लेडी मंटो का पतनशील पत्नियों को सलाम 

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पिछले एक महीने से एक किताब की बड़ी चर्चा है ‘पतनशील पत्नियों के नोट्स’. लेखिका नीलिमा चौहान की यह किताब एक मुश्किल किताब है. मुश्किल इस अर्थ में कि इसका पाठ किस तरह से किया जाए कि कुपाठ न हो जाए. एक मुश्किल विषय पर एक साहसिक किताब है. आज इस किताब की समीक्षा कवयित्री सुधा उपाध्याय ने लिखी है- किताब की एक अच्छी यात्रा करवाते हुए- मॉडरेटर

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उड़ना चाहती हूं। पर घरकुनबे के पचड़ों, ज़िम्मेदारियों का क्या हो? उस प्यार से बनाये गये आशियाने के लिए लगाव का क्या करूँ? इस बोझ को लेकर उड़ गयी हर फ्लाइट में अतिरिक्त ताक़त लगानी पड़ती है। कई बार उतनी ताक़त लगाने की ताक़त भी नहीं होती भीतर। कितना अच्छा होता कि मन में कोई असमंजस ही न होता अपनी भूमिका, अपने औरतपने, अपनी फील्ड को लेकर। कितना अच्छा होता कि घरगृहस्थी पति को सँभालना और मस्त होकर अपने औरतपने को भोगना होता।क्या हो क्या न हो की कशमकश। ऐसा क्यों? वैसा किसलिए? मेरी ज़िंदगी, मेरा अस्तित्व, क्यों सहूं क्यों न करूँ विरोध। इस उथलपुथल की वजह दिमाग़ में बसा कीड़ा है जिसका कोई इलाज, नहीं।” (इसी पुस्तक से)

क्यों सहूँ क्यों न करूँ विरोध। इस उथल-पुथल की वजह दिमाग़ में बसा कीड़ा है जिसका कोई इलाज, नहीं। यह असमंजस ही नीलिमा चौहान की क़िताब पतनशील पत्नियों के नोट्स की महत्वपूर्ण कड़ी है। महिला विमर्श पर चर्चा होते हुए कई दशक बीत गए। ऐसे में नीलिमा चौहान की किताब ‘पतनशील पत्नियों के नोट्स’ में उभरा असमंजस महिला विमर्श को थोड़ा हटकर और नए सिरे से उठाने की दिशा में एक सार्थक प्रयास है। नए सिरे से कहने का मतलब है उस विमर्श में एक और मजबूत पहलू को जोड़ना है। मजबूत पहलू है पत्नी।पत्नी यानी एक ऐसी महिला जो समाज, परिवार, रिश्ते-नाते, सगे सम्बन्धियों के बीच सांस लेती है, हर पल उनके साथ रहती है, हर परिस्थितियों का डटकर सामना करती है, तमाम ऊंच-नीच के बावजूद एक दायरे में रहती है। चाहे जिसने भी वह दायरा बनाया हो पर पत्नी हमेशा अपना दायरा जानती है। और नीलिमा असमंजस के उस दायरे में रहकर पतियों से, परिवारों से, समाज से और देश से सवाल पूछती हैं। बढ़ती उम्र के साथ-साथ होने वाले तमाम शारीरिक, मानसिक और सामाजिक बदलावों की गवाह पत्नियों से जुड़े सवाल। पतनशील पत्नियों के नोट्स की खूबसूरती इसी में है कि वो पत्नी होकर सवाल पूछ रही है, बच्चों को संभालते हुए, पति का सारा ख्याल रखते हुए, सास-ससुर के लिए बहू का धर्म निबाहते हुए और इसके साथ नौकरी करते हुए। सवाल कि पत्नी उड़ना चाहती है पर जानती है कि दिमाग़ में बसे इस कीड़े का कोई इलाज नहीं है। सवाल कि पत्नी तमाम ज़िम्मेदारियों को पूरा करते हुए भी अपनी इच्छा के अनुरुप कुछ क्यों नहीं कर पाती? सवाल कि परंपरा और आडंबर की आड़ में पत्नी को ही ज्यादा क्यों भोगना है? सवाल कि सृष्टि का सर्जक होते हुए भी कष्ट का बड़ा हिस्सा औरत के ही जिम्मे क्यों आता है? और इन सबसे बड़ा सवाल कि आखिर ऐसा कबतक चलता रहेगा?

असमंजस जिस ध्वनि से उभरा है वो है अधिकार। इन सवालों के तलीय स्वर में अधिकारों की गुहार है। सामाजिक संरचना की वजह से जो अनकहा अधिकार पतियों को प्राप्त है वो पत्नियों को क्यों नहीं। नीलिमा ने बड़े साफ शब्दों में इस बात को इंगित किया है कि समानता का अधिकार सिर्फ विमर्शों तक सीमित है। किताबों में दफ़न है। सच तो है कि नौकरी करने वाली पत्नियां भी अपने पतियों के बराबर अधिकार कभी नहीं पाती हैं। नीलिमा ने बड़े बेबाक तरीके से लिखा है—जान लीजिए लड़की कभी अकेली नहीं होती। अपने गुसलख़ाने में भी नहीं, अपने कमरे के अपने बिस्तर पर भी नहीं। अपने घर से बाहर तो कभी भी नहीं। उसके भगवान, उसके बड़ेबुज़ुर्ग, उसके वहम, उसके सबक़, उसकी फ़ितरत, उसका आगापीछा हमेशा हुआ करता है।हमें तो यही सबक़ पिलाया गया है कि यह पाक़ देह पर्दे में सहेजे जाने के लिए है। सबकी रज़ामंदी से चुने गये उस अनुभवी मर्द कौ सौंप दिये जाने के लिए जिसे पति कहा करते हैं जो हमबिस्तरी के लिए एक कमसिन और पाक़ीज़ा बीवी की चाहत में जवाँ हुआ होता है। जबकि हम बीवियों को बचपन बाज़ार में बाज़ू से टकरा गए मर्द की छुअन को नल के नीचे रगड़रगड़ कर धोए जाने की तर्बियत वाला रहा है जनाब।

 असल में नीलिमा जब ऐसा कह रही होती हैं तो वो किसी ख़ास एक पति की बात नहीं कर रही होती हैं। वो दरअसल तमाम स्त्री विमर्शों के बावजूद समाज में महिलाओं को लेकर जो एक मानसिकता व्याप्त है, उसकी बात कर रही होती है। यहां पति असल में पुरुष मानसिकता का द्योतक है जो बात तो करता है बराबरी की और काम करता है हमेशा अपनी अकड़ वाला। जो दुनिया के सामने झंडे तो उठाता है फेमिनिज़्म का पर घर आकर उसी दकियानूसी में लिप्त हो जाता है। असल में नीलिमा चौहान ने अपनी किताब के माध्यम से उस गंभीर चिंता को नए तरीके से ज़ाहिर किया है जहां कुछ नहीं बदला है। न तो सोच बदली है न ही महिलाओं को देखने और समझने का नज़रिया बदला है। बदली है सिर्फ तारीख़ और बदले हैं तो लोगों के चेहरे। पति नामक पुरुष की मानसिकता में कहीं कोई बदलाव नहीं आया।

पतनशील पत्नियों के नोट्स सात हिस्सों में बंटा है। लेखिका की मंशा का अंदाजा आप इन हिस्सों के नाम से भी लगा सकते हैं। क़ैद में ही बुलबुल, अक्स करे सवाल, ताले जज़्बातों वाले, दर्द का नाम दवा रखा है, बुनियादें पहने हैं पायल, कुछ इश्क किया कुछ सफ़र किया और अदब का दारोग़ा। हालांकि कुछ लोग इस किताब को टिपिकल बॉलीवुड मसाला फिल्म की श्रेणी में लाकर खड़ा कर सकते हैं, जिसमें संदेश तो है पर मस्ती भी भरपूर है। लोग,पति-पत्नी का सेक्स, सेक्स में नाकाम होता पति और सीधे मुंह न कही जाने वाली बहुत सारी बातों को पढ़कर, मज़ा लेकर इसके मूल भाव को गुमराह करने का आरोप लगा सकते हैं। मसलन उम्र बढ़ने के साथ पत्नी के लिए पति का सेक्स के प्रति उदासीन रवैया पर दूसरी महिलाओं को देखते ही बांछें खिल जाना, वगैरह-वगैरह। पर मतलब निकालने वाले तो बिना बात का भी मतलब निकाल लेते हैं।

एक बात तय है कि किताब को पढ़ते हुए पतनशील पत्नियों के नोट्स आपके नोट्स लगने लगते हैं और उसके साथ एक तादात्म्य बन जाता है, जिसके साथ हम आगे बढ़ने लगते हैं। चूंकि इनमें जो असमंजस दिखाई देती है असल में वो मध्यवर्गीय परिवार की हर पत्नी की बेचैनी है। असल में पतनशील पत्नियों के नोट्स उन पत्नियों की सच्चाई से रु-ब-रू कराती है जो परिवार की चहारदीवारी लांघने की लालसा और न लांघ पाने के संतोष के बीच खड़ी हैं। जो आगे बढ़ना तो चाहती हैं, सेक्स से लेकर हर दिशा में एक अतृप्त इच्छा को पूरा करना तो चाहती हैं पर मौका मिलने की गुंजाइश को नकार भी देती हैं। यही इस किताब की खूबसूरती है।

क़िताब का नाम पतनशील पत्नियों के नोट्स पर एकबारगी तो ध्यान हर किसी सह्दय पाठक का जाएगा। जाना भी चाहिए। अगर नहीं गया तो समझिए वो पाठक नहीं, आदित्य चोपड़ा की फिल्मों का सिर्फ दीवाना है। शीर्षक से सहसा यह सवाल उठता है कि पत्नियां पतनशील कैसे हो गईं? अगर आप इस सवाल से टकरा रहे हैं तो समझिए नीलिमा चौहान का लिखना सफल हो गया। पति का सौ ख़ून माफ और पत्नी अगर किसी से हंसकर बात भी कर ले तो उसका चाल, चरित्र और चेहरा भूत, वर्तमान और भविष्य सब एक झटके में याद करा दिया जाता है। हमेशा बदचलनी का तमगा महिलाओं के पक्ष में जाता है क्योंकि पुरुष के लिए सौ ख़ून माफ़ है। पर यहां नीलिमा ने पतनशील को नई परिभाषा में गढ़ने की कोशिश की है। पुस्तक के अंत में ‘चलते-चलते’ में नीलिमा में लिखा है….सुनिए जनाब जब औरतें ख़ुद को पतनशील कहती हैं तो दरअसल यह जमात की काहिली का, मक्कारी का, चालूपंती का, साजिश का पर्दाफाश करना हो जाता है। अगर अपनी चाहतों, हसरतों, सपनों, सहजता और इंसानी हक़ों के लिए पत्नियों के पास आसान और सीधा रास्ता होता तो पतनशील कहलाने की किसे पड़ी थी जनाब? xxxxxxxxxxxxxxxx  इसलिए आलीजाह एक बड़ा मज़े का रास्ता चुना मैंने। ख़ुद पर तंज़ करना, ख़ुद का माखौल उड़ाना, ख़ुद को गिरा हुआ बताना, अपने राज़ खोलने की हिमाक़त करना, अपने राज़ छिपाने के राज़ को ज़ाहिर करना, तंगदिल माहौल में अपने तरीके से जीने की जुगत को बेपर्दा करना, खूब खिलखिलाना और आपको भी हँसाते हुए खेलखेल में सबका भंड़ा फोड़ डालना।   

 परिवार एक ढांचा है जिसपर समय के साथ प्रहार बढ़ता जा रहा है। पति-पत्नी के संतुलन में कमी आई कि ढांचा चरमराया और ढह गया। इस ढहते और टूटते ढांचे को बचाए रखने की दिशा पतनशील पत्नियों के नोट्स का योगदान अहम है। जो ढांचे को तोड़कर नहीं बल्कि ढांचे में रहकर अपने अधिकारों की गुहार लगा रही है। पतनशील पत्नियों के बयान दुनिया को देखने का एक वैकल्पिक नज़रिय ही तो है। ऐसा नज़रिया जिसे दुनिया के मुताबिक बनाकर पेश करने की मजबूरी से आज़ाद होकर सीधेसीधे कहने का जोख़िम उठाने वाली पतनशील नहीं तो और क्या कहलाएंगी?” 

इस पुस्तक में मौन होकर भी जो बहुत मुखर है वह है अपराजिता शर्मा की आकृतियां। लफ़्ज़ों के साथ कदमताल करती हुई बेहतरीन आकृतियां। बल्कि कई जगहों पर तो आकृतियां शब्दों से आगे निकल जाती हैं और अपनी भाव-भंगिमा से पूरा संसार रच जाती हैं। कुल मिलाकर पतनशील पत्नियों के नोट्स इस सदी का ऐसा दस्तावेज है जो निहायत ही बिंदास, बेबाक और आंखों में आंखें डालकर अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाता है। तमाम स्थितियों और बातों को खुलकर साझा करना सबके बूते की बात नहीं। नीलिमा चौहान ने वाकई साहस का काम किया है। बेलौस, बेबाक और खुलकर अपने होने का अहसास कराने वाली किताब को पढ़ते हुए बार-बार सआदत हसन मंटो याद आए। यक़ीनन नीलिमा चौहान इस सदी की लेडी मंटो हैं और उनकी यह पुस्तक सभी पतनशील पत्नियों को सलाम है।

पुस्तक- पतनशील पत्नियों के नोट्स; प्रकाशक-वाणी समीक्षक—डॉ सुधा उपाध्याय; पृष्ठ-199

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