धोनी के मौन सन्यास पर फिल्म भी मौन है!

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धोनी कई बार पॉल कोएलो के उपन्यास ‘अलकेमिस्ट’ के नायक की तरह लगता है, जिसने सपने देखे और उनको हकीकत में बदल दिया। “एमएस धोनी-अनटोल्ड स्टोरी” उसी नायक की कहानी है। नीरज पांडे के इस बायोपिक पर आज नवल किशोर व्यास का लेख- मॉडरेटर 
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धोनी पर बनी फिल्म देखनी ही थी। काफी इंतजार था। हॉल में धोनी धोनी चिल्लाने वालो में से एक में भी था। वैसे पसंद शुरू से सचिन था और लगता था कि जिस दिन ये खेल छोड़ेगा, रो दूंगा पर हो गया उल्टा। सचिन की एक्शन-इमोशन-ड्रामा वाली फेयरवेल के बावजूद केवल दुखी हुआ पर ये मन रोया धोनी के मौन संन्यास पर। उस दिन मौन का जादू सर चढ़ के बोला। पांच दिन तक व्हाट्स एप पर धोनी की फोटो लगा स्टेट्स लिखा था- अभी ना जाओ छोड़ के, कि दिल अभी भरा नही। पर उसे किसकी सुननी थी जो मेरी सुनता। ये कब साला चुपचाप घुसपैठ कर गया, पता ही नही चला। धोनी-अनटोल्ड स्टोरी को केवल धोनी से प्रेम और पागलपन की वजह से देखना हो तो ये फिल्म उम्दा है, बेहतरीन है पर मेरी तरह धोनीप्रेमिल होने के बाद भी दिमाग लगाओगे तो ज्यादा मजा नही आयेगा।
धोनी शायद नीरज पांडे की अब तक की सबसे कमजोर फिल्म हैं। ये फिल्म उनके मिजाज के अनुरूप थी भी नही। फिल्म को लेकर उनका ट्रीटमेंट भी बेहद साधारण है। इसे साधारण बनाना था या साधारण बन गया, ये भी एक विषय है। बॉयोपिक बनाना वैसे कभी आसान नही होता वो भी तब जब आपको कल्पना की उड़ान उड़ाने का मौका नही मिलने वाला हो। बॉयोपिक को जीवनी की तरह पर्दे पर देखने में कोफ्त होती है और धोनी को देखते समय ये कोफ्त बार-बार हुई। नीरज पांडे ने धोनी को और उस पर लिखी स्क्रिप्ट को बहुत सतही रूप में लिखा हैं। धोनी का बचपन और उसकी गैर जरूरी लाइफ सेट करने में काफी फिल्म बर्बाद की। असमंजस और संघर्ष हर स्पोर्ट्समैन की लाइफ में होता है। इस साधारण संघर्ष ने धोनी को धोनी नही बनाया। धोनी का असली संघर्ष कुछ और था। उसकी उम्र के युवराज, कैफ, दिनेश मोंगिया का टीम में होना और उसका इन बेहद जरूरी समय में टीसी की नौकरी करना और एक मध्यमवर्गीय पिता की इच्छा के लिए जीवन सिक्योर करना या खुद के सपनो की और देखने का असमंजस ही फिल्म का मूल था। फिल्म का ये हिस्सा ही फिल्म का और धोनी के व्यक्तिगत जीवन का बेस्ट पार्ट है। धोनी का एकांत भी धोनी के व्यक्तित्व का खास हिस्सा है। हर टूटन पर उसका एकांत में जाना और खुद में समाना बेहद अपीलिंग है। धोनी में ना तो सचिन, द्रविड़ और विराट जैसी शास्त्रीय प्रतिभा मौजूद थी और ना विकेटकीपर के तौर पर वो असाधारण था। असाधारण है उसकी मजबूत मानसिक दृढ़ता और हर स्थिति में सहज रहने की जीवटता। फिल्म उसके व्यक्तित्व के इस हिस्से को जब-जब मुखर करती है, आनंद देती है।
अच्छे किरदार की समस्या होती है कि आप इन्हें देखकर इससे दूर नही भाग सकते। आनंद लेकर फ्री नही हो सकते। ये आपके दिलो दिमाग में घूमता रहता है कुछ दिन तक, कई बार बहुत दिनों तक। आपको बार-बार खुश करने, दुःखी करने, सोचने-विचारने, खुद से जोड़ने को, लगातार। फिल्म का वो हिस्सा अब भी साथ है जब टीसी की नौकरी करते परेशान धोनी स्टेशन की बेंच पर अपने बॉस से दिल की बात कहता हैं। उसकी समस्या मेरे जैसे बहुतो की है। हम लाइफ में करना कुछ और चाहते है और कर कुछ और रहे होते है। बहुत कम होते है जो एक्चुअल में वही करते है जो उन्हें करना होता है। बॉस का जवाब भी प्यारा है- लाइफ बाउंसर मारे तो डक करके बचो और जब फुलटॉस आये तो घुमा के मारो। दोस्तों के साथ क्रिकेट देखते अचानक उठकर रसोई में जाकर चाय बनाने के एक दृश्य ने वो कह दिया जो डायलॉग ने नही कहा। रूटीन लाइफ की आपाधापी में किसी के सपनो का सुसाइड करना आम है। लाइफ की इस क्रूरता पर बात होनी चाहिए। धोनी का बेंच पर अकेले बारिश में बैठने का दृश्य फिल्म का सार है, बाकी सब रचा और कहा सबने देखा-जाना हुआ है। फिल्म धोनी ने बताया कि असफल होना, रिजेक्ट होना, टूटना भी जीवन का एक भाव है। इसका आनंद भी जरूरी है। इस आनंद से निकला ही धोनी जितना निर्मोही हो सकता है।
कहानी जब बॉयोपिक हो तो फिर व्यक्तिगत कहानी के मायने भी सार्वजनिक हो जाते है। व्यक्तिगत तहें बार-बार सार्वजनिक बन आपके भीतर दस्तक देते रहते है इससे पहले भी दशरथ मांझी के बायोपिक ने हिलाया था। पिंक ने भी, जो बायोपिक नही होकर भी देश की हर उस लड़की का बायोपिक है, उसके भीतर का मोनोलॉग है, जो अपने तय किये व्याकरण के साथ इस थोपे हुए समाजवाद में जीना चाहती है। सिनेमा कई बार चमत्कार सा हमारे सामने आता है तो बहुत बार ये भी होता है कि ये आइने सा, हमारी ही जिंदगी बनकर हमसे मिलता है। मांझी और धोनी इसी मायने में खास हैं। ये हमारे सपनो, हमारी असफलताओं, हमारी जिद, हमारे हौंसलो, हमारे एकांत, हमारी उम्मीदों और हमारी पीड़ाओं की कहानी है। दोनों ही के व्यक्तिगत राग-द्वेष आगे चलकर सार्वजनिक कपाट खोलते है। दोनों किरदारों की कहानी आम से खास बनने की है। धोनी की कहानी सपने को हकीकत में बदलने की जिद की कहानी है तो मांझी की कहानी हकीकत को सपने की तरह दिखने की कहानी है। अजीब संयोग है कि दोनों ही किरदार बिहार(धोनी का झारखंड उस समय का बिहार) की पृष्ठभूमि से हमारे सामने आये है।
धोनी के बारे में क्रिकेट की एक घटना और मूव सभी को आज तक याद है। 2011 के वर्ल्ड कप फाइनल में रन चेस करते हुए लगभग 150 के स्कोर पर जब विराट के रूप में तीसरा विकेट भारत खोता है तो इन फॉर्म युवी की जगह मैदान पर अप्रत्याशित रूप से धोनी खुद उतरता है। उस युवी की जगह जो उस वर्ल्ड कप में अपने उतराव से पहले का अभूतपूर्व शिखर लिख रहा था। धोनी पूरे वर्ल्ड कप में डांवाडोल था, विकेटकीपिंग और बेटिंग दोनों से। धोनी आता है और हार की तरफ बढ़ते मैच को छीनकर लाता है। विजयी छक्का लगा कर एक अमिट याद, एक दिलकश हँसी और एक कभी न भूलने वाला लम्हा हम भारतीयों को देता है और अपने मिजाज के अनुसार पीछे मुड़कर चुपचाप स्टंप उठाने लग जाता है। ये मिजाज और तेवर ही धोनी को धोनी बनाता है। निर्मोही धोनी। भगवान की स्क्रिप्ट भी लिखी होती है। सचिन सचिन ही पैदा होते है। नियति महानता का सर्वनाम कइयों के साथ लाती है तभी सब कुछ स्क्रिप्ट सा होता जाता है। 16 साल की उम्र से खेलना शुरू कर दशकों तक राज करना पर दूसरी और धोनी को धोनी बनने में जोर आता है। इस फिल्म ने मानसिक मजबूती दी है असफलता का आनन्द लेने की। इसने बताया कि असफलता और रिजेक्शन बुरा नही, इसका नशा भी जरूरी है। टूटना जरूरी है, उठने के लिए, सफलता में धोनी जैसे निर्मोही बनने के लिए। अथ श्री धोनी कथा। जय हो।

4 COMMENTS

  1. सतही होने की बात तो सही है। पर, जैसा कि आपने स्वयं बखुबी चित्रण किया है धोनी के व्यक्तित्व का, धोनी को शायद हम उतना ही जान सकेंगे जितना वो हमें जानने देगा।

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