कलाकारों के आरोप- प्रत्यारोप और सरकार के आश्वासन

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हाल में ही संपन्न हुए पटना फिल्म फेस्टिवल पर सुशील कुमार भारद्वाज की रपट- मॉडरेटर 
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बिहार में वर्ष 2016 की शुरूआत फिल्मों के नजरिए से अच्छी मानी जा सकती है. एक महीने के भीतर राजधानी पटना में तीन फिल्म फेस्टिवल आयोजित किए गए और तीनों ही अपने अपने कारणों से अलग स्वरूप में दिखे. पहला पटना फिल्म फेस्टिवल पूर्णतः कला संस्कृति एवं युवा विभाग के तत्वावधान में आयोजित किया गया, जहां एक सप्ताह तक मोना और एलिफिन्स्टन में 28 चुनिन्दा एवं भारतीय पैनोरमा की फ़िल्में दिखाई गई साथ ही साथ फिल्मकारों से साक्षात् बातचीत भी हुए. वहीं मनोवेद फिल्म फेस्टिवल का आयोजन पहली बार पटना संग्रहालय के कर्पूरी ठाकुर सभागार में निजीतौर पर डॉ विनय कुमार के निजी प्रयास से विजय मेमोरियल ट्रस्ट के बैनर तले आयोजित हुआ जिसमें भाषा व क्षेत्रीय विविधता के कारण दर्शकों से दूर सार्थक फिल्मों (खासतौर से मानसिक स्वास्थ्य व अन्य)को आमजन तक लाने की कोशिश की गई. जबकि अधिवेशन भवन में  ग्रामीण स्नेह फाउंडेशन के तत्वावधान में आयोजित बिहार; एक विरासत कला एवं फिल्म महोत्सव 2016” का आयोजन सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों के सहयोग से किया गया. इस फेस्टिवल की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि यह पूर्णरूप से बिहार की सभ्यता- संस्कृति एव कला फिल्म पर केंद्रित थी. सचिवालय परिसर में स्थित अधिवेशन भवन में मुंबई दिल्ली आदि शहरों में रहकर फ़िल्मी दुनियां में परचम फहराने वाले बिहार के बेटे बेटियों का ही जमावड़ा नहीं लगा बल्कि कुछ राष्ट्रीय स्तर के नेताओं, नौकरशाहों एवं बुद्धिजीवियों के मिलन का भी यह साक्षी बना. जहां पूरे परिसर को मिथिला की कलाकृतियों से सजाने की कोशिश की गई वहीं बिहारी पहचान को बिखेरती एक से बढ़कर एक नक्काशी के नमूनों, कपड़ों आदि की दुकानें भी सजाई गई. साथ ही राज्य के नौवों प्रमंडल से प्रतियोगिता के आधार पर चुनकर आए प्रतिभागियों के कलाओं का प्रदर्शन एवं पुरस्कार वितरण भी किया गया. और इन सब से हटकर जो सबसे खास बात रही वह थी बिहारी फिल्मकारों द्वारा बिहार से जुड़ी फ़िल्मी समस्याओं पर खुलकर बोलना एवं कला संस्कृति मंत्री शिव चन्द्र राम द्वारा आश्वासनों की झड़ी लगा देना.
17 मार्च से 20 मार्च तक आयोजित इस चार दिवसीय कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र के दौरान फिल्मकार शत्रुघ्न सिन्हा, शेखर सुमन, नीतू चंद्रा, नितिन चंद्रा, अविनाश दास, चंद्र प्रकाश द्विवेदी, अजय ब्रह्मात्मज, शारदा सिन्हा आदि लोग उपस्थित थे जिन्होंने बिहार की सभ्यता संस्कृति के इतिहास, वर्तमान एवं संभावनाओं पर जमकर बातें कहीं. बिहारी सभ्यता-संस्कृति के गुणगान के बीच शत्रुघ्न सिन्हा ने बिहार, बिहारी के अलावे अपने नए किताब खामोश..की भी चर्चा की. सुबह के सत्र में जहां गूंजाफिल्म दिखाई गई वहीं बाद के सत्र में मिथिला मखानफिल्म का प्रदर्शन हुआ.
18 मार्च को प्रकाश झा की फिल्म सुनहरी दास्तानके बाद बातचीत के दौरान चाणक्य धारावाहिक से जुड़ी कहानियों को सुनाते हुए चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने कहा –“बिहार की पहचान इसके विचारों में है. क्रांति करने की शक्ति में है. बिहारी मतलब अड़ियल, अपनी बातों पर अड़े रहने वाला. यही इसका सकारात्मक पक्ष भी है और नकारात्मक भी.दर्शकों के बीच से एक सवाल उछला कि क्यों नहीं सिनेमा को भी स्कूली पाठ्यक्रम में जोड़ा जाए ताकि माता पिता बच्चों की बातों को समझ उन्हें कुछ हद तक छूट दे सकें जिसके जबाब में उन्होंने फ़िल्म एवं टेलिविज़न क्षेत्र में कार्यरत कलाकारों के वास्तविक संघर्ष की बात बताते हुए कहा कि इस क्षेत्र में हर तरीके के त्याग की जरूरत होती है और कोई भी इंसान व्यक्तिगत प्रतिभाओं के बदौलत ही इसमें टिक सकता है.चक दे इण्डिया से सुर्ख़ियों में आई वैशाली की शिल्पा शुक्ला ने भी इसी सत्र में अपने फ़िल्मी सफर और 18वर्ष की उम्र में पाकिस्तान जाने और अपने परवरिश की बात बताई. साथ ही बिहार केंद्रित फिल्म बनाने की बात भी कही.
बिहार में फिल्म की चुनौतियांसत्र में मनोज वाजपेयी ने भोजपुरी फिल्मकारों को बिहारी संस्कृति को देशभर में बदनाम करने और सरकारी स्तर पर मिलने वाले असहयोग के लिए खूब बोले. जिनमें उनका साथ दिया नितिन चंद्रा, शिल्पा शुक्ला, और आर एन दास ने. जबकि अविनाश दास सिर्फ अपनी मोडरेटर की ही भूमिका में ही रहे. बाद में राज्यसभा सदस्य पवन वर्मा एवं चिल्ड्रेन फिल्म सोसाइटी के सीओ श्रवण कुमार ने भी अपनी बातें रखी. शाम के सत्र में गंगा मैया तोहे पियरी चढैइबोका प्रदर्शन हुआ.
19 मार्च को मिर्च मसालाऔर मांझी द माउंटेन मैनजैसी फिल्मों को बनाने वाले केतन मेहता ने बताया कि जब वे बिहार में शूटिंग के लिए तैयारी कर रहे थे तो किस तरह लोगों ने बिहार के नाम पर डराया था अपहरण हो जाने तक की बातें कहीं. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है. अब यह सब भ्रम दूर हो गया. बेहतर लोकेशन हैं, लोगों का प्यार और सहयोग है. जो दिक्कते आई वे दूसरी जगहों पर भी आती हैं. यहां कई कहानियां हैं जिन्हें फिल्माने की जरूरत है. नयना जागीनफिल्म प्रदर्शन के बाद पर्दे पर कैसा दिखता है बिहारमें चर्चित अभिनेता संजय मिश्रा, अखिलेन्द्र मिश्रा, ऋचा सिंह, शिल्पा शुक्ला आदि ने फिर से भोजपुरी कलाकारों को निशाने पर लिया. चंद्रकांता में क्रूर सिंह की भूमिका निभाने वाले अखिलेन्द्र मिश्रा ने कहा – “बिहार को जाने बिना बिहार पर फ़िल्में बनाई जा रही है. बिहार की कहानियां दिखाई जा रही है लेकिन उसमें बिहार कहीं दिखता नहीं.आँखों देखी और मसान जैसी फिल्मों के लिए पुरस्कृत संजय मिश्रा ने कहा –“ये भोजपुरी वाले अभी तक चोली लहंगा में ही अटके हुए हैं. पूरी संस्कृति का सत्यानाश कर दिया है.आगे उन्होंने कहा कि यदि सरकार सहूलियतें दें तो वे मुफ्त में यहां की फिल्मों में काम करने के लिए तैयार हैं. शिल्पा शुक्ला ने कहा –“यहां बहुत ही सुन्दर गांव हैं. अच्छी शूटिंग की जा सकती है.मिसेज यूनिवर्स साउथ एशिया ऋचा सिंह ने भी सहूलियत मिलने पर काम करने की बातें कहीं. शाम के सत्र में तीसरी कसमफिल्म का प्रदर्शन हुआ.
20 मार्च को अखिलेन्द्र मिश्रा ने जहां बातचीत में बिहार की संस्कृति को नुकसान पहुँचने वाले पर अंकुश लगाने और बेहतरीन फिल्मों के निर्माण के लिए सबके सहयोग की बात कही वहीं संजय मिश्रा, अविनाश दास, प्रवीण कुमार, विनीत कुमार, शिल्पा शुक्ला, संजय झा, केतन मेहता, रेखा झा आदि ने भी सकारात्मक सहयोग एवं माहौल की बातें दुहराई जबकि सिने स्टार और लोकसभा के सदस्य मनोज तिवारी ने आयोजक गंगा कुमार और स्नेहा राउट्रे को धन्यवाद देते हुए कहा कि यदि वे उनके पास फिल्म निर्माण का कोई प्रस्ताव लेकर आएंगें तो वे आर्थिक मदद करने को तैयार हैं.
सभी प्रतिभागियों एवं सम्मानितों को पुरस्कार देने के बाद समापन समारोह में कला संस्कृति मंत्री शिवचंद्र राम ने जब अपना जोशीला भाषण देते हुए शत्रुघ्न सिन्हा, सोनाक्षी सिन्हा से भोजपुरी कलाकार निरहुआ और खेसारी लाल का गुणगान करने लगे. मंत्री जी अपने जिस अंदाज में बोल रहे थे उससे लोगों की आशाएं बढ़ गई लेकिन आश्वासनों की झड़ी में कुछ भी नया नहीं मिला. अपने भाषण में राजगीर में फिल्म सिटी बनने और राज्य में फिल्म नीति बनने की बातें बताई. जहां उन्होंने शीघ्र ही पटना में फिल्म सेंसर बोर्ड के शाखा के खुलने की बात बताई वहीं बिहारी सभ्यता संस्कृति पर केंद्रित और पचहत्तर प्रतिशत बिहारी कलाकारों के साथ फिल्म बनाने वालों को पचास प्रतिशत राज्य से अनुदान देने की बात कही, जो कि पटना फिल्म फेस्टिवल के उद्घाटन समारोह में भी कही गई थी.
फिल्म मांझी : द माउंटेन मैनके प्रदर्शन के बाद समारोह का समापन इस घोषणा के साथ हुआ कि फिर हमलोग 14 नवम्बर 2016 को चिल्ड्रेन फिल्म सोसाइटी की ओर से आयोजित बाल फिल्म समारोह में और ग्रामीण स्नेह फाउंडेशन के तहत आगामी जनवरी फरवरी 2017 में मिलेंगें .
इस तरह कलाकारों के एक दूसरे पर आरोप- प्रत्यारोप और मांगों के बीच बिहारी सभ्यता-संस्कृति पर बहस चारों दिन चलती रही. संभावनाओं के साथ सहयोग से काम करने के वादे होते रहे. और अंत में सरकार की ओर से आश्वासनों की झड़ी लगा दी गई. जिसके साथ ही महीने भर से चला आ रहा फिल्म समारोहों का दौर थम गया.
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