वैराग्य-साधन के द्वारा मुक्ति मेरे लिए नहीं है

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जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में एमफिल के छात्र राजकुमार ने रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविता में जागरण और मुक्ति की चेतना को लेकर एक अच्छा लेख लिखा है- मॉडरेटर

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                         बांग्ला साहित्य के मूर्धन्य हस्ताक्षर रवीन्द्रनाथ ठाकुर बीसवीं शताब्दी के शुरुआती चार दशकों तक भारतीय साहित्याकाश में ध्रुवतारे की तरह चमकते रहे | ‘गीतांजलि’ के लिए उन्हें १९१३ई. में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया | जिसके बाद उन्होंने विश्व कवि के रूप में ख्याति प्राप्त की, इस कृति से उनकी छवि एक विश्व मानवतावादी के रूप में सामने आयी | ‘गीतांजलि’ के गीतों में कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने आत्माभिव्यन्जन, अध्यात्म-चिन्तन, जीवन-दर्शन, प्रकृति-चित्रण, भाव-प्रकाशन आदि की दृष्टि के साथ अपने को अभिव्यक्त किया और कवि गुरु के रूप में प्रसिद्धि पायी | यही नहीं गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर उन भारतीय मनीषियों में थे जिन्होंने भारतीयता को वैश्विक मानवतावादी दृष्टिकोण से अभिव्यंजित किया | भारतीय नवजागरण और राष्ट्रीय स्वाधीनता के काल में भारतीय लोकमानस को सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक आदि अनेक पक्षों से समृद्ध करने में कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर का अहम योगदान रहा |  उनके इस बृहद योगदान पर अलग से बात करने की आवश्यकता है | अभी हम ‘रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविताओं में जागरण और मुक्ति की चेतना’ पर अपनी बात करेंगे |

                         ऐसे समय में जब भारत स्वाधीन भी न होने पाया था उन्होंने अपनी मातृभूमि के प्रति सारे संसार का सम्मान और श्रद्धा अर्जित की थी | “यह काम वह इसलिए कर सके कि उन्होंने अपने व्यक्तित्व में भारतीय चिन्ताधारा और संस्कृति के उत्तम-से-उत्तम और उदात्त-से-उदात्त गुणों को समा लिया था |”[1]

उनका एक पूजा गान देखिए :

                            “हे चिरनूतन, आजि ए दिनेर प्रथम गाने

                             जीवन आमार उठुर विकाशि तोमारि पाने |

                             तोमार वाणीते सीमाहीन आशा,

                             चिरदिवसेर प्राणमयी भाषा –

                             क्षयहीन धन भरि देय मन तोमार हातेर दाने |

                             ए शुभलगने जागुक गगने अमृतवायु,

                             आनुक जीवने नवजनमेर अमल आयु

                             जीर्ण जा-किछु, जाहा-किछु क्षीण

                             नवीनेर माझे होक ता विलीन

                             धुये जाक जत पुरानो मलिन नव-आलोकर स्नाने”[2]

[ गीत वितान, पूजा गान संख्या २७३ ]

( हे चिरनूतन ! आज इस दिन के प्रथम गान में मेरा जीवन तुम्हारी ओर विकसित हो उठे | तुम्हारे स्वर में मेरी आशा सीमाहीन होकर चिर दिन की प्राणमयी भाषा हो उठे | तुम्हारे हाथ का दान मन को अक्षय धन से परिपूर्ण का दे | आज इस शुभ लगन में, गगन में वह अमृत वायु संचरित हो, जो इस जीवन को नये जन्म की अम्लान आयु से पूरित करे | जो भी जीर्ण है, क्षीण है वह नवीन में विलीन हो जाए | जो कुछ पुराना, निष्प्राण या मलिन है, वह नवीन आलोक में स्नान कर शुभ्र और प्राणवान हो उठे | )

यह उक्त बंगाली गीत पूजा गान ही नहीं बल्कि जागरण गीत है, नए दिन और नए सबेरे का स्वागत है इसमें तो कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर के यहाँ जागरण इसी रूप की जीवन धारा और प्राण की नवीनता के साथ आता है |

                         गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर भारतीय नवजागरण को किस रूप में देखते हैं उसकी एक कवि कल्पना देखिए –

                             “जहाँ तुच्छ आचारों की मरु-रेती;

                              शतधा न जहाँ पुरुषार्थ; जहाँ पर सतत

                              सब कर्म-भाव आनंद, तुम्हारे अनुगत;

                              हे पिता, उसी स्वर्लोक में करो जाग्रत,

                              निज-कर निर्दय ठोकर देकर, यह भारत !”[3]

जहाँ सब कर्म-भाव आनंद सतत हों ऐसे भारत के प्रति हम अनुगत हों, उसी स्वर्लोक को करो जाग्रत | यही कवि के जागरण का संदेश था | लीला मजुमदार लिखती हैं, “अपने देश से उन्हें बड़ा गहरा और उत्कट प्रेम था | वह देश के आदर्शों का, उसकी भाषा का और उसकी जनता की विद्या का आदर करते थे | पर साथ ही, वह बाहरी ज्ञान का भी स्वागत करते थे, चाहे वह कहीं से भी क्यों न मिले | विज्ञान के क्षेत्र में और विचार की स्वतंत्रता के क्षेत्र में हमें पश्चिम से जो दें मिली है, उसके लिए वह पश्चिम के प्रति भी कृतज्ञ थे |”[4] ग्रामीण भारत की समस्याओं के बारे में उनकी समझदारी और किसानों, देहाती दस्तकारों आदि की भलाई की आकुल चिंता भी इसी प्रत्यक्ष सम्पर्क से पैदा हुई थी | शिक्षा के मामले में भी उनका यह विचार धीरे-धीरे स्पष्ट होता गया कि बच्चों का लालन-पालन सीधे-सादे देहाती वातावरण में प्रकृति की गोद में होना चाहिए, पुराने ज़माने के आश्रमों के आदर्श पर | इसीलिए आगे चल कर उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में अपने प्रयासों से ‘शान्तिनिकेतन’ की नींव रखी, एक ऐसे संस्थान के रूप में जो उनके शिक्षा के लक्ष्यों के लिए आधुनिक और पारम्परिक विचारों का सामूहिक आदर्श थी |

                         अपनी ग्यारह विदेश-यात्राओं में कवि ने लगभग सारी दुनिया घूम ली थी | ज्यों-ज्यों उन्होंने दुनिया देखी, त्यों-त्यों उनका यह विचार पक्का होता गया कि सभी देशों की जनता में मित्रता और प्रेम-भावना से आदान-प्रदान के बिना संसार से सुख-शांति की आशा करना व्यर्थ है | इसी आदर्श पर उन्होंने १९२१ई. में शान्तिनिकेतन के विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना की थी | कवि की आतंरिक अभिलाषा थी कि विश्वभारती में संसार के सभी देशों की शिक्षा-संस्कृति के प्रतिनिधि एकत्र हों | विश्वभारती के आदर्श वाक्य के रूप में उन्होंने संस्कृत का यह सुभाषित चुना : ‘यत्र विश्वंभवत्येकनीडम्’ अर्थात ‘जहाँ सारा संसार एक ही घोंसला बन जाए !’ कवि की ‘प्राण’ कविता में व्यक्त मनुष्य जीवन की ऐसी ही आकांक्षा देखिए –

                            “सुंदर संसार में मैं मरना नहीं चाहता,

                             मनुष्यों के बीच मैं बचना चाहता हूँ,

                             जीवंत हृदय के बीच यदि स्थान पा सकूँ,

                             तो इन सूर्य-किरणों में, इस पुष्पित कानन में

                             मैं अभी जीना चाहता हूँ |”[5]

                         रवीन्द्रनाथ ठाकुर ऐसे गीतों की रचना जीवन-भर करते रहे | अनगिनत गीत लिखे हैं उनहोंने | भक्ति के गीत, प्रकृति की वन्दना, देश-प्रेम के गाने, आनेकानेक अवसरों के गीत | आज भी उनके गीत बेजोड़ है | ऐसे और इतने गीत कभी किसी और ने नहीं लिखे | रवीन्द्रनाथ ठाकुर के गीतों को दो देशों ने बाद में अपना राष्ट्र-गान बनाया, भारत ने ‘जन-गण-मन’ को और बांग्लादेश ने ‘आमार सोनार बांग्ला’ को अपना राष्ट्र-गान बनाया है | ऐसे छुटपन में ही उन्होंने यह विख्यात ब्रह्म-संगीत लिखा था :

‘नयन तोमारे, पाय ना देखिते रयेछ नयने-नयने |’

( आँखे तुमको देख न पातीं; बसे हुए आँखों-आँखों में )

उनके गीतों की बड़ी प्रशंसा हुई | इन्हीं-में एक कविता वह भी थी जिसका नाम था ‘निर्झरेर स्वप्नभंग’ माने ‘निर्झर का स्वप्न-भंग’ | सूरज की गरमी से बर्फ़ के पिघलने पर झरने का पानी जिस उद्दाम आनन्द से उमग उठता है उसी का वर्णन इस कविता में है | इसे पढ़कर दुनिया ने समझ लिया कि कवि ने अपने जीवन का मर्म पा लिया है, उसके भीतर का झरना अब उमड़ पड़ा है और आजीवन बहता रहेगा –

                            “अरे, मेरे चारों ओर

                             यह कठिन कारागार क्या है ?

                             तोड़ो तोड़ो, इस कारा को भंग करो

                             आघातों पर आघात देते चलो |

                             अरे, आज पक्षी ने कौन-सा गाना गाया है ?

                             सूर्य की किरणें आयी हुई हैं |”[6]

                         कवि की एक कविता है ‘बलाका’ – बलाका जो पक्षियों के उड़ते हुए समूह के वक्र से बना है – उसमें सामूहिक मुक्ति की चेतना और निखिल विश्व के जागरण का गान है, जरा ‘बलाका’ की इन पंक्तियों को देखिए –

                           “(मैंने) सुना है, मानव के न जाने कितने संदेश दल बाँध कर

                            अलक्षित मार्ग से उड़े चले जा रहे हैं

                            स्पष्ट अतीत से अस्फुट सुदूर युगांतर की ओर,

                            (मैंने) सुना अपने अंतर ने

                            असंख्य पक्षियों के साथ

                            दिन-रात

                            यह घर छोड़ पंछी दौड़ रहा है आलोक और अंधकार में

                            (न जाने) किस पार से किस पार की ओर |

                    ध्वनित हो उठा है शून्य, निखिल (विश्व) के पंखों के इस गान से –

                    ‘यहाँ नहीं, और कहीं, और कहीं, कहीं और |’”[7]

इनकी एक और कविता है ‘मुक्ति’ इसमें समाज और व्यक्ति की मुक्ति की आकांक्षा को गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने जो स्वर दिया है उसे उनकी मुक्ति-चेतना का ‘सस्वर गान’ ही कहा जाएगा | देखिए पूरी कविता इसी भाव को व्यक्त कर रही है –

                    “वैराग्य-साधन के द्वारा मुक्ति मेरे लिए नहीं है

                     मैं असंख्य बन्धनों में

                     महा आनंदमय मुक्ति का स्वाद लूँगा

                     इस वसुधा के मिट्टी के पात्र में बार-बार

                     तुम्हारा नाना वर्ण गंधमय अमृत निरंतर ढालता रहूँगा

                     सारा संसार दीपक के समान मेरी लक्ष-लक्ष वर्तिकाओं को

                     तुम्हारी ही शिखा से छूकर तुम्हारे मन्दिर में प्रज्ज्वलित कर देगा

                     इन्द्रियों के द्वार रुद्ध करके

                     योगासन मेरे लिए नहीं है

                     जो कुछ भी आनन्द है दृश्य, गंध और आहार में

                     तुम्हारा आनन्द उसी में निवास करेगा

                     मेरा मोह जल उठेगा मुक्ति बनकर

                      मेरा प्रेम फलेगा भक्ति बनकर”[8]

‘मानव मुक्ति की चेतना’ सच में उनके गीत इसी बात के प्रमाण हैं | उनकी भाषा आधुनिक है, स्वर नये हैं, पर उनके माध्यम से हमारे प्राचीन पुरखे भी अपनी बात कह जाते हैं | भाव, विचार, शब्द और संगीत का इतना सर्वांग-पूर्ण समन्वय सचमुच दुर्लभ है |

                         गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर का व्यक्तित्व अत्यंत विशाल था, उन्होंने मानव-जाति के हित में सोचा और काम किया | जब पशु-शक्ति के दानव, फासिस्टवाद और नाजीवाद ने सारी दुनिया में सर उठाना शुरू कर दिया था | तब कवि ने देखा कि कुछ लोग मानव-अधिकारों को निगल जाने पर तुले हैं, गुरुदेव को दुःख का पारावार उमड़ता हुआ मालूम हुआ क्योंकि कवि के आदर्शों और मान्यताओं को पैरों-तले रौंदा जा रहा था | यह उनकी आत्मा के लिए बड़ी कठिन यातना का कारण था | सन १९१५ई. में अंग्रेजी सरकार ने कवि को ‘सर’ की उपाधि दी थी | लेकिन जब सन १९१९ई. में जलियाँवाला बाग़ का गोली-काण्ड हुआ, जिसमें अनेक निर्दोष और निहत्थे भारतीयों को गोलियों से भून दिया गया, तब शोक, लज्जा और रोष से आकुल कवि ने ‘सर’ की उपाधि लौटा दी | उपाधि लौटाते हुए उन्होंने बड़े लाट साहब को जो पत्र लिखा था उसमें जनता पर किए गए अत्याचारों का बड़ा ही प्रबल और वीरतापूर्ण प्रतिरोध किया था | वह पत्र अविस्मरणीय रचना है |

                         अब तक दुनिया ने कवि की प्रतिभा का लोहा मान लिया था और कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के संसार में विश्व-जागरण और मुक्ति की चेतना का स्वर प्रत्यक्ष रूप में सुना जा सकता था | ७ अगस्त, १९४१ई. को राखी-पूर्णिमा के दिन कवि ने अपनी आँखे मूँद लीं; वे ही आँखें, जिनसे अस्सी बरस तक उन्होंने दुनिया का न जाने कितना सौन्दर्य देखा था ! फिर भी उनका जीवन उदात्त रहा और उन्होंने निर्भय होकर मृत्यु का स्वागत किया | मृत्यु का आभास पाकर उन्होंने एक गीत लिखा और इच्छा प्रकट की कि यही गीत मेरी मृत्यु पर गाया जाय | उस गीत का आरम्भ है –

‘सम्मुखे शान्ति-पारावार

भासाओ तरणी हे कर्णधार !’

( सामने शान्ति-पारावार | खोल दो नैया हे कर्णधार ! )

जिसे कवि ने आजीवन प्यार किया था, जिसे वह अपना प्रेम-पात्र, मित्र और मार्ग-दर्शक मानते रहे थे, उसी ईश्वर को ‘कर्णधार’ बनाकर हमारे कवि इस ‘तरणी’ पर सवार हुए और ‘शान्ति-पारावार’ में उतरकर अनजान लोक में चले गये | उनका जीवन ‘जागरण और मुक्ति’ का संदेश था और उनकी रचनाएँ उसकी चेतना के वाहक !

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राजकुमार

शोधार्थी : एम.फिल.(हिन्दी)

कमरा संख्या – 10,

नर्मदा छात्रावास,

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय,

नयी दिल्ली – 110067

मोबाईल : +919971915375

ई-मेल : rajkumarkidiary@gmail.com

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[1]. रवीन्द्र रचना संचयन, सम्पादक – असित कुमार बंद्योपाध्याय, साहित्य अकादेमी, पुनर्मुद्रण संस्करण – २०१२, पृष्ठ – xix

[2] . वही, कवर फ्लैप

[3] . वही, ‘जहाँ चित्त भय-शून्य’, पृष्ठ – ३

[4] . वही, पृष्ठ – xii

[5] . वही, ‘प्राण’, पृष्ठ – २२

[6] . वही, ‘निर्झर का स्वप्न-भंग’, पृष्ठ – ४

[7] . वही, ‘बलाका’, पृष्ठ – १५२

[8] . वही, ‘मुक्ति’, पृष्ठ – १२६

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