भारतीय उप-महाद्वीप की भाषाओं की चैपियंस ट्रॉफी

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चैम्पियंस ट्रॉफी जो भी जीते इतना तय है कि अंग्रेजियत हारेगी. इंग्लैण्ड तो पाकिस्तान से पहले ही हार चुकी है. यह पहली बार है जब आईसीसी के किसी टूर्नामेंट में तीन ऐसे देश सेमी फाइनल में पहुंचे हैं जिनका डीएनए एक रहा है. जिसे मजाक में वीरेंदर सहवाग ने दादा, बेटा और पोता कहा था- भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश. इतना तय है कि जीत इनमें से किसी एक की ही होगी. भारत की जीत होगी तो एक देशभक्त होने के कारण मुझे बेहद ख़ुशी होगी. लेकिन उससे भी बड़ी ख़ुशी इस बात से हुई है कि सेमी फाइनल स्तर पर पहुँचने वाली इन तीन टीमों में ऐसे खिलाड़ी बहुतायत में हैं जिनको अंग्रेजी नहीं आती.

क्रिकेट को किसी ज़माने में जेंटलमेंस गेम कहा जाता था. एकदम यूरोपीय शिष्टाचार की भांति. सबको याद होगा जब सौरव गांगुली ने नेट वेस्ट ट्रॉफी के फाइनल को जीतने के बाद लॉर्ड्स ग्राउंड की बालकनी से अपना टी शर्ट खोलकर हवा में लहरा दिया था तो उनकी बेहद आलोचना इस बात के कारण हुई थी कि उन्होंने भद्रजनों के इस खेल की मर्यादा को भंग कर दिया. उससे भी पहले 80 के दशक में क्रिकेट देखने वालों को यह याद होगा कि भारत के पहले विश्वविजेता कप्तान और शायद महानतम ऑलराउण्डर कपिल देव के अंग्रेजी बोलने के लहजे का मजाक उड़ाया जाता था. बाद में उसी मजाक उड़ाने को भुनाने के लिए उनको रैपिडेक्स इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स किताब का विज्ञापन दिया गया था. जो भारत की सबसे अधिक बिकने वाली किताब बन गई थी. कल जब मैंन ऑफ मैच का पुरस्कार लेने के बाद जब हसन अली उर्दू बोल रहे थे या मैच जीतने के बाद पाकिस्तान के कप्तान सरफ़राज़ अहमद टूटी फूटी अंग्रेजी बोल रहे थे तो क्रिकेट की मातृभूमि इंग्लैण्ड की धरती पर अंग्रेजी भाषा का मर्सिया लिख रहे थे. इस चैम्पियंस ट्रॉफी में हिंदी, उर्दू, बांगला बोलने वाले खिलाड़ियों का दबदबा है.

भाषा की यह जीत मेरे लिए उस जीत से कहीं बड़ी है जो आने वाले इतवार को होने वाली है. तीन सहोदर देश पहले ही एक बड़ी जीत जीत चुके हैं.

-प्रभात रंजन

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