सरकार है या ब्रांड मैनेजिंग कम्पनी?

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सरकार किस तरह से ब्रांड, प्रतीकों के सहारे चल रही है उसका एक रोचक विश्लेषण किया है युवा मीडिया विशेषज्ञ संजय सिंह बघेल ने- मॉडरेटर 
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गुडगाँव का नाम रातोरात बदलकर जिस तरह गुरुग्राम कर दिया गया. यह कोई महज संयोग नहीं है. इसके पीछे के राजनैतिक मंसूबे तभी स्पस्ट हो गए थे. जब भाजपा सरकार ने पार्टी से ऊपर करके “अबकी बार मोदी सरकार” का नारा स्वीकार कर लिया. यह बात भी किसी से छुपी नहीं है कि भाजपा की लगाम जिस अदृश्यमान लेकिन सबको पता शक्ति के हाथ में है उसका मुख्य मकसद रास्ट्रवादी और स्वदेशी सरकार को स्थापित करना है. अनायास नहीं है कि जिस कार्पोरेटस और मीडिया मुग़लों के सहारे सत्ता तक पहुंची भाजपा सरकार, जिस तरह से एक-एक करके अपने छुपे हुए एजेंडे को लागू कर रही है. उससे न सिर्फ कार्पोरेट्स अपितु अब मीडिया भी मुह मोड़ने लगा है. एक तरफ माननीय प्रधानमंत्री जी कार्पोरेट्स घरानों के कर्ज माफ़ तो करते है लेकिन दूसरी तरफ स्वदेशी के नाम पर बाबा रामदेव की पतंजलि जैसी कंपनियों को बढ़ावा देते है. पिछले एक महीने के बार्क (ब्राडकास्ट आडियंस रिसर्च काउंसिल) के आकड़ों पर यदि हम गौर फरमाये तो पता चलेगा की बाबा रामदेव की पतंजलि कंपनी ने विज्ञापन के मामले में सभी बड़े कार्पोरेट्स घरानों के रिकार्ड तोड़ डाले है. जिसमें  से हिंदुस्तान युनिलेवर लिमिटेड, कैडवरी, टाटा, रिलायंस आदि भी शामिल है. तस्वीर का दूसरा पहलू तो इससे भी भयानक है. पहले जाट आरक्षण के नाम को लेकर जिस तरह से हरियाणा को तबाह किया गया. फिर रातोरात नाम बदलकर गुडगाँव से गुरुग्राम कर दिया गया. कार्पोरेट्स और विदेशी कंपनियों को इससे बड़ा झटका कुछ नहीं हो सकता है. मारुति जैसी विदेशी कंपनियां जहा पहले ही गुडगाँव में आगे व्यवसाय करने से हाथ खड़ा कर चुकी है वही नाम बदलने के बाद कई अन्य बड़ी कंपनियां सिलिकान सिटी के अपने अस्तित्व खोने के डर से चिंतित है.

“अबकी बार मोदी सरकार” “अच्छे दिन आएंगे” का स्लोगन देकर सत्ता तक पहुंची भाजपा सरकार एक –एक करके लगातार जिस तरह से ब्रांड प्रतीकों का इस्तेमाल करते हुए आगे बढ़ रही है. यही प्रतीक उसकी सरकार के प्रदर्शन पर प्रश्न-चिन्ह खड़े कर रहे है. कोई स्लोगन देते समय, किसी का नाम बदलते समय अथवा किसी स्थापित प्रतीक चिन्ह का इस्तेमाल करते समय मोदी सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए की जिन प्रतीक चिन्हों को बैशाखी बनाकर सत्ता के सिंहासन तक पहुंचे है. उसका अपना कुछ सिद्धांत भी होता है. यदि उसका बराबर ध्यान नहीं रखा गया तो जितनी तेजी से कोई पहचान बनती है. उतनी ही तेजी से ख़तम भी हो जाती है.

प्रसिध्य ब्रांड विशेषज्ञ लियो बर्नेट के उधार के शब्दों में कहे तो “ब्रांड एक येसा प्रतीक है जो किसी भी वस्तु के बारे में मस्तिस्क में ब्रांड की पहचान के सन्दर्भ में एक तस्वीर खींच दे” हमें यह नहीं भूलना चाहिए जब मोदी सरकार का चुनाव प्रचार चल रहा था और “अबकी बार मोदी सरकार” का स्लोगन बुलंदियों में था तब उसके समनांतर उनकी तस्वीर “विकास पुरुष” और “गुजरात माँडल” के विकास की छवि जनता के सामने प्रस्तुत की गई थी. लेकिन सत्ता में पहुचने के लगभग दो वर्ष बाद भी जिस तरह से विकास का माडल नदारत दिखता  है और सिर्फ नए-नए स्लोगनों, नाम, रंग, प्रतीक बदलने की रणनीति जारी है. इससे मोदी सरकार के विकास माडल पर ही बट्टा लगता दिखाई देता है. आपको याद होगा नब्बे का वह दशक जब दिल्ली की सड़कों पर रेड लाइन बसों का आतंक खूब बढ़ गया था और लोगों द्वारा इसे “हत्यारी बसे” तक घोषित कर दिया गया था. जिसके बदले में उस समय की मदललाल खुराना सरकार ने कोई कार्यवाई न करते हुए उसका रंग लाल से नीला कर दिया था. इससे बड़ा जनता को मूर्ख बनाने का दूसरा कोई उदाहरण नहीं हो सकता. परिणामस्वरूप क्या हुआ. अगले ही चुनाव में मदललाल खुराना को हार का मुह देखना पड़ा और शीला दीक्षित सरकार बनी. जो 15 साल तक रही.

सुशासन और विकास को मुख्य मुद्दा बनाकर जो सरकार सत्तासीन हुई. वह कैसे एक –एक मुद्दे पर फेल होती जा रही है. इसीलिए वह जनता का ध्यान मुख्य मुद्दे से बहकाकर नए-नए प्रतीक गढ़ती जा रही है. जो उसे ही भारी पड़ते हुए दिखाई देते है. इसका कारण ब्रांड प्रतीकों के वायदे को पूरा न कर पाना है. “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” और “सबका साथ, सबका विकास” के स्लोगन का जिस तरह से ट्रीटमेंट मुज्जफरपुर के दंगों और जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, दिल्ली से लेकर एन.आई. टी. कश्मीर तक दिखाई देता है. उसमे कही न कही सरकार के द्वारा ब्रांड की शर्तों पूरा न कर पाना रहा है.
यही हाल कालाधन और मंहगाई के मामले में दिखाई देता है. कालाधन तो सीमित समय के वायदे के अनुसार आया नहीं, अपितु पनामा डायरी और पिछले छय वर्ष की अब तक सबसे न्यूनतम औद्योगिक विकास डर ने सरकार के मुह पर कालिख पोत दी. दाल अबतक के सबसे महगें स्तर तक पहुँच गई. रुपया जिस मरणासन्न अवस्था में पड़ा है. उसकी सुध तो सरकार को है ही नहीं. दाल और रुपया ही मोदी सरकार के इस स्लोगन “बहुत हुई महगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार” को ही मुह चिढ़ाने के लिए काफ़ी है.

ब्रांड के अपने कुछ प्रतीक चिन्ह होते है. जैसे नाम, रंग, आकार, टैगलाइन, स्लोगन आदि. इसमें बदलाव करते हुए मार्केटिंग का सिद्धांत कहता है कि इसके समनांतर यदि किये गए वायदे के अनुसार सेवा नहीं दी जाती तो यही प्रतीक आपके व्यवसाय और लक्ष्य को पलट सकते है. नाम के मामले में गुडगाँव एक मात्र उदाहरण हो सकता है. लेकिन वैश्विक स्तर पर सिलिकान सिटी के नाम पर स्थापित ब्रांड को पलभर में बिना रणनीति के जिस तरह से बदलकर ख़तम कर दिया गया. यह भाजपा सरकार की योजना पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है. आखिर हम भारत को किधर ले जाना चाहते है. इसी तरह बीच में रास्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक मनमोहन वैद्य का संदेश आया की तिरंगे का रंग बदलकर भगवा  कर देना चाहिए. क्योंकि यह सम्प्रदायवाद को बढ़ाता है. उन्होंने आगे कहा कि तिरंगा धर्मनिरपेक्षता का नहीं अपितु कई प्रकार के आतंकवाद का प्रतीक है.

इसी बीच माननीया मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी के मंत्रालय से एक दिन खबर आई कि देश के सभी 46 केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में अबसे 207 तिरंगा फहराया जायेगा. बात यही ख़तम नहीं हुई जे.एन.यु. काण्ड ने पूरे देश को एक येसा स्लोगन दे दिया. जो पूरे देश में दहशत का माहौल पैदा कर दिया. बाहरी दिल्ली के रमेश इन्क्लेव के मदरसे में पढ़ने वाले 18 वर्षीय छात्र मोहम्मद दिलकाश की हड्डी-पसली महज इसलिए तोड़ दी गई, क्योंकि उन्होंने “भारत माता की जय” बोलने से मना कर दिया था.

कहना न होगा कि मोदी सरकार जिस ढ़र्रे पर चल रही है. इसका अंतहीन सच किसी समाधान की तरफ बढ़ता हुआ नहीं दिखाई देता बल्कि एक येसे रसातल की तरफ जाता हुआ दिखाई देता है जिधर जाने से रास्ट्रीय सहिष्णुता, विकास की गति, धर्मनिरपेक्षतावाद और समानता के सिद्धांत के लिए खतरा महसूस होता है. जबकि ब्रांड का सिद्धांत कहता है कि कोई भी ब्रांड प्रतीक चाहे वह नाम हो, रंग हो, आकार हो अथवा स्लोगन हो यदि वहा उपभोक्ता अथवा जनता के मन में कोई सकारात्मक छाप नहीं छोड़ पा रहा है, उनके भीतर किसी नए तरह का उत्साह और जागरूकता नहीं पैदा कर पा रहा है तो वह विफ़ल माना जाता है. येसे में जनता का विश्वास पुराने ब्रांड की तरफ जाना स्वाभाविक है. यह कहना गैर मुनासिब न होगा की यदि येसा ही चलता रहा तो जनता पांच साल तक पहुचते-पहुचते कही यह न कहने लगे मुछे नहीं चाहिए “आपके अच्छे दिन” और यह जिंगल गाने लगे “कोई लौटा दे मुछे बीते हुए दिन, वो …….

 

द्वारा:-
डॉ. संजय सिंह बघेल
(प्रोफ़ेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय)
ए-405, अरुणिमा पैलेस
सेक्टर-4, वसुंधरा, गाजियाबाद
उत्तर-प्रदेश पिन-201012

मोबाइल: 9868593732 

16 COMMENTS

  1. तो, क्या यहूदियों ने लड़ी थी, आजादी की लड़ाई तो मुग़ल काल से चलती आ रही है…. जानकारी दुरुस्त कीजिए,

  2. डाक्टर साहब, नमस्कार|
    क्षमा कीजिएगा, कल थोड़ा रोजी-रोटी के चक्कर में फंसा रहा, सो आपका उत्तर नहीं देख पाया|
    आपने अपने उत्तर में जो लिखा वह आपका अपना मत है, मुझे या किसी को भी इससे कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए| कुछ बातों को लेकर असहमति होती है तो वह भी अच्छी बात है| उत्तम स्वास्थ्य के लिए ‘असहमति की सहमति’ अपरिहार्य होती है, ऐसा मेरा दृढ विश्वास है|
    बस मेरा तो इतना ही कहना है, बौद्धिक अराजकता का जन्म होने का बहुत बड़ा कारण तथ्यों और अंकों का अपनी आवश्यकतानुसार और सुविधानुसार प्रयोग किया जाना होता है| किसी भी घटना को पूर्णता से न देखे जाने पर अर्थ का अनर्थ होने में देर नहीं लगती|
    आपने मुझे अध्ययन करने और अन्धविश्वासी न होने की नसीहत दी है, उसके लिए धन्यवाद| अपनी प्रतिक्रिया में मैंने इसी जजमैंटल होने की प्रवृत्ति की बात की थी| खैर, आपकी बात सही है| अध्ययन जरूरी है लेकिन अध्ययन के साथ साथ विषय को समझने और उसके विश्लेषण में भी सर्वागीणता, जो कि प्राय: तटस्थता और लेखकीय ईमानदारी से ही आती है, वह भी जरूरी होती है; यह आधुनिक विश्लेषकों को भी समझना चाहिए|
    आपका,
    अरविन्दनाभ

  3. अरुण जी. इतना अंधभक्त नहीं होना चाहिए की सोचना बंद करके सूचना के पीछे पड़ जाय. इतिहास के तथ्यों को जानिए फिर मानिए.

  4. मुनमुन जी आप तो ब्रांड और मीडिया के व्यक्ति है. मीडिया की हालत क्या है. आपसे बेहतर कौन जानता है. खासकर आपके दैनिक जागरण के कहने ही क्या. सच को स्वीकार करना सीखना चाहिए. मै किसी की तारीफ नहीं कर रहा बल्कि तथ्य प्रकट किया है.

  5. हिन्दुस्तान की आज़ादी की लड़ाई सिर्फ हिंदुयों ने नहीं लड़ी है. जानकारी दुरस्त कीजिए.

  6. भाई अरविन्द जी, मेरा कोई एजेंडा नहीं. मैंने जो भी लिखा है. पप्लिक पोर्टल पर सब तथ्य उपलब्ध है. यदि आप शोधार्थी है तो मेरी बात को चांज भी सकते है. सोसल मीडिया सबसे सरल माध्यम है जब पूरा मीडिया पेड़ हो और कार्पोरेट के हाथों बिका हुआ हो. थोडा अध्ययन कीजिए अंधविश्वासी मत बनिए.

  7. मुन्ना भइया नाम बदलने से न पहले कोई फायदा हुआ,न अब होगा। 1300 करोड़ रु का गुड़गोबर करने से क्या गुड़गांव की ब्रांड-वैल्यू बढ़ जाएगी और निवेशक खिंचे चले आएंगे? इससे हासिल क्या होगा?

  8. कोमा में शायद आप जैसे भक्तगण थे,जो आपको कांग्रेस के भ्रष्टाचार का इतना भारी विरोध नजर नहीं आया। भ्रष्टाचार के खिलाफ चला अन्ना आंदोलन मीडिया से मिले प्रचार और समर्थन की वजह से ही इतना लोकप्रिय हो पाया था।

  9. कोमा में शायद आप जैसे भक्तगण थे,जो आपको कांग्रेस के भ्रष्टाचार का इतना भारी विरोध नजर नहीं आया। भ्रष्टाचार के खिलाफ चला अन्ना आंदोलन मीडिया से मिले प्रचार और समर्थन की वजह से ही इतना लोकप्रिय हो पाया था।

  10. मुन्ना भइया नाम बदलने से न पहले कोई फायदा हुआ,न अब होगा। 1300 करोड़ रु का गुड़गोबर करने से क्या गुड़गांव की ब्रांड-वैल्यू बढ़ जाएगी और निवेशक खिंचे चले आएंगे? इससे हासिल क्या होगा?

  11. वो सब लोग जो भी मोदी के खिलाफ हैं, या बोल रहे हैं या लिख रहे हैं, मोदी सरकार आने से पहले कोमा में थे क्या ?

  12. मोदी सरकार यदि पुराने नाम को वापस ल रही है तो आपके पेट में दर्द क्यूँ हो रहा है। मुंबई बॉम्बे से बदला। चेन्नई मद्रास से बंगलोरे बंगलुरु हो गया। क्या आज चेन्नई की पहचान नहीं है। मोदी सरकार का विज़न स्पष्ट है। आपको उसको आईना दिखाने की ज़रुरत नहीं। मैं भी ब्रांड को अछे से समझता हूँ। गुरुग्राम को भी ब्रांड बनाने में 1300 करोड़ खर्च होंगे। कुछ दिन में ही यह लोगो की जुबां पर चढ़ जायेगा। नए को कोसना और पुराने की सराहना करना कुछ आलोचकों का पुराना शगल रहा है

  13. अगर हम धीरे धीरे ही सही 900 साल की इस्लामिक और 200 साल की अंग्रेजी गुलामी से बाहर आ रहे हैं तो इसमें किसी को क्या आपत्ति होनी चाहिये|

  14. बुरा मत मानिएगा लेकिन लेख भारत-पाक युद्ध के दौरान रेडियो पाकिस्तान से प्रसारित होने वाले दावों जैसा एकांगी, अधकचरा और अपरिपक्व सा है| एक के बाद एक जजमेंट दिए जा रहे हैं| निराधार बात कही गयी हैं| जैसे –
    "मारुति जैसी विदेशी कंपनियां जहा पहले ही गुडगाँव में आगे व्यवसाय करने से हाथ खड़ा कर चुकी है वही नाम बदलने के बाद कई अन्य बड़ी कंपनियां सिलिकान सिटी के अपने अस्तित्व खोने के डर से चिंतित है"
    अज की दिक्कत यही हो गयी है कि अधिकांश लेखन (विशेष रूप से इंटरनेट के माध्यम से प्रकाशित होने वाला लेखन) प्राय: किसी एजेंडे के तहत लिखा जा रहा है| कुछ पिछलग्गू होते हैं तो कुछ अंध-विरोधी| खैर, सुपठित बुद्धिजीवियों से तो यह उम्मीद की ही जा सकती हैं कि वे न केवल खुद इस चक्रव्यूह से बाहर निकलेंगे अपितु दूसरों को भी बाहर आने में मदद करेंगे|

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