‘मिर्ज्या’ फिल्म आई भी चली भी गई!

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राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म ‘मिर्ज्या’ पर सैयद एस. तौहीद की टिप्पणी- मॉडरेटर 
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राकेश ओमप्रकाश मेहरा की मिर्जियारिलीज़ हुई.. आपने देखी? दो कहानियों को साथ लेकर चलती इस फ़िल्म के एक छोर पर पंजाब की लोककथा मिर्जा-साहिबा का युग है. दूसरी कहानी आज के राजस्‍थान के आदिल-सुचि की है. दोनों कहानियों की तक़दीर एक सी है. अफ़सोस सदियों बाद भी मुहब्बत को लेकर परिवार और समाज का रवैया नहीं बदला. आंसुओ में डूबी इश्क़ की परिणति नहीं बदली. मेहरा इस फिल्‍म में रंग दे बसंती की शैली से दो युगों में आते-जाते हैं. लेकिन इस बार उनका प्रयोग दो युगों को खूबसूरती से बांध नहीं सका. लिरिकल ताक़त पठकथा की खूबसूरती में तब्दील हो पाती तो मिर्जियाकुछ अलग होती… मिर्ज़ा-साहिबां की कथा का यादगार रूपांतरण सिनेमा को मिला होता. फ़िल्म अपने ही ख़्वाब को मुकम्मल जी नहीं सकी. फिर भी कहना होगा कि इस किस्म की फिल्में हिन्दी सिनेमा को कम मिली हैं. फ़िल्म का गीत-संगीत पक्ष इसे परदे पर लिखी कविता की शक्ल देता है. तकनीकी तौर पर मिर्ज़िया भव्य है. फिल्म के हर एक दृश्य को किसी पेंटर की पेंटिंग की शक्ल देने की कोशिश हुई है.
गुलजार के संवादों में एक किस्म की अनोखी लिरिकल खूबसूरती है. फ़िल्म का विजुअल ट्रीटमेंट इसे अपने किस्म की रचना बनाने की दिशा में है. नवोदित हर्षवर्धन कपूर और सैयमी खेर ने अपने चुनौतीपूर्ण किरदारों को जीने की भरपूर कोशिश की हैं. पहला प्रोजेक्ट होने पर भी दोनों ने काफी मेहनत की है. लांचिंग फिल्‍म कलाकारों की परख का अंदाज ले लेती है.इस लिहाज से हषवर्धन और सैयमी निराश नहीं करते. लेकिन कोशिशें एक मुकम्मल मायनेदार शक्ल अख़्तियार नही पा सकी. फिल्‍म को किस्तों में देखेंगे तो अधिक खूबसूरत लगेगी. फ़िल्म की लोकेशन एवम सिनेमाटोग्राफी इसकी ताक़त है. फिल्‍म के भावों से उनकी संगत भी नज़र है. ब्यूटी पर काफी मेहनत हुई है. कुछ छूट रहा तो बस कंटेंट. अतीत व आज की कथाओं का प्रवाह एक सा नज़र आया. गुलजार साहेब ने प्रयोग किया है कि अतीत की कहानी में संवाद नहीं रखे. मूक अभिनय को वर्त्तमान के संवादों से मायने मिला. आज का समय और एक वह समय जिसके बारे में कोई नहीं जानता के बीच संवाद स्थापित करने की यह प्रयोग नया है.
 
कहानी लोहारों की बस्‍ती से शुरू होती है.लोहार बने सूत्रधार ओम पुरी बताते है, ’लोहारों की गली है यह. यह गली है लोहारों की, हमेशा दहका करती है….यहां पर गरम लोहा जब पिघलता है, सुनहरी आग बहती है, कभी चिंगारियां उड़ती हैं .भट्ठी से कि जैसे वक्‍त मुट्ठी खोल कर लमहे उड़ाता है. सवारी मिर्जा की मुड़ कर यहीं पर लौट आती है. लोहारों की बस्‍ती फिर किस्‍सा साहिबां का सुनाती है…. मिर्जा-साहिबां की कहानी… ये वादियां दूधिया कोहरे की.. की अनुगूंज से शुरू हुई. दलेर मेंहदी के गाए इस गीत की अनुगूंज फ़िल्म में है. इसे दृश्यों पर बार बार इम्पोज़ करना थोड़ा अधिक लगा.फिल्‍म का बेशक अपना अंदाज है. लेखक व निर्देशक ने अपने अपने प्रयोग किए हैं. राकेश ओम प्रकाश मेहरा यहां भी रंग दे बसंती की तरह वर्तमान-अतीत के बीच आने जाने का प्रयोग किया है. ऐसा खूबसूरती से करने में वे कहीं चूकते नज़र आए हैं. फिल्म देखते समय जब-जब कहानियां बदलती हैं ऐसा लगता है कि कहीं कुछ मुकम्मल नहीं.
 
मिर्जा-साहिबा की दास्तां मोहब्बत की कसौटी समक्ष सामने आती है. पुरुष- स्त्री के रिश्ते की तक़दीर में खून के दरिया को लांघती, पश्चाताप के आंसुओं में डूब अंततः मृत्यु की गोद में पनाह पाती एक दर्दनाक प्रेमकथा. गुलज़ार इस अमर कथा को आज के जमाने के संदर्भ में पेश करते हैं. आदिल-सूचि में मिर्ज़ा-साहिबां की रूह को देखा. ऊंचे खानदान की सुचि और गरीब परिवार का मोनीष/आदिल  बचपन के दोस्त हैं, जो किसी वजह से एक दूसरे से अलग हो जाते हैं. कुछ सालों बाद किस्मत उन्हें फिर एक दूसरे के सामने ला खड़ा कर देती है. सुचि की शादी के समय दोनों की मुलाकात फिर होती है. बाल सुधार गृह से भागने के बाद मोनीष लोहारों की बस्ती में आ जाता है और उसका नाम आदिल हो जाता है. मोनीष को वापस लौटा देख सुचि ने अधूरे प्यार की कसक पूरा होते देखा. लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. वो एक बड़े खानदान की बहू बनने वाली है. जबकि मोनीष, जोकि अब आदिल मिर्ज़ा के नाम से जाना जाता है, अस्तबल में काम करता है.
 
मिर्जिया मिर्जा-साहिबा की दास्तां को सुंदरता से जिंदा करने के मुकम्मल कोशिश बनते- बनते रह गई है. लैला-मजनू, हीर रांझा और शीरी फहराद के इश्क की दीवानगी इसमें भी थी लेकिन आज के संदर्भ में कविताई अंदाज़ में पूरी व्यक्त नहीं हो पाई.गुलज़ार को फौलो करने वाले इसे फिर भी देखें… मिर्ज़ा-साहिबां की कथा को जिंदा करने का जोखिम सिर्फ़ वही उठा सकते थे.क्या वजह रही होगी हिन्दी सिनेमा ने पंजाब की इस प्रेम कथा को मिर्जिया से पहले नहीं छुआ? आज के चलन के हिसाब से फ़िल्म में ज़्यादा मेहनत नज़र आई. गीत-संगीत कहानी का अटूट हिस्सा बनकर उभरे. गीतों के माध्यम से कथा को बढ़ाने का काम हुआ. बहुत कुछ देकर भी फ़िल्म इम्प्रेस क्यों नहीं कर पाई? जवाब आपको फ़िल्म बेहतर दे सकेगी. मिर्जिया के एक्सपीरियंस में जवाब छुपे हैं.

2 COMMENTS

  1. असहमति हो ही सकती है. क्योंकि इस समीक्षा से एकदम उलट रहा है मेरा अनुभव. मेरे ज़ेहन में फिल्म अब भी चल रही है…लगातार…

  2. सय्यद साहब भी उसी मर्ज़ के शिकार हैं जिससे आज की अधिकांश हिंदी युवा-लेखक पीढ़ी बीमार है – यह समझना कि अल्लामियाँ ने उसी दिन दुनिया के लिए 'कुन' फ़र्माया था जिस दिन उन्होंने अवतार लेने की ज़हमत उठाई थी.डरते-डरते इत्तेला दे रहा हूँ कि हिंदुस्तान में 1947 में के.अमरनाथ ने 'मिर्ज़ा साहिबाँ' फिल्म बनाई थी जिसमें मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ ने साहिबाँ का किरदार निभाया था और कपूर-खानदान के सगे चाचा और चचेरे दादा त्रिलोक कपूर,यानी पृथ्वीराज कपूर के छोटे भाई, मिर्ज़ा बने थे.फिल्म हिट साबित हुई थी और तीन-चार गाने तो अब भी खूब सुने जाते हैं.

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