प्रेमचन्द के नाम शहरी बाबू की पाती

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धर्मग्रंथों के बाद हिंदी में सबसे अधिक उनकी रचनाएँ पढ़ी गईं और धार्मिक कथा-लेखकों-कवियों के बाद वे हिंदी समाज के सबसे अधिक समादृत लेखक हैं. मुझे उनके लेखन से अधिक उनका लेखकीय व्यक्तित्व प्रभावित करता है, प्रेरित करता है. वे कुछ और नहीं थे लेखक थे, प्रेमचंद लेखन  के माध्यम से कुछ और हासिल नहीं करना चाहते थे लेखन को ही जीना चाहते थे. प्रेमचंद ने सिर्फ 56 साल का जीवन जिया लेकिन लेखन, संपादन के क्षेत्र में वे जो रच गए हिंदी आज तक उस हद से बाहर नहीं निकल पाया है. वे साधारण के सबसे असाधारण लेखक थे. आज प्रेमचंद की जयंती पर नॉर्वेवासी डॉक्टर-लेखक प्रवीण कुमार झा ने उनको अपने निराले अंदाज़ में याद किया है- मॉडरेटर 

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कब शहरी बाबू बन गया, खबर ही न हुई। सालों बाद जब हवेली के बाहर स्कोर्पियो लगाई, आँखें रामधन मल्लाह को ढूँढ रही थी। अब तो वो आँवला का पेड़ भी नहीं रहा जिसके नीचे हम गुल्ली-डंडा का खेल खेलते। एक दिन हल्कू बढ़ई ने चौखट की बची-खुची लकड़ी से अंग्रेजी बैटभी बना डाला, और हम क्रिकेट खेलने लगे। खेलने क्या लगे, हम बस गेंद फेंकते और रामधन बैट घुमाकर छक्के-चौके मारता। बभनटोली के सारे लड़कों के छक्के छुड़ा दिये थे इस मल्लाह ने।
कहते हैं मियाँदाद के छक्के के बाद चेतन चौहान कभी ठीक से खेल नहीं पाए। मैं भी कभी ढंग से क्रिकेट नहीं खेल पाया।
“कहाँ है आजकल ये रामधन मल्लाह?”
“जब से दारूबंदी हुई, पड़ा रहता है ताड़ीखाने में।”
“कल भेजना। कहना डॉक्टर साब क्रिकेट खेलेंगे।”
आपने प्रेमचंद पढ़ा हो या न पढ़ा हो, खेल का हश्र आपको पता ही होगा। रामधन गेंद डालता रहा, और मैं डिविलर्स की तरह चहु-दिशा में छक्के मारता रहा। शौकिया समाजवादी हूँ। पैरों के नीचे गर्दन दबाने का शौक नहीं। रामधन है कि खामख्वाह सहला रहा था। मेरा मन बहला रहा था। मैनें भी खुश हो कर १०० रूपये पकड़ा दिये। खबर मिली अगले दिन जुए में हार गया।
रामधन तो खोटा सिक्का निकला। यादवों का वर्चस्व आया, तो फगुनी यादव की भैंस पर इनवेस्टमेंट की सोची। दूध के कारोबार में सुना था खरा नफा है। पर भैंस बँधेगी कहाँ, और हिसाब कौन रखेगा? दद्दा अड़ गए, ब्राह्मनों के बथान में गाय जितनी बाँधनी है बाँध लो, भैंस न बँधेगी। दखिनटोली श्राद्ध में अभी-अभी गोदान हुआ है, गाय तैयार है। फगुनी को कह दो, गाभिन कराकर दूध का धंधा कर ले। बड़ी मिन्नतें करी, पर फगुनी का गाय में कोई इंटरेस्ट नहीं। गोबर ज्यादा दे, दूध रत्ती भर नहीं। बड़ी मगजमारी है।
“कहो तो गोदान की गाय ठुकरा दी फगुनी ने! पंचायत लगा कर हुक्का-पानी बंद करा दूँ?” दद्दा भड़के।
“अरे क्या बंद कराओगे? फगुनी का बेटा गाँव की चमकी को भगा ले गया शहर, तब तो कुछ न कर पाये! हाथ पर हाथ धरे रह गए।”
“हाँ जी। छोड़ो, कौन बेइज्जती कराए? यादवों का ही तो राज है।”
प्रेमचंद के फौलोवरलोगों! होरी भी कैपिटलिस्ट और मॉडर्न बन गया। गाय और भैंस में फर्क समझने लगा। कौन गोबर ज्यादा देती है, और कौन दूध? ऊपर से भैंस की कोई सर्वेलेंसभी नहीं। जहाँ मरे, वहीं त्याग दो।
फगुनी यादव और उसके बेटे से मुझे कोई शिकायत नहीं। मेहनत की कमाते हैं, और आज भी मॉडेस्टसलाम ठोकते हैं। चमकी को भगा तो ले गया, पर रानी बना कर रखता है।
दूबे जी के बेटे को देखो, पूरा डुप्लीकेट। झूठे तगमे दिखा कर सिंह जी की बेटी फांस लाया। अपूर्व सुंदरी और पिता की अकूत संपत्ति की इकलौती वारिस। हाकिम बोल कर फाँसा, और है बैंक में किरानी। प्रेमचंदजी की कसम, अब गबन न करे तो क्या करे भला? मासिक वेतन से क्या होगा? आप ही न कहते थे, वो तो पूरनमासी की चाँद की तरह घटता जाता है। खूब लूट-पाट मचाई, विजिलेंस दरोगा पकड़ कर ले गया। सिंह जी की बेटी सिंहनी बन गई थी।
“मेरे पिता के चार पेट्रोल पंप हैं शहर में। बड़े-बड़े हाकिम सलाम ठोकते हैं। तुम्हें क्या पड़ी गबन करने की?”
“तुम्हें सुख देना चाहता…” दूबे बुदबुदाया।
“अरे भाड़ में जाए ऐसा सुख!”
अब बड़े घर की बेटी की बात ही कुछ और है। बाप से फोन घुमवाया। दूबे बाहर। अब तो बड़ा बाबू बन गया है, पे कमीशन के एरियर से सुना है, बड़ा बंगला बनवा लिया।
सारांश ये है, जो मिले उसी में खुश रहो। मेरे बाबू जी कहते हैं, ज्यादा फुर-फाँय मत करो। हम भी पिछले मैरेज-एनिवर्सरी में चिमटा गिफ्ट कर आए। मुँह फुलाए बैठे हैं।

6 COMMENTS

  1. बहुत सुन्दर सामयिक प्रस्तुति
    प्रेमचंद जी को नमन!

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