प्रेम की नहीं देशप्रेम की फिल्म है ‘रंगून’

फिल्म 'रंगून' पर एक दर्शक की नज़र

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सिनेमा पर लिखता नहीं हूँ लेकिन रिव्यू पढ़कर सिनेमा देखता जरूर हूँ. ‘रंगून’ देखने के बाद यह महसूस हुआ कि रिव्यू पढ़कर कई बार सिनेमा देखने पर यह बुझाता है कि जो लिखा गया था वह तो फिल्म में है ही नहीं. ‘इन्डियन एक्सप्रेस’ समेत सभी बड़े अखबारों ने फिल्म की बड़ी ठंढी समीक्षा की थी. प्रेम और देशप्रेम के थीम को किसी ने समझना ही नहीं चाहा. उनको स्टार देने की जल्दी रहती है. ढाई स्टार से अधिक किसी ने भी इस फिल्म को नहीं दिया था. लेकिन फिल्म चवन्नी छाप नहीं है.

असल में देखते हुए मुझे यह फिल्म सब्जेक्ट के लिहाज से विशाल की अब तक की सबसे अच्छी फिल्म लगी. इस बार उन्होंने आजादी के आन्दोलन का दौर उठाया है और उसमें भी आज़ाद हिन्द फ़ौज की एक भूली हुई कहानी को. यह फिल्म प्रेम की नहीं देशप्रेम की है. विशाल भारद्वाज ने अपनी एक बातचीत में यह कहा भी है कि यह फिल्म उन्होंने सुभाष चन्द्र बोस को ट्रिब्यूट देने के लिए बनाई है. उस नेताजी को जिन्होंने बर्मा में आजाद भारत का तिरंगा पहली बार फहराया था.

फिल्म इस उम्मीद से देखने गया था कि इसमें फियरलेस नाडिया की कहानी होगी, जो 1930 के दशक में भारतीय फिल्मों की पहली स्टंट वुमेन थी. उसको हंटरवाली के नाम से बुलाया जाता था. कहानी शुरू में जरूर उसकी याद दिलाती है. मिस जूलिया का किरदार उसकी झलक से शुरू जरूर होता है लेकिन उससे आजाद होता चला जाता है. मिस जूलिया बम्बई के समुद्र तट पर चाकू छुरियों का खेल दिखाने वाली दलित लड़की ज्वाला थी, जिसे रूसी बिलमोरिया ने जूलिया बनाकर मशहूर कर दिया. रूसी के किरदार में सैफ अली खान ने एक यादगार भूमिका निभाई है. उसके प्रेम में जुनून दिखाई देता है. फिल्म में जूलिया को अंग्रेज फौजी अफसर के इसरार पर जूलिया को रंगून ले जाया जाता है. रास्ते में नवाब मालिक(शाहिद कपूर) मिलता है जिससे जूलिया को सच्चा प्यार हो जाता है.

लेकिन यह फिल्म प्यार की नहीं है. फिल्म में एक संवाद आता है- अपनी जान से ज्यादा कीमती क्या होता है. जवाब मिलता है- जिसके लिए जान दी जा सके. नवाब, जूलिया देश के लिए जान दे देते हैं जबकि अंग्रेज परस्त प्रेमी रूसी यानी सैफ अली खान अपनी प्रेमिका की अन्तिम इच्छा पूरी करने के लिए आज़ाद हिन्द फौज तक उस तलवार को पहुंचाता है जिसकी कीमत से आजाद हिंदी फौज को भारत की आजादी की लड़ाई लड़नी थी. ये तीनों किरदार फिल्म में जो थे वही नहीं रह जाते हैं. इनके व्यक्तित्व रूपांतरित हो जाते हैं. जूलिया एक नाचने वाली स्टंट वुमेन से देशप्रेमी बन जाती है और अपने दूसरे प्रेमी नवाब से कहती है कि वह भी आज़ाद हिन्द फौज की रानी लक्ष्मीबाई ब्रिगेड में शामिल होना चाहती है. नवाब वैसे तो अंग्रेजी फौज का सिपाही था लेकिन वह आज़ाद हिन्द फौज के गांधी ब्रिगेड का हिस्सा होता है. सच्चा प्यार वही होता है जो हमें वही नहीं रहने देता है जो हम होते हैं.

फिल्म के शुरू में एक संवाद आता है कि देश गांधी के अहिंसा और सुभाष की हिंसा के बीच में फंसा हुआ है. लेकिन फिल्म विशाल भारद्वाज की है इसलिए हिंसा अधिक है. इसलिए देशभक्ति की फिल्म होते हुए भी बच्चों के साथ इसको नहीं देखा जा सकता. सेक्स के सीन उतने नहीं हैं जितने लग रहे थे.

हाँ, मैं हैरान हूँ कि रिव्यू लिखने वाले यह क्यों लिख रहे थे कि फिल्म कंगना के कन्धों पर टिकी है. फिल्म में सबसे यादगार भूमिका मुझे सैफ अली खान की लगी, जो मिस जूलिया का जुनूनी प्रेमी है. उसके लिए अपने बाप से तक से लड़ जाने वाला. उसके कहने पर उसके मरने के बाद आजाद हिन्द फौज तक तलवार पहुंचाने वाला. सैफ में एक क्लास है जो विशाल की फिल्मों में उभर कर आता है.

फिल्म के गानों उसके पिक्चराइज़ेशन पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है. फिल्म में 1943 का दौर बहुत अच्छी तरह से उभर कर आया है. बहुत मेहनत की गई है, अच्छा रिसर्च है. हाँ, एक बात और यह सुनते थे कि ‘जन गण मन’ का अनुवाद सुभाष चन्द्र बोस ने भी किया था. फिल्म में उनके अनुवाद का ही इस्तेमाल किया गया है. शब्द अलग हैं. उसको सुनते हुए बहुत रोमांचित हुआ.

हाँ, फिल्म थोड़ी लम्बी हो गई है. खासकर जुलिया के रंगून जाने वाला प्रसंग बहुत लम्बा हो गया है. डिटेलिंग दिखाने के चक्कर में फिल्म पहले एक घंटे तक ठहरी हुई लगती है और देशभक्ति के अपने मूल थीम से भटक जाती है. जूलिया से रश्क भी होता है कि ऐसे जहान में जहाँ लोगों को एक प्यार नहीं मिलता जूलिया को दो-दो सच्चे प्रेमी मिलते हैं जो उसके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहते हैं.

सलाम है विशाल भारद्वाज को जिन्होंने सुभाष चन्द्र बोस को याद किया.

अंत में यह भी बताता चलूँ कि यह फिल्म की समीक्षा नहीं है. एक दर्शक के कुछ अनुभव हैं जिसमें उसकी अपनी भावनाएं शामिल हो गई हैं. वह भी नेताजी का पक्का वाला फैन जो है.

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