क्या ब्रजेश्वर मदान को भुला दिया जाना चाहिए?

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‘जानकी पुल’ पर शशिभूषण द्विवेदी के लिखे लेख ‘बर्बाद जीनियस थे ब्रजेश्वर मदान’ की टिप्पणी में ब्रजेश्वर मदान के भतीजे आदित्य मदान ने कमेन्ट में लिखा- ब्रजेश्वर मदान इज नो मोर. इस एक पंक्ति ने हमारे में में चल रहे होने न होने उस द्वंद्व को ख़त्म कर दिया जो कुछ बरस से चल रहा था- मेरे, शशिभूषण और मेरे सीनियर, फिल्ममेकर नरेश शर्मा के बीच. हम फेसबुक के माध्यम से उनके होने न होने का खेल खेलते थे. उस पर विराम लग गया.

कल मैं दिन भर सोचता रहा कि उनकी मौत कब हुई? अगर आदित्य मदान को जानकी पुल का पता था तो उसने फोन से सम्पर्क करके उनके निधन की खबर हमें क्यों नहीं बताई? जब वह एक लेख के नीचे कमेन्ट कर सकता था तो जानकी पुल के संपर्क कॉलम में मेरा नंबर देखकर मुझे फोन भी कर सकता था. बहरहाल, यह संतोष हुआ कि वे जीवन के इस बंधन से मुक्त हुए. उनको अकेले होते और उस अकेलेपन से घबराकर लोगों की तलाश करते, फिर अकेले हो जाते मैंने बहुत करीब से देखा था. अच्छा हुआ इस अकेले जीवन से उनको मुक्ति मिली. लेकिन क्या इस तरह घुट घुट कर जाना था उनको?

1970-80 के दशक में जब फिल्म पत्रकारिता का शिखर काल था, जब पत्रिकाएं गाँव घरों में पढ़ी जाती थी तब उन्होंने फिल्मों पर लिख लिख कर लोगों के दिलों में घर बनाया. अपनी छोटी छोटी साहित्यिक कहानियों से एक अलग पहचान बनाई. राजेंद्र यादव उनको बहुत पसंद करते थे और उनसे कहानियां लिखवाते रहते थे. बाद में अखिलेश ने उनकी अंतिम कहानियां ‘तद्भव’ पत्रिका में 2005 में प्रकशित की. उसके बाद वे कविताएँ लिखते रहे और ‘अलमारी में रख दिया है घर’ नाम से उनका कविता संग्रह भी प्रकशित हुआ.

मैं यह सोच रहा हूँ कि 2010 में वे लकवाग्रस्त हुए. तब से हिंदी समाज के कुछ गिने चुने लोगों के अलावा किसने उनकी खबर ली? जब उनके न रहने की खबर आई तब भी हिंदी के वरिष्ठों को श्रद्धांजलि लिखने का वक्त नहीं मिला. क्या उनको याद नहीं किया जाना चाहिए?

आज जब फिल्म पत्रकारिता पूरी तरह से पीआर लेखन में बदल चुकी है, ऐसे में इस बात को नहीं समझा जा सकता है कि वे जिस दौर में फिल्मों पर लिखते थे उस दौर में प्रिंट के माध्यम से फिल्मों का प्रचार होता था. आम जनता फ़िल्मी पत्रकारों के लिखे के आधार अपनी राय बनाया करती थी. ‘चित्रलेखा’, ‘फ़िल्मी कलियाँ’ जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से मदान साहब ने फिल्मों पर एक अलग तरह के लेखन की शुरुआत की. वे विजुअल लिखते थे. यानी उनको पढ़ते हुए मन में दृश्य कौंधने लगते थे. उस जमाने में जब आज की तरह अंतरराष्ट्रीय फ़िल्में उपलब्ध नहीं होती थीं, वे अंतराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में फ़िल्में देखते थे और इंटरनेशनल फिल्मों के एक बड़े जानकार थे. फेलिनी, बुनुयेल जैसे न जाने कितने फिल्मकारों की फिल्मों से पहला परिचय उनके लिखे के माध्यम से ही हुआ.

अब यह बात तो मैं कितनी बार लिख चुका हूँ कि अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘जंजीर’ का पीआर उन्होंने हरिवंश राय बच्चन के आग्रह पर किया था. बहरहाल, अंत में एक घटना याद आ रही है. 1990 के दशक के शुरूआती वर्षों की बात है शत्रुघ्न सिन्हा राजनीति में आ चुके थे. उनकी प्रेस कांफ्रेंस बारहखम्बा रोड पर होलीडे इन होटल(अब ललित) में था. मदान साहब ने वहां शत्रुघ्न सिन्हा से राजनीति में जाने को लेकर एक चुभता हुआ सा सवाल किया. जवाब में शॉटगन ने कहा- इस दीपक में तेल नहीं है! जाहिर है, वे बहुत नाराज हो गए थे.

कहने का मतलब यह कि आज की तरह तब फिल्म पत्रकारिता फिल्मवालों से दोस्ती गांठने की पत्रकारिता नहीं थी. बल्कि फिल्म पत्रकार फिल्म वालों से सवाल किया करते थे, उनको असहज बना दिया करते थे. इसीलिए उनके लिखे की क़द्र थी.

फिर अंत में एक सवाल- क्या वे सच में गुमनामी में भुला दिए जाने के काबिल थे?

प्रभात रंजन 

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