रजनी मोरवाल की कहानी ‘खूबसूरत फूल के लिए’

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रजनी मोरवाल के कहानी संग्रह ‘कुछ तो बाकी है’ के प्रकाशन के बाद से उनकी कहानियों की खूब चर्चा हो रही है. उनकी कहानियां चर्चा के लायक हैं या नहीं आप खुद पढ़कर बताइए- मॉडरेटर
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मुंबई के मौसम का कुछ पता नहीं चलता, बहुत बंकस करता है सब तरफ चिप-चिप, जररा सी झमाझम हुई नहीं की ये इलाका फ़चाफ़च करता है, ली लियांग को बस यही बात परेशान करती है | मुंबई मस्त पण इधर की बारिश पस्त कर देती है” ली लियांग को कॅमलिंग की लाउंज में मच्छरों का आतंक सहना पड़ता है, बूंदें पड़ते ही अक्खा मुंबई मरीन ड्राइव के किनारे भेला हो जाता है…व्होह टेम में मरीन ड्राइव बोले तो सुवर्ग नज़र आता है, कपल्स लोग कईसा फिट होके बैठता है…एकदम मस्त सीन होता है रोमांटिक और चिपका चिपकी वाला |” ली लियांग कुढ़ के रह जाता है, शायद अपने एकाकीपन से या अपने हालातों से पता नहीं पर उसे बहुत गुस्सा आता है इन कपल्स को देख कर |
   कभी-कदार तो ली लियांग को इधर के लोग भी मोइस्ट-मोइस्ट लगते हैं- “मोइस्ट-मोइस्ट ,च्या माईला बोले तो…..जैसे शरीर से गीले और माइंड से थकेले, सब ओर बोले तो भागम-भाग माइला, “जास्ती टेम किसी के पास नईच” ली लियांग सोचता रहता है-
“मई किधर से आया रे बाबा इस शहर में ? कहने को माँ-बाप नहीं, रहने को छप्पर नहीं, कोई सगाच पण नईच अपुन का इस शहर में, कोई पण नैपाली बुलाता है तो कोई चीनी, बस चेंग हीच अपुन को थोड़ी बहोत चाइनीज़ सिखाया, चाइनीज़ बहोत आस्ता से समझ में आईला अपुन को ….चेंग बोलता है मई चाइनीज़ है तो इसके वास्ते मई भी अपुन को चाइनीज़ समझ के रखा है…फेसकट भी तो अपुन का चाइनीज़ लोगों से मिलता-जुलता है, चेंग तो मेरा बाप के माफक लगता है | उसकी चिंगी-चिंगी आँखें भी तो अपुन के माफक ही है …रंग भी तो है सेम-टू-सेम ऐसा कि जैसे फटेला दूध ….” और ली लियांग अकेले में खी…खी करके हंसने लगता है | मरीन ड्राइव से वापिस लौटते वक़्त दाहिने हाथ की तरफ गेलार्ड रेस्त्रां पड़ता है उससे ज़रा आगे चलते रहो तो बाएँ हाथ की तरफ पेवमेंट की रेलिंग से सटकर केमलिंग रेस्त्रां है, ली लियांग बरसों से वहीं डटा हुआ है |
  किउ की माँ भी शायद वहाँ आती रही होगी, उसके पिता का पता नहीं कि वह वहाँ आते थे या नहीं पर जब माँ है तो पिता का होना तो निश्चित ही होगा | उसकी माँ कहाँ से आई थी ? यह तो किसी को नहीं पता किन्तु किसी ने बताया था वह अक्सर मरीन ड्राइव पर घूमती दिख जाया करती थी और कइयों ने तो उसकी माँ को अकेले-अकेले मुस्कुराते भी देखा था | वैसे ऐसा व्यहार व्यक्ति तब करता है जब वह प्यार में होता है …तो क्या किउ की माँ किसी के प्यार में थी ? बहरहाल यह सब जवाब किउ ढूँढे …हमें क्या ? हम तो सिर्फ किउ को जानते हैं उसके परिवार को नहीं | किउ तो फिलहाल किसी से प्यार नहीं करती क्योंकि वह अक्सर सुबकती रहती है, अगर प्यार में होती तो मुस्कुराती ….खिलखिलाती |शरीर में यह जो एक बेरहम सा अंग है न…पेट जिसे कहते हैं,यह किसी को मुस्कराने नहीं देता वह भी बेवजह तो हरगिज़ भी नहीं | ली लियांग जानता है, वह सुबह से शाम तक रेस्त्रां में खटता है और कॅमलिंग लाउंज में पड़ा रहता है, कहने को चेंग उसका सबकुछ है लेकिन उसके एकाकीपन को कौन झेले ? एकाकीपन तो सबका निजी होता है फिर ये एकाकीपन किउ का हो, ली लियांग का या फिर चेंग का, बहरहाल कोई नहीं मुस्कुराता यानिकी फिलहाल कोई भी किसी के प्यार में नहीं है |
  ट्रे उठाकर पास से गुजरते हुए ली लियांग ने कोने की मेज़ पर बैठी किउ को देखा जो उस वक़्त अकेली ही वहाँ बैठी थी | आमतौर पर व्यवस्थित रहने वाली किउ के काले रेशमी बाल आज बेतरतीब­-से फैले थे | माथे पर ढुलक आई लटें बाँई ओर के गाल पर से होती हुई एक तरफ से होठों को छू रही थी जैसे जानबूझ कर उन्हें इस प्रकार से गिरने के लिए ढीला छोड़ दिया गया हो | ली लियांग को चिढ़-सी हुई | अगर ये लड़की उसकी कौम की न होती तो वह उसे कभी इस रेस्तराँ में घुसने न देता | मगर कैसे ? रेस्तराँ तो चेंग का है वह तो यहाँ वेटर मात्र है | वेटर जो सिर्फ वेट करता है लोगों के बार-बार कन्फ्युज होते मेनू को देखकर अथवा उनके अजीबोगरीब ऑर्डर के इंतज़ार में…कभी-कभी खाना सर्व करने में देरी हो जाए तो उसे बिल  में फेरबदल का वेट करना पड़ता है कई मर्तबा जब सैफ की गलती से मेनू में परिवर्तन हो जाए तो ली लियांग ढीठ बन जाता है और उनकी झिड़कियों का वेट करता है | हाँ, टिप उसे जरूर सुहाती है जब सौंफ और मिश्री की तश्तरी के साथ-साथ वह टिप के पैसे उठाता है न तो बिन खाए भी सौंफ और मिश्री की मिठास उसकी जुबान ना….ना…उसकी जेब में घुल जाती है और वह गदगद हो उठता है | वह इस मुंबई शहर में अपनी एक खोली लेना चाहता है, वैसे उसने एकाध जगह बात भी कर रखी है पर उतने ढेर सारे पैसे जो उसके पास इकट्ठे नहीं हुए …कभी ना कभी तो होंगे, इसी उम्मीद पर मुंबई की दुनिया कायम है और मुंबई में कदम रखने वाला हर शख्स इसी सपने को साधे अपना दम फुलाए रहता है सो ली लियांग भी क्या अनूठा कर रहा था ? 
  ली लियांग को आज भी याद है बरसों पुरानी वह रात, जब कड़ाके की सर्दी से बचने के लिए वह इस रेस्तराँ के बाहर आ दुबका था | ड्रैगन का आकार लिए लाल रंग की बड़ी-सी लालटेन के नीचे  उसने कुछ गर्मी महसूस की थी वह राहत पाकर वहीं ठिठक गया था | ऊपर देखा तो अंग्रेजी और चाइनीज भाषा में लिखा था कॅमलिंग | मुंबई जैसे महानगर में महीनों भटकते रहने के बाद इस चाइनीज रेस्तराँ को देखकर आज उसे कुछ अपनापन-सा लगा था और वह सीढ़ियों के कोने पर ही दुबक कर सो गया था | अगली सुबह रेस्त्रां का गेट खोलते हुए चेंग ने टोर्च की रोशनी उसके मुँह पर मारी थी “कौन है वहाँ ?”चेंग ने कडकदार आवाज़ में पूछा था डर के मारे उसकी चीनी आँखे और भी मिचमिचा गई थी, उसकी घिग्घी बंध आई थी और वह सिकुड़ कर लाल प्लास्टिक वाले डिवाइडर के पास जा सटा था जैसे वह अदृश्य हो जाना चाहता हो | कई दिनों से भूखे-प्यासे भटकते रहने की वजह से उसकी आंतों में अकुलाने की अजीब-अजीब सी आवाज़ें आ रही थीं और एक आवाज़ उसके दिमाग में भी हथोड़े मार रही थी वह थी भूख….भूख और वह लगभग बेहोश हो चुका था | किन्तु यही कहानी चेंग की अनुपस्थिति में वह अपने नए दोस्तों को नए अंदाज़ में पूरे आत्मविश्वास से सुनाता है “जैसेच चेंग ने फुल्ल बत्ती मारी थी टोरच की मेरे मुंह पे, मैं ज़रा नहीं घबराया था, क्या करता जास्ती-जास्ती चेंग मेरे को भगा देता …मई बिलकुल खौफ नहीं खाया था उस टेम भी जब मई दस बरस का छोकराइच था ….अब चेंग को मेरे जरूरत थी इस वास्ते व्होह मेरे को उठाके सीने से लगाया, मेरे जैसा वफ़ादार छोकरा उस को किधर से मिलेंगा ?व्होह मेरे को अपने सगा बेटा के माफक प्यार करता है मालूम ?
  चेंग बड़ा दयालु व्यक्ति है, उसने ली लियांग को घर वापस पहुँचाने का भरसक प्रयत्न किया था | घर के बारे में ली लियांग को कुछ अता-पता ना था | उसे याद था तो जमाने की ठोकरें , बदन पर चिथड़े और पेट की अग्नि जो जाति, नस्ल, रंग और नाम को जलाकर राख़ कर देती है, एक पेट ही तो था जो पूरी देह में उस वक़्त सर्वोपरि था उसके लिए | जब चाइना टाउन और चाइना गेट से लेकर मुंबई की अन्य चायनीज बस्तियों में भी ली लियांग का कोई रिश्तेदार ना मिला तो चेंग ने उसे अपने ही रेस्त्रां में वेटर रख लिया था | तभी से “कॅमलिंग” ही ली लियांग का पता-ठिकाना बन गया है | चेंग को वह पिता स्वरुप मानता है और “कॅमलिंग” पर अपना अधिकार समझता है इसीलिए जब किउ जैसी लड़कियाँ इन लड़कों के साथ यहाँ आती हैं तो वह  चिढ़ उठता है, खासतौर पर किउ से | हँसती इठलाती किउ की टेबल पर जब कभी वह खाना सर्व करने जाता है तो एक घूरती हुई नज़र उसके साथ बैठे हुए लड़के पर जरूर डालता है | कभी-कभार तो उसका मन करता है कि वह गर्मागर्म खाना इन लड़कों पर गिरा दे या फिर इन लड़कों को जमकर पीट डाले | ली लियांग मन-ही-मन उन्हें बिगड़े शहज़ादे कहता था | अक्सर ये लड़के उसी के हम उम्र होते थे | “इनके पास ऐसा क्या है जो मेरे पास नहीं ? बस पईसा है और प्यार का क्या ?….व्होह तो किधर है ? सब स्याला….पेनचौभ…..बिगड़ैल औलादें हैं, इनपर रईसी का नशा है जो जवानी की पेंट में फूटता है फिर ज़िप से उछलकर बाहर कूदने पर उतारू हो जाता है, पण किउ यह सब क्यों नहीं समझती ? या समझती है तो मुकर क्यों नहीं जाती इस गलीच जीवन से ? किउ कैसे सूरजमुखी-सी पीली पड़ गई है बेचारी |”  
   किउ हमेशा कार से उतरकर कोने वाली मेज़ पर बैठ जाती थी जहाँ अपेक्षाकृत अधिक अँधेरा रहता है | शायद अपने ग्राहकों के पैरों में पैर डालकर बैठने में उसे हाँ सुविधा होती होगी | मगर जब भी उसका कोई ग्राहक उसे ‘किस’ करने के लिए आगे बढ़ता है तो किउ ‘किस’ करने से पहले एक बार वह आस-पास ज़रूर देख लेती थी, ज़्यादातर तो वह अपनी हथेली आगे बड़ा देती थी और यदि ग्राहक ज्यादा चिपकू निकले तो वह खिसियाकर अपना गाल उसके आगे कर देती थी | ली लियांग ने नोटिस किया था कि किउ  अक्सर अपने होंठ बचा लेती थी | इसी कारण से ली लियांग को लगता था कि शायद किउ इस धँधे में मजबूरी के तहत आ फँसी होगी | “गंदा है पण धंधा है …क्या करेगी व्होह ? ज्यासती पढेली होती तो किधर क्लार्क लग जाती, पण इस मुलुक का रेशेन कारड़ किधर से लायेंगी बिचारी ? उसका भी केस अपुन के माफक हिच तो है |”
  ली लियांग को ऐसे लड़कों से सबसे ज्यादा चिढ़ तो तब होती है जब वे किउ के साथ  सिर्फ़ वक़्त गुजारने के लिए हर आधा-आधा घंटे में खाना आर्डर करते रहते हैं फ़िर पूरा का पूरा खाना टेबल पर छोड़कर चले जाते हैं | इतने महँगे खाने को इस तरह बर्बाद होते देखकर वह खीज उठता है | कितने लोगों का पेट भर सकता है इस बचे-खुचे खाने से मगर छोड़े हुए खाने की जगह सिर्फ़ डस्टबिन ही रह जाती है | हाँ, ऐसे लोग टिप तगड़ी छोड़ जाते हैं, जिन्हें वह बुरे वक्तों की अमानत समझकर जेब में ठूँस लेता है | चेंग के पास टिप की एक तगड़ी रकम भी बचत के तौर पर उसने जमा करवा रखी है |
  उस रोज़ माजरा कुछ अलग ही था | किउ अकेली बैठी थी और उसने सिर्फ़ एक कप कॉफी मँगवाई थी |  दो घंटे पहले मँगवाई गई कॉफी भी अब तक पड़ी-पड़ी ठंडी हो चुकी थी | वह न जाने किन ख़्यालों में गुम थी | ली लियांग ने उसकी मेज़ पर जाकर पूछा था– “आपको कुछ ओर मंगता है क्या  मैडम ?” किउ ने अचकचाकर उसे ऐसे देखा था जैसे वह गहरी नींद से जागी हो और इसी हड़बड़ाहट में उसके गालों पर बड़े यत्न से सहेजी गई बालों की लटें हवा से उड़ गई थी, बालों के हटते ही उनके भीतर करीने से छुपाया ज़ख़्म व सूजी आँखें भी ली लियांग को नज़र आ गई थी | घबराहट छिपाने के लिए किउ ठंडी कॉफी ही सिप करने लगी थी | ली लियांग को किउ पर दया आ गई थी और वह पूछ बैठा था “कोई परेशानी है मैडम, कोई लफड़ा हुआ क्या ?” किउ उसकी तरफ देखकर सिसक उठी थी

8 COMMENTS

  1. धन्यवाद प्रीता जी,अविनाश जी व शोभा जी । आप सभी ने कहानी को इतनी गहराई से पढा व समझा कि लिखना सफल हुआ समझिए । आभार ।

  2. भिन्न परिवेश से आए पात्र को उसकी भाषा रिवाजों के साथ भावपूर्ण कथ्य को रोचक शैली मे बयां करना निस्संदेह रजनी सखी की कामयाबी है । निरंतर ऊंचाइयों पर चलती रहो । बधाई रजनी

  3. बेहद सधी हुई भाषा में एक जीवंत चरित्र को कुशलता के साथ उकेरा है रजनी जी ने। कहानी सीधे पाठक से संवाद करती है। मन को छू लेने वाली इस बेहतर कहानी के लिए रजनी जी को साधुवाद।

  4. धन्यवाद सर आपकी इस लघु समीक्षा से मेरा लिखना सफल हुआ साथ ही भविष्य के लिए एक दिशा मिली । शुक्रिया इस प्रोत्साहन हेतु ।

  5. मुंबई के माहौल को सजीव साकार करती बेहद खूबसूरत कहानी रची है रजनी मोरवाल ने। आश्‍चर्य हैै कि एक बिल्‍कुल भिन्‍न जीवन-शैली वाले चीनी चरित्रों के चित्‍त को वे कितनी बारीकी से और संवेदनशीलता से उकेर सकी हैं। निस्‍संदेह यह कहानी उनकी बाकी कहानियों से बिल्‍कुल अलग रंगत की है और बहुत गहरा प्रभाव उत्‍पन्‍न करती है। रजनी को इस खूबसूरत कहानी के लिए बधाई और शुभकामनाएं।

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