जीवन और कला के अंतर्संबंधों की बेहतरीन किताब ‘सिमिट सिमिट जल’

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कुछ किताबें ज्ञान बढाने के लिए होती हैं, कुछ मन को गुदगुदाने के लिए, कुछ गर्मी की छुट्टियों में पहाड़ों पर पेड़ के नीचे लेटकर पढने के लिए. गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो चुकी हैं. अगर आप इन छुट्टियों में कहीं जाने की योजना बना रहे हैं तो मेरा आग्रह है कि कैमरे, फोन के अलावा कुछ किताबें भी अपने साथ रख लें, ऐसी किताबें जो आपके जीवन अनुभव को समृद्ध बनाएं. गहरे जीवन अनुभवों से निकली किताबें जो आपके मन में उतरती चली जाए. इंसानी जीवन से अधिक विविध और बीहड़ कुछ नहीं होता है.

ऐसी ही एक किताब है यायावर कलाकार सीरज सक्सेना और यायावर कवि पीयूष दईया की बातचीत की किताब ‘सिमिट सिमिट जल’.यह एक ऐसी किताब है जिसका जिक्र आप बिकने वाली किताबों की सूची में नहीं पायेंगे. यहाँ तक कि इसके लेखक-कलाकार भी आपको सोशल मीडिया पर इसका प्रचार करते नहीं दिखेंगे. लेकिन पिछले दिनों आई कुछ बेहद महत्वपूर्ण किताबों में मेरे लिए यह किताब भी है.

चित्रकार, सिरेमिक कलाकार सीरज सक्सेना का जीवन ही यात्रा है और कला के विविध रूप जैसे उस बीहड़ यात्रा के अलग अलग मील स्तम्भ. बातचीत की इस किताब की शुरुआत ही सीरज के बचपन की यात्राओं से होती है और इससे कि उन यात्राओं ने किस तरह उनके कला जीवन को प्रभावित किया. किस तरह बचपन में उन्होंने जीवन के जो विविध रूप देखे उसने उनके कला जीवन को रूप दिया आकार दिया. सीरज का यह कथन देखिये- “पलट कर अपने बचपन को देखने पर लगता है कि उसमें कला के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले बहुत कुछ प्रेरणादायक तत्त्व थे. जैसे, मानवीय सम्बन्ध, सामाजिक सरोकार, इत्यादि. या जब सितारों या साबुन से कोई गुलदस्ता बनाता या किसी और पदार्थ से कुछ और बनाता तब इनकी उपयोगिता के बजाय रस इसमें होता कि यह कुछ सुन्दर है जो बना है. प्रशिक्षण अलग था वहां. उस वक्त मुझे यह पता नहीं था कि इसमें एक तरह की उपयोगिता के अलावा कला भी है.”

कितनी सहजता से सीरज जी ने कितनी सुन्दर बात कही है. इस उद्धरण के पीछे इस किताब की एक अलग खूबी को रेखांकित करना भी है. इस तरह की कई किताबें पहले भी आई हैं. जो कलाकारों से बातचीत पर आधारित हैं. उनका कला जगत में अपना महत्व भी है. इससे इनकार नहीं किया जा सकता. लेकिन यह किताब इस मायने में अलग है कि यह कला के भारी भरकम जार्गन नहीं बनाती या पाठकों को उसमें उलझाकर आतंकित नहीं करती बल्कि जीवन और कला के अंतर्सबंधों को इतनी सहजता से हमारे सामने रखती है कि पढने वाले को एक तरह से कला के सूत्र मिलते हैं.

आज कला को लेकर इस तरह के किताबों की बहुत जरुरत है जो कला को किसी अलौकिक अनुभव की तरह नहीं बरतती हो बल्कि उसके सूत्र लौकिक जीवन से बड़ी सहजता से जोडती हो. इस तरह की किताब बच्चों को भी पढ़ानी चाहिए ताकि वे कला अनुभव को समझ सकें, महसूस कर सकें. इसके कई हिस्से ऐसे हैं जो मैंने रेखांकित करके रख लिए हैं ताकि जब मैं अपनी बेटी के साथ छुट्टी पर जाऊं तो उसे पढवाऊं ताकि वह भी समझ सके कि चित्रकला कोई  बाहरी चीज नहीं होती बल्कि वह हमारे अन्दर से ही पैदा होती है. अपने आसपास के अनुभवों से ही उपजती है. आखिर कला देखने का एक ढंग ही तो है- जीवन-जगत को देखने का एक नजरिया. इसी तरह से अमूर्त कला को समझा जा सकता है. सीरज जी कहते हैं- “मैं इस बात को पूरी तरह मानता हूँ कि संसार में कोई भी चीज अमूर्त है ही नहीं. अभी तक मनुष्य ने समूची प्रकृति ही नहीं देखी है. कितने हजारों रंग ऐसे होंगे जो अभी तक देखे नहीं गए हैं.” मुझे जादुई यथार्थवाद के महान लेखक मार्केज़ की वह बात याद आती है जिसमें उन्होंने कहा था कि जिसे दुनिया जादुई समझती है वह असल में हमारे अपने अनुभव, अपनी समझ की सीमा भी है. अमेज़न के जंगलों में कितना कुछ छिपा है जिसको अभी देखा जाना बाक़ी है.

यात्राओं ने सीरज जी के जीवन अनुभवों का विस्तार किया है और उनके कला अनुभवों, माध्यमों का विस्तार किया है. इस किताब में अलग-अलग तरह के परिवेश, अलग अलग तरके विविध व्यक्तित्वों से साक्षात्कार होता है. यह किताब एक साथ हमारी कला समझ को समृद्ध करती है, किसी किस्सागो के उपन्यास की तरह मजा देती है और निश्चित रूप से एक ऐसे कलाकार को समझने में हमारी मदद भी करती है जिसके लिए सफ़र ही मकाम है.

इस सुन्दर बातचीत, किताब के सुन्दर संयोजन के लिए पीयूष दईया का जितना धन्यवाद दिया जाए कम है. एक बीहड़, सघन अनुभवों वाले कलाकार के विविधवर्णी रूप को एक सुसंपादित किताब के रूप में प्रस्तुत कर पाना आसान काम नहीं था. पीयूष जी ने बहुत आसान बना दिया. एक कलाकार के शून्य से विराट तक के सफ़र को इतनी अच्छी तरह से सम्पादित करके हमारे सामने प्रस्तुत किया कि यह किताब अपने आप में कला शिक्षण की किताब की तरह भी बन पड़ी है.

छुट्टी में अपने साथ इस किताब को लेकर जायेंगे तो निश्चित रूप से अन्दर से कुछ और समृद्ध होकर लौटेंगे. यह मेरा विश्वास है.

पुस्तक: सिमिट सिमिट जल(सीरज सक्सेना के साथ एक संवाद)- पीयूष दईया; वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर 

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