ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर में ‘हिंदी साहित्य उत्सव’

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पिछले साल ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर ने ‘हिंदी साहित्य उत्सव’ की शुरुआत की थी. इस बार भी हुआ. आज ही जब दिन भर लोग योगी दित्यनाथ को लेकर बहसों में उलझे हुए थे ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर में ‘हिंदी साहित्य उत्सव’ चल रहा था. पिछले साल इस आयोजन में  पार्टनर वाणी प्रकाशन था जबकि इस बार राजकमल प्रकाशन. आज के आयोजन पर संतोष कुमार की रपट- मॉडरेटर

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राजकमल प्रकाशन समूह एवं ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर द्वारा आयोजित ‘हिंदी साहित्य उत्सव’ का आयोजन आज ऑक्सफ़ोर्ड बुकस्टोर में  हुआ। इस एक दिवसीय साहित्य उत्सव की शुरुआत मृणाल पांडेय के ‘भाषा और समाज’ विषय पर व्याख्यान से हुई। भाषा और समाज के अंतर्संबंधों को मृणाल पांडेय ने कई उदाहरणों एवं निजी अनुभवों के माध्यम से रखा। उन्होंने कहा, “भाषा हमें विरासत में मिलती है और  एक समाज  उसे अपने स्तर पर गढ़ता है. हिंदी समावेशी भाषा है, इसलिए वो अपने अनुसार शब्दों को ले कर चलती है और शब्दों की यह यात्रा बहुत रोचक होती है।”

अशोक माहेश्वरी, मुख्य प्रबंधक , राजकमल प्रकाशन समूह, ने कहा, “यह ख़ुशी कि बात है कि हाल के कुछ वर्षों में हिंदी पुस्तकों और लेखकों में दिलचस्पी लगातार बढ़ी है। यह कार्यक्रम इसी का विस्तार है, ये हिंदी के साथ अन्य भारतीय भाषाओँ के लिए भी एक अच्छा संकेत हैं।  हिंदी के मूल  सवालों, असल सरोकारों, मूल पाठक समाज तक अभी तमाम साहित्य उत्सवों को और तैयारी से पहुँचने की जरूरत है।”

लेखिका एवं जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की सहनिदेशक नमिता गोखले ने इस अवसर पर कहाँ “हिंदी साहित्य उत्सव का यह दूसरा वर्ष है। इस तरह के साहित्यिक कार्यक्रम से  हिंदी पुस्तकों के वितरण को भी काफी प्रोत्साहन मिलेगा। यह हिंदी के लिए और अन्य भारतीय भाषाओँ के लिए भी एक अच्छा संकेत हैं। भाषाओँ के साहित्य की मैत्री की दिशा में उठाया गया यह एक महत्वपूर्ण आयोजन है।”

 दिन  के  साहित्य  उत्सव  के पहले सत्र  ‘अपनी चुनी राहें, क्या मकसद, क्या हासिल ‘ का संचालन अनु सिंह चौधरी ने किया. इस सत्र में उर्वशी बुटालिया, मैत्रयी पुष्पा, विद्या शाह और पियूष मिश्रा ने अपने अनुभवों को साझा किया। मैत्रयी पुष्पा ने कहा, “मैं लेखिका बनने  के लिए ही पैदा हुई, मेरे लिए साहित्य लेखन मतलब जीवन जीना और फिर उसका चित्रण करना है. मेरा रास्ता आसान नहीं था. मेरी ज़िन्दगी की इस जद्दोजहद ने मुझे लगातार  लिखने के लिए प्रेरित किया।”  इसी  सत्र  में  बोलते  हुए  गीतकार  पियूष मिश्रा ने कहा, ” “मेरी ज़िन्दगी में बहुत ही कनफ्यूज़न रहा है. क्या करना है क्या नहीं, कुछ समझ नहीं आता था, इसलिए मैंने सब कुछ कर के देख लिया,और आज मैं मानता हूँ, यही कनफ्यूज़न  मुझे आगे बढ़ाता चला गया और मैं सफ़ल होता चला गया।”

उत्सव  में  जहाँ  युवाओं  की  मौजूदगी  माहौल  में  उत्साह  का  संचार  कर  रही  थी  वहीं “प्यार का पंचनामा: यूथ और कैंपस ” सत्र में  गर्मागरम चर्चा  ने  भी  लोगों  को  बहुत  आकर्षित  किया। सत्र  का संचालन निष्ठा गौतम ने किया. इस सत्र में हिंदी के युवा लेखक क्षितिज रॉय, नीलिमा चौहान, दिव्य प्रकाश दुबे और सौरभ द्विवेदी ने शिरकत की. आज के साहित्य में यूथ, कैंपस, बदलती भाषा, लिंग, प्यार, को किस प्रकार रखा जा  रहा है, इस पर इन युवा लेखकों ने अपनी बात रखी. इन दिनों अपनी किताब गन्दी बात के लिए चर्चित लेखक क्षितिज रॉय ने कहा, “दिल्ली विश्वविद्यालय आने के बाद मैं कई आज़ाद ख्याल लड़कियों से मिला. उनकी बातें और किस्से मेरे दिमाग में थे. इन्ही अनुभवों से प्रेरित होकर मैंने अपने किरदारों को गढ़ा।”

भाषा  में  अनुवाद  की  महत्ता  पर  केंद्रित  सत्र  “अनुवाद भाषाओं के आर-पार” विषय पर मीरा जोहरी, पंकज चतुर्वेदी और मनीषा चौधरी से  नीता गुप्ता ने  बातचीत की. पंकज चतुर्वेदी ने इस मौके पर बोलते हुए कहा, “अनुवाद केवल भाषा से भाषा का ही करना नहीं होता बल्कि अनुवाद में भावनाओं को भी स्थान देना होता है।”

दोपहर  बाद के  सत्रों  में  “सत्ता का धर्म और धर्म की सत्ता” विषय पर पत्रकार  पाणिनि आनंद से बातचीत में लेखक शाज़ी ज़मां ने कहा, “अकबर ने धर्म की सत्ता को सीधी चुनौती दी. इसके अलावा, उनके जीवन का एक सन्देश हमेशा प्रासंगिक रहेगा. उन्होंने अपने समय की लगभग सभी वैचारिक और धार्मिक धाराओं को एक मंच पर लाने की कोशिश की।”

अपने  आप  में  अनोखा  सत्र  “हिंदी कैसी दिखती है” विषय पर रहा.  इस सत्र में तृषा गुप्ता, इरफ़ान, राजीव प्रकाश खरे और शीराज़ हुसैन से शैलेश भारतवासी से बातचीत की.  इसमे  भाग  लेने  वाले  सभी  वक्ता चित्रकार , टीवी  एंकर, अंग्रेजी पत्रकार  और  पब्लिशिंग  जैसे  भिन्न  क्षेत्रों  से  थे, जो  हिंदी  को  अपने  अपने  तरीके  से  लिख  पढ़  रहे  हैं।

कार्यक्रम का समापन पीयूष मिश्रा के गायन से हुआ!

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