लापता लड़की…स्लीपिंग पार्टनर नहीं!

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वकील-लेखक अरविन्द जैन के कहानी संग्रह ‘लापता लड़की’ की समीक्षा लिखी है लेखक सुधांशु गुप्त ने- मॉडरेटर

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अरविंद जैन का कहानी संग्रह ”लापता लड़की” पठनीयता और लोकप्रियता के पैरोकारों के लिए नहीं है। उनके लिए तो यह संग्रह बिलकुल भी नहीं है, जो कहानियों में ”रसपान” खोजते हैं। और हां, अम्तर्य सेन हर साल कोख में गुम हो जाने वाली जिन लड़कियों का जिक्र करते हैं, यदि आप उनकी तलाश करना चाहते हैं, तब भी यह कहानी संग्रह आपके लिए नहीं है। देह की ”फिफ्टी शेड्स” तलाश रही आंखों के लिए भी यह कहानी संग्रह उपयुक्त नहीं है। ”लापता लड़की” उन लोगों के लिए भी मुफीद नहीं है, जो समाज में ”पोजिटीविटी” का प्रचार प्रसार करते हैं और मान कर चलते हैं कि स्त्री की दुनिया बदल रही है-बदल गयी है, जिनका यह सौ फीसदी मत है कि लड़कियां आत्मनिर्भर हो रही हैं, वे आजादी से अपनी जिंदगी जी पा रही हैं, आजादी को वे ”एन्ज्वॉय” कर रही हैं, अपने फैसले खुद कर रही हैं और óी अस्मिता और अस्तित्व की लड़ाई का अंत हो चुका है, आज स्त्री और पुरुष दोनों बराबर हैं, जो समाज में ”निर्भयाओं” को अपवाद स्वरूप घटनाएं मानते हैं, जिनका मानना है कि स्त्री आज अपनी देह के संबंध में सारे फैसले स्वयं ले रही हैं, जो इस बात से इनकार करते हैं कि किस तरह आजादी के नाम पर óी को एक ”ब्रांड” में बदला जा रहा है। स्त्री के प्रति उस मर्दवादी सोच, जो कहती है कि स्त्री ”भोग” के लिए ही पैदा हुई हैं, इसलिए उनका अधिक से अधिक भोग किया जाना चाहिए, रखने वालों के लिए भी नहीं है यह कहानी संग्रह। पिछले कुछ वर्षों में यह आम धारणा बन रही है कि कहानी स्पष्ट और आसान भाषा में लिखी जानी चाहिए यानी ऐसी भाषा में जिसे आम आदमी भी समझ सके। कहानी की पक्षधर ये बिरादरी किसी भी तरह की जटिलताओं और संकेतकों के खिलाफ है। जीवन की तरह ही कहानी को भी ”ब्लैक एंड व्हाइट” में देखने वाले लोगों को भी यह संग्रह निराश करेगा। नायक-नायिका की कहानियां पढ़ने का आदी पाठक कहानियों में ”रेफ्रेंसेस” को पसंद नहीं करता, और अरविंद जैन का कहानी संग्रह रेफ्रेंसेस से भरा पड़ा है, केवल साहित्यिक रेफ्रेंसस ही नहीं, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, न्यायिक रेफ्रेंस और फिल्मी रेफ्रेंस इन कहानियों में भरे पड़े हैं। न जाने कितनी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय किताबों के नाम कहानी में इस तरह आए हैं कि इन्हें जाने और समझे बिना कहानी को समझना कठिन है। लिहाजा सपाट बयानी की कहानियां पढ़ने वाले पाठक को भी ये कहानियां रास नहीं आएंगी।
तो फिर लापता लड़की किसके लिए है? इराक की निर्वासित कवयित्री दुन्या मिखाइल का कहना है कि कविता कोई दवा नहीं है, वह एक्सरे है जो समाज की स्थिति को दिखाती भर है। कहानी के संदर्भ में भी यही बात कही जानी चाहिए? लेकिन एक्सरे तो केवल शारीरिक स्थिति को ही दिखा सकता है, उसमें मानसिक दुविधाएं, जटिलताएं, इनसानी सोच, शोषण के बदलते तरीके, बाजार का लड़कियों के जीवन पर पड़ता प्रभाव, आजादी के नाम पर शोषित हो रही लड़कियां, ब्रांड में बदलती लड़कियां , मॉडलिंग और देह की रूमानी दुनिया के अंधरे गलियारे, बलात्कार से जीवन भर कराहती स्त्री, लड़कियों की अस्मिता, पितृसत्ता के खिलाफ लड़कियों का संघर्ष, न्यायक्षेत्र में बैठे शिकारियों के खेल, बलात्कार के बाद कानून की नौटंकी…”दलालों से सावधान” के निहितार्थ, ये सब एक्सरे में कैसे देखा जा सकता है। तो अरविंद जैन की कहानियां एक्सरे से थोड़ा आगे बढ़कर यही सब दिखाती हैं। परंपरागत शिल्प और परंपरागत भाषा को मीलों पीछे छोड़ते हुए ये कहानियां नया मुहावरा और नया शिल्प देती हैं। संकेतों में (वे भी तब समझ में आएंगे जब आप सारे रेफ्रेंसेस समझेंगे) ये कहानियां आगे बढ़ती हैं और आज की लापता हो रही लड़कियों को बताती हैं कि वे कैसे, क्यों और किन शक्तियों द्वारा लापता की जा रही हैं।
छोटी-छोटी 10 कहानियों का यह संग्रह लगातार गुम हो रही स्त्री की खोज को बेहद संवेदनशील तरीके से आगे बढ़ाती हैं। ये कहानियां विमर्श को एक मंच देती हैं। लेकिन ये कहानियां आपको कोई मुक्तिमार्ग नहीं दिखातीं। ये मुक्तिमार्ग आपको स्वयं ही खोजना होगा। ये कहानियां ”डैड एंड” पर जाकर रुक जाती हैं। लेकिन यह एक ऐसा डैड एन्ड है, जो आपको बेचैन करता है, जहां से आप स्वयं रास्ते तलाशने की प्रक्रिया शुरू करते हैं। यह तय है कि इन कहानियों को पढ़कर आप सो नहीं सकते। सोचने…और सोचने और लगातार सोचने के लिए बाध्य करती हैं ये कहानियां। कहानियों के अंत में भी भविष्य की कोई स्त्री आप नहीं खोज सकते। अरविंद जैन का स्वयं कहना है स्त्रियों के लिए फिलवक्त यही स्थिति है और अभी यही स्थितियां बनी रहेंगी। मैंने अपनी कहानियों के जरिये समाज की उस वीभत्स तस्वीर को दिखाने की कोशिश की है जिसे विकास और आजादी के कालीन के नीचे छिपाये रखने का प्रयास लगातार किया जा रहा है, छिपाया जा रहा है। मेरी कहानिया पढ़कर यदि कोई जागरूक होता है, इन स्थितियों को बेहतर ढंग से समझने का प्रयास करता है तो यही मेरी सीमित अर्थों में उपलब्धि कही जा सकती है। तो इन कहानियों को पढ़ना शुरू करें?
लेकिन क्या कहानियों को पढ़ने का कोई क्रम हो सकता है या होना चाहिए? क्या कहानियों का कालक्रम लेखक और कहानियों को समझने में मदद करता है? क्या कालक्रम जानना कहानियों की जटिलता को कम करता है? क्या कहानियों का रचना समय, समाज और बदल रही स्थितियों को समझने में मदद करता है? कम से अरविंद जैन की कहानियों के संदर्भ में इन सभी सवालों के जवाब ”हां” में हैं। ”लापता लड़की” में लेखक ने इस क्रम का पालन नहीं किया है। लेकिन यहां पाठकों की सहूलियत के लिए हम एक क्रम में ही इन कहानियों पर बात करेंगे, ताकि कहानियों के साथ साथ अरविंद जैन और उनके साथ साथ समाज के के विकासक्रम (विनाशक्रम) को बेहतर ढंग से समझा जा सके।
इस क्रम में सबसे पहली कहानी है ”अनुवाद।” यह उस दौर की कहानी है जब अरविंद जैन हरियाणा के रोहतक जिल में पढ़ाई लिखाई में मसरूफ थे। वह युवा हो रहे थे और खुली आंखों से समाज को देखने और समझने का प्रयास कर रहे थे। यह वह दौर था जब भारतीय समाज में ”यौन क्रांति” की आहट सुनाई पड़ने लगी थी। जब प्रेम धीमी गति से हुआ करता था। शहरों और छोटे शहरों में ”स्पीड” का दखल बस हो ही रहा था। कहानी की शुरुआत नायक के एक पुराने मित्र संकट लाल की एक कॉल से होती है। और नायक 25 साल पुरानी दुनिया में लौट जाता है। यह दुनिया प्रदेश के एक कस्बे की दुनिया है। यहां माना जाता है कि सिर्फ ”डेढ़ आदमी” पढ़ा लिखा है। यौन क्रांति की आहट है। कॉलेज, होस्टल, तीन पत्ती, फेयर एंड लवली गर्ल्स हैं और है सफेद रिबन वाली एक लड़की छवि। बिना किसी सेक्स और हिंसा के दोनों -नायक और छवि के बीच प्रेम आकार ले रहा है। लेकिन निजी संघर्ष प्रेम को आकार लेने दें इससे पहले ही सफेद रिबन वाली लड़की चोटियों की जगह जूड़ा बनाने लगती है, उसकी गोद में एक बच्चा आ जाता है। नायक रियल नायक में कनवर्ट हो जाता है। जब छवि से उसकी दोबारा मुलाकात होती है तो छवि तीन बच्चों की मां बन चुकी है। वह नायक के नायकत्व को पहचानती है और कहती है, मैं तुम्हें लगातार पढ़ती-सुनती रही हूं….लिखा-अनलिखा, कहा-अनकहा एक-एक शब्द…पूरी किताब कई बार पढ़ चुकी हूं। चाहती हूं कि इसका अनुवाद करूं। नायक कहता कुछ नहीं बस सोचता है कि , ऐसे मूल जीवन का पता नहीं अनुवाद कैसा होगा। संग्रह की यह इकलौती कहानी है जिसमें सांकेतिक भाषा का कम से कम इस्तेमाल किया गया है। अगर सांकेतिक भाषा है भी तो केवल प्रेदश से संबंधित है। वह भी इतनी स्पष्ट है कि आप आसानी से पहचान लेते हैं कि यह हरियाणा के रोहतक जिले की कहानी है। निजता की कुछ छवियां इस कहानी में दिखाई देती हैं अन्यथा पूरा संग्रह वैचारिक ही लगता है। यह कहानी अरविंद जैन की युवावस्था और शिक्षा प्राप्त करने की कहानी है। इसके बाद अरविंद जैन हरियाणा से दिल्ली आ गये। और यहां आकर प्रोफेशनल वकील के रूप में काला चोगा पहन लिया। वकील रहते हुए अरविंद जैन ने न्यायपालिका के तमाम अंधेरे गलियारों और कानून और न्याय के रखवालों के विकृत चेहरे देखे। कानूनों के ”लूपहोल्स” को देखा और यह समझने की कोशिश की क्यों और कैसे ये लूपहोल्स छूट गये हैं या जानबूझकर छोड़ दिये गये हैं। कोर्ट कचहरी की वास्तविक और विकृत दुनिया अरविंद जैन के सामने खुलती चली गयी। साहित्य के प्रति प्रेम ने उन्हें इन पर कहानियां लिखने के लिए प्रेरित किया। और कचहरी के इन्हीं प्रत्यक्ष अनुभवों ने ”घूस यार्ड” कहानी को जन्म दिया। इस कहानी को पढ़ते हुए काफ्का बरबस याद आ जाते हैं। उनका उपन्यास ट्रायल इसी पृष्ठभूमि पर लिखा गया था। लेखक ने कुत्ते, बिलाव, बिल्लियों, लंगूर और चूहों के जरिये कचहरी का जो चित्र खींचा है वह बेहद डराने वाला है। वकील जब अदालत के लिए निकलते हैं तो उसे लेखक ने ”शूटिंग” पर जाना कहा है। पूरी कहानी प्रतीकों में कचहरी की परतें खोलती है। घूस यार्ड यानी घूस लिये और दिये जाने का अड्डा। कहानी को ध्यान से पढ़ने पर यह भी समझ आता है कि कौन सा जानवर किस का प्रतीक है। यह कहानी भारतीय समाज पर, पूरी व्यवस्था पर, न्यायपालिका पर एक कटाक्ष है। यह कहानी एक जरूरी और आपकी नींद उड़ा देने वाली कहानी है, जिसे पढ़ना और समझना बेहद जरूरी है। यह इसलिए भी जरूरी है कि कचहरी की अंधेरी गुफाओं को पहचान सकें, हालांकि पहचानने के बावजूद आपके पास इन्हीं अंधेरी गुफाओं से गुजरने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।
कचहरी के अनुभवों ने ही अरविंद जैन को सिखाया कि यहां किस तरह ”बड़े वकील” की विरासत को उनके पुत्र आगे बढ़ाते हैं। कितने सहज और स्वाभाविक रूप से यह विरासत आने वाली नस्लों को सौंप दी जाती है। किस तरह वकीलों का धर्म पॉवर वुमन और मनी के इर्द गिर्द घूमता है। अरविंद जैन ने यहां रहते हुए न्यायपालिका के तमाम छिद्रों को तो देखा ही यह भी देखा कि वकील का असली ”धर्म” क्या है और वे कैसे इस ”धर्म” का पालन करते हैं। इन अनुभवों ने जन्म दिया कार्बन कॉपी को। ”कार्बन कॉपी” वकीलों के इसी धर्म को चित्रित करती है। कहानी का नायक मिस्टर कानूनवाला वास्तव में कोई एक बड़ा वकील नहीं है बल्कि तमाम बड़े वकीलों को मिलाकर इस किरदार की रचना की गयी है। अगर आप प्रभावशाली वकीलों से वाकिफ हैं तो बहुत से वकीलों की शक्लें कानूनवाला में देख और पहचान सकते हैं। कानूनवाला सिगार पीते हैं। छोटी उम्र की लड़कियों को ”सहारा” देते हैं। ऐसी ही सहारा पाई अंकिता उनकी सचिव है। कहानी उनका पूरा साम्राज्य है। मिस्टर कानूनवाला की कोठी आनंदभवन से कम शानदार नहीं है। प्रतीकों में कहानी वकील समुदाय पर करारी चोट है। मिस्टर कानूनवाला का एक बेटा है अनुभव। पिता और पुत्र की पटरी नहीं बैठती। लेकिन मिस्टर कानूनवाला अनुभव को एक ही जवाब देते हैं, दि किंग एंड लायर मे डाई बट दे नेवर रिटायर। इसके बाद मिस्टर कानूनवाला अनुपस्थित हो जाते हैं और उनकी जगह उनका बेटा ले लेता है। वह भी बिलकुल अपने पिता की तरह ही व्यवहार करने लगता है। कॉर्बन कॉपी एक खूबसूरत कहानी है जो आम इनसान की न्याय के प्रति आस्था पर गहरी चोट करती है। यह कहानी बताती है कि वकीलों का चक्रव्यूह ऐसा जटिल है जिससे बाहर निकलने के सभी रास्ते बंद हैं।
इसी दौर की एक अन्य कहानी है शिकार। शिकार कहानी बलात्कार पीडि़त सपना की कहानी है। सपना यानी सपना जैसी तमाम लड़कियां। सपना की सहेली का भाई एक दिन उसका ”शिकार” कर लेता है। सपना गर्भवती हो जाती है। वह गुलाब को जन्म देती है। लेकिन लड़ाई लड़ना नहीं भूलती। फिर शुरू होता है कोर्ट, कचहरी और वकीलों के चक्करों का एक लंबा दुःस्वप्न। वकील भी सपना को यही समझाते हैं, कि गुलाब बड़ा हो रहा है। कल को कोई पूछेगा तो क्या जवाब दोगी। वकील बहस में उलझे रहते हैं कि सपना की उम्र 16 से कम है। सपना के शिकारी को सजा नहीं हो पाती। वह निरपेक्ष भाव से विचरता रहता है। सपना सपनों में ही रहती है। वह अपने शिकारी का कुछ नहीं बिगाड़ पाती। यह कहानी भी समाज और अदालत में बलात्कार पीडितों के फर्स्ट हैंड एक्सपीरियंस पर ही आधारित है। अदालतों का विकृत चेहरा इस कहानी में दिखाई पड़ता है। और दिखाई पड़ता है कि ”सबके लिए न्याय” की अवधारणा में बलात्कार पीडि़ता लड़की कहीं नहीं है। यह कहानी 1995 में प्रकाशित हुई थी।
यह वह दौर था जब ”दलाली” को सामाजिक स्वीकृति मिल रही थी। लोग दलालों को सम्मान की नजर से देखने लगे थे। दलाली चाहे प्रोपर्टी की हो, हथियारों की, सांसदों की, न्याय की, सोने चांदी की या फिर लड़कियों की। अब लोगों को यह साफ दिखाई दे रहा था कि दलाली ही एकमात्र ऐसा पेशा है जहां आपको ऐशो आराम की हर सुविधा उपलब्ध हो सकती है, दलाली ही है जो आपको सत्ता के करीब ला सकती है। इस समय समाज में प्रोपर्टी डीलरों, ब्यूटी पार्लरों और गैर सरकारी संगठनों की संख्या तेजी से बढ़ रही थी। आपसी रिश्तों में संदेह के बीज अंकुरित होने लगे थे, अपने ख्वाबों को पूरा करने के लिए ”कुछ भी देने या लेने का रिवाज” जन्म ले रहा था। नाजायज रिश्तों (हालांकि वह हर दौर में रहे हैं) के लिए पुख्ता जमीन तैयार हो रही थी। समय और समाज के इसी माहौल पर अरविंद जैन की एक कहानी आई ”भेड़-भेडि़या”। वकील के चश्में से कचहरी को देखते हुए अरविंद जैन की यह एक अहम कहानी है। माणिक और मधु के बीच पनपे एक नाजायज रिश्ते की। प्रोपर्टी डीलर माणिक सत्ता के गलियारों तक पहुंच गया था। उसकी भव्य हवेली में आए दिन पार्टियां चलती रहती थीं, जिमें मादक संगीत से लेकर मादक नशों का इंतजाम होता। मधु का ”ब्यूटी पार्लर” खोलने का ख्वाब था। माणिक ने इस ख्वाब को हकीकत में बदलने का सपना मधु को दिखाया। और दोनों एक दूसरे के करीब आ गये। मधु अक्सर अपने घर से दो दो तीन तीन दिन के लिए गायब होने लगी। पांच सितारा होटलो में दोनों की रंगरेलियों के विषय में लोग अनुमान लगाने लगे और चर्चाएं करने लगे। जब अवैध संबंधों का ताप बढ़ा तो एक दूसरे बिना रहना कठिन होता गया है। उनके निरंतर मिलने में मधु के बच्चे बाधक बनने लगे। लिहाजा मधु के दोनों बच्चों-सात साल का बेटा और चार साल की बेटी को माणिक शहर के सुनसान पहाड़ी जंगल में ले जाकर जिंदा जला देता है। यहां से कहानी अदालत पहुंच जाती है। कुछ ही महीनों बाद मधु को स्त्री होने और मुकदमें में सालों लगने की वजह से जमानत पर रिहा कर दिया जाता है। बाद में उसकी रिहाई कराने वाले वकील की भी हत्या कर दी जाती है। लेकिन आपकी संवेदनशीलता बच्चों को जिंदा जलाए जाने की घटना को भूल नहीं पाती। आपको हर जगह वही बच्चे जलते हुए दिखाई पड़ने लगते हैँ। दस साील बाद अखबारों से पता चलता है कि तमाम गवाहों, तथ्यों-सत्यों को देखते हुए दोनों पक्ष के विद्वान वकीलों की बहस सुनने के बाद सेशन जज ने माणिक को ”सजा ए मौत” को हुकुम देते हैं, बशर्ते उच्च न्यायालय फैसले की पुष्टि कर दे। कुछ समय बाद उच्च न्यायालय इस मामले को ”दुर्लभतम में दुर्लभ” न मानते हुए फांसी की सजा को उम्र कैद में बदल दिया। और जैसा की हमेशा होता है एक दिन खबर मिलती है कि माणिक रिहा हो गया है। कहानी का एब्सट्रेक्ट नायक इस खबर से बेचैन हो जाता है। वह पागलों की तरह इधर उधर घूमता है। उसे यही डर सताता रहता है कि माणिक फिर बच्चों को जलाएगा। अगर आप अपने आसपास देखेंगे तो बहुत से माणिक और मधु दिखाई पड़ जाएंगे। कुछ तो ऐसी घटनाएं भी हैं जो बेपनाह चर्चित हुईं और अखबारों की सुर्खियां बनीं। कहानी का अंत प्रतीक रूप में एक ऐसी कलाकृति के सामने होता है जिसमें एक भेडियानुमा आदमी के हाथ में भारी सी तलवार है और दूसरे में तराजू। एक बड़े से पेड़ पर बैठे बंदर अजीब अजीब सा मुंह बना रहे हैं। दाई तरफ बाड़े में बंद भेड़ों के सिर पर काली पट्टी बंधी है। उसके ठीक सामने काठ का लट्ठा रखा था जिसपर खून से लथपथ कटी हुई भेड थी। ऐसा लगता है जैसे तराजू के एक पलड़े में भेड का मांस है और दूसरे में सोने चांदी के सिक्के। भेडिएनुमा आदमी के चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान और संतोष नजर आ रहा है। यहां भेड़ जनता है और भेडिया कानून और न्यायपालिका। बंदर तमाशबीन हैं। और जब जब भेड़ की हत्या होती है भेडिये के चेहरे पर संतोष दिखाई पड़ता है। रियल मंे यह प्रतीक देखना हो तो मुंबई हाईकोर्ट में जाकर देख सकते हैं। इस भव्य बिल्डिंग में लगी यह कलाकृति भव्यता के साथ साथ न्यायपालिका को भी प्रतीकों में चित्रित करती दिखाई पड़ती है। यह कहानी 1992 की एक रियल और कुख्यात घटना पर आधारित है जिसने उस समय समाज के माथे पर शिकन पैदा कर दी थी। यह अरविंद जैन की एक सशक्त कहानी है जो जब भी पढ़ी जाएगी कोर्ट कचहरी को मुंह चिढ़ाती नजर आएगी।
वक्त थोड़ा और आगे बढ़ा। भारतीय समाज में इस दौरान बड़े अहम बदलाव आ चुके थे। 1990 में आर्थिक उदारीकरण, 1994 में ऐश्वर्या राय का मिस वर्ल्ड और सुष्मिता सेन का मिस यूनिवर्स बनना, दोनों को बग्घियों में बिठा कर इंडिया गेट पर सौंदर्य का भव्य प्रदर्शन, इसके दो साल बाद अमिताभ बच्चन की एबीसीएल द्वारा पहली बार भारतीय टेलीविजन पर सौंदर्य प्रतियोगिता का लाइव टेलिकास्ट, दूर संचार क्रांति समाज में दस्तक दे रही थी। यही वह समय था जब माडलिंग की दुनिया का विस्तार हो रहा था और लड़कियों को गोरा बनाने के लिए बाजार तरह-तरह की क्रीमों से पट रहे थे। पांच-पांच साल की उम्र की लड़कियां मिस वर्ल्ड और मिस यूनिवर्स बनने के ख्वाब बुन रही थीं। हर लड़की सुंदर होना, सुंदर दिखना और अपने सुंदरता को बाजार में बेचना सीख रही थी। छोटे छोटे शहरों से निकलकर लड़कियां राजधानी और मुंबई पहुंचने लगीं थीं। उनके अवचेतन में कहीं ऐश्वर्या और सुष्मिता जैसी बनने का सपना लगातार आकार ले रहा था। बिना यह समझे कि यह कितना कठिन है। समाज में आ रहे इन व्यापक बदलावों ने अरविंद जैन को भीतर तक झिंझोड़ दिया। उन्होंने इन बदलावों की बाहरी परत को हटाकर इनके निहितार्थ तलाशने शुरू किये। इस प्रक्रिया में उनका सामना कड़वी सच्चाइयों से हुआ। ”स्लीपिंग पार्टनर” और ”यस पापा” इन्हीं सच्चाइयों से रूबरू कराती कहानियां हैं।
बिजनेस में स्लीपिंग पार्टनर का अर्थ होता है, ऐसा पार्टनर होता है जो प्रबंधकीय फैसलों से दूर रहता है। वह मैनेजमेंट की किसी बैठक में शामिल नहीं होता। अरविंद जैन ने ”स्लीपिंग पार्टनर” कहानी में óी को स्लीपिंग पार्टनर के रूप में चित्रित किया है। यहां स्लीपिंग पार्टनर के अनेक निहितार्थ हैं। स्लीपिंग पार्टनर यानी जिसके साथ आप सोते भर हैं। स्लीपिंग पार्टनर यानी जो किसी भी तरह के निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है, या कोई निर्णय नहीं ले सकता। कहानी का पहला वाक्य है ”शताब्दी अपनी रफ्तार से भागी जा रही है।” यहां शताब्दी गाड़ी भी है और गुजर रही 20वीं सदी भी। इसी शताब्दी से गुजर रही है एक लड़की समीक्षा। वह कोई मिथक कल्पना या सपना नहीं, हाड़ मांस की जीती जागती और घूमती फिरती लड़की है। वह सजग और पढ़ने लिखने वाली लड़की है और अपने लिए ”सुटेबल ब्वाय” की तलाश कर रही है। कहानी का वायवीय सा नायक समीक्षा के साथ बतियाता है, चर्चाएं करता है। एक दिन यही नायक कहता है, समीक्षा …आज मेरे साथ चलो ना, क्या हम लाइफ पार्टनर नहीं बन सकते। समीक्षा गौर से नायक को देखते हुए बोलती है, आज से तुम्हारा मतलब, मैं रोज किसी न किसी…। समीक्षा फिर कहती है, अगर तुमने ”आज” न कहा होता। तुम हमेशा पार्टनरशिप की बात करते हो…बात। मुझे लगता है तुम्हें ”लाइफ पार्टनर” नहीं ”स्लीपिंग पार्टनर” चाहिए…हर जगह स्लीपिंग पार्टनर। यह कहकर समीक्षा चली जाती है। सुबह आंगन से सड़क तक-सिंदूर, कांच की चूडि़यां, लाल साड़ी, मंगल सूत्र और ”मर्निंग गिफ्ट” बिखरे पड़े थे। और शताब्दी…अपनी रफ्तार से भागी जा रही थी। क्या आज विवाह का अर्थ केवल स्लीपिंग पार्टनरशिप नहीं रह गया है? क्या स्त्रियां केवल स्लीपिंग पार्टनर ही नहीं समझी जातीं? क्या लाइफ पार्टनर का अर्थ स्लीपिंग पार्टनर ही नहीं हो गया है? पति पत्नी, विवाह और प्रेम संबंधों के इसी स्वरूप से साथ हम 21वीं सदी में पहुंच गये हैं। यही कहती है कहानी। स्त्री को महज स्लीपिंग पार्टनर मानने की सोच ही है जो स्त्री के हिस्से का आकाश छीन रही है, स्त्री की अस्मिता और अस्तित्व की लड़ाई को कमजोर बना रही है। इसी सोच के चलते जेवर और रामपुर जैसे कांड हो रहे हैं। लिहाजा जो शताब्दी गुजर गयी वह गुजर गयी, लेकिन 21वीं सदी में हमें इस सोच को बदलना होगा तभी óी को उसके हिस्से का स्पेस मिल सकेगा।
”यस पापा” एक एब्सर्ड कहानी है। इसमें महाज्ञान बाबू का इकलौता बेटा है चेतन। यही चेतन कभी चेतन है और कभी चेतना में बदल जाता है। चेतन और चेतना कभी अर्द्धनारीश्वर की अवधारणा को पूरा करते दिखाई देते हैं और कभी ऐसा लगता है कि ये ट्रांसजेंडर हैं। और कभी ये दोनों केवल स्त्री पुरुष के रूप में दिखाई पड़ते हैं। यहां भी चेतना माडलिंग की दुनिया में है। वह ”शूटिंग” के लिए जाती है। वह समझ रही है और उसे लगातार समझाया जा रहा है कि जिस ब्रांड को वह छुएगी वह सोना बन जाएगा। इस मायावी खेल में वह खुद ब्रांड बनती जा रही है। चेतन गुडि़यों भरी गाडि़यां लेकर कोठियों से कोठों तक घूमता है। और पापा महाज्ञान बाबू सोने के सिक्के तौलते, शेयर गिनते और ”बजट” बनाते रहते हैं। चेतन और चेतना के रूप में स्त्री पुरुष के बीच एक द्वन्द्व लगातार चलता रहता है। एक दिन चेतना चेतन से कहती है, चेतन तू चूहा है चूहा…और चूहे से ज्यादा अवसरवादी और घिनौना कोई नहीं होता। चेतन इसके जवाब में वही हथियार इस्तेमाल करता है जो पुरुषों का सदियों पुराना हथियार और सोच है। चेतन कहता है, इफ आई एम ए रैट, यू आर ए कैट मेयर ली ए स्टिकिंग कंट। अंत में प्रतीक रूप में चेतना की आंख खुलती है तो वह देखती है कि उसकी एक मुट्ठी में मरा हुआ चूहा है और दूसरी में चेतन का चेहरा। लेकिन यह सपना भर है। आशावाद है। स्त्री की उस संभावित विजय का प्रतीक है जो उससे कोसों दूर है। आज की स्थिति तो यही है कि यह ”चेतनों” का दौर है और चेतन कभी स्त्री को पहचान और उसके अधिकार देने के पक्ष में नहीं है। और महाज्ञान बाबू सिक्कों को ही तौलते रहते हैं।
भारतीय समाज के इसी संक्रमण काल में लिखी अरविंद जैन की एक अहम कहानी है ”लापता लड़की”। उनकी कहानियों में लड़की किसी जाति, धर्म, किसी वर्ग की नहीं है, बस वह लड़की है। मानो लड़की अपने आप में ही एक जाति है, धर्म है। ”लापता लड़की” शीर्षक से कहानी में अरविंद कहते हैं, कहानी तो बस इतनी सी है कि वह लड़की घर लौटने के बाद, सारी रात सपनों का स्वेटर बुनती और सारा दिन दफ्तर में ऊंघते-ऊंघते उधेड़ती रहती। यह कहानी का कंकाल है। लेकिन अगर आप यह सोचने बैठ जाएंगे कि यह लड़की कौन है किस मज़हब की है, मध्यवर्ग की है, उच्च वर्ग की या निम्न वर्ग की, इसका नाम क्या है तो आप उलझ जाएंगे। कहानी के इस कंकाल में आप किसी भी लड़की का बायोडाटा भर सकते हैं। यानी यह कहानी किसी भी लड़की की हो सकती है या यह कहानी हर लड़की की है। अरविंद जैन का विरोध और तल्खी कहानियों में भी बदस्तूर चलती है। ”बदसूरत लड़की का साहित्य में क्या काम”, ”लड़कियों के अपने घर भी कहां होते हैं,” वह तो अक्सर पिता या पति (और उनके मर्द वारिसों) का ही होता है न, जैसे वाक्यों से वह पितृसत्ता पर लगातार चोट करते चलते हैं। यह लापता लड़की नौकरी की तलाश में राजधानी दिल्ली पहुंचती है। यहां होस्टल के 69 नंबर रूम में रहते हुए वह ”सेकेंड सेक्स,””सेक्स” ”मदर”से लेकर ”सुटेबल ब्वाय” तक पर चिंतन करती है। वह कभी नहीं समझ पाई कि लड़कियां उसे मिस 69 क्यों कहती हैं। धीरे-धीरे वह राजधानी को समझने लगती है और राजधानी उसे। विभिन्न लोगों और बिस्तरों से होते हुए कहानी की ये नायिका किस तरह एक तस्वीर में बदल जाती है, यही कहानी है। छोटे शहरों से बड़े सपने लेकर राजधानी में आने वाली लड़कियों को किन स्थितियों से गुजरना पड़ता है, यह इस कहानी में दिखाया गया है। कहानी का अंत अधिकांश कहानियों की तरह स्त्री संघर्ष को कोई नया रास्ता नहीं सुझाता। हो सकता है इसका कोई रास्ता हो ही ना, लेकिन लेखक ने कहानी का अंत करते हुए लिखा है, सामने नजर पड़ी तो दीवार पर लगे कैलेंडर में लड़की, वही लड़की घोड़े पर बैठी मुस्करा रही थी। घोड़ा रेस का प्रतीक और लड़की का घोड़े पर बैठना दो अर्थ देता है। एक तो यह कि वह भी रेस में शामिल हो चुकी है और दूसरा वह बेशक इस रेस को नहीं जीत पाई लेकिन दूसरी लड़कियां आएंगी जो ”ड्राइविंग” सीट पर होंगी। या एक अर्थ यह भी हो सकता है कि लड़की अंततः एक ऐसी तस्वीर की तरह जीवन गुजारती है जिसके न अपने सपने हैं, ना उन सपनों को पूरा करने का कोई रास्ता उसके पास है, उसे हमेशा उपयोग और उभभोग की वस्तु की तरह ही ट्रीट किया जाएगा। कहानी का अंत पढ़कर आपकी बेचैनी और बढ़ जाती है।
बीसवीं सदी के अंतिम वर्ष तक भारतीय समाज में तकनीक गहरे तक दस्तक दे चुकी थी। अब सपने तकनीक के जरिये देखे जा रहे थे। 94-95 में ऐस्वर्या और सुष्मिता ने मध्यवर्ग की लड़कियों को जो सपने दिये थे, अब उनका विस्तार हो रहा था। इसी दौर को रिफ्लेक्ट करती है एक कहानी है बुलैट प्रूफ। ”बुलैट प्रूफ” कहानी की शुरुआत इस तरह होती है, ”ब्यूटी क्लीनिक” से घर आते-आते मिस मर्यादा उर्फ ”ब्यूटी विद द ब्रेन” को अचानक ऐसा लगने लगा कि वह जादू की देह है और देह के जादू से, मिट्टी को सोने में बदल सकती है।” यहां से आप माडलिंग वर्ल्ड में प्रवेश करते हैं। जहां आपको ”नाइटक्रीम”, ”मिडनाइट क्रीम” और ”ड्रीमक्रीम” लगाती सुंदरियां दिखाई पड़ती हैं। मिस मर्यादा प्रतिमा में बदलती है तो प्रतिमा आकृति में तब्दील हो जाती है। लड़कियां बदलती रहती हैं और बैकग्राउंड वही रहती है। सौंदर्यवर्धक साबुन और शैंपू, निर्मल कोमल सुरक्षित अहसास, टफ शूज़, चार मीनार से ट्रिपल फाइव तक के पैकेट, विभिन्न किस्म के परफ्यूम, कंडोम कल्चर, यूज एंड थ्रो की इक्वेशंस, माइक्रो स्कर्ट और बुलैट प्रूफ ब्रा….। गौरतलब है कि जर्मनी में महिला पुसिलकर्मियों की सुरक्षा के लिए बुलैट प्रूफ की व्यवस्था की गयी थी। लेकिन कहानी में ”बुलैट प्रूफ ब्रा” महिलाओं को सुरक्षा दिये जाने का प्रतीक है। यानी महिलाओं को बुलैट प्रूफ सुरक्षा की जरूरत है। कहानी माडलिंग के तमाम अंधेरों के दिखाने के बाद ”ब्लाइंट स्ट्रीट” पर माड्ल्स की हत्या के साथ खत्म होती है। कहानी का अंतिम पैरा कहता है, शहर में आम चर्चा है कि पीछे पीछे एक छोटी सी दुबली-पतली और सांवली सी लड़की आई और गली में पड़ी एक जोड़ी सैण्डिल और जुते उठा कर भाग गयी। पुलिस हत्यारे की तलाश में घूम रही है और हत्यारा जूतों की।….जूते तो वो छोटी-सी, प्यारी सी, खरगोश शर्मिली लड़की उठा कर भाग गई और न मालूम किस की कोख में जा छिपी।….अरविंद कहानी के इस अंत में यह कह रहे हैं कि माडलिंग की दुनिया की विरासत को आने वाली लड़कियों ने संजो लिया है। अर्थात यही लड़कियों की नियति है और यही भविष्य। वह इस में किसी तरह के बदलाव को भी नहीं देखते। इसीलिए एक छोटी सी, दुबली-पतली और सांवली सी लड़की रोल माड्लों के सैण्डिल और जूते (जो प्रतीक में वर्तमान माडलिंग की दुनिया की विरासत है) उठाकर ले गयी है। यानी इस वर्ल्ड में आने वाला समय भी लड़कियों के लिए बदलने नहीं जा रहा है।
संग्रह की अंतिम कहानी के रूप में ”उसका जाना” कहानी है। आज लड़कियों का लापता होना इस समाज की नियति सी बन गया है। उसे जाना ही है। ”उसका जाना” कहानी ऐसी ही एक लड़की संभावना (यह नाम सिर्फ प्रतीक है जो सिर्फ लड़कियों के बच जाने की संभावना की ओर संकेत करता है) की है। संभावना की स्मृति में रोज एक विमान उड़ान भरता और सांझ होते-होते दुर्घटनाग्रस्त हो जाता। इस कहानी में अरविंद जैन अपनी स्मृतियों में उस लड़की को खोज रहे हैं जो गुम हो गयी है। यह लड़की बहन, बेटी, दोस्त, प्रेमिका कुछ भी हो सकती है। अनुपस्थित हो गयी ये लड़की लगातार परेशान करती है। तरह-तरह के सवाल आपसे पूछती है। आप इस संभावना को तलाश करते रहते हैं। तलाश करना चाहते हैं। कभी दुर्घटनाओं के दुष्चक्र में, कभी दहेज के लिए जला दी गयी बहुओं में, कभी आत्महत्या करने वाली लड़कियों की फेहरिस्त में। लेकिन संभावना के मिलने की कोई संभावना दिखाई नहीं देती। जीवन अपनी गति से चलता रहता है। आपकी संवेदनशीलता और सरोकार हर संभावना को तलाशने के लिए बाध्य करते हैं। लेकिन संभावना कहीं नहीं है। निराशा की यह स्थिति आपको लगातार मृत्यु की ओर ले जा रही है। और जब मृत्यु सामने आती है तो आप हारे हुए योद्धा की तरह बिना सोचे समझे कहते हैं, नहीं, मुझे किसी से नहीं मिलना…संभावना से भी नहीं। और मृत्यु के साथ जाने के लिए तैयार हो जाते हैं। संभावना की खोज को आपने बिलकुल समाप्त कर दिया है। यह निराशा की पराकाष्ठा हो सकती है। या यह भी हो सकता है कि यही हमारे समाज का यथार्थ हो। खो गयी या खो रही संभावनाओं की वापसी की कोई संभावना नहीं है।
पेशे से वकील अरविंद जैन तीन से भी अधिक दशकों से महिला अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। कॉपी कानून के वे विशेषज्ञ वकील माने जाते हैं और अधिकांश मुकदमें उन्होंने लड़े हैं। ”औरत होने की सजा” महिला कानूनों पर मानवीय नजरिये से लिखी गयी उनकी किताब ने उन्होंने लोकप्रियता और अहमियत दिलाई है। लेकिन कहानी लिखना उनके पूरे व्यक्तित्व का जरूरी हिस्सा है।
अरविंद जैन की सोच, उनका कार्यक्षेत्र, उनकी बातें, उनका पढ़ना लिखना, उनकी जीवन शैली, स्त्री के लिए हक के लिए उनकी लगातार लड़ाई सब कुछ इन कहानियों में दिखाई पड़ता है-और अब एक क्रम में। कहानियां ऐसा लगता है कि अरविंद जैन के व्यक्तित्व का ही हिस्सा हैं। इन कहानियों में कहीं भी आपको ऐसे तत्व नहीं मिलेंगे जो अरविंद जैन को कहानियों से अलग खड़ा करते हों। यानी दोनों एक ही हैं। अरविंद जैन ने हिंदी कहानी को एक नयी भाषा और मुहावरा देने की इन कहानियों में सफल कोशिश की है। उनके किरदारों के नाम यूं ही नहीं रखे गये हैं, बल्कि वे स्वयं अपने आप में बहुत कुछ कहते दिखाई पड़ते हैं। संभावना, समीक्षा, कृति, आकृति, अंकिता, छवि, सपना, चेतना, भावना…लड़कियों के सभी नाम केवल नाम भर नहीं है बल्कि ये नाम स्त्री की पहचान को आगे ले जाते दिखाई पड़ते हैं। ये ऐसी कहानियां हैं जिनमें नायक कोई नहीं है। लड़की स्वयं नायक है और स्वयं ही नायिका। ”लापता लड़की” वास्तव में एक बेहद जरूरी किताब है जिसे न केवल पढ़ा जाना चाहिए बल्कि समझा भी जाना चाहिए।

”लापता लड़की” का प्रकाशन राजकमल प्रकाशन ने किया है।

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