देवदत्त पटनायक की पुस्तक ‘भारत में देवी’ का एक अंश

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देवदत्त पट्टनायक हमारे समय में संभवतः मिथकों को आम लोगों की भाषा में पाठकों तक सरल रूप में पहुंचाने वाले सबसे लोकप्रिय लेखक हैं. उनकी नई पुस्तक आई है ‘भारत में देवी: अनंत नारीत्व के पांच स्वरुप‘. यह हिन्दू धर्म में देवी के स्वरुप को लेकर संभवतः पहली पुस्तक है, जिसमें देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रचलित मिथकों के आधार पर देवी के स्वरुप को समझने-समझाने का प्रयास किया गया है. अंग्रेजी से इसका हिंदी अनुवाद मैंने किया है. पुस्तक राजपाल एंड सन्ज प्रकाशन से प्रकाशित हुई है. प्रस्तुत है पुस्तक की भूमिका- प्रभात रंजन 
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भूमिका
यह पुस्तक क्यों

जो हिन्दू विश्व दृष्टि है वह यहूदी-ईसाई विश्व दृष्टि से अलग है. हिन्दू धर्मग्रंथों में मूल पाप की कोई चर्चा नहीं है. पतित हो जाने या पाप मुक्ति का इसमें कोई उल्लेख नहीं है. स्वर्ग के खो जाने के लिए किसी ईव को जिम्मेदार नहीं ठहराया गया. कोई देवता यह वर नहीं देते हैं कि पुरुषों को स्त्रियों के ऊपर शासन करना चाहिए. बल्कि, शक्तिशाली और आदर स्मरणीय देवियों की मूर्तियाँ भी मंदिरों में पाई जाती हैं. फिर हिन्दू समाज पितृसत्तात्मक क्यों है? फिर हिन्दू कानून निर्माताओं ने स्त्रियों को ऐसी कामिनी के रूप में क्यों देखा जिनसे बचने के लिए कहा गया है और ऐसी कर्कशा के रूप में जिनको पालतू बनाया जाना चाहिए?

यह पुस्तक उन कहानियों में जवाब ढूंढने की कोशिश है जिनको हिन्दू पवित्र मानते रहे हैं. सभी पवित्र ग्रंथों की तरह हिन्दू ग्रंथ पूर्वजों की ओर से दिए गए परम आदरणीय उपहार हैं जो लोगों को एक पहचान देते हैं, संस्कृति को एक विश्व दृष्टि देते हैं तथा सभ्यता को एक सन्दर्भ बिंदु देते हैं. ये संस्कारों, आचारों एवं परम्पराओं को एक आधार देते हैं. यह इन चीजों के लिए क्योंबनता है. जैसे लिलिथ, इव, जाएल, जूडिथ, ज़ेज़ेबेल, रूथ, सालोम और मेरी की कहानियों से महिलाओं के प्रति अब्राहमी धर्मों(यहूदी, ईसाई और इस्लाम) के रुख का पता चलता है, उसी तरह पवित्र हिन्दू ग्रंथों से स्त्रीत्व को लेकर हिन्दू दृष्टि का पता चलता है.    
पुरुषत्व से भरे साधुओं के शोरगुल से परे हिन्दुओं का साहित्य ऐसी कहानियों से भरा पड़ा है जो स्त्रैण स्वप्नों से भरे हुए हैं और ऐसे विषयों से भी जिनमें स्त्रियों के क्रोध से जुड़े विषय हैं. ऐसी देवियों की कहानियां हैं जो बच्चों पर कुदृष्टि रखती हैं, ऐसी कामिनियों की कहानियां जो ऋषियों को फुसलाती हैं, ऐसी दिव्य कुमारियों की कहानियां जो जंगलों में खुलेआम घूमती हैं और ऐसी पतिव्रता स्त्रियों की कहानियां हैं जो खुद को चिता में जलाकर स्त्रीत्व के गुणों का प्रतीक बन जाती हैं.

ऐसी भी गाथाएं हैं जो मसिक धर्म के खून से लिथड़ी हुई हैं और ऐसे भी गीत हैं जिनमें वर्जित प्यार की खुशबू है. इन कथाओं के बीच कहीं अनंत हिन्दू स्त्री का दिल धडकता है- भीतरी मन के सपने, उसके कोख का अव्यक्त बोझ.

यह किताब ब्रह्मचर्य, जनन, फरेब और बलिदान की उन कहानियों को फिर से कहती हैं जिन्होंने हिन्दू स्त्रियों को देवी बनाया. इसमें राजकुमारियों, रानियों, वीरांगनाओं, नायिकाओं एवं वेश्याओं की भी कहानियां हैं- वे स्त्रियाँ जो वैसी देवी नहीं हैं- जिन्होंने जम्बुद्वीप में जीवन जिया, प्यार किया और जीवन त्याग किया. कथानक रूढियों से लेकर कथावस्तु और पुरापात्रों के माध्यम से पारंपरिक हिन्दू स्त्रियों को लेकर बेहतर समझ बनाने की कोशिश है जो अपने पति की बायीं तरफ बैठती, लाल रंग के कपडे पहने, जिनको देवी की तरह पूजा जाता था, जिनसे इसलिए डरा जाता था क्योंकि वह कामोत्तेजना भड़काया करती थीं.

इस पुस्तक की प्रत्येक देवी की कहानी की जड़ भारतीय मिटटी में है. सब इसी गर्मी में पके हैं, वर्षा में काँपे हैं. सदियों से, वे सिन्धु घाटी के शहरों में पके; श्यामवर्ण आदिवासियों ने उनको गुफाओं में छिपाकर रखा; द्रविड़ों द्वारा पूजा में चढ़ाये गए फूलों से वे सुवासित रही हैं; आर्यों ने उनको रथों से कुचला है, उन्होंने ब्राह्मणों के हवन कुंड में झुलसी हैं; बुद्ध एवं जैन साधुओं की प्रज्ञा से उनको चुनौती मिली है; जिनको ग्रीक, साईथियन, पार्थियन, हूण एवं गुजरों की तलवार को काटा है; इनको अरबों एवं तुर्कों के पर्दों में घोंटा गया; और आखिर में जिनको विक्टोरिया के पाखंड के कारण शर्मसार होना पड़ा. अधिकतर कहानियां वेदों, तंत्रों, इतिहास(रामायण और महाभारत) और पुराणों से ली गई हैं, साथ ही ये कहानियां देशी भाषाओं के महाकाव्यों एवं लोक की उन लोक गाथाओं से ली गई हैं जिनको हिन्दुओं द्वारा पवित्र माना जाता रहा है. कुछ कहानियां बाली एवं थाईलैंड के हिन्दू ग्रंथों से ली गई हैं. कुछ कहानियां भारतीय आदिवासियों की गाथाओं से ली गई हैं. कुछ कहानियों का सम्बन्ध बौद्ध एवं जैन मत से है जिनकी मान्यताएं भी हिन्दुओं की तरह हैं.

ये कहानियां पांच अध्यायों में विभाजित की गई हैं. पहला अध्याय इस पुस्तक का आधार है क्योंकि इसमें पुरुष प्रमुख का स्त्री शरीर के प्रति प्रतिक्रिया को देखने की कोशिश की गई है. अगले अध्याय में ऐसी कहानियां कही गई हैं जिनमें स्त्री, पृथ्वी एवं मातृ-देवी को उसी भौतिक यथार्थ के विस्तार के रूप में देखा गया है, जो अस्तित्व के लिए आवश्यक होते हैं, इसलिए आदर और धाक के लायक होती हैं. तीसरे अध्याय में, मातृ रूप कामासक्त स्त्री का रूप ले लेती है, कामिनी का, जो सांसारिक सुख प्रदान करती है और पुरुष को जीवन चक्र से बाँधे रखती है. चौथे अध्याय में उन कहानियों को दोबारा प्रस्तुत किया गया है जिनमें धीरे धीरे महिलाओं को ऐसी पतिव्रता स्त्री के रूप में घरेलू बनाए जाने की कहानियां हैं जिनमें चमत्कारी शक्तियों को देखा गया है. अंतिम अध्याय में, विनम्र पत्नी खुद को उग्र और डराने वाली देवी के रूप में पुनर्परिभाषित करती है, जो युद्ध करती है, खून पीती है और मनौती की मांग करती है. 

सभी पवित्र कथाओं की तरह हिन्दुओं की कथाओं को भी कई स्तरों पर देखा जा सकता है. इस पुस्तक में उनको समाजशास्त्रीय, नृतत्वशास्त्रीय, मनोवैज्ञानिक एवं दार्शनिक दृष्टियों से देखने की कोशिश की गई है. किसी भी रूप में यह पुस्तक आधिकारिक या अकादमिक प्रकृति की नहीं है. जिन कहानियों को यहाँ प्रस्तुत किया गया है वे अनुवाद या पुनर्लेखन नहीं हैं; उनको सार संक्षेप रूप में प्रस्तुत किया गया है. विस्तार के बजाय प्रवृत्तियों के ऊपर ध्यान रखा गया है. 

प्रत्येक कथा को उसके अनेक प्रचलित रूपों से निकाल कर प्रस्तुत किया गया है. इसका उद्द्देश्य यह है कि समय मुक्त पांच हजार साल का इतिहास हर कहानी से झांके ताकि वर्तमान और अतीत साथ दिखें. इन कहानियों को कालक्रम के आधार पर रख पाना लगभग असंभव है. यही हिन्दू दृष्टि है- जो था वह जो हैके साथ रहता है और जो हैवह जो होगाउसमें दिखाई देगा. किसी को ख़ारिज नहीं किया जाता. सब कुछ इसमें समाहित है, सतत बनाये रखा गया, उनको रूपांतरित किया गया और उनको विख्यात बनाया गया. सूचित व्याख्या के द्वारा इनको रूपाकार दिया गया है, इनको इस धरती की जीवंत छवि के द्वारा सजाया गया है, लोगों की रुचियों के मुताबिक इनको मसालेदार बनाया गया है. यह किताब हिन्दू परंपरा के गहन अचेतन में घुसने की कोशिश करती है जो कि प्राचीन स्मृति से समृद्ध है और उसमें वह उम्मीदें हैं जो हिन्दू स्त्रियों का घूंघट कुछ और ऊपर उठा देती है, उस भावाभिव्यक्ति का खुलासा करने के लिए जो शायद ही पहले देखी गई हो.

और ऐसा करते हुए मैंने खुद को विनम्रता से यह भी याद दिलाया है कि मैंने यहाँ जिन भी धर्मग्रंथों के हवाले दिए हैं उनको एक पितृसत्तात्मक समाज में एक पुरुष द्वारा लिखा गया है और मैंने जो भी छवियाँ देखी हैं उनका निर्माण पुरुषों द्वारा पुरुष आँखों के लिए गढ़े गए हैं, और इस पुस्तक का लेखक मैं भी पुरुष हूँ. क्या मैं स्त्री के बारे में सच देख सकता हूँ? क्या कोई कभी सत्य देख सकता है?

क्योंकि असंख्य मिथकों के बीच शाश्वत सत्य रहता है. वरुण की हजार आँखें थीं, इंद्र की सौ आँखें थीं और मेरी महज दो.

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