नजरिए में मौजूद गहरी समस्‍याओं पर अलग से लेख लिखूंगा।)
पाठकों को उकसाने के लिए पहले ही मैं रिमझिम की अखिलेश द्वारा की गई समीक्षा के बारे में अपनी राय बता देता हूं। मेरे विचार से अखिलेश जी द्वारा की गई रिमझिम की समीक्षा का स्‍तर बहुत ही चिंतनीय है व उनकी गंभीरता व विश्‍लेषण क्षमता पर एक नहीं कई सवाल खड़े करती है।(बाकी दोनों पाठ्यपुस्‍तकों की समीक्षा के बारे में आप खुद अनुमान लगा लें व उसकी जांच के लिए की गई समीक्षा को किताबों के साथ मिला कर देख लें।)मैंने ये दोनों बातें जानबूझ कर इसलिए कही है क्‍योंकि इस लेख पर टिप्‍पणी करने वाले एक लेखक ओमा शर्मा इस समीक्षा को सुचिंतित बताते हैं व दूसरे लेखक सारंग उपाध्‍याय लेखक अखिलेश की गंभीरता व विश्‍लेषण क्षमता की तारीफ करते हैं। और इसे विष्‍णु खरे अपनी अलग से लिखी टीप में कई बातों के साथ साथ इस पर शोध निबंध का तमगा लगा देते हैं। वैसे यह जुदा मसला है कि उनकी यह टिप्‍पणी इस लेख के शोध निबंध होने के बारे में कम, शोध निबंध के बारे में उनकी समझ पर ज्‍यादा बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर देती है।
संदर्भ के लिए मैं अखिलेश के लेख का रिमझि‍म 2 से जु़ड़ा हिस्‍सा यहां रख रहा हूं।
अब एन.सी.ई.आर.टी. की पुस्तक देखी जा सकती है। रिमझिम-2’, इसका नाम रिमझिमपढ़कर ही मुझे पता चला कि किसी अदृष्य, अप्रकाशित डिक्शनरी में मातृभाषा का पर्यायवाची शब्द रिमझिमहै। 2तो मैं जानता ही था, ‘दोही है। दूसरी कक्षा के लिए। इसमें और भाषा भारतीमें फ़र्क सिर्फ़ इतना है जितना भोपाल और दिल्ली में छपी पुस्तकों के बीच हो सकता है। पुस्तक का प्रारम्भ आमुख से होता है, जिसमें यहाँ भी निदेशक सफाई दे रहा है कि बच्चों के स्कूली जीवन को बाहरी जीवन से जोड़ा जाना चाहिए और यह उस किताबी ज्ञान के खि़लाफ़ पहल है। यानी स्कूल जेल या सुधारगृह हैं जिसमें बच्चे बाहरी जीवन से कटे रहते हैं। यह आशा भी पहले ही पैरा में है कि ये कदम हमें राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) में वर्णित बाल केन्द्रित व्यवस्था की दिशा में दूर तक ले जायेंगे।और ये पुस्तक सफलतापूर्वक बच्चों को मातृभाषा से बहुत दूर ले जाती है। प्रयत्नों की सफलता की जिम्मेदारी प्राचार्य और अध्यापक पर डाल दी गई है। इसी में पता चलता है कि पाठ्य-पुस्तक निर्माणसमिति भी है, मानो पाठ्यपुस्तक नहीं कोई बहुमंजिला भवन है, जिसका निर्माण हो रहा है। फिर कई लोगों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए एक निगरानी समितिका पता भी चलता है। इसके तत्काल बाद बड़ों से बातेंकी जा रही हैं, जिसमें सिर्फ़ बकवास की गई है और क्यों की गई है, यह समझ नहीं आता। इसी में बड़ों को बताया गया है कि रिमझिमरंगीन आकर्षक चित्रों से सजी है। चित्र भाषाई कौशल को विकसित करने में सहायक हो सकते हैं, यह बात भी यहाँ पता चलती है। तीन पन्नों की बकवास के बाद आभार का एक पृष्ठ और भी है। फिर बड़े अक्षरों में घोषणा है पाठ्यपुस्तक निर्माण समितिकी।
इसके बाद सबसे मज़ेदार पृष्ठ है, जिसमें बच्चों को बतलाया गया है पुस्तक में इस्तेमाल हुए चित्र संकेत के बारे में। कुछ निहायत ही साधारण किन्तु अत्यन्त ही निकृष्ट चित्र छपे हैं, जो जिस बात के संकेतहैं वह लिखा है। मतलब भाषा नहीं सीखना है, संकेत सीखने से मातृभाषा आ जाती है। इसमें नौ कविताएँ हैं, जिसमें चित्र संकेतके अनुसार तीन सिर्फ़ पढ़ने के लिए हैं, बाकी चार पढ़कर कुछ करने के लिए भी हैं। ऊँट चला, म्याऊँ-म्याऊँ, बहुत हुआ, तितली और कली, टेसू राजा बीच बाजार, सूरज जल्दी आना जी। इसमें प्रार्थना गायब है और साथ ही नीति शिक्षा देने वाली या पहेली पूछती रोचक कविताएँ नहीं हैं। यह किताब भालू ने फुटबाल खेली, अधिक बलवान कौन, दोस्त की मदद, मेरी किताब,बुलबुल, मीठी सारंगी, बस के नीचे बाघ, नटखट चूहा और एक्की-दोक्की जैसे पाठ लिये है, जिसकी सफाई निदेशक महोदय शुरू में दे देते हैं कि यह सब बच्चों को स्कूल के बजाय जीवन से जोड़ने के लिए किया जा रहा है। आत्मग्लानि से भरी ये दोनों समितियाँ या तो स्वनामधन्य विषेषज्ञों की हैं या जुगाड़ू लोगों की हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को अपनी मातृभाषा से काटने के लिए बनायी गयी है, जो ग़ैरजिम्मेदार और भारतीय संस्कृति और भारतीय संस्कृति में छिपी वैश्विक समझ और गहराई से नितान्त अपरिचित है। हम आगे देखेंगे कि इन्होंने बुनियादी शिक्षा में ही खोट पैदा कर दी, जो अंग्रेज़ नहीं कर रहे थे। उनके पाठ्यक्रम सुविचारित और भारतीय मानस के अनुरूप थे। उन्होंने अपनी मिशनरी चालाकी ज़रूर बरती है एकाध पाठ में, जहाँ एक हिन्दू और एक मुसलमान विद्यार्थी की तुलना में एक ईसाई विद्यार्थी समाजसेवा का बड़ा काम करता है, जबकि हिन्दू और मुस्लिम विद्यार्थी सिर्फ़ एक व्यक्ति की सहायता करते दिखलाये जाते हैं। किन्तु फिर भी पाठ और कविताओं का एक स्तर है और चुनाव सावधानीपूर्वक किया गया है, जिससे बच्चे का मानसिक विकास हो सके।(इन्‍हीं में से कुछ का दोहरान आगे भी लेख में किया गया है, यहां उनका जिक्र नहीं किया जा रहा।)
लेखक की गंभीरता का अंदाजा लेख की शुरूआत में चौथी पंक्‍त‍ि(जो कि उपरोकत संदर्भ से पहले लेख में आता है) से ही होना शुरू हो जाता है। जब लेखक पाठ्यपुस्‍तकों को खरीदने की बात करते हैं व उसके बाद वे पाठ्यपुस्‍तकों की खराब छपाई की समीक्षा करने लगते हैं। आप सोचते रह जाते हैं कि वे खरीदी हुई पाठ्यपुस्‍तकों में से किनकी बात कर रहे हैं। अगर आपके पास इनमें से किसी एक जगह की किताबें हो तभी आप यह अनुमान लगा सकते हैं कि बिना नाम लिए ये बातें भारत भारती के लिए कही जा रही है। खैर यह छोटी सी समस्‍या लेख की शुरूआत में एक दो पं‍क्‍तियां जोड़ कर आसानी से हल की जा सकती थी।
रिमझिम की समीक्षा की शुरूआत ही लेखक इस तंज के साथ करते हैं कि मुझे पाठ्यपुस्‍तक का नाम पढ़ कर पता चला कि किसी अदृश्‍य अप्रकाशित डिक्‍शनरी में मातृभाषा का पर्यायवाची रिमझिमहै।  यानी लेखक को भाषा की पाठ्यपुस्‍तकों का नाम रिमझिम रखे जाने पर सख्‍त एतराज है। उन्‍होंने बताया तो नहीं कि इनका नाम क्‍या हो लेकिन यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उनकी राय में इन पाठ्यपुस्‍तकों का नाम या तो मातृभाषा या भाषा या इनके अंदर काम ली गई भाषा – हिंदी होना चाहिए था। लेकिन इन्‍हीं लेखक को भाषा भारतीके नाम पर ऐतराज नहीं होता और न ही वे इस नाम पर अपने अदृश्‍य अप्रकाशित शब्‍दकोष को खोलने की जहमत उठाते है जिसमें मातृभाषा का पर्यायवाची भाषा भारतीदिया गया हो। थोड़ा दिमाग पर जोर डाल कर सोचिए कि भारती शब्‍द किस भाषा का पर्यायवाची है। वैसे भी मातृभाषा का पर्यायवाची न तो भाषा होता है न ही हिंदी। वैसे अगर हिंदी की किताब का नाम हिंदी रखना जरूरी माना जाए तो इस तर्क से तो हर कहानी की किताब का नाम कहानी, कविता का किताब का नाम कविता, हर चित्र का नाम चित्र और आदमी का नाम आदमी व औरत का नाम औरत ही रखा जाना चाहिए।
अगर लेखक ने समीक्षा के लिए थोड़ी सी मेहनत की होती और रिमझिम पर काम करने में मदद के लिए बनाई गई शिक्षक संदर्शिका – कैसे पढ़ाएं रिमझि‍म को उलटा पुलटा होता तो उन्‍होंने कम से कम इन पाठ्यपुस्‍तकों का नाम रिमझिम रखे जाने के तर्क को पढ़ा होता और उस कारण से असहमत होने पर उसकी आलोचना की होती। मैं आपकी मदद के लिए उस तर्क को नीचे ज्‍यों का त्‍यों रख रहा हूं,
पुस्‍तक को जब अंतिम रूप दिया जा रहा था तभी विचार आया कि क्‍यों न पुस्‍तक का नाम रिमझिम रखा जाए। रिमझिम शब्‍द ध्‍वन्‍यात्‍मक है, इसमें संगीतात्‍मक झलकती है, रिमझिम शब्‍द बच्‍चों के लिए सार्थक है और बच्‍चों के लिए रिमझिम शब्‍द को उच्‍चरित करना भी आसान है। रिमझिम फुहार में भीगना तथा बारिश की रिमझिम बूंदों को नन्‍हीं मुट्ठि‍यों में भरने की कोशिश बच्‍चों को पुलक से भर देती है। इन सब बातों को सोचते हुए यही लगा कि पुस्‍तक का नाम रिमझिम रखना ही बेहतर होगा।”(पृ. 5, कैसे पढ़ाएं रिमझिम- शिक्षक संदर्शिका)
इसके बाद लेखक फिर से बिना कोई सबूत दिए यह दावा करते हैं कि रिमझिम व भाषा भारती में इतना ही फर्क है जितना दिल्‍ली व भोपाल में। गोया पाठ्यपुस्‍तकें न हुई कोई फलाना ढिकाना शहर हो गई। वैसे भी इस बात का यह कोई मतलब नहीं निकलता क्‍योंकि लेखक आपको दिल्‍ली व भोपाल में कोई फर्क नहीं बताता। अब जो इन दोनों शहरों के मिजाज में फर्क को नहीं जानता वह इससे क्‍या समझेगा। और जो जानता है उसकी भी गारंटी कि वह दोनों में उसी फर्क की कल्‍पना करेगा जो लेखक के दिमाग में उपजी है। फिर लेखक अपना चाबुक आमुख पर चलाने लगते हैं। इसमें वे निदेशक द्वारा राष्‍ट्रीय पाठ्यचर्या के संदर्भ से कुछ प्रमुख सिद्धांतों को याद दिलाए जाने को सफाईदेना करार देते हैं।। एक राष्‍ट्रीय स्‍तर के दस्‍तावेज का संदर्भ अध्‍यापकों को याद दिलाना सफाई देना कब से होने लगा। ये तो ऐसा हो गया कि कोई व्‍यक्‍ति लोकतंत्र पर चल रही बहस में संविधान व अंबेडकर का जिक्र करे तो आप यह कहने लगें कि लो ये तो सफाई दे रहा है। क्‍या किसी बात को कहते वक्‍त किसी दस्‍तावेज का संदर्भ देने व किसी बात की सफाई देने में कोई फर्क नहीं होता ।
पाठ्यपुस्‍तक के आमुख में निदेशक ने कहा है कि राष्‍ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा(2005) यह सुझाती है कि बच्‍चों के स्‍कूली जीवन को बाहर के जीवन से जोड़ा जाना चाहिए।इस बात से लेखक एक ऐसा नतीजा निकाल लेते हैं जो इससे निकाला ही नहीं जा सकता। वे कहते हैं कि यानी स्‍कूल जेल या सुधारगृह हैं, जिसमें बच्‍चे बाहरी जीवन से कटे रहते हैं। वैसे कइयों ने स्‍कूलों को जेल की उपमा दी है और उसके कारण भी दिए हैं। वैसे भी अपनी ढांचागत संरचना में आज के स्‍कूल कई मायनों में जेल से कम नहीं ज्‍यादा ही नजर आते हैं। लेकिन निदेशक ने तो जिस बात का संदर्भ दिया है उसमें तो कहीं भी इस बात की झलक नजर नहीं आती। क्‍या लेखक को स्‍कूली जीवन को बाहरी जीवन से जोड़ने से ऐतराज है। वैसे जिस जगह उन्‍होंने इस संदर्भ में जेल का जिक्र किया है उससे उन्‍हें स्‍कूली जीवन को बाहरी जीवन से काट कर रखने का समर्थक माना जाना चाहिए। लेकिन ऐसा क्‍यों चाहते हैं इसके बारे में कुछ नहीं कहते।  फिर लेखक निदेशक की यह आशा, कि ये कदम (यानी किताबों को बनाने का) हमें राष्‍ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में वर्णित बाल केन्‍द्रि‍त व्‍यवस्‍था की दिशा में दूर तक ले जाएगा, की खिल्‍ली उड़ाते हुए कहते हैं कि ये पुस्‍तकें सफलतापूर्वक बच्‍चों को मातृभाषा से बहुत दूर तक ले जाती है। हो सकता है कि लेखक की राय एकदम ठीक हो। लेकिन हमें कैसे पता चले कि लेखक इस नतीजे तक कैसे पहुंचे।  अब तक उन्‍होंने रिमझिम के बारे में ऐसी कोई बात नहीं बताई है जिससे हमें कई तो छोड़ि‍ए एक भी ऐसा सबूत मिले जिससे यह पता चलता हो कि ये किताबें बच्‍चों को उनकी मातृभाषा से सफलता पूर्वक दूर तक ले जाती है। रिमझि‍म का गंभीर विश्‍लेषणकरते हुए उन्‍होंने किया सिर्फ यह है कि साहित्‍य की एक विधा-कविता का इस्‍तेमाल करते हुए वाक्‍यों की तुक मिला दी है और बाल-केन्‍द्रि‍त की जगह मातृभाषा लिख दिया है। क्‍या तुकबंदी करना व वाक्‍यों में हेर फेर कर देना समीक्षा हुआ करता है

4 COMMENTS

  1. Anil ji krupya aap bhi dhyan se padhe. Ye Gambhir masala hain Hamari aane wali generation ki padhai ka. maine do char panne nahi palate hain. Ye aap padhakar samjh jayenge.

  2. अच्‍छा लेख है रवि. भाषा की पाठ्यपुस्‍तकों और साहित्यिक रचनाओं की किताबों में फर्क को स्‍पष्‍ट तौर पर सामने रखता है. पाठ्यपुस्‍तक का निर्माण ही करना होता है क्‍योंकि भाषा के विविध अास्‍वादों से छात्रों को परिचित करवाने की जिम्‍मेदारी होती है उन पर साथ ही कुछ क्षमता विकास की जिम्‍मेदारी भी होती है. कहानी, कविता, निबंध आदि जैसी किसी रचना को लि‍खने का लेखक का अपना मकसद होता है किन्‍तु जब कोइ्र रचना पाठ्यपुस्‍तक में शामिल की जाती है तो उसके साथ शैक्षिक मकसद भी जुड़ जाता है और कोई भी शैक्षिक मकसद बिना समाज की परिकल्‍पना के, उसमें मौजूद नागरिकों की परिकल्‍पना के पूरा नहीं हो सकता. इसीलिए किसी रचना के पाठ़यपुस्‍तक में शामिल होते ही उसके साथ सवाालों, अभ्‍यासों का अंश जोड़ा जाता है. साहित्‍य का अध्‍ययन स्‍वांत: सुखाय भी किया जा सकता है किन्‍तु पाठ्यपुस्‍तकें केवल इस मकसद से नहीं बनाई जा सकतीं. उनके निर्माण को लगातार एक समाज व उसमें मौजूद नागरिक की परिकल्‍पना दि‍शा देती रहती है. यह दिशा क्‍या और किस ओर होगी इसके लिए बाकायदा पाठ्यचर्या और संबंधित अन्‍य दस्‍तावेज तैयार किए जाते हैं. पाठ्यपुस्‍तक कभी भी इस दिशा से स्‍वायत्‍त नहीं हो सकती.

  3. बहुत अच्छी समीक्षा है यह। इस तरह के समीक्षकों को तमीज़ सिखाने के लिए की गई अच्छी पहल, जो दो-चार पन्ने पलट कर समीक्षा लिख देते हैं। शाबास रविकान्त !

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