रवीश कुमार की कविताएं

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रवीश कुमार को पढ़ते हुए, सुनते हुए कई बार कि ये मूलतः कवि-ह्रदय हैं. ‘इश्क में शहर होना’ के बाद तो ऐसा बार-बार लगा लेकिन इधर वे कविता के रूप में ही कविताएं लिख रहे हैं. उनसे पूछा तो उन्होंने कहा कि वे ड्रेरित काव्य लिख रहे हैं, जैसे आप लोग प्रेरित होकर कविता लिखते हैं वैसे ही वे वैसे ही वे माहौल से डर कर यानी ड्रेरित होकर कविता लिखते हैं. फिलहाल बानगी के लिए उनकी तीन कविताएं- मॉडरेटर 
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1. 
हज़रात आप ही सरकार
सरकार तो है ही बोकरात
उसके डंडे में ज़ोर है
डंडा खाने के लिए शोर है
जुग कलजुग की घटा घनघोर है
डरपोकों की तादाद बढ़े यही तो
बुलेटिनों में बुलेटिन
नंबर वन बुलेटिन का ज़ोर है
हफ़्तों लोगों ने आँखें फाड़ कर देखा है
वही लेकर आज फिर आया हूँ
तो कमर कस लें और रस लें कि
जन्नत टाइम का समय शुरू होता है अब
मुल्क में टीवी पर जब से हम पर्दानशीं हुए हैं
परिंदों के घर उजड़ गए हैं
पर्दों के परखच्चे उड़ गए हैं
हम ही तो हम हैं, हम नहीं तो उन्हें भी ग़म है
तुम्हारी आँखों के नूर न हो सके, हूरों को भी यही ग़म है
हर तरह का खाद है हमारी दुकान में
वाद विवाद
राष्ट्रवाद
गोबर का खाद
फ़साद वसाद
यहाँ लाद वहाँ लाद
इसे मार उसे मार
यूरिया का खाद
जल्दी डाल जल्दी डाल
तो सुनिये बाहों में बाँहें डाल
मीडिया में भी सैंकड़ों मीडिया
नेशनल मीडिया, लोकल मीडिया
दब्बू मीडिया भोकल मीडिया
प्रिंट मीडिया सरकारी मीडिया
मीडिया में भी एक मीडिया
इसका नाम सोशल मीडिया
जब से मुल्क में जन्नत की तामीर हुई है
सोशल मीडिया उनके चेलों की जागीर हो गई है
फरियाते हैं न सरियाते हैं
दिन भर देखो गरियाते हैं
माँ की गाली, बहन की गाली
बेटी की गाली बीबी की गाली
गाली रसगुल्ला गाली बर्फ़ी हो गई है
गाली गुड़ की खीर हो गई है
रसियाव समझ कर खा लीजिये
पुलाव समझ कर फाँक लीजिये
हर खाते में गाली है, हर गाली का खाता है
योजनाओं में एक योजना है
तहतों में तहत इसके तहत
सबको गालीधन मिलेगा
ट्वीटर पर बंट रहा है
फेसबुक पर बंट रहा है
रहे हैं रही है रहा है रहा है
जोगीरा मत कहो सारा कुछ सारा रा रा है
हुजूर की, हुजूर का,हुजूर के लिए
की का के को समझो अपनी तक़दीर के लिए
गाली जन्नत की नेमत है
बेकारों की तरफ़ से सरकारी बताशा है
मिलेगी रोज़ अब यही एकमात्र प्रत्याशा है
आशा ही झाँसा है और झाँसा भी आशा है
बोलना यहाँ बिल्कुल मना है
बोलने पर हैशटैग की हरकत है
सबके फोलोअर हुए हज़ार
कुछ यहाँ गिरे कुछ वहाँ गिरे
गुल के गुलशन में फ़ूल खिले हैं
कुछ वहाँ गिरे कुछ यहाँ गिरे
तो हज़रात जन्नत टाइम आपका नज़रिया बदल देगा
आपके बदलने का टाइम चला गया
यही बता कर चल देगा
कुछ मंत्र हैं एंकरों के लिए
कुछ तंत्र हैं एंकरों के लिए
इनके चक्कर में रोज़ आया करो
जहालत की जन्नत हुई है यहाँ
तर्कों की क़ब्रों पे जाया करो
हमने चुराई है ये तर्ज भी
तुम न नुसरत को सबको सुनाया करो
भयंकर भयंकर एंकर है
एंकर ही तो भयंकर है
वही नेशनल वही रैशनल
हर एंटी का एंटी है
हर आंटी का अंकल है
कल कल कल कल
हलचल हलचल हलचल हलचल
अलबल अलबल अलबल अलबल
तू नैशल मैं नैंशनल
नेशन में है सब नैशनल
ब्रेक के पहले ब्रेक के बाद
झूम के गाएँ आज की रात
हिन्दू मुस्लिम हिन्दू मुस्लिम
दादरी मालदा दीघा मालदा
डालडा डालडा डालडा डालडा
झाऊं झाऊं कांव काँव
ऊफ वूफ आव वाव
रेलगाड़ी छुक छुक ह्रदय की नाड़ी धुक धुक
जब से जन्नत की तामीर हुई है
हर एंकर की जागीर हुई है
आम आदमी बेकाम आदमी
खास आदमी सौकाम आदमी
ओपिनियन से ही डोमिनियन है
हर स्टेट का अपना स्टेटस है
जो जेल में नहीं है वही तो नेशनल है
कालिया कालिया कालिया कालिया
हर जेल से भागा है कालिया
हर दीवार को फाँदा है कालिया
कालिया नहीं वो माल्या है
आँधी नहीं वो अंधड़ है
गांधी नहीं वो लफंदर है
एंकर एंकर एंकर है
क्रेज़ है इन दिनों क़र्ज़ का
कोई उतार रहा है कोई लेके भाग रहा है
माल्या नाम जपते हैं सब
बाकी पर चुप रह जाते हैं सब
कौन नाम ले उधारियों का
जन्नत टाइम में ब्रेक हुआ चाहता है
ब्रेक के बाद ब्रेक फ़ेल हुआ चाहता है
जाते जाते हम कुछ फ़रमा जाते हैं
हमें ख़त न लिखें हम शरमा जाते हैं
जो छोटे हैं वो तकलीफ़ सहते रहे
जो नहीं सह पाते वो राम राम जपते रहे
जो सह पाते हैं वो सहनशील हैं
बाकी सब ज्वलनशील हैं
ज़रूरी है कि हम सब जेल से डरें
ख़ुदा से नहीं जेलर से डरें
जन्नत के इस दौर में जेल में बहारें आईं हैं
इसलिए आवाज़ उठती है तो न उठायें
घर में रहें जेल न जायें
जेल जाकर आप ठीक हो जायेंगे
जेल चलो जेल चलो
खेल खेल में जेल चलो
ठेल ठेल के जेल चलो
जेल जेल में जेल चलो
जेलर साहब आप तो इसी ज़माने के हैं
हम पढ़े न होते तो लगता ही नहीं
आप अंग्रेज़ों के ज़माने के हैं
2.
मुर्दे लौट आए हैं

आधी रात से पहले के ठीक किसी वक्त में
जब हम मुर्दा हो रहे होते हैं
कुछ मुर्दे लौट रहे होते हैं

10 COMMENTS

  1. कविता को कच्चा माल कहने से पहले इस पंक्ति को एक बार फिर से पढ़िये …
    जो छोटे हैं वो तकलीफ़ सहते रहे
    जो नहीं सह पाते वो राम राम जपते रहे
    जो सह पाते हैं वो सहनशील हैं
    बाकी सब ज्वलनशील हैं

  2. जो छोटे हैं वो तकलीफ़ सहते रहे
    जो नहीं सह पाते वो राम राम जपते रहे
    जो सह पाते हैं वो सहनशील हैं
    बाकी सब ज्वलनशील हैं

  3. पत्रकार से कवि तो बन गये पर मानसिकता वही है।

  4. कहानी की नयी विधा लप्रेक के बाद शायद कविता की नयी विधा ! पर सच में बहुत – बहुत बेहतरीन !!

  5. दूसरी और तीसरी बेहतर कविताएं है ,पहली कविता में पूरा कच्‍चा माल है , आज के मीडिया की बहुत सारी सच्‍चाई , कुछ-कुछ नागार्जुन की मंत्र कविता काा भी असर ,परंतु एक मुकम्‍मल कविता नहीं है

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