राफ़िया फ़रहत की नज़्में

नज़्म तो हो गई पूरी, कसक अब भी अधूरी है

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राफ़िया फ़रहत अफ़साना निगार हैं। शायरा हैं। ऑल इंडिया रेडियो बाड़मेर में अनाउंसर हैं। तजरबे की बारिश में भीगी हुई राफ़िया की नज़्में, पढ़ने वालों के दिलों को और ज़ियादा मासूम बना देती हैं। महसूस होता है कि दुनिया के तमाम ज़र्द गुलाब सियाह हर्फ़ बन गए हैं। ओस की बूँदों ने अपनी नमी रूह को उधार दे दिया है और नींद जागते हुए ख़्वाब के आसमान में परवाज़ कर रही है। अगर आप ग़ौर करें तो पाएँगे कि सुकून की सफ़ेद चादर में लिपटी हुई बेचैनी ठीक उस वक़्त ख़ुशरंग हो जाती है, जब ज़मीन के लबों में सूरज का लम्स सुगबुगाने लगता है। आँखों का गुलदान अपने आप भरने लगता है, जब मुहब्बत की शाख़ पर एक नया सितारा खिलता है। इन सभी जज़्बात को अपना एहसास बनाते हुए, आइए पढ़ते हैं राफ़िया फ़रहत की नज़्में – त्रिपुरारि

बेलौस मोहब्बत

मेरी बेलौस मोहब्बत का तक़ाज़ा है यही
तुम हवाओं में उड़ो और मैं बंध कर ही रहूँ
तुम जिन्हें चाहो जहाँ चाहो मरासिम रखो
मैं फ़क़त खुद से कहूँ और फ़क़त खुद की सुनूँ
बद दिमाग़ी की हदें पार करो तुम अक्सर
बुर्दबारी की हदें मैं ही समेटे रखूं
मुँह से निकले जो कोई बात तुम्हारे जब भी
ग़ौर से सुनके उसे फ़तवा समझ कर रखूं
मेरी अदना सी भी ख़्वाहिश का भरम तुम न रखो
और मैं झूठी सी ख़्वाहिश का भी दम भरती फिरूँ
जब थकाने लगें गर्दिश-ओ-अय्याम तुम्हें
तुम पुकारो मुझे और मैं बस यूँ ही दौड़ चलूँ
कैसा अंदाज़े तख़ातुब है तुम्हारा मेरे दोस्त
तुम झिड़कते ही रहो और मैं सुनती ही रहूँ
तर्क करते हो तअल्लुक़ को हर एक बात पे तुम
और मैं बात निभाने की जुगत करती रहूँ
फिर भी एक आस अजब दिल में जगा रखी है
अपनी ये नज़्म ही होंठों पे सजा रखी है
कोई लम्हा तो तुम्हें खींच के ले आएगा
और मोहब्बत का सिरा फिर से ये बंध जायेगा
क्योंकि..
मेरी बेलौस मोहब्बत का तक़ाज़ा है यही

उदास दिल के बहाने

ये नम आँखों की शबनम है
जो तकिये को भिगोती है
जो होती ओस सुबह की
तो होंठों को भिगो जाती…

मोहब्बत क्या हुई गोया
गुनाहों की गिरह खोली
ना खुद को आज़माती तो
ये गठरी ही बंधी रहती…

अजब सी आस में अक्सर
यूँ वक़्तों को गँवाया है
कोई जज़्बा तो ऐसा हो
जो रूहों को जगाता हो
मगर अफ़सोस हर जज़्बा
फ़क़त जिस्मों को जाता है…

उदासी दिल की मिट जाए
बहाने ढूंढ लाती हूँ
इसी कोशिश में अक्सर यूँ
नज़्म लिखती सुनाती हूँ।

सुनो साहिब

मैं जब भी कुछ लिखूँ साहिब
मेरी हर हर लिखावट में
तुम्हारा अक्स उभरे है
तुम्हारा नाम उतरे है

मैं जब चाहूँ सुधारुं कुछ
इसी बेढब लिखावट को
कहूँ कुछ अपने बारे में
लिखूं कुछ अपने बारे में

मगर हर बार काग़ज़ पर
तुम्हारी पुर कशिश आँखें
मेरा मन मोह लेतीं हैं
मुझे यूँ बाँध लेती है

क़लम ऐसे फिसलता है
मेरे नादान हाथों से
छलक जाते हैं कुछ आँसू
मेरी बे नूर आँखों से

ये कैसा रब्त है मुझ पर
ये कैसा ख़ब्त है मुझ पर
हज़ारों बार ये मंज़र
मुझे पागल बनाता है

मगर फिर भी सुनो साहिब
मगर फिर भी सुनो साहिब

जुटा के सारी हिम्मत को
जमा करती हूँ लफ़्ज़ों को
लरज़ती उँगलियों को फिर
थमाती हूँ क़लम अपना

कि कुछ तरतीब दे डालो
कोई अफ़साना लिख डालो
सुना दो दास्ताँ कोई
कहानी मेरी कह डालो

तभी गर्दन उठा कर जो
नज़र दौड़ाऊँ काग़ज़ पर
नज़म तो हो गई पूरी
कसक अब भी अधूरी है
तुम्हारा अक्स अब भी है
तुम्हारा नाम अब भी है

तुम्हें जो वक़्त मिल जाये
जो तुम पढ़ लो नज़म मेरी
ज़रा सी बात बन जाए
सुकूँ मुझको भी आ जाये।

दयारे यार के ख़ातिर

कभी जाज़म बिछी और
कभी मुसल्ला बिछाया
कभी घुटने टेके और
कभी सर को झुकाया
कभी नंगे पाऊं खुद को दौड़ाया और
कभी बे तहाशा सर को ढाँपा
गंध जो अगरबत्ती और
लोबान की थी
कब और कैसे
इतर की खशबू में तब्दील हो गई
मगर
दयारे यार तो किसी
पीर के मज़ार से कम न था
जो बंद आँखों और
खामोश लबों से
अपने मुरीदों की तादाद बढ़ाने में लगा था
जिसे न मुरीदों की शिद्दतों की परवाह थी और
ना उनके बेईमान हो जाने की
जिसे ना चढ़ावे समझ आते और
ना मुरीदों के लाये फूल और
चादर
मगर
ये सब आधुनिक मुरीद थे
पीर की इब्लिसियत को भांप गए थे
अब
दयारे यार के ख़ातिर
ना जाज़म है ना मुस्लल्ला
ना पाऊं नंगे है और
ना सर ढकने की फ़िक्र
अब ना लोबान है ना अगर बत्ती
अब सिर्फ खुशबू ही खुशबू है
जो फ़िज़ाओं में घुल रही है

गई रात की नींद

तुम्हारी आमद के इंतज़ार में
मैं रात के सारे पहर
तकिये को तरतीब देती रही
काला डोरा भी पहना
अपने हाथों की उँगलियों पर
ना जाने क्या क्या
पढ़कर भी फूँका
मगर तुम थीं कि
किसी और चेहरे का तवाफ़ करने में लगी थीं
मैंने अधखुली नज़रों से
तुम्हारा पीछा किया
तुम उस चेहरे पर दिलो जान से
मेहरबान थीं
उसे अपनी आग़ोश में लेना
चाहती थीं
तभी मैंने देखा
तुम्हारी सभी कोशिशें
रायगाँ रहीं
उस चेहरे का कर्ब भी कम न था
बेचैनी वहां भी थी
तकिया वहां भी बे तरतीब था
मैं खुश थी कि
गई रात की नींद
दो जगह यकसां थी

ख़ारज़ार राहें

वो लौट जाना चाहती थी
उन ख़ारज़ार राहों (कंटीले रास्ते) से
जिन पर चलते हुए उसके
क़दम लहुलहान हुए थे
ये वो राहें थी जहाँ दूर दूर तक
सिर्फ़ सेहरा (रेगिस्तान) ही सेहरा था
न प्यास बुझने का कोई इमकान
ना दम भरने का कोई ठिकाना।

जिन राहों पर चलते हुए
उसने बारहा धड़कनों को थामा था
बिखरी ज़ुल्फ़ों को समेटते हुए
उसके हाथ बार बार काँपे थे
लरज़ती पलकों को मूँद कर
हज़ार हा किसी ख़ूबसूरत
ख़्वाब की ख़्वाहिश की थी
मूंदी पलकों के खुलने पर
अश्क बार आँखों को हथेलियों से
एहतियात से रगड़ डाला था।

जिन तपती राहों पर चलते हुए
उसे कई बार ख़ुद के गुम हो जाने का
बे वजह गुमान हुआ था
डगमगाते क़दमों को
जमा जमा कर रखने की कोशिश में
वजूद के टूटने का ख़ौफ़ और
रगों में रवां ख़ून के थम
जाने का अंदेशा हुआ था।

इसीलिए बस इसीलिए
वो लौट जाना चाहती थी
उन ख़ारज़ार राहों से
जिन पर चलकर क़दम
लहुलहान हुए थे।

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