‘लता सुर-गाथा’- आलोचना नहीं श्रद्धा की कथा

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इस साल निस्संदेह यतीन्द्र मिश्र की किताब ‘लता: सुर गाथा’ हिंदी की सर्वाधिक चर्चित किताब रही. लेकिन इस किताब को लेकर कोई विस्तृत टिप्पणी या समीक्षा पढने में नहीं आई है. आज कल समीक्षा की जगह पर प्रोमोशन चलने लगा है. किताब चाहे कितनी भी बड़ी हो, उसका विषय कितना भी महत्वपूर्ण हो लेकिन हिंदी में उनकी समीक्षाएं नहीं आती हैं. ‘लता: सुर गाथा’ की यह पहली समीक्षा है. लिखी आशुतोष भारद्वाज ने है. आशुतोष भारद्वाज किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं. इन्डियन एक्सप्रेस के स्टार रिपोर्टर आशुतोष जी को पत्रकारिता के लिए प्रतिष्ठित रामनाथ गोयनका अवार्ड चार बार मिल चुका है. फाइनेंसियल एक्सप्रेस में नियमित रूप से किताबों पर लिखते हैं. स्वयं हिंदी के अच्छे कथाकार हैं और इन दिनों नक्सलवाद की पृष्ठभूमि में एक उपन्यास लिख रहे हैं. अब पढ़िए उनकी नज़र में ‘लता: सुर गाथा’- मॉडरेटर

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यह तथ्य इसे स्थापित करने को पर्याप्त है कि यह हिंदी की उन गिनती की किताबों में हुई जिसे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला. कोई शुबहा अगर बाकी हो तो फिर एक दूसरा तथ्य यह कि यह किताब हिंदी सिनेमा की एक बड़ी संज्ञा पर केन्द्रित है — लगभग अलंघ्य-अवेध्य एक संज्ञा, जिसके शैदाई कई पीढ़ियों तक बिखरे हैं.

पूर्वज लेकिन बतला गए हैं कि इतिहास में संज्ञाएँ सत्य होती हैं, संवेदना महत्वहीन; जबकि साहित्य में संवेदनाएं सत्य होती हैं, संज्ञाएँ महत्वहीन.

चूँकि यह किताब एक ऐतिहासिक दस्तावेज के बजाय एक कलात्मक कृति होने का गुमान करती है, उस संज्ञा के संगीत पर एक अहम् दस्तावेज हो जाने का ख्वाब देखती है, इसलिए इस किताब की स्थापना का आधार यह भी, शायद यह ही, होना चाहिए कि यह उस संज्ञा की संवेदना को कितना थामती या थामना चाहती है। क्या यह किताब उस संज्ञा के बेशुमार प्रशंसकों में एक इजाफ़ा भर है या यह उस संज्ञा को पुरजोर टटोलती है, परखती है, उसकी शोहरत से किन्हीं अवसरों पर असहमत होने का दुस्साहस, जो साहित्य का बुनियादी कर्म है, भी करती है?

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वह संज्ञा एक तनहा कलाकार का रूपक है। सातेक दशकों से वह सिनेमा-संगीत के शिखर पर काबिज है, लेकिन इसके बावजूद उसके जीवन का हमें कोई इल्म नहीं। सिनेमा के स्याह पर्दे, समकक्ष बहनों से संभावित ईर्ष्या की कथायें, खुद में ही डूबे जीवन की डूबती व्यथायें —- वे सभी तत्व जो मिल कर इस शख्सियत का, उसके कंठ का निर्माण करते हैं, हमसे परे हैं। हमारे लिये वह सिर्फ एक गायिका है, पर्दे के पीछे से आती जिसकी आवाज के हम शैदाई हैं। उसके जीवन और स्वर-तंतुओं तक हमारी कोई पहुँच नहीं।

जाहिरा तौर पर जब कोई किताब आती है इस दावे के साथ कि लेखक ने छः बरसों तलक उससे संवाद किया, रिकॉर्डिड साक्षात्कार ही छः हजार मिनट से अधिक का हुआ तो हमारी, बतौर रसिक पाठक, उत्सुकता और अपेक्षा बढ़ती है कि अब हम उस संज्ञा की संवेदना से रू-ब-रू होंगे। उसकी रूह तलक उतरने का रास्ता यह किताब दिखायेगी। लेकिन छः सौ उन्तालीस पन्नों में बिखरी यह किताब, जिसमें तीन सौ सत्तर पन्ने तो सिर्फ साक्षात्कार ही है, उस संवेदना को लगभग छुये बगैर ही लौट आती है। यह हमें नहीं बतलाती कि किस कदर उस संज्ञा के एकांत की परछाईंयां उसकी आवाज में खनकती हैं, किस राग के किन स्वरों में उसका जीवन चुपचाप रिस आता है।

यह किताब उसके गीतों से जुड़े किस्सों के बारे में बखूबी बतलाती है। यह भी पूरे सामर्थ्य से साबित करती है कि उस आवाज के बगैर कई प्रख्यात संगीतकार हिंदी सिनेमा के गीतों में शास्त्रीय राग इतनी सहजता से नहीं पिरो पाते। इसका उल्लेख कई-कई बार करती है कि किस तरह वह आवाज एक बेनज़ीर उड़नखटोला बनी जिस पर सवार होकर ये संगीतकार स्वर के आसमान में उड़ सके। जिन दिलचस्प किस्सों को यह किताब बयान करती है, उनमें से एक नायाब यह है —- एक प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक दिल का दौरा पड़ने के बाद अमरीका के किसी अस्पताल में भर्ती थे। वे अपने स्वास्थ्य-लाभ के दौरान कई दिनों तक उस गायिका से एक चर्चित गीत फोन पर सुनते रहे थे। “हो सकता है उन्हें अपने कुशल-क्षेम के लिये,” लेखक लिखता है, उस संज्ञा की “दैवीय आवाज और इस गीत की महान संरचना में कुछ तासीर दिखाई दी हो।”

ऐसे किस्से इस किताब की जान हैं, लेकिन यही उसकी परिधि को सीमित भी करते हैं। यह किताब गीतों की संरचना को, उनमें निहित राग-रागिनियों को तो बतलाती है, लेकिन जो तत्व गायिका के जीवन में संगीत को अनिवार्य, पहला और आखिरी पड़ाव बनाते हैं, उन्हें नहीं उघाड़ती। इस तरह गहन संभावनाशील यह किताब सिर्फ गीतों के किस्सों में ही सिमट जाती है, उस कंठ के स्वर-तंतुओं के भीतर झांकने की अंतर्दृष्टि नहीं देती। शायद किसी अन्य किताब से इस कदर अपेक्षा न होती, लेकिन इस किताब से यह उम्मीद नाइंसाफी नहीं है।

लेखक ने अन्यत्र कहा है कि उसकी दिलचस्पी गायिका के जीवन में नहीं, संगीत को लिखने में रही है, कि यह किताब जीवनी नहीं, ‘सुर-गाथा’ है।

लेकिन क्या सुर और संगीत को उसके फनकार से अलग कर देखा जा सकता है? दिलचस्प यह कि खुद लेखक इसी किताब में एक जगह लिखता है: “उनसे इस तरह मिलना कि वे हमें अपने घर की माँ और मौसी सरीखी लगें, भला लगता है…(उन्हें) एक महान पार्श्वगायिका के धरातल से अलग हटकर देखने पर उनमें एक ऐसी मानवीय स्त्री छवि के दर्शन होते हैं, जो बेहद अपनी लगती हैं।”

इसके तुरंत बाद वे लेखक से कहती हैं: “आप ही बताइये…आखिरकार मैं भी एक इंसान हूँ। हर समय उस रूप में बंधी नहीं रह सकती हूँ, जिस रूप में हमेशा लोग मुझे देखते आये हैं…मुझे भी तकलीफ़ होती है। मेरे पेट में भी अक्सर दर्द होता है। सिर दुखता है और उस समय सिर पर तेल चुपड़ने के अलावा कुछ नहीं सूझता…और अक्सर तो यह भी मन करता है कि ऐसे ही बोर होने पर कहीं सड़कों पर घूमने निकल जाऊं, जैसा पहले बम्बई में अपने संघर्ष के दिनों में करती थी।”

यह निरीह लम्हे हैं उस कलाकार के। लेकिन कलाकार की निरीहता शारीरिक कम, रूहानी अधिक होती है। यह किताब उसके पेट के दर्द का तो उल्लेख करती है, उस रंजो-ग़म का नहीं जिसने उसकी रूह को निश्चय ही मरोड़ा होगा, निचोड़ा भी होगा। लेखक “मानवीय स्त्री छवि” का उल्लेख तो करता है, लेकिन उस छवि की सूरत और सीरत को नहीं टटोलता, उस स्त्री के मानव को नहीं उघाड़ता।

यह किताब, इसलिये, उस संज्ञा की आवाज का विकीपीडिया अधिक है, उसकी भूल, फिसलन, उत्थान-पतन, वासना-व्यसन का मानवीय दस्तावेज नहीं।यह किताब हमें उस गायिका से नहीं, उसके गाये गीतों से परिचित कराती है, जिनसे हम निरे अपरिचित नहीं है।

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सांगीतिक सफर पर लिखना अपने आप में समस्याग्रस्त नहीं है। लेकिन इस रास्ते में दो बड़े रोड़े हैं। अव्वल तो यह रास्ता इस संज्ञा को महज रोचक किस्सों के दायरे में सीमित करता है। दूसरे, इस रास्ते पर भी किताब कहीं-कहीं लड़खड़ाती है। लेखक का साक्षात्कार तीन सौ सत्तर पन्नों में फैला है लेकिन कई जगह उसके प्रश्नों के भीतर भोलापन बजने लगता है। गौर करें:

प्रश्न: आपका हिंदी सिनेमा में ऑल टाइम फेवरेट एक्टर कौन है?

उत्तर: महमूद को मैं बहुत ही अच्छा आर्टिस्ट मानती हूँ।

प्रश्न: वे कौन से क्रिकेट खिलाड़ी रहे हैं जिनसे आपके मित्रवत या पारिवारिक संबंध रहे हैं?

प्रश्न: राजनीति के क्षेत्र में वे कौन से लोग हैं जो आपके पारिवारिक मित्र रहे हैं?

प्रश्न: आपको जलेबी बहुत पसंद है, यह सर्वविदित तथ्य है, मगर उसके अलग कुछ और मिठाईयाँ भी होंगी, जो आपकी पसन्द में शामिल रही हैं?

उत्तर: मुझे कैरामल कस्टर्ड और क्रिसमस के मौकों पर बनने वाले प्लम केक बहुत पसंद हैं।

प्रश्न: आपको गहनों का शौक रहा है?

प्रश्न: गले में कोई हार या किसी विशेष रत्न की माला पहनने का कभी मन हुआ है?

प्रश्न: सौन्दर्य-प्रसाधन की वस्तुयें जो कमोबेश हर एक स्त्री की कमजोरी होती हैं। आपने ऐसा कौन सा प्रसाधन हमेशा के लिये अपनी पसन्द के तौर पर इस्तेमाल किया है?

प्रश्न: दीदी कभी सिर में दर्द होने पर कौन सा तेल लगाती हैं?

उत्तर: पैराशूट नारियल तेल।

प्रश्न: आपको किस तरह की साड़ियाँ पसंद हैं?

प्रश्न: दीदी यह बतायें कि जब आपके प्रशंसक आपको श्रद्धा, प्रेम, भक्ति के भाव से देखते हैं, तब उस समय कैसा लगता है?

क्या इस किताब को एक संपादक की दरकार है, जो श्रद्धा के बजाय किसी दूसरी भूमि पर इसका दूसरा ड्राफ्ट लिख दे?

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लेखक संज्ञा को एक अतिरिक्त भक्ति-भाव से बरतता है। लेखक निस्संदेह उसके कंठ का शैदाई है, कोई भी हो सकता है, लेकिन जब कोई लेखक शब्दों के घर में किसी संज्ञा को बरतता है तो उससे यह अपेक्षित होता है, और यह अपेक्षा नाजायज नहीं है कि वह क्रूर व निर्मम आलोचकीय दृष्टि से अपने विषय को परखेगा, अपने व्यक्तिगत चुनाव, पसंद व सरोकार से संघर्ष करेगा। एक बड़ी किताब अपने विषय के साथ संघर्ष करती है, उसके सामने समर्पण नहीं कर देती।

यह किताब आलोचकीय दृष्टि का हलफ़ नहीं उठाती। लेखक लगभग हर दूसरे पन्ने पर घोषित करता है कि इस शख्सियत की आवाज “दैवीय”, “चिरदैवीय”, “स्वर्गिक”, “पवित्र” है। “पता नहीं वे कोई मायाविनी हैं या फिर वास्तव में अभिशप्त गन्धर्व कन्या, जो अपने संसार का रास्ता भटक कर गलती से हमारे पास चली आयी हैं।”

“इस छोटी सी गुड़िया की लंबी कहानी में जितना कुछ भी हल्का, अधूरा और छोटा है, वह गलती से मेरी कलम़ की सीमा के चलते हुआ है।”

इन विशेषणों की बेइंतहा आवृत्ति इस किताब में होती है। यह भाषा तुलसीदास को मानस लिखते समय सुहाती होगी, संगीत पर लिखने वाले इक्कीसवीं सदी के एक लेखक से वाक्-भाव-संयम की उम्मीद बेमानी नहीं होगी।

इसी लेखक की लगभग ऐसी ही एक अन्य किताब, ‘देवप्रिया’, एक नृत्यांगना के साथ लंबे संवाद पर आधारित है। उस किताब की प्रकृति लेकिन इस किताब से एकदम भिन्न है। वहाँ भी नृत्यांगना का जीवन नहीं है, लेकिन लेखक नृत्यांगना के साथ कहीं गहरे उसकी कला में डूबता है। ‘देवप्रिया’ संज्ञा (नृत्यांगना) को केंद्र में नहीं रखती, संज्ञा का गुणगान नहीं करती बल्कि उसके कर्म (नृत्य) पर विमर्श करती है। ‘देवप्रिया’ नृत्य को इतना ऊपर उठा कर ले जाती है, उसे इतने रंगों और रूपों में उद्घाटित करती है कि आपको नृत्यांगना के जीवन की सुध ही नहीं होती। न ही लेखक नृत्यांगना के सामने नतमस्तक होता दिखाई देता है, जैसाकि गायिका के समक्ष होता है। लेखक का गायिका के साथ साक्षात्कार, नृत्यांगना के साथ हुये उसके संवाद के मुकाबले कहीं निचले पाये का नजर आता है। वह सच्चे अर्थों में नृत्य-गाथा है, यह सुर-गाथा होने का ख्वाब देखते हुये भी शायद संज्ञा-गाथा है। जो कमाल उसने अपनी पिछली किताब में हासिल किया, उसे वह इस मर्तबा क्यों नहीं पकड़ पाया, इसकी वजह जाहिर है।

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इसी वजह से लेखक एक गैरजरूरी कोशिश में उलझता दिखता है जब वह संज्ञा द्वारा गाये सिनेमा गीतों को शास्त्रीय संगीत के समकक्ष रखता है। सिनेमा और शास्त्रीय संगीत दो भिन्न विधायें हैं, दोनो के अनुशासन और फनकारों में समानता नहीं, उन्हें समान पाये पर बिठाने की जरूरत भी नहीं। लेखक को संगीत की अवश्य ही पुरजोर समझ है, लेकिन उसके बावजूद वह इस तुलना के जाल में उलझता है। शायद यह भी आराध्य-भाव के चलते ही हुआ होगा। आखिर सिनेमा और शास्त्रीय संगीत के बीच का भेद खुद यह गायिका ही तय कर देती है जब वह लेखक से कहती है: “अगर मैं रियाज़ करती, बैठकर तसल्ली से गाया होता तो शायद मैं बेहतर शास्त्रीय गायिका बन सकती थी।”

यह इस किताब का दुर्लभ लम्हा है। इस लम्हे में यह संज्ञा बेपर्दा है। उसने अपने सिने-गायकीय जीवन को इस एक वाक्य में उघाड़ दिया है, शायद खारिज भी कर दिया है। उसने तात्कालिक शौहरत और घनघोर लेकिन गुमनाम रियाज़ के फर्क को स्वीकार लिया है। लेखक के समक्ष हुये इस स्वीकार में इस संज्ञा की अनाम कसक सुनी जा सकती है, उसकी संवेदना की पुकार भी जिसे वह शायद लेखक से साझा करना चाहती होगी लेकिन नहीं कर पायी होगी, या शायद लेखक ने अनसुना-अनदेखा कर दिया होगा। इसलिये तकरीबन साढ़े छः सौ पन्नों के बाद जब आप यह किताब बंद करेंगे, जिनमें से बेहिसाब पन्नों में इस संज्ञा के गीतों का कोरा ब्यौरा दर्ज है, तो यह ख्याल सतायेगा —- पेट का दर्द तो ठीक, लेकिन, ओ फनकार, तेरी रूहानी तड़प का क्या?

क्या यह किताब एक विलक्षण विफलता है, जो अपने विषय के बहुत करीब होते हुये भी उससे बहुत दूर है? एक महत्वपूर्ण कोशिश जो छः साल तक चलते रहने के बाद भी मुकाम से पहले ही ठहर जाती है?

जाहिरा तौर पर यह महज सवाल है, प्रस्तावना नहीं, निष्कर्ष तो बिल्कुल नहीं। इस सवाल का जवाब आखिर इस पर निर्भर होगा कि इसे संज्ञा के निरे बखान बतौर पढ़ा जाये, या इससे संवेदना के अन्वेषण की भी अपेक्षा की जाये। पूर्वज जरूर बतला गए हैं —- इतिहास में संज्ञाएँ सत्य होती हैं, संवेदना महत्वहीन; साहित्य में संवेदनाएं सत्य होती हैं, संज्ञाएँ महत्वहीन.

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कोई चाहे तो इस किताब पर लिखे उपरोक्त शब्दों को उलट कर, खारिज कर, यह भी कह सकता है, इस निगाह पर जोर देते हुये कि इतिहास ही अंतिम सत्य है, इतिहास के पन्नों में एक जगमगाती हुई संज्ञा बतौर दर्ज होना ही कला का एकमात्र पुरूषार्थ है, और यह किताब तो खुद ही एक चमकती हुयी संज्ञा बन चुकी है। जाहिरा तौर पर यह निगाह भी बाकी निगाहों की तरह एकदम वाज़िब होगी।

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पुनश्च:

इस किताब की समस्या यह नहीं कि इसमें गायिका अनुपस्थित है, बल्कि यह उसके रूहानी संघर्षों के बजाय उसकी साड़ी के रंग, गहने, पैराशूट नारियल तेल इत्यादि में दिलचस्पी रखती है।
यह पूरी तरह गायिका के कर्म पर ही केंद्रित होती, उसके जीवन को एकदम नजरअंदाज करते हुये उसकी साधना और संगीत को बतलाती तो एक बड़ी कृति होती। जैसाकि इसी लेखक ने अपनी पिछली किताब ‘देवप्रिया’ में हासिल किया था। जितनी गहरी डुबकी लेखक ने ‘देवप्रिया’ में लगायी थी, अगर उससे आधे पानी में भी यह किताब गयी होती तो कहीं बड़ी होती।
Voyeurism आत्मसंघर्ष के उद्घाटन में नहीं, पैराशूट नारियल तेल, जलेबी और क्रिसमस केक में शायद झलकता है।
इस किताब की समस्या यह है कि यह महत्वपूर्ण कोशिश होने के बावजूद आलोचना नहीं भक्ति का दस्तावेज है।

एक युवा लेखक से श्रद्धा के बजाय निर्मम आलोचना की उम्मीद रखना, उससे यह अपेक्षा करना कि वह अपने पिछले प्रतिमानों को अपनी हर आगामी किताब में ध्वस्त कर ही आगे निकलना चाहेगा या कम-अस-कम निकलने की चाह रखेगा, बेमानी है क्या?

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