आंसुओं के माध्यम से कही गयी प्रेम कहानी

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फ्रेंच लेखक डाविड फोइन्किनोस के उपन्यास डेलिकेसी’ का एक अंश. यह उपन्यास हिंदी में  ‘नजाकत’ के  नाम  से  राजपाल एंड  सन्ज प्रकाशन से  प्रकाशित  हुआ  है. अनुवाद मैंने किया है- प्रभात रंजन 
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मार्कस की छोटी सी प्रेम कहानी, उसके आंसुओं के माध्यम से कही गई.

सबसे पहले और सबसे बढ़कर, उसके बचपन के आंसुओं को छोड़कर, अपनी माँ और स्कूल में अध्यापिका के सामने बहाए गए आंसुओं को छोड़कर. ये अकेले आँसू थे जिसकी वजह रोमांटिक थी. तो, नैटेली के सामने रोकने की कोशिश करते उन आंसुओं के सिवा, इस तरह के दो मौके और आये थे.

पहले आँसू का सम्बन्ध स्वीडेन से थे, जिसका सम्बन्ध एक युवा लड़की से था जिसका नाम था मर्लिन. बहुत स्वीडिश किस्म का नाम नहीं था, लेकिन निश्चित रूप से मर्लिन मुनरो की लोकप्रियता की कोई सीमा नहीं थी. मर्लिन के पिता सारी उम्र उसके बारे में सपना देखते रहे, और उनको इसे बेहतर कुछ और नहीं लगा कि उसका नाम मर्लिन के नाम पर रख दिया जाए. इस बात के मनोवैज्ञानिक खतरों के बारे में कुछ बात न की जाए कि अपने प्रेम कल्पना के नाम पर बेटी का नाम रख दिया जाए. मर्लिन के पिता का इतिहास हमारे लिए एक तरह से गैर जरूरी था, नहीं?

मर्लिन उत्सुकता जगाने वाली उन औरतों के वर्ग से आती थी जो अपने दिमाग को जानती थी. विषय चाहे कुछ भी हो, वह हमेशा अनिश्चित से विचार रख देती थी. तब भी यह बात आती थी जब उसकी सुन्दरता की बात आती थी: हर सुबह वह चेहरे पर सितारों सा भाव लिए जगती थी. हमेशा खुद को लेकर निश्चिन्त रहने वाली, वह हमेशा पहली पंक्ति में बैठती थी, कई बार वह अपने पुरुष शिक्षकों को अपने हाव भाव के सामने दुनिया की राजनीति के विषयों को भूलने के लिए मजबूर कर देती थी. जब वह किसी कमरे में घुसती थी तो पुरुष उसे देखकर कल्पना में खो जाते थे, और महिलाएँ स्वाभाव वश उससे नफरत करती थी. वह सबकी कल्पना का हिस्सा बन गई थी, जो उसके ही ऊपर पड़ गया. फिर उसको उनके उत्साह के ऊपर पानी फेरने का एक बहुत ही अच्छा ख़याल आया: कि सबसे बेकार लड़के के साथ प्यार किया जाए. जिससे पुरुष परेशान होंगे, और महिलाओं को चैन मिलेगा. मार्कस वह भाग्यशाली था जिसका चुनाव किया गया. बिना इस बात को समझे कि आखिर क्यों जो सारी दुनिया का केंद्र थी वह उसमें रूचि दिखा रही थी. यह कुछ वैसी ही बात थी कि अमेरिकी दिन के खाने पर लिचेंस्टीन को बुलाये. उसने उसको लेकर कुछ अच्छी अच्छी बातें की, यह दावा भी किया कि वह उसकी तरफ खूब देखती थी.

लेकिन तुम मुझे देख कैसे सकती हो? मैं तो कक्षा में हमेशा पीछे की तरफ बैठता था. जबकि तुम हमेशा पहली पंक्ति में.

मेरे गर्दन कि पिछला हिस्सा मुझे सब कुछ बता देता है. मेरे गर्दन के पीछे के हिस्से में आँखें हैं’, मर्लिन ने कहा.

उनकी समझ इस बातचीत से बढ़ी.

एक ऐसी समझ जिसे देखकर सबकी आँखें चढ़ गई. उस शाम सबकी खुली आँखों के नीचे वे स्कूल से साथ साथ निकले. उस समय के दौरान, मार्कस उतना जागरूक नहीं हुआ था. वह जानता था कि वह उतना आकर्षक नहीं था, लेकिन एक ख़ूबसूरत महिला के साथ उसे वह उतना अस्वाभाविक नहीं लग रहा था. उसने हमेशा यह बात सुनी थी, ‘महिलाएँ पुरुषों की तरह से उथले नहीं होते हैं, उनके लिए सुन्दरता का उतना महत्व नहीं होता है. महत्वपूर्ण बात होती थी कि वह सुसंस्कारी हो और मन लगाने वाला.इस कारण वह कई वजहों से बेवकूफ था और उसने अपने दिमाग का नमूना देने का प्रयास किया. जिसमें कुछ सफलता मिली, यह कहा जाना चाहिए; इसलिए उसका फुंसीदार चेहरा एक सुन्दरता की आभा के पीछे छिप गया.

लेकिन यह जादू उस दिन बिखर गया जब सेक्स का मसला आया. मर्लिन ने निश्चित रूप से बहुत से प्रयास किये थे, लेकिन जिस दिन उसने उसके सुन्दर स्तनों को छूने की कोशिश की वह अपने हाथों के ऊपर नियंत्रण नहीं रख सकी और उसकी पांच उंगलियाँ मार्कस के हैरान गालों पर जा पड़ी. वह पीछे मुड़ा शीशे में अपना चेहरा देखने के लिए और अपने गालों पर पड़े लाल निशान को देखकर स्तब्ध रह गया. उसे लाल रंग हमेशा याद रहा और उस रंग को वह ठुकराए जाने से जोड़ कर देखने लगा. मर्लिन ने यह दावा करते हुए माफ़ी मांगी कि उसका हाथ बस भावनावश उठ गया था, लेकिन मार्कस वह बात समझ गया था जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता. कुछ पाशविक और अंदरूनी बात: उसने उसे बद्दुआ दी. उसने उसकी तरफ देखा और रोना शुरू कर दिया. हर शरीर की अभिव्यक्ति का अपना तरीका होता है.

यह पहली बार था जब वह किसी औरत के सामने रोया था.

उसने स्वीडेन से सहायक डिग्री हासिल की और फ्रांस जाने का फैसला किया. उस देश में जहाँ महिलाएँ मर्लिन नहीं होती. अपने पहले रूमानी प्रसंग से उसे दुःख हुआ और उसके भीतर एक तरह का आत्म बचाव का भाव विकसित हो गया. हो सकता है कि वह जीवन में किसी ऐसे रास्ते पर चले जो कि कामुकता का विकल्प हो. उसे पीड़ा से डर लगता था, उसे न चाहे जाने से डर लगता था, उसके पास अपने कारण थे. वह वह अंदर से बड़ा कोमल था, लेकिन उसको इस बात का इल्म नहीं था कि नजाकत जो होती है वह महिलाओं को छू जा सकती थी. तीन साल तक शहरी ढंग का अकेलापन बिताने के बाद, कभी प्यार न पा सकने की हताशा में उसने यह फैसला क्या कि एक स्पीड डेटिंग के सत्र में हिस्सा लिया जाए. उसके पास मौका होता सात महिलाओं से मिलने का और सभी से सात सात मिनट बात करने का. उसके जैसे इंसान के लिए वह बहुत ही कम समय था: उसने सोचा कि उसे कम से कम सौ साल चाहिए जिसमें कि वह किसी महिला को इस बात के लिए मना सके कि वह उसके साथ उसके जीवन के सीमित पथ पर चले. लेकिन कुछ अजीब हुआ: पहली मुलाकात के दौरान उसे कुछ ऐसा महसूस हुआ जो सामान्य था. उस लड़की का नाम था एलिस, और वह एक दवा दुकान में काम करती थी जहाँ वह कभी कभी सौन्दर्य सामग्री की दुकान का काम देखती थी(यह अजीब बात थी कि एलिस नाम की लड़की दवा दुकान में काम करती थी. आम तौर पर एलिस नाम की लड़कियां किताब की दुकानों या यात्रा सम्बन्धी काम में पाई जाती थी). सचाई कहूँ, तो वे दोनों वहां के कार्यकलापों से इतने असहज हो चुके थे कि वे दोनों ही एक दूसरे से सहज हो गए. जिसका नतीजा था, उनकी बातचीत आदर्श रूप से उलझावों से मुक्त थी. तय समय के बाद उन्होंने फिर सात मिनटों की मांग की. जो दिन बन गए, फिर महीने.

लेकिन उनकी कहानी एक साल तक नहीं चल पाई. मार्कस तो बहुत चाहता था लेकिन एलिस उसे पसंद नहीं करती थी. सबसे मार्के की बात यह थी कि वह उसकी तरह उतना आकर्षित नहीं हुआ था. बड़ी विकट स्थिति थी: एक बार वह किसी अच्छी से मिला और उसे उससे बिलकुल ही प्यार नहीं था. क्या हम हमेशा अपूर्ण के लिए अभिशप्त हैं? उनके सम्बन्ध जितने हफ्ते भी चले उसने दम्पति होने के बारे में कुछ सीखें हासिल की. उसने इसकी ताकतों की खोज की प्रेम किये जाने को महसूस किये जाए की क्षमता को समझा. चूँकि एलिस बुरी तरह से प्यार में थी. किसी के बारे में यह जानकारी परेशान करने वाली हो सकती थी कि उसे सिर्फ माँ का प्यार मिला(या शायद वह भी नहीं). मार्कस के बारे में एक बात थी जो बड़ी प्यारी और दिल को छू जाने वाली थी, उसमें एक तरह की आश्वस्त करने वाली क्षमता एवं दिल को पिघला देने वाली कमजोरी का मेल था. और ठीक यही कमजोरी थी जिसने उससे अवश्यम्भावी को करवाया- एलिस को छोड़ देना. लेकिन एक सुबह उसने यही किया. उस युवती की पीड़ा ने उसे स्पष्ट रूप से बहुत गहरे चोटिल कर दिया था. शायद उसकी अपनी पीड़ा से बढ़कर. वह आंसू नहीं रोक पाया, लेकिन वह यह जानता था कि यह फैसला सही था. उसने दोनों दिलों के बीच गहरी दरार बनाकर अकेले रहने को चुना.

यह दूसरी बार था जब वह किसी औरत के सामने रोया.

उसके बाद से करीब दो साल तक उसके जीवन में कुछ नहीं घटित हुआ. वह एलिस को भूलने लगा. विशेषकर तब जब स्पीड डेटिंग के सत्रों में वह उसके बाद गया, जो काफी निराश करने वाले थे- बल्कि कहना चाहिए कि शर्मनाक- जब कोई लड़की उससे बातचीत करने की कोशिश भी नहीं करती थी. जिसका नतीजा यह हुआ कि उसने उनमें और नहीं जाने का फैसला किया. उसने किसी के साथ रहने के बारे में सोचना भी शायद छोड़ दिया था? उस समय उसे उसमें कोई ख़ास रूचि भी नहीं रह गई थी. आखिरकार, लाखों लोग अकेले हैं. वह भी किसी औरत के बिना रह लेगा. लेकिन वह यह बात अपने आपको दिलासा देने के लिए कहता था ताकि वह यही न सोचता रहे कि उसकी अवस्था कितनी दुखद हो गई थी. वह  औरतों के शरीर के बारे में इतने सपने देखता था, और कई बार वह यह सोचने भी लगता था कि उसे यह अब कभी नहीं मिलेगी. कि सुन्दरता को आकर्षित करने के लिए जो पारपत्र(पासपोर्ट) चाहिए होता है वह उसे खो चुका था.

और अचानक नैटेली ने उसे चूम लिया. उसकी प्रमुख और उसके ख्यालों में आने वाली एक स्वाभाविक पसंद. फिर उसने उसे यह समझा दिया कि यह तो कभी था ही नहीं. इसलिए उसे इस बात का आदी हो जाना चाहिए. यह असल में उतनी बड़ी बात नहीं थी. तो भी वह रोया. हाँ, आँसू उसकी आँखों से ढुलक पड़े, और इस बात से उसे हैरानी हुई. अयाचित आँसू. क्या वह कमजोर था? नहीं, बात यह नहीं थी. इससे पहले भी उसकी कई बार बुरी हालत हो गई थी. बात बस यह थी कि वह इस चुम्बन से खास तौर पर हिल गया था; केवल इस कारण से नहीं कि नैटेली सुन्दर थी, बल्कि उसके पागलपन भरे काम के कारण भी. उसे इस तरह से पहले किसी ने नहीं चूमा था, उसके होंठों से बिना मिलने का समय लिए. यही वह जादू था जिससे उसकी आँखों में आँसू आ गए. और अब, निराशा के कड़वे आँसू.
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पेपरबैक में उपन्यास की कीमत 295 रुपये है.        

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