प्रभास को देखते हुए विनोद खन्ना के डील डौल की याद आ रही थी!

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बाहुबली फिल्म की अभूतपूर्व सफलता से मुझे जे के रोलिंग के हैरी पौटर की सफलता याद आ रही है. हालाँकि वह किताब थी. खैर इस फिल्म ने भी बड़े पैमाने पर लोगों की कल्पनाओं, उत्सुकताओं को जगा दिया है. बाहुबली फिल्म पर यह लेख विमलेश शर्मा ने लिखा है जो अजमेर में रहती हैं- मॉडरेटर

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फैंटेसी आकर्षित करती है क्योंकि वहाँ तर्को की उलझनें मौन हो जाया करती है। बाहुबली-2 इसी बात को रेखांकित करती हुई अपने नैसर्गिक रंगों से आपको उस कल्पना लोक में ले जाती है जहाँ राजसी परियाँ हैं,  एक राजकुमार है और कथानक को आगे बढ़ाते परम्परागत सियासी घटनाक्रम। पर फिल्म देखते वक्त मेरे लिए , कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा उस सवाल से अधिक अहमियत कुछ और रख रहा था और वह था अपनी आँखों से प्रभास को पहली मर्तबा बड़े पर्दे पर देखना। मेरे जेहन में यह एक नायक का जाना और दूसरे का आना था। मैं जाने क्यों ऐतिहासिक किरदारों में,  राजसी वस्त्रों में विनोद खन्ना और प्रभास के डील डौल की तुलना कर रही थी।

दक्षिण नाटकीय प्रस्तुतियों की प्रभाविकता में बेजोड़ है, यह बात एक बार फिर बाहुबली से सिद्ध होती है परन्तु फिल्म का हर दृश्य प्रभास के नायकत्व के विस्तृत फलक से जुड़ा होकर भारतीय धीरोदात्त नायक की एक नयी परीभाषा भी गढ़ता है । फैंटेसी हो, प्रभास सा महानायकत्व हो तो आप  बौद्धिकता को छोड़ उसके साथ बहने पर मजबूर अपने आप हो जाएँगे।

प्रभास के बाद कटप्पा का अभिनय, स्वाभिमानिनी नायिकाओं को टक्कर देता है। कटप्पा, माने न्यायशास्त्र की कुटिलताओं के भेंट चढ़ता एक निर्दोष मानव। अपने प्राण प्रण की रक्षा में यह मुझे अनेक स्थानों पर उसने कहा था कि याद अनायास ही दिला जाती है। शिवा द्वारा शीतल रात में चकोर पक्षियों के दृश्य को प्रेमिल दृष्टि से देखने से इतर उन्हें आँच पर पका कर खाने की इच्छा, कटप्पा की परिवेश और कार्यजन्य विविधता  से उपजी मनसा दृष्टि को दर्शाती है। देवसेना और बाहुबली तथा अवन्तिका और शिवा के प्रेम प्रसंग औदात्य भावों को मानवीय पृष्ठभूमि पर खड़ा करते हैं । फिल्म स्त्री पुरुष को एक धरातल पर तो खड़ा करती ही है पर साथ-साथ अतिमानवीय प्रसंगों में भी मानवीय करूणा भर देती है।

फैंटेसी है तो फिल्म को इतिहास की कसौटियों पर तौलना बेमानी होगा पर कुछ बातें फिर भी है जो चेतना के द्वार खटकटाती है। फिल्म में दो मर्तबा पिंडारियों का जिक्र हुआ है, एक तरफ उनकी जीवित चेहरों को जल समाधि में तब्दील कर देने की निर्ममता है तो दूसरी ओर भयंकर आक्रमण!  दरअसल चौंक इसी आक्रमण में निहित है। पिंडारी दल, वो भी इतनी बड़ी संख्या में चौंकाता है। इतिहास में इन दलों का इतनी अधिक संख्या में होने का उल्लेख कम ही है।

प्रभास का दीप-दीप पौरुष तमाम ऊब और कौतुकों को झेलने का धीरज देता है तो हर किरदार का डूब कर किया गया अभिनय फिल्म के दृश्यों को सजीवता प्रदान करता है। प्रेम के पगे हुए  और मातृत्व के दृश्य भावनाओं को खाद देते हैं तो खलनायकों का अभिनय जुगुप्सा भाव पैदा कर उनके अभिनय को पूरे अंक दे देता है।शिवगामी और देवसेना के किरदारों को राम्या और अनुष्का  अपने  दमदार अभिनय के दृष्टान्त से प्रस्तुत करती हैं ।

कल्पना लोक में खड़ा माहिष्मति साम्राज्य स्त्री संदर्भों के दमदार निर्णयों, एक माँ के अविचल इंतज़ार और मरकर भी प्रण निभाने की लकीर प्रस्तरों पर खींचता है तो वहीं धर्म के लिए किसी के भी विरुद्ध जाने की बात कह जीवनसाथी के साथ भी खड़ा होता है। घटनाएँ बतलाती हैं कि समय हर कायर को शूरवीर होने का अवसर प्रदान करता है। राजा और प्रजा के सहसंबधों पर आधारित यह कहानी राजनीतिक हलकों को भी चुपचाप समाजवाद का संदेश दे जाती है।

निर्देशक राजमौली ने पटकथा को इतने रोमांचक तरीके से पर्दे पर दर्शाया है कि दर्शक एकबारगी कहानी को भूल जाता है। मध्यांतर तक तीसरे भाग के आने के कयास भी मन में उग आते हैं। नि:संदेह प्रभास के मार्फत बाहुबली का जुनून हर दृश्य में दर्शक के सर चढ़ कर बोलता है। सिनेमेटोग्राफी और तकनीक इस फिल्म को एक नया आयाम देती है वहीं नीले पर्दे पर फैंटेसी के दर्शाये जाने के जोखिम को भी एक सकारात्मक और नयी दिशा प्रदान करती है।

इस फिल्म की सफलता दक्षिण के ही निर्देशन में आने वाली महाभारत की  सफलता भी सुनिश्चित करती है। बौद्धिकता से परे अगर बालमन के उत्साह के साथ आप इस रोमांस और कौतुक को देखने जायें तो यह फिल्म आपको पसंद आ सकती है।

-विमलेश शर्मा

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