लाल शाहबाज़ कलंदर की दरगाह के बारे में ओम थानवी ने क्या लिखा था?

लाल शाहबाज़ कलंदर की मज़ार 1356 ईस्वी से सिंध के सेवण शरीफ में है. उस मजार पर हिंसा इंसानियत के ऊपर हिंसा है.

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कल जब टीवी पर यह समाचार देखा कि सूफी फ़कीर शाहबाज़ कलंदर की मजार पर धमाका हुआ है तो मुझे ओम थानवी की किताब ‘मुअनजोदड़ो’ की याद आई. उस किताब में उन्होंने सेवण शरीफ की यात्रा का जिक्र किया है- “बाहर उजाला हो गया था. बस एक कस्बे में रुकी हुई थी. सेवण? दुबारा पूछा. जी, सेवण शरीफ! यकीन नहीं हुआ. किसी ने जिक्र तक नहीं किया था कि बस सेवण होकर जाती है. सेवण का नाम आपने कई दफा सुना होगा. रुना लैला, आबिदा परवीन, नुसरत फ़तेह अली खान जाने कितने फनकारों ने ‘दमादम मस्त कलंदर’ गाकर झंकृत किया है. यह उन्हीं सिंधड़ी के लाल सूफी फ़कीर शाहबाज़ कलंदर का स्थान है. बाज़ के आख्यान को जोड़कर उनके कई किस्से हैं, जो लोकमानस को देखते हुए न वहां अटपटे लगते होंगे, न यहाँ. लाल उनका नाम इसलिए पड़ा कि हर दम लाल कमली ओढ़े रहते थे.

मैं बस से घड़ी भर को उतरा. मन में अजब रोमांच था.

शाहबाज़ कलंदर का जन्म आठ सौ साल पहले अफगानिस्तान में हुआ था. बाद में सेवण में उनका धाम हो गया. मुस्लिम उन्हें पीर मानते थे, हिन्दू भर्तृहरि का अवतार. आपने गौर किया होगा, ‘सरायकी’ भाषा में रची गई ‘मस्त कलंदर’ मंकबत सिंध के देव झूलेलाल- जो लाल कलंदर के कोई सौ साल पहले हुए- से शुरू होती है और बाद में सूफी संत पर आ जाती है: ‘ओ लाल! मेरी पत रखियो भला, झूलेलालन… सिंधड़ी दा, सेवण दा, सखी(दाता) शाहबाज़ कलंदर…” मरहूम नुसरत फ़तेह अली खान ने अपनी कव्वाली ‘झूले झूलेलाल: दम मस्त कलंदर’ को पारंपरिक बंदिश से बिलकुल अलग भंगिमा दी है. मानो अपनी स्थायी में ही वे सिंध के दोनों लाल को एक साथ सजदा कर रहे हों. हिन्दू देवता और मुस्लिम संत दोनों को एक साथ पूजने वालक कोई दूसरा गीत मुझे फ़ौरन याद नहीं आया.

यह महज कहने के लिए कहना होगा कि सेवण शरीफ हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रतीक है. उस वक्त लोग शायद ऐसी भाषा में सोचते ही नहीं थे क्योंकि दोनों समुदायों को वे, आज की तरह, भेद करके नहीं देखते थे; न यहाँ आने वाले, न उन्हें तारने वाले. इसके बावजूद यह बात अपनी जगह सही है कि शाहबाज़ कलंदर हिन्दू-मुस्लिम, गरीब-अमीर की खाई को पाटने वाले पीर माने जाते थे.”

ओम थानवी की पुस्तक ‘मुअनजोदड़ो’ वाणी प्रकाशन से प्रकाशित है!

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