रविकांत की किताब और उनकी भाषा लीला

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मीडिया की भाषा-लीला– यह इस साल की सबसे सुसज्जित पुस्तक है. प्रकाशक वाणी प्रकाशन है. रविकांत की यह हिंदी में पहली प्रकाशित पुस्तक है. महज इससे रविकांत का महत्व नहीं समझा जा सकता है. पिछले करीब तीन दशकों में इतिहासकार रविकांत ने दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी पढने वाले विद्यार्थियों को जितना प्रभावित किया उतना शायद हिंदी के किसी प्रोफ़ेसर ने भी नहीं किया. इस दौरान हिंदी के जितने युवाओं ने हिंदी में अलग ढंग से काम किया वे सब किसी न किसी रूप में रविकांत से प्रभावित रहे. यह एक सच्चाई है. मैं खुद भी उन प्रभावित होने वाले लेखकों में रहा हूँ.

रविकांत मूलतः इतिहासकार हैं. इस पुस्तक में मूलतः सिनेमा की भाषा और उसको प्रभावित करने वाले कारकों का ऐतिहासिक मूल्यांकन करने वाले कुछ लेख हैं. रविकांत ने हिंदी सिनेमा के इतिहास के ऊपर इतिहास विभाग से पीएचडी की है लेकिन यह किताब उनका शोध प्रबंध नहीं है. बल्कि पुस्तक में उस शोध के दौरान उन्होंने सिनेमा, उसकी भाषा को लेकर कुछ अलग-अलग लेख लिखे थे उसको एक साथ संकलित किया गया है. लेखक ने सिनेमा और रेडियो की भाषा और उसके ऊपर साहित्य के प्रभावों, भाषा के बदलते रूपों को लेकर भूमिका में विस्तार से उल्लेख किया है. हिंदी सिनेमा की ऐतहासिक पृष्ठभूमि को समझने के लिहाज से ‘मीडिया की भाषा लीला’ की भूमिका पढने लायक है.

लेखक की चिंता के केंद्र में सिनेमा की, माध्यमों की भाषा है- हिंदी-उर्दू का द्वंद्व. आज हिंग्लिश भाषा का सिनेमा में जोर है लेकिन लेखक ने अपने एक लेख में यह याद दिलाया है कि असल में हिंदी की आड़ में उर्दू के ऐतिहासिक वर्चस्व को हम नजरअंदाज कर रहे होते हैं. इसलिए पुस्तक में लेखक ने उर्दू की उस ऐतिहासिक भूमिका को अपने लेखों के माध्यम से समझने की कोशिश की है. मेरे ख़याल से दो उदाहरन इस सन्दर्भ में दिए जा सकते हैं. हिंदी सिनेमा के सर्वकालिक महान अभिनेता दिलीप कुमार अपनी फिल्मों में खालिस उर्दू में संवाद बोलते रहे और तो वे भी सबसे लोकप्रिय अभिनेता रहे. इसी तरह हिंदी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय गीतकार साहिर लुधियानवी रहे, जिनके बारे में यह कहा जाता है कि वे सिनेमा में उर्दू शायरी को लेकर गए और उन्होंने उसको स्थापित भी किया. बहरहाल, लेखक ने अपने लेखों में उर्दू के खालिस शब्दों का जमकर प्रयोग किया है. ऐसा लगता है रविकांत हिन्दुस्तानी भाषा के रूप के नहीं बल्कि देवनागरी में उर्दू लिखने के हामी हैं. भाषा को लेकर उनका दृष्टिकोण बहसतलब है.

किताब में दो लेख ऐसे हैं जिनसे बचा जा सकता था. एक लेख मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास ‘कसप’ की भाषा को लेकर है. दूसरा लेख ‘हिंदी वेब जगत: भविष्य का इतिहास’ है. यह लेख वेब पर बरती जाने वाली शुरूआती हिंदी को लेकर है. अब इन्टरनेट पर हिंदी बहुत विकसित हो चुकी है. बहरहाल, इन्टरनेट पर हिंदी के शुरूआती प्रयासों को लेकर यह लेख ऐतिहासिक प्रकृति का है.

पुस्तक में कुल सात लेख हैं. एक लेख सिनेमा की पत्रिका ‘माधुरी’ को लेकर है. जो सिनेमा और साहित्य के अंतर्संबंधों को समझने के लिए बहुत उपयोगी लेख है. हालाँकि हिन्दुस्तानी सिनेमा और उर्दू को लेकर रविकांत ने इस लेख में भी सवाल उठाये हैं. मुझे हैरानी इस बात पर होती है कि रविकांत उर्दू को लेकर तो बहुत बात करते हैं लेकिन हिन्दुस्तानी को लेकर नहीं, जो हिंदी का सबसे प्रचलित रूप रहा है. हो सकता है हिंदी-उर्दू के सवालों को उठाने के पीछे रविकांत की अपनी राजनीति हो.

बहरहाल, रविकांत ने ही हमारे अन्दर प्रश्नाकुलता पैदा की. इसलिए उनकी इस किताब को पढ़ते हुए मन में कुछ सवाल उठे. एक हिंदी लेखक होने के नाते कुछ हिंदी वाले सवाल.

लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह एक संग्रहणीय किताब है. बहुत दिनों बाद शोधपूर्ण लेखों की ऐसी पठनीय किताब हिंदी में आई है. तमाम तरह के पूर्वाग्रहों के बावजूद यह किताब पढने के लिए मजबूर करती है. सिनेमा में दिलचस्पी रखने वालों को, सिनेमा के इतिहास को लेकर काम करने वालों को इस किताब को जरूर पढना चाहिए.

हालाँकि किताब क नाम ‘मीडिया की भाषा लीला’ क्यों रखा गया यह समझ में नहीं आया?

पुस्तक- मीडिया की भाषा लीला; लेखक- रविकांत; प्रकाशक- वाणी प्रकाशन, मूल्य-395(पेपरबैक)

3 COMMENTS

  1. सर इस विस्तृत टिप्पणी के लिए शुक्रिया आपका. कृपया किताब की भूमिका उपलब्ध करवाएं.

  2. शुक्रिया प्रभात,

    सत्यदेव जांगिड़ का भी धन्यवाद। किताब की सुंदरता साज-सज्जा में की गई मृत्युंजय चैटर्जी की मिहनत की वजह से है, भले ही सामग्री मेरे ऐतिहासिक अभिलेखागार से आ रही है। वाणी ने साहस तो दिखाया है सर्वथा छपी हुई और अंतर्जाल पर उपलब्ध सामग्री को पुस्तकाकार छापके। देखना है कि वे इसे कितना बेच पाते हैं। जैसा कि किताब के शुक्राने में लिखा है: एक लेख तो बहुवचन में सबसे पहले छपा था, जब साक्षात आप उसके सह-संपादक थे। यह वही लेख है जिसे यहाँ नहीं होना चाहिए था, आपके मुताबिक़। ये और जोशी जी वाला भी, जहाँ से किताब का शीर्षक आ रहा है। भाषा का तार ही इन लेखों को जोड़ता है, लेकिन भाषा-अध्ययन पर बहुत-सारी किताबें बाज़ार में है, और मैं यहाँ भाषा की राजनीति के अलावा रचनात्मकता की ओर पाठकों का ध्यान खींचना चाहता हूँ। दूसरी बात मेरी भाषा वही हिंदुस्तानी है जिसे राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह पिछली सदी में और कृष्णा सोबती आज तक इस्तेमाल करती हैं। लिहाज़ा अपनी ज़बान के लिए मुझे किसी सर्टिफ़िकेट या आलोचना की परवाह नहीं। जो कसौटी मेरी किताब की भाषा के लिए प्रभात रंजन ने इस्तेमाल की है, वही मैं उनकी 'कोठागोई' के लिए इस्तेमाल करके उसको उर्दू घोषित कर सकता हूँ। लेकिन इससे क्या होता है। बस ये बताओ कि बात समझ में आती है कि नहीं, मज़ा आता है कि नहीं। मेरी किताब में यही कहा गया है कि हिंदी/उर्दू/हिंदुस्तानी के ऐतिहासिक झगड़े बेवक़ूफ़ाना समझ से उपजे थे।

    तीसरी सफ़ाई यह कि यह किताब 'मीडिया' को इसके व्यापकतम अर्थ में लेता है, और अंतर्माध्यम अध्ययन की दलील पाठकों के विचारार्थ पेश करता है, कि सिनेमा का एक जीवन अगर हॉल के अंदर है, तो एक उसका उत्तर-जीवन भी। ऐसा उत्तर-जीवन जो छप-माध्यम से रिले होकर हमारे बीच पहुँचता रहा है, कि फ़िल्म-पत्रकारिता सिनेमा पर चर्चा, उसकी समीक्षा, और सिनेमा के पर्दे के बाद के उपयोग और पुनर्चक्रण(remixing)का दस्तावेज़ है। सिनेमा दक्षिण एशिया में सुना भी जाता रहा है, इसलिए रेडियो और सिनेमा का अंतर्संबंध गहरी पड़ताल की माँग करता है। जिसका एक प्रस्थान है इस किताब में।

    वैसे, भूमिका को जानकी पुल पर डाला जा सकता है, फिर पाठक तय करें कि प्रभात की शिकायत वाजिब है या नहीं। कुछ पुराने लेख तो यहाँ नहीं, तो दूसरी जगहों पर मौजूद हैं ही।

    शुक्रिया

    एक बार फिर शुक्रिया
    रविकान्त

  3. सुंदर,धन्यवाद श्री प्रतिक्षा रंजन साहब, समीक्षा पढ़, पुस्तक पढ़ने की उत्सुकता हो गई है, श्री रविकान्त जी को बधाई दीजियेगा…

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