‘मेकिंग ए मर्डरर’ के बहाने कुछ सवाल

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‘मेकिंग अ मर्डरर‘ डॉक्युमेंट्री सीरिज देखकर युवा पत्रकार-लेखक अमित मिश्र ने यह लेख लिखा है. अमेरिकी न्याय-व्यवस्था के ऊपर कई सवाल उठाता हुआ. अमित जी फिल्मों की गहरी समझ रखते हैं और एक पेशेवर की तरह समस्या की नब्ज पर उंगली रखना जानते हैं, किसी किस्सागो की तरह नैरेटिव लिखना जानते हैं. एक अलग-सा लेख- मॉडरेटर 
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हां, हम हत्यारे बनाते हैं…
मेरे हिसाब से सिनेमा वह है जो देखे जाने के बाद लंबे वक्त तक नींद में पीछा करे और मानसिक जड़ता से झकझोर कर उठा दे। एक ऐसे ही सिनेमैटिक अनुभव से पिछले तकरीबन 72घंटे से उबरने की कोशिश कर रहा हूं और नीचे लिखा सब कुछ उस कोशिश का ही हिस्सा है।
अपनी बात कहने से पहले आपसे एक सवाल पूछता हूं। क्या कभी आप पर ऐसा गलत इल्जाम लगा है, जिसकी सफाई देने में आपको एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ा हो तब जाकर आप खुद को साफसुथरा साबित कर पाए हों। मेरे हिसाब से हर इंसान की जिंदगी में कभी न कभी ऐसा वक्त आता है। खुद को सही न साबित कर पाने की छटपटाहट चंद घंटों को ही बरसों के इंतजार में तब्दील कर देती है। जरा सोच कर देखिए कि अगर जिंदगी के 18 साल एक ऐसे जुर्म के लिए जेल में बिताने पड़ें जो आपने किया ही नहीं। आप सफाई देते रहें लेकिन पुलिस-कानून इसे अनसुना कर दे। उस पर मुश्किल यह कि इल्जाम रेप जैसे अपराध का हो।
‘Making a Murderer’ एक ऐसे ही इंसान स्टीव एवरी की कहानी है, जिस पर 1985 में रेप का इल्जाम साबित होता है और इसके लिए उसे 30 साल की सजा सुनाई जाती है। वह बेगुनाही की गुहार लगाता रहता है, लेकिन कोई उसकी नहीं सुनता। ये सब देखना तब और भी दिलचस्प हो जाता है जब दुनियाभर को अपने जस्टिस सिस्टम की दुहाई देने वाले अमेरिका के जस्टिस सिस्टम की हस्यास्पद सचाई से सामना होता है। अमेरिकी के विंस्कॉसिन नाम के स्टेट में मेडिसन शहर के स्टीव एवरी का ट्रायल, अमेरिकी जस्टिस सिस्टम की बखिया उधेड़ता नजर आता है। इस ट्रायल में वह सबकुछ है जो 90 के दशक की हिंदी फिल्मों में होता है, मिसाल के तौर पर भ्रष्ट पुलिस, जजों की मिलीभगत और सरकारी गुंडा-गर्दी। भला हो उसी अमेरिका के साइंटिस्टों का जिन्होंने डीएनए मैचिंग का टेस्ट इजाद कर दिया वरना शायद स्टीव इस अपराध की सजा अब भी काट रहा होता। इस टेस्ट के सहारे स्टीव आधी से ज्यादा सजा काटने के बाद अपनी बेगुनाही साबित कर पाते हैं। 18साल की पीड़ा के बाद स्टीव एवरी खुली हवा में सांस लेने के लिए बाहर आ जाते हैं। उनके साथ तस्वीर खिंचाने वालों में सबसे पहले लोकल नेता और हर सुखद अंत वाली कहानी में अपना हीरो ढूंढ निकालने वाले अमेरिकी, उसे सिर-आखों पर बिठा लेते हैं। स्टीव बाहर आने के बाद अपनी पीड़ा के लिए उस पुलिस डिपार्टमेंट पर हर्जाने का केस करता है जिसने उसे गलत तरीके से फंसाया था। इस मुहिल में राजनेता, सोशल वर्कर और आमलोग सब स्टीव के साथ हैं। बाजी पलट चुकी है। पुलिस महकमा ऊपर से नीचे तक हिल जाता है। हड़कंप का ऐसा माहौल बनता है कि आनन-फानन में तरह-तरह की रिपोर्टें और कमीशन दिखाई-सुनाई देने लगते हैं। सबकुछ काफी भारतीय सा लगने लगता है। अमेरिकी कानून के हिसाब से हर्जाने की लाखों डॉलर की रकम इस केस से जुड़े पुलिस अधिकारियों से वसूलने का आदेश जारी होने का माहौल बनने लगता है। करीने से बनाई इस डॉक्युमेंट्री में अब तक सब कुछ खुशगवार नजर आता है। लेकिन जल्दी ही स्टीव को उसके घर के पास ही हुई एक लड़की की हत्या के इल्जाम में गिरफ्तार कर लिया जाता है। पुलिस महकमा इतनी फुर्ती से काम करता है कि यह एक ओपन एंड शट केस सा नजर आता है। हर सबूत और परिस्थिति चीख-चीख कर जुर्म में स्टीव के शामिल होने की गुहार लगाते नजर आते हैं। सही मायने में यहीं से Making a Murderer यानी एक हत्यारे के निर्माण की शुरुआत होती है। जैसे ही एवरी पर हत्या में शामिल होने की खबर आती ही कैसे एक तथाकथित प्रोग्रेसिव और लिबरल अमेरिकी समाज अपने हीरो से किनारा करने लगता है यह देखना कलेजे को चीरने वाला है। मीडिया की गैरजिम्मेदार और बेहुदा रिपोर्टिंग सिर्फ हमारी ही बपौती नहीं है, अमेरिकी इस मामले में हमारा बढ़ा भाई है। बड़ी खूबसूरती से एक पुलिस अधिकारी जो स्टीव को 18 साल पहले एक इंस्पेक्टर की हैसियत से गिरफ्तार कर चुका है, अब पुलिस महकमे के प्रमुख की तरह उसे कोर्ट के सामने ले जाने के लिए सबूत जुटाने शुरू करता है। पुलिस कुछ भी साबित होने से पहले ही प्रेस कॉन्फ्रेंस करके स्टीव को गुनहगार साबित कर देती है। खबरों का भूखा मीडिया भी टीआरपी की दौड़ में कहानी को सनसनीखेज बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ प्राइम टाइम पर दौड़ाने लगता है। यह प्रेस कॉन्फ्रेंस मुझे अनायास उस प्रेस कॉन्फ्रेंस की याद दिला गई जब जाने-माने आरुषि मर्डर के चंद दिनों बाद ही यूपी पुलिस ने न सिर्फ आरुषी के माता-पिता को गुनहगार करार दे दिया था बल्कि आरुषि के कैरक्टर पर भी सवाल उठा दिए थे। यह डॉक्युमेंट्री दिमाग में एक बात बिठा कर जाती है कि ज्यूरिसपुडेंस (न्यायशास्त्र) की एक सीमा है। फिर वह चाहें अमेरिका में प्रैक्टिस किया जा रहा हो या भारत में। 
 

अमित मिश्र

डॉक्टुमेंट्री में स्टीव के शॉट्स शायद 25 फीसदी हिस्से में ही दिखाए गए हैं लेकिन जेल से उसकी अलग-अलग मौकों पर की गई टोलिफोनिक बातचीत की कमेंट्री मन को झकझोर कर रख देती है। उसकी अपनी मां, बहन, प्रेमिका और फिल्ममेकर से फोन पर की गई बातचीत एक पीड़ित इंसान की मनोदशा का ऐसा बेमिसाल खाका खींचती है कि पीड़ा का पिघला शीशा आत्मा के भीतर उतरता महसूस होता है। यह डॉक्युमेंट्री शायद इसलिए और बेहतर बन पड़ी है कि इसकी राइटर-डायरेक्टर दो महिलाएं लॉरा और मोरिया हैं। डॉक्युमेंट्री में स्टीव की मां, बहन, पत्नी, गर्लफ्रैंड्स और मौत की शिकार लड़की के किरदार और कैरक्टर्स को जिस बखूबी से महिला डायरेक्टरों ने उभार है, शायद ही कोई उभार पाता। यह डॉक्युमेंट्री इस लिहाज से भी देखने लायक है कि कैसे एक हर समाज सही ट्रायल से पहले ही मीडिया रिपोर्टों और पूर्वाग्रहों के आधार पर किसी बेगुनाह को सूली पर चढ़ाने को तैयार हो जाता है। यह अनुभव रोंगटे खड़े करने के लिए काफी है।
नेटफ्लिक्स ने इस डॉक्युमेंट्री को प्रॉड्यूस किया है। इसे बनने में तकरीबन 10साल का वक्त लगा है। 10 एपिसोड की इस डॉक्युमेंट्री को इंडिया में भी नेटफ्लिक्स पर देखा जा सकता है।
आपके मन में एक सवाल तो रह ही गया होगा। आखिर स्टीव का हुआ क्या? बेहतर होगा इसके जवाब के लिए यह बेहतरीन डॉक्युमेंट्री देखें। बस इतना ही कह सकता हूं कि अभी स्टीव की कहानी खत्म नहीं हुई है।
डॉक्युमेंट्री में स्टीव का केस लड़ने वाले वकील की चंद लाइनों से बात खत्म करता हूं।

हमारा इस पर तो कंट्रोल है कि हम कोई अपराध न करें लेकिन इस पर नहीं कि कोई हम पर अपराध करने का इल्जाम लगाए। अगर कभी ऐसा होता है तो बस मैं इतना ही कहूंगा ‘Best Of Luck.’

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