नामवर सिंह का सम्मान हिंदी का सम्मान है!

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मुझे याद आ रहा है कि एक बार ‘कथादेश’ पत्रिका के एक कार्यक्रम में उत्तर-आधुनिक विद्वान सुधीश पचौरी ने नामवर सिंह को हिंदी का अमिताभ बच्चन कहा था. आज नामवर सिंह के 90वें जन्मदिन के दिन यह कथन याद आ रहा है तो यह भी याद आ गया कि चाहे अमिताभ बच्चन हों या नामवर जी दोनों को उनका उचित सम्मान भगवा शासन काल में ही मिला. जबकि दोनों का भगवाधारियों से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं था.

जिस तरह से जगदीश्वर चतुर्वेदी और कुछ अन्य विद्वान् इस बात का स्यापा कर रहे हैं कि भाजपा शासनकाल में किसी संस्था द्वारा नामवर सिंह का जन्मदिन क्यों मनाया जा रहा है. वे शायद यह जानना भी नहीं चाहते कि इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र हिंदी के विद्वानों का सम्मान करती रही है. उसकी एक राष्ट्रीय व्याख्यानमाला आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के नाम पर हर साल आयोजित की जाती है. अगर वह संस्था नामवर जी का जन्मदिन मना रही है तो इसके ऊपर आपत्ति क्यों होनी चाहिए? नामवर जी हिंदी की सबसे बुलंद इमारत हैं क्या उनके जन्मदिन को कम से कम हिंदी सेवी संस्थाओं को उत्सव की तरह नहीं मनाया जाना चाहिए?

न जाने कितनी संस्थाएं नामवर जी ने बनाई, कितनी संस्थाओं में उन्होंने कितने लोगों को पहुंचाया- आज किसी को नामवर जी की याद आती है? भगवा का डर दिखाकर सेक्युलर सेक्युलर का खेल खेलने वाले कुछ तथाकथित सेक्यूलरवादियों से वे बहुत बड़े हैं. वे कभी इस नेता या कभी उस नेता से सेक्युलर राजनीति में अपना हिस्सा मांगने के लिए नहीं जाते. उनके दीर्घ जीवन में ऐसा कोई उदहारण नहीं मिलता.

क्या यह बड़ी बात नहीं है कि नामवर जी रचनात्मक लेखक नहीं हैं, वे एक अध्यापक-आलोचक रहे लेकिन हिंदी समाज में सभी धडों में जैसी व्याप्ति उनकी रही वैसी शायद ही किसी की रही. मुझे याद आता है जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में पढने आया था. पहली छुट्टी में जब मैं घर गया तो मेरे एक चाचा ने, जो रेलवे में स्टेशन मास्टर थे, मुझसे पूछा कि जेएनयू में नाम लिखाया कि नहीं. मैंने कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय में. उन्होंने थोड़ा दुखी होते हुए कहा था दिल्ली में हिंदी पढने गए हो तो नामवर सिंह से पढना चाहिए था.

नामवर सिंह होना इतना आसान नहीं होता. पिछले 30 सालों में मैंने बहुत विद्वानों को नामवर सिंह होने की कोशिश करते देखा. कई लोगों ने सत्ता उनसे अधिक हासिल कर ली लेकिन वह व्याप्ति कहाँ से लाते? मोदी के खिलाफ दो कविता लिखकर सेक्युलर होने के इस दौर में नामवर सिंह का महत्व समझ में आता है. यह विडंबना भी कि हिंदी में आपका व्यक्तित्व कितना भी बड़ा क्यों न हो? आपने कितने भी बड़े बड़े काम क्यों न किये हों? आपने कितने ही लोगों का ‘कल्याण’ क्यों न किया हो? जब तक आप सत्ता में रहते हैं तभी तक आपकी पूछ रहती है. नामवर सिंह इसके अपवाद हैं. वे हिंदी की सबसे बड़ी सत्ता हैं. आज भी उनके सर्टिफिकेट के लिए सब लालायित रहते हैं. नामवर जी का जन्मदिन एक विराट साहित्यिक उपस्थिति का उत्सव है. उनके होने में हमारा होना है.

जैसे सुपरस्टार तो बहुत हुए लेकिन कोई दूसरा अमिताभ बच्चन नहीं हो सकता उसी तरह बहुत से सत्ताधारी वाजपेयी, पुरुषोत्तम, पचौरी हुए लेकिन इनमें से कोई भी नामवर जी की परछाईं तक भी नहीं पहुँच सका, नहीं पहुँच सकते.

इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र की यह पहल ऐतिहासिक है कि उसने हिंदी के सबसे बड़े आइकन के 90 साल के होने को उत्सव की तरह मनाने का निर्णय लिया है. क्या हमें अपनी भाषा के सबसे बड़े पोस्टर बॉय का जन्मदिन राष्ट्रीय उत्सव की तरह नहीं मनाना चाहिए? या उनको ढेलमरवा गोसाईं की तरह पत्थर मारने चाहिए!

नामवर के होने में हमारा होना है! उनका सम्मान हमारा सम्मान है. कुछ कद. कुछ व्यक्तित्व राजनीति से ऊपर होते हैं, होने चाहिए. कृपया उनको अपनी अवसरवादी राजनीति के नजरिए से नहीं देखिये!  

1 COMMENT

  1. एक बार झंकार में पढ़ा था इनके बारे में पर अाज इनकी आभा का अनुमान हो गया

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