हरे प्रकाश उपाध्याय की लम्बी कविता ‘खंडहर’

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बड़ा जटिल समय है. समाज उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है. एक बड़ा परिवर्तन घटित हो रहा है. हरेप्रकाश उपाध्याय की कविता ‘खंडहर’ उसी को समझने की एक जटिल कोशिश की तरह है- मॉडरेटर

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खंडहर

भयानक परिदृश्य है

डरा रहा है

कहीं कोई विलाप…. कोई चिल्ला रहा है

यह कौन है कौन है

क्या गा रहा है

कहाँ जा रहा है

किस आँच में यह कौन देश को पका रहा है

कौन है

देखिये असली वक्त पर आप मौन हैं

 

पूछो भागो मारो पकड़ो पकड़ो

 

अरे भाई इस तरह मत अकड़ो

जाति का बंधन

नहीं नहीं

तोड़ो जाति जाति तोड़ो

छोड़ो छोड़ो नया समाज बनाना है

पकड़ो पकड़ो रूको रे भाई

जाति जाति जाति

जाति क्यों नहीं जाती

तोड़ दी जनेऊ किसी ने

भागी किसी की बेटी हल्ला मच गया…

 

जाति तोड़ो तोड़ो जाति

सब कहते हैं तोड़ो जाति

छोड़ो जाति

छह दशक से देश आजाद है

सोचो छह दशक से देश आजाद है

 

पर्दे के पीछे मगर जोड़ो जाति

पर्दे के बाहर तोड़ो जाति

हमारा समाज कमजोर है

देखो कैसा चोर है

समता की ममता झूठी है

 

आया लोकतंत्र का महापर्व

जाति को गोलबंद करो

जाति तोड़ो… छोड़ो मुँह बंद करो…

अधिकार अगर पाना है … (कैसा अधिकार…मारो पागल है…)

जाति के नाम पर जाना है

अपनी जाति का नेता खोजो

अपनी जाति की जनता खोजो

यही समाजवाद है

यही बहुजनवाद है

यही अभिजनवाद है

यही जनवाद है

बहुत गहरा घाव है भरा हुआ मवाद है…

कुरेदो इस घाव को अपने धँसे हुए पाँव को

 

सामंती बरगद की जड़ें फैलती गयीं

घुसती गयीं समाज के हर कोने-अंतरे में

सत्ता की बारिश में

हर जाति में घुस गयी जड़ें

 

जाति के नाम पर हत्याएँ

मार-काट…                                 हर कोई जाति के पीछे अँधा है…

तरह-तरह के अत्याचार अनाचार

 

एक मर्ज के इलाज में हजार मर्ज हरे हो जाते हैं

खोजो खोजो कोई उपाय खोजो

बढ़ती जाती है घृणा

समाज बदल रहा है

बदल डालो समाज को

लागू करो संविधान को

झूठ मत बोलो

मुस्काओ मत कुटिल मुस्कान

अरे देखो देखो …                                   राजनीति भी धंधा है…

 

जाति तोड़ो तोड़ो जाति

सब कहते हैं तोड़ो जाति

छोड़ो जाति

छह दशक से देश आजाद है

सोचो छह दशक से देश आजाद है

 

ममतालु बने कैसे यह समाज

दयालु बने कैसे यह समाज…

मरती हुई मनुष्यता विह्वल पुकारती है।

 

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एक पागल भीड़ विचारहीन ऐसी

चीखती-चिल्लाती हुई

भागती हुई करुणा को दौड़ाती हुई

सहमी चेतना बेहोश संवेदना…

हाँ जी मियाँ जी

इस देश में रहना होगा तो वंदे मातरम कहना होगा

ये खाना होगा इधर से आना होगा उधर से जाना होगा

संविधान सम्मत यह जनतंत्र हमारा

पानी भरेगा प्यारा

देश भक्ति की परीक्षक यह भीड़

भागो भागो

मगर कहाँ

अब तो जागो जागो अब तो

छह दशक से देश आजाद है

सोचो छह दशक से देश आजाद है…

 

कहीं मंदिर मस्जिद के झगड़े

कहीं खाने-पीने के लफड़े

रहते आये साथ-साथ

मगर रोज-रोज के रगड़े गहरा संशय गाढ़ा अविश्वास परस्पर

हम कबीर के वंशज हम गालिब के वंशज

हम मीर औ रैदास के वंशज

कहाँ बिसर गयी यह परंपरा पुरानी

ढूँढो खोजो…

और खड़ी कर दो भीड़ के सामने… भीड़ के सामने…!

 

इतनी बेहूदा नफरत

डूबा दो इसे प्यार के समंदर में (कहाँ हैं प्यार का समंदर?)

अल्लाह-ईश्वर के घर के नाम पर पगला रहा है कौन

डरा हुआ है

डरा रहा है

बँटा हुआ है बँटता जा रहा है

यह कौन है कौन है

क्या गा रहा है

कहाँ जा रहा है

किस आँच में यह कौन देश को पका रहा है

कौन है

देखिये असली वक्त पर आप मौन हैं

झाँको अपनी आत्मा में

किसके नाम पर किसके खून बहा रहे हो

क्या इन्सानी खून से लिखोगे

धर्म की इबारत      -एक पागल चिल्ला रहा है।

 

धन्य धिक्कार है तुम्हारा धर्म

जो समझ नहीं पाये मर्म

आएगी क्या कभी तुम्हें शर्म

तोड़ो अज्ञान का अँधेरा

वक्त की करवट को देखो

समय की सलवट को देखो

भीड़ के पाँवों तले कुचलती इन्सानी मुहब्बत को देखो

 

पूँछें अपनी गँवा आये तुम

फिर सिर पर सींगें क्यों उगा रहे हो

सोने दो पशुता भला क्यों जगा रहे हो

सोचो तो बात समझ में आएगी

मुहब्बत होगी दिल में तो इंसानियत क्यों किसी पर चिल्लाएगी

 

यह दुनिया इतनी विविध हमारी

इतने रंगों में रंगी न्यारी

लोगों को घुलने मिलने दो

रंगों को मचलने दो

क्यों उठाते हो नफरत की दीवारें

बच्चों को मैदानों में निकलकर घुलने-मिलने दो (ले भागा कोई किसी के बच्चे को ही)

 

नकाबों से ढँके हैं भीड़ के नियंताओं के चेहरे

नोचकर नकाब देखो

इंसानों का कारवां

भीड़ में बदलने वालों का ख्वाब देखो

 

सूरज एक ही है

एक ही है धरती

एक ही हवा में घुली-मिली हैं साँसें सबकी

एक ही नदी का जल दौड़ रहा है हमारी देहों में

एक ही मिट्टी हमारी…

 

अड़ गये अकड़ गये

जरा सी बात में लड़ गये

भयानक पागलपन में पड़े गये…

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सफेद कमीज पजामे में

आदमी काला दिल का अजब गिरगिटान

लगाये घड़ी-घड़ी आग      कभी इधर भागे कभी उधर कूदे

अजब फितूर इसका

गजब सपना दिखाये है

मन ललचाये है, हाथ में रोशनी का कंगन लहराये है

इसी से पालें हम आशा    गजब चकाचौंध

अजब-गजब है निराशा

 

इसकी आत्मा में गजब की है घड़ी

हर वक्त जिसे बाँटने की बेचैनी ही पड़ी

सत्ता की भूख भयानक

कुछ भी कराये है, इसे गजबे नचाये है

तांडव दिखाये है

मन ललचाये है

 

अरे ये तो इधर

काला जादू चल रहा है

भयानक खंडहर व्यवस्था का

उसमें नये रंग-रोगन

रंगों के भरम में

कभी भीड़ इधर भागे

कभी भीड़ उधर भागे

मृग मरिचिका अनवरत अविराम

 

निकलने का न यह रास्ता

न वह रास्ता

 

तंत्र यह लोक का

मंत्र यह सत्ता का

बहुत तेज शोर

कुछ भी ठीक से सुनाई न पड़े

लगता हर बार कुछ बदल रहा है

मगर हर बार बदल कर वही रंग जम जाये है

 

अर्रे  सिंहासन पर बैठे सफेद बाने के इस आदमी के हाथ में

कितने-कितने तरह के हथियार

कभी वह इधर चलाये है

कभी वह उधर चलाये है (बेमतलब भी)

किस आँच में यह कौन देश को पका रहा है

कौन है

देखिये असली वक्त पर आप मौन हैं

 

देश ठिठका अंधी गली के मुहाने पर बेचैन मौन

देखो खा रहा

मुस्का रहा देशभक्त

देशभक्त की आत्मा में खुराफातें तमाम

वह देश की नस नस जानता है

इस ज्ञान में वह ऐंठा है

देखो कैसे तनकर कुर्सी पर वह बैठा है

 

कभी यह बैठे कभी वह बैठे

जो भी बैठे

एक ही तरह से ऐंठे

देश की आत्मा पर देशभक्तों की जूतियों की कीलें गड़ रही हैं

 

हमारी व्यवस्था सड़ रही है

सड़ती ही जा रही है

उठती उससे बदबू देश बेचैन है

राजा को इसी बात का चैन है

वह बताये है इस तरह भरमाये है

कि देश को कहीं आगे ले जाये है

 

किससे पूछें

किससे करें शिकायत

पंचो बोलों कहाँ करें पंचायत

ठगा हुआ देश ठिठका हुआ देश

किधर जाये

किधर से लौट आये

 

गिद्ध मंडरा रहे आसमान में

धरती पर बगुले नजर गड़ाये

धरती की तरह चकरघिन्नी खा रहा है देश

कभी एक ठोकर इधर से खाये

कभी एक ठोकर उधर से खाये

धरती का बेटा हाड़तोड़ खेतों में कमाये

जरूरतों की चिथड़ी कमीज पहनकर

आँखों में उम्मीदों का पानी लिये अक्सर भूखा सो जाये…

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जनतंत्र की चौरस जमीन पर उग आये हैं

पौधे नागफनी के बहुत सारी जहरीली झाड़ियाँ

बनकर आश्रय सुरक्षित विषधर जीवों के

नफरत घृणा के झाग फेंकते तरह-तरह के जीव खूँखार

अरे कहाँ गया हँसिया-हथौड़ा

कहाँ गये तारे-सितारे

कहाँ गये कामरेड

पूछो किस ख्वाब में खो गये

क्या वक्त के पहले ही सो गये

बिखर गये

इधर गये-उधर गये

 

मजदूरों को सपने दिखाकर

खुद ही सो गये?

 

चकाचौंध के साथ ही बढ़ता गया अँधेरा

तन के फटे हुए वसन

फटते गये और

भूख को नहीं मिला समाधान

दीन-हीन जन और पीटा गया

बहस में जबकि उसे बार-बार घसीटा गया

 

बहस चलती रही

बहस करने वालों की तकदीर बदलती रही

भौंचक्क देखता रहा

भूखा आदमी

ठिठका हुआ

 

लगातार पसीने बहाता हुआ

वह बहस करने वालों को पानी पिलाता रहा

उनकी चाय लाता रहा

आँखों में उम्मीद के लाल झंडे लहराता रहा

कभी उससे उसकी मर्जी पूछी न गयी

झंडे का लाल रंग

उसकी आँखों के नमकीन पानी से धुलकर बहने लगा

मगर बहस करने वालों का इसका इलहाम तक न हुआ

 

खंडहर में अँधेरा मुस्कराने लगा…

अजी खंडहर के कोने में उगे जंगल से

तड़ तड़ की आवाजें आने लगी

गोली चलने लगी

लाशें आने लगीं

भूख से बौखलाये हुए जनों ने बारूद से खेलना शुरू कर दिया

 

जंगल में भगदड़ मच गयी

कोहराम मच गया

पुलिस बुलाई गयी

और लाशों के ढेर लगने लगे

बीस उधर से मारे

बीस इधर से मारे

बीस यहाँ मरे

बीस वहाँ मरे

अखबारनवीस गिनने लगे गिनती

सत्ताधीश झूठमूठ की करने लगे विनती

 

फिर बहस शुरू हो गयी

कामरेड के तर्क जोरदार

बारूद के पक्ष में उन्होंने धाँसू नारे बना दिये

कुछ मौतों पर आँसू बहा दिये

कुछ को जायज ठहरा दिये

 

भूल गये कामरेड अपना सपना

मोमबत्तियाँ जलाने लगे

दिन में चौराहे पर अपनी खुद दीनता दिखाने लगे

लो उनका कारवाँ छिटक गया

चुनाव चिन्ह अपना कैडर ही भूल गया…

 

कहाँ हुई भूल गलती

सोचने की जहमत कौन उठाये

कामरेड बस अपना झंडा लहराता ही जाये

अकेला ही गाता चला जाय

 

अरे कामरेड! लोग हँस रहे हैं

आपके पीछे के लोग कहाँ लौट गये

कहाँ जा रहे हैं कामरेड कहाँ जा रहे हैं कामरेड

किस भीड़ में खो गये कामरेड

कामरेड! असली दुविधा तो उस आदमी की है

जो अरसे से भरोसे से चलता रहा बाँये अब किधर जाये…

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पकड़ लायी है पुलिस

एक दीन-हीन जन को

जिसके कपड़े इतने गंदे कि गंदगी भी शरमाये

लगता है अरसे का भूखा है

उसके चेहरे से टपक रहा दु:ख

हवा चले तो हिलने लगे ऐसा वो जन

चेहरे पर दाढ़ी तनिक घनी है

बता रही पुलिस उसे ही आतंकवाद की जड़

मार रही बेरहम

कहता है आला अधिकारी, साले की चमड़ी उधेड़ लो

रासुका लगा दो… आप नहीं जानते, ये साले हैं असली तिजोरी के मालिक…

मारते-मारते थक गया है सिपाही

फूटबाल की तरह उसे बूटों से उछाल रहा है

कपड़े उसके चीथड़े हुए

चमड़ी भी चीथ गयी

लहूलुहान आदमी लग रहा देश का सरल अनुवाद है

मगर उसकी देशभक्ति पर खींच दिया

पुलिस ने प्रश्नवाचक चिह्न

 

वही है वही है

जी हाँ वही है

आतंकवाद की जड़

भ्रष्टाचार की जड़

गरीबी की जड़

बेरोजगारी की जड़

सारे अपराधों पापों की जड़ वही है

उसी ने रोक रखा है विकास का पहिया

 

देश के नौकरशाहों

थैलीशाहों

शाहों मोदियों

अंबानियों टाटाओं बिड़लाओं सबकी दुख का जड़

वही है वही है

सारी ताकत की जड़

वही कर रहा देश की छवि खराब

मारिये साहब मारिये

खाल उसकी खींचकर खंजरी बनाइये

उस पर अमन का गाना बजाइये

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साहेब ने जारी किया फरमान

करो देश का विकास

फाइलें बनाने लगे अधिकारी

होने लगीं मीटिंगों पर मीटिंगें

अखबारों में छपने लगे आँकड़े

आँकड़ों में होने लगा विकास…

 

अरे नहीं ऐसे नहीं थोड़ा ठोस करो विकास

झोपड़ियाँ उजाड़ो

जंगलों को काटो

आदिवासियों को मारो भगाओ

थोड़ा हल्ला मचाओ

विकास की हलचल जगाओ

थोड़ा कर का सोंटा जनता पर और तेज लगाओ

थोड़ा और लगाओ यार

चीजों के दाम बढ़ाओ

हल्ला मचाओ

करो कुछ ऐसा कि जन मन को भी लगे

कि हो रहा विकास

 

ढाह दो छोटे-मोटे सरकारी संसाधन

छीन लो सब्सिडी

जनता से कहो कि विकास में जरा करे खुलकर मदद

कष्ट उठाये जरा… (देशहित से बड़ी चीज आखिर और है ही क्या…)

 

देखिये विकास का विरोध बर्दाश्त नहीं किया जाएगा

आपको रोटी नहीं मिल रही

पानी नहीं मिल रहा

बिजली नहीं मिल रही

सर छुपाने को छत नहीं मिल रही

ये सब ओछी बातें मत करिये… अभी आगे-आगे तो देखिये होता है क्या

बड़े-बड़े पुलों… बड़े-बड़े पार्कों

बड़े-बड़े भवनों

बड़े-बड़े उद्योगों को शान से निहारिये

इससे बढ़ रहा दुनिया में देश का मान

पूँजी निवेश के लिए हमने बुलाये हैं मेहमान

हे देश की जनता थोड़ा और झुको

तुम्हारी पीठ पर से गुजरेगा थैलीशाहों का रथ… सिक्के लुटाते हुए चकाचौंध मचाते हुए…7

जब हमें संगठित होकर

कस्बे की ओर जाना चाहिए था

लोगों के साथ नयी दिशाओं पर शुरू करनी चाहिए थी बातचीत

जब हमें लोगों पर सबसे अधिक भरोसा करना चाहिए था

उस दिशा में जाना चाहिए था

जहाँ लोग अपनी परेशानियों से जूझ रहे हैं

जहाँ लोग असहाय हाय-हाय करते मदद के लिए गुहार लगा रहे हैं

 

हम शहरों के नुक्कड़ों और चौराहों की ओर बढ़ गये

बढ़ते गये

हम वातानुकूलित कमरों में पकाते रहे विचारों के व्यंजन

हवा में लहराते रहे अपनी मुट्ठियाँ

जबकि हमें डूबते लोगों के लिए हमें हाथ बढ़ाना था

 

हम चंद लोग आपस में मुग्ध थे

आपसी विचारों पर

हमें इस बात का गुमान रहा आया

कि करते हैं हम सबसे अंतिम आदमी पर बातचीत

हम बातचीत से कभी आगे बढ़े ही नहीं

रौंदता रहा राक्षस

हमें उससे कभी लड़े ही नहीं

 

हम कागजों में उगाते रहे सूरज

बहसों में फैलाते रहे रोशनी

कहवाघरों और नुक्कड़ की चाय दुकानों पर दिखा हमारा आक्रोश

शराब की गिलासों में डूबा दी हमने सारी चिंताएं

 

इस तरह धीरे-धीरे खोया हमने भरोसा

फिर हमने परेशान लोगों को ही कोसा

उनकी समझ और सरोकार पर ही उठाये सवाल

 

बौद्धिकता की चादर भर

रही हमारी दुनिया…

उसी में छुपकर देखे हमने बड़े-बड़े सपने

सिर्फ सपने सपने सपने

और सपने सपने सपने

सपने में सोये सपने में जागे

हम सपनों से बढ़े नहीं आगे…

 

हरे प्रकाश उपाध्याय

संपादक

मंतव्य (साहित्यिक त्रैमासिक)

204, सनशाइन अपार्टमेंट, बी-3, बी-4, कृष्णा नगर, लखनऊ-226023

मोबाइल-8756219902

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