युवा शायर #11 विजय शर्मा की ग़ज़लें

क्यों मैं रहने लगा हूँ यूँ ख़ामोश / कुछ तो मालूम हो गया है मुझे

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युवा शायर सीरीज में आज पेश है विजय शर्मा की ग़ज़लें – त्रिपुरारि
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ग़ज़ल-1

यमन की धुन पे ये किसका बदन बहलता है
हर एक शाम ये साहिल पे कौन चलता है

किसी के होंठ की गर्मी जबीं को मिलते ही
बदन का ग्लेशियर आँखों से बह निकलता है

बदन तो अपना सलामत ही लाये हैं, लेकिन,
ये घर अँधेरे में क्यों क़ब्र सा दहलता है

हवस बदन को है कैसी गुनाहगारी की,
अभी जो हिज्र की पाकीज़गी में जलता है

मुहब्बतों की अज़ाँ हो रही है मुझ में ‘अर्श’
सो मेरे जिस्म का हर ज़र्रा आँख मलता है

ग़ज़ल-2

ख़ुद को सदियों पुकारना है मुझे
अपने होने का क्या पता है मुझे

क्यों मैं रहने लगा हूँ यूँ ख़ामोश,
कुछ तो मालूम हो गया है मुझे

मेरे रुख़ पर हवा से दस्तक दी,
कोई इस तरह जानता है मुझे

नींद है क़ैद गाह अब मुझको,
ख़्वाब तक देखना मना है मुझे

ज़ब्त ख़ाने में लिख दिया मैंने
अब तेरा ग़म तेरी वफ़ा है मुझे

चाँद टूटे तो माँग लूँ कुछ ‘अर्श’
टूटे तारों से क्या मिला है मुझे

ग़ज़ल-3

जिस भी जगह देखी उसने अपनी तस्वीर हटा ली थी
मेरे दिल की दीवारों पर दीमक लगने वाली थी

एक परिंदा उड़ने की कोशिश में गिर गिर जाता था
घर जाना था उसको, पर वो रात बहुत ही काली थी

आँगन में जो दीप क़तारो में रक्खे थे धुँआ हुए
हवा चली उस रात बहुत जब मेरे घर दीवाली थी

एक मुद्दत पर घर लौटा था पास जब उसके बैठा मैं
मुझमें भी मौजूद नहीं थी, वो ख़ुद से भी ख़ाली थी

‘अर्श’ बहारों में भी आया एक नज़ारा पतझड़ का
सब्ज़ शजर के सब्ज़ तने पर इक सूखी सी डाली थी

ग़ज़ल-4

तेरे ग़ुरूर मेरे ज़ब्त का सवाल रहा
बिखर- बिखर के तुझे चाहना कमाल रहा

वहीं पे डूबना आराम से हुआ मुमकिन
जहाँ पे मौजो-सफ़ीना में ऐतेदाल रहा

नहीं के शाम ढले तुम न लौटते लेकिन
तुम्हारी राह में सूरज ही लाज़वाल रहा

फिर अपना हाथ कलेजे पे रख लिया हमने
फिर उसके पांव की आहट का ऐहतेमाल रहा

सुलगती रेत पे इक अजनबी के साए -सा
मेरी ग़ज़ल में किसी शख्स़ का ख़याल रहा

ग़ज़ल-5

इस लम्हे का मतलब कितना गहरा है
हम दोनों के बीच जो लम्हा ठहरा है

रेत की राहें चाँद तलक भी जायेंगी
सामने मेरे बस सहरा ही सहरा है

सुनते हैं उम्मीद पे है दुनिया क़ायम
अपनी तो उम्मीदों पर भी पहरा है

जो तेरी क़ुर्बत के साए में ठहरे
उन सारे लम्हों का रंग सुनहरा है

उड़ती रेत पे अक्स तुम्हारा है या फिर
‘अर्श’ ये पतझड़ के मौसम का चेहरा है

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1 COMMENT

  1. किसी के होंठ की गर्मी जबीं को मिलते ही
    बदन का ग्लेशियर आँखों से बह निकलता है

    बदन तो अपना सलामत ही लाये हैं, लेकिन,
    ये घर अँधेरे में क्यों क़ब्र सा दहलता है
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    क्यों मैं रहने लगा हूँ यूँ ख़ामोश,
    कुछ तो मालूम हो गया है मुझे

    मेरे रुख़ पर हवा से दस्तक दी,
    कोई इस तरह जानता है मुझे
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    एक मुद्दत पर घर लौटा था पास जब उसके बैठा मैं
    मुझमें भी मौजूद नहीं थी, वो ख़ुद से भी ख़ाली थी
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    सुलगती रेत पे इक अजनबी के साए -सा
    मेरी ग़ज़ल में किसी शख्स़ का ख़याल रहा
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    रेत की राहें चाँद तलक भी जायेंगी
    सामने मेरे बस सहरा ही सहरा है

    KAMAAL KAR DIYA VIJAY JI NE WAAH WAAH WAAH…YUVA SHAYAR ? AESA KALAAM TO USTADON KE YAHAN BHI MUSHKIL SE PADHNE KO MILTA HAI …MERI DUAYEN VIJAY KE HAMESHA SATH RAHENGI…YE URDU SHAYRI KE FALAK PAR ROSHAN SITARA BANNE KI RAAH PAR HAIN.
    JIYO BARKHURDAAR.
    NEERAJ

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